❖ राजस्थान की जनजातियाँ
- भारत में सर्वाधिक जनजाति – मध्यप्रदेश
- न्यूनतम जनजाति – पंजाब, हरियाणा
- जनजाति जनसंख्या की दृष्टि से राजस्थान का देश में स्थान – 4
- भारत में सर्वाधिक जनजाति प्रतिशत – मिजोरम
- प्रतिशत के आधार पर राजस्थान का स्थान – 13वाँ
- विश्व आदिवासी दिवस – 9 अगस्त को मनाया जाता है
❖ राजस्थान में जनजाति वितरण –
- सर्वाधिक जनजाति जनसंख्या वाले जिले – उदयपुर, बाँसवाड़ा
- सर्वाधिक जनजाति प्रतिशत वाले जिले – बाँसवाड़ा, डूंगरपुर
- न्यूनतम जनजाति जनसंख्या वाले जिले – बीकानेर, नागौर
- न्यूनतम जनजाति प्रतिशत वाले जिले – नागौर, बीकानेर
❖ राजस्थान की प्रमुख जनजातियाँ –
- मीना, भील, गरासिया, सहरिया
- राजस्थान की जनजातियाँ मुख्यतः अरावली पर्वतीय क्षेत्र में निवास करती हैं
❖ मीना जनजाति –
- राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति
- प्रमुख क्षेत्र – जयपुर, अलवर, दौसा, करौली
- मत्स्य पुराण में मीना जनजाति का उल्लेख मिलता है
- ‘मीना’ शब्द का अर्थ – मत्स्य (मछली)
- उत्पत्ति – भगवान विष्णु के प्रथम अवतार मत्स्यावतार से संबंधित मानी जाती है
- कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार इनकी उत्पत्ति कालीखोह पर्वतमाला (अजमेर से आगरा तक) से मानी जाती है
- मीना पुराण में मुनी मगन सागर ने मीना जनजाति की 5200 गोत्र व 24 खाप का उल्लेख किया है
❖ मीना जनजाति के प्रकार –
(1) चौकीदार मीना – दुर्ग व महलों की सुरक्षा कार्य
(2) जमींदार मीना – कृषि एवं पशुपालन कार्य
- पडीहार मीना – टोंक, भीलवाड़ा, बूंदी
- मीना व कंजर जाति का मुखिया – पटेल कहलाता है
- मीना जनजाति की सबसे बड़ी पंचायत – चौरासी पंचायत
- मीना जनजाति को सबसे अधिक शिक्षित जनजाति माना जाता है
- विवाह की प्रमुख परंपरा – मोरनी मांडना
- आराध्य देव – भूरिया बाबा / गौतमेश्वर
❖ भील जनजाति –
- राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी एवं प्राचीन जनजाति
- प्रमुख क्षेत्र – उदयपुर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर
- कर्नल जेम्स टॉड ने भीलों को “वन पुत्र” कहा है
- ‘भील’ शब्द का संबंध तीर-कमान (धनुष-बाण) से माना जाता है
- विलियम रोने की पुस्तक Wild Tribes of India में भीलों का उत्पत्ति स्थल मारवाड़ बताया गया है
❖ कृषि परंपराएँ –
- चिमाता – पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानांतरित कृषि हेतु जंगल काटना/जलाना
- दजिया – मैदानी क्षेत्रों में की जाने वाली कृषि
- उदरिया पंथ – जयसमंद झील क्षेत्र के भीलों में प्रचलित परंपरा
- भीलों का रणघोष – ‘फाइरे-फाइरे’
- केसरियानाथ जी (ऋषभदेव जी) के प्रति मान्यता है कि केसर का जल पीकर भील सत्य बोलते हैं
❖ भील समाज की शब्दावली –
- घर – टापरा / कू
- छोटे गाँवों का समूह – फला
- बड़ा गाँव – पाल
- पाल का मुखिया – पालवी
- गाँव समूह का प्रमुख – गमेती
- बरामदा – डहलिया
- कुल देवता – टोटम
- मुख्य भोजन – मक्का
- पवित्र वृक्ष – महुआ (कल्पवृक्ष)
- देशी शराब – महुआ से निर्मित
- विवाह में चित्रांकन – भराडी देवी का चित्र
- मृत्यु भोज – कायता (काटटा)
- घोड़े को मारने वाला – पाखरिया
- हाथीवेडो विवाह – वृक्ष को साक्षी मानकर विवाह
- दापा – वर पक्ष द्वारा वधू मूल्य
- छेड़ा फाड़ना – तलाक की प्रक्रिया
- गोदना – शरीर पर चित्रांकन
- मौताना – मृत्यु के बदले लिया गया धन
- हेलमो – सामूहिक कृषि कार्य
❖ भील जनजाति के प्रमुख मेले –
(1) बेणेश्वर मेला – नवाटपुरा (डूंगरपुर) – माघ पूर्णिमा
(2) घोटिया अम्बा मेला – बाँसवाड़ा – चैत्र अमावस्या
- इसे आदिवासियों का दूसरा कुंभ कहा जाता है
❖ गरासिया जनजाति –
- राजस्थान की तीसरी प्रमुख जनजाति
- प्रमुख क्षेत्र – आबूरोड (सिरोही), गोगुन्दा (उदयपुर), बाली (पाली)
- कर्नल टॉड के अनुसार ‘गरासिया’ शब्द की उत्पत्ति गवास (सेवक) से हुई है
- नक्की झील (सिरोही) को पवित्र मानकर पूर्वजों की अस्थियाँ प्रवाहित की जाती हैं
❖ गरासिया के प्रकार –
(1) भील गरासिया – भील महिला से विवाह करने पर
(2) गमेती गरासिया – गरासिया महिला से विवाह करने पर
- मुखिया – सहेलोत
- घर – घेर
- गाँव इकाई – फालिया
- बरामदा – ओसरा
- अनाज भंडारण कोठी – सोहरी
- स्मारक – हुरे
- स्थानांतरित कृषि – वालरा
- सामूहिक कृषि – हारी-भावरी
- विकास संस्था – हेलरू
- सर्वाधिक प्रचलित विवाह – प्रेम विवाह
❖ विवाह प्रकार –
(1) मोर बंधिया – पारंपरिक ब्रह्म विवाह
(2) पहरावणा – प्रतीकात्मक फेरे
(3) ताणना – दापा देकर विवाह
(4) मेलबो – वधू को घर लाना
❖ प्रमुख मेले –
(1) सियावा का गौर मेला – सिरोही (सबसे बड़ा)
(2) चैत्र विचित्र मेला – देलवाड़ा (सिरोही)
(3) भाखर बावजी मेला – आदिपुरुष की स्मृति में
❖ सहरिया जनजाति –
- ‘सहर’ शब्द का अर्थ – जंगल
- प्रमुख क्षेत्र – बारां (शाहबाद, किशनगंज), कोटा
- राजस्थान की एकमात्र जनजाति जिसे आदिम जनजाति समूह (Primitive Tribal Group) में शामिल किया गया है
- आदिपुरुष – वाल्मीकि
❖ पंचायत व्यवस्था –
(1) पंचताई – 5 गाँव
(2) एकदसिया – 11 गाँव
(3) चौरासिया – 84 गाँव
सबसे बड़ी पंचायत – चौरासिया पंचायत (सीताबाड़ी, बारां)
- घर – टापरा
- गाँव – सहरोल
- बस्ती – सहराना
- झोपड़ी – हथाई
- अनाज कोठी – कुसिला
- आटा कोठी – भडेरी
- मुखिया – कोतवाल
- वृक्षीय आवास – गोफना / कोरूआ / टोपा
- कुल देवी – कोडिया देवी
- लोक देवता – तेजाजी महाराज
- सहरिया समाज में दहेज प्रथा एवं श्राद्ध परंपरा नहीं है
- विशेष संस्कार – धारी संस्कार
- विकास कार्यक्रम – सहरिया विकास कार्यक्रम (1977-78)
❖ प्रमुख मेला –
(1) सीताबाड़ी मेला – बारां (ज्येष्ठ अमावस्या, सहरिया कुंभ)
(2) कपिल धारा मेला – बारां (कार्तिक पूर्णिमा)
❖ कथौड़ी जनजाति –
- मूल रूप से यह जनजाति महाराष्ट्र से संबंधित मानी जाती है
- प्रमुख निवास क्षेत्र – उदयपुर जिले के कोटड़ा, झाड़ोल, सराड़ा, साथ ही डूंगरपुर और बाँसवाड़ा
- यह लोग खैर वृक्ष की छाल से कत्था तैयार करने का कार्य करते हैं
- इनके आवास को खोलरा कहा जाता है
- महिलाएँ परंपरागत रूप से मराठी शैली की साड़ी पहनती हैं, जिसे फड़का कहा जाता है
- पति-पत्नी दोनों द्वारा साथ में शराब सेवन की परंपरा देखी जाती है
- समाज का प्रमुख नायक कहलाता है
- भोजन में बंदर का माँस पसंद किया जाता है तथा दूध का उपयोग नहीं किया जाता
❖ कंजर जाति –
- सर्वाधिक जनसंख्या भीलवाड़ा एवं हाड़ौती क्षेत्र में पाई जाती है
- ‘कंजर’ शब्द की उत्पत्ति काननचर से मानी जाती है, जिसका अर्थ है जंगल में विचरण करने वाला
- इनकी मान्यता है कि हाकम राजा का प्याला पीकर कभी झूठ नहीं बोलते
- मृत शरीर को दफनाने की परंपरा है तथा अंतिम संस्कार में मृतक के मुख में शराब डालने की प्रथा है
- पारंपरिक रूप से इनका मुख्य व्यवसाय अपराध से जोड़ा जाता है, इसलिए घरों के पीछे भागने हेतु विशेष खिड़की बनाई जाती है
- आराध्य देव – हनुमान जी
- कुल देवी – चौथ माता (चौथ का बरवाड़ा, सवाईमाधोपुर)
- आराध्य देवी – जोगणिया माता (भीलवाड़ा)
- अपराध से पूर्व ईश्वर से आशीर्वाद लेने की परंपरा को ‘पाती मांगना’ कहा जाता है
❖ डामोर जनजाति –
- प्रमुख रूप से सीमलवाड़ा (डूंगरपुर), बाँसवाड़ा एवं उदयपुर क्षेत्रों में निवास करती है
- इनका मुख्य व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन है
- गाँव को फला तथा मुखिया को मुखी कहा जाता है
- पुरुषों द्वारा महिलाओं की तरह आभूषण धारण करने की परंपरा भी देखी जाती है
प्रमुख मेले –
- छैला बावजी का मेला – पंचमहल (गुजरात)
- ग्यारस का रेवाड़ी मेला – डूंगरपुर
❖ सांसी जाति –
- उत्पत्ति सासमल नामक व्यक्ति से मानी जाती है
- सर्वाधिक जनसंख्या क्षेत्र – भरतपुर एवं झुंझुनूं
- प्रमुख उपजातियाँ – बीजा, माला
- विवाह नारियल की गिरी से तय करने की परंपरा है
- यह समुदाय विधवा विवाह नहीं करता
- कुकड़ी रस्म (महिलाओं की चरित्र परीक्षा) प्रचलित है
- यह समुदाय अनुसूचित जाति (SC) श्रेणी में शामिल है
- अपने विवादों का निपटारा हरिजन समुदाय की मध्यस्थता से करता है
❖ जनजातियों एवं जातियों से संबंधित तथ्य –
- लोकाई – आदिवासियों में मृत्युभोज की परंपरा
- लीला मोरिया – विवाह से जुड़े संस्कार
- बडालिया – विवाह संबंधों में दो पक्षों के बीच मध्यस्थता करने वाला व्यक्ति
- रावल जोगी – जिनके कान कटे होते हैं तथा जटा धारण करते हैं, उनका प्रतीक
- राइका / रेबारी जाति – भेड़, बकरी एवं ऊँट पालन करने वाली जाति, मुख्यतः मारवाड़ क्षेत्र में निवास
❖ संस्थागत तथ्य –
- राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग – 1975 में स्थापना
❖ राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास सहकारी संघ –
- स्थापना – 1976, उदयपुर
❖ जनजाति कल्याण प्रकोष्ठ (Tribal Welfare Cell) –
- स्थापना – 2011, राजभवन (जयपुर)
❖ माणिक्य लाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान –
- स्थापना – 2 जनवरी 1964, उदयपुर
- उद्देश्य – आदिवासी समाज में जागृति एवं विकास कार्यों को बढ़ावा देना
