❖ राजस्थान की मध्यकालीन प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था ❖
❖ सामन्ती व्यवस्था –
- सम्पूर्ण शासन व्यवस्था का सर्वोच्च केन्द्र राजा होता था।
- परंपरा के अनुसार बड़ा भाई ही राज्य का राजा बनता था।
- शासन, न्याय तथा सैन्य शक्ति का अंतिम अधिकार राजा के पास होता था।
- राजा अपने भाइयों को जागीर प्रदान करता था तथा उस जागीर का स्वामी सामन्त कहलाता था।
- राजस्थान की प्रशासनिक संरचना मुख्य रूप से सामन्ती व्यवस्था पर आधारित थी।
- जागीरों पर अधिकार वंशानुगत होता था।
❖ राज्य के प्रशासनिक अधिकारी –
➤ प्रधान / प्रधानमंत्री
- राजा के बाद यह राज्य का सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी माना जाता था।
- शासन, सेना तथा न्याय संबंधी कार्यों में यह राजा का प्रमुख सहयोगी होता था।
- इसे मुख्यमंत्री अथवा मंत्रीप्रवर के नाम से भी जाना जाता था।
- जयपुर रियासत में प्रधानमंत्री को मुसाहिब, जबकि कोटा एवं बूंदी में फौजदार या दीवान कहा जाता था।
➤ दीवान
- राजा को आर्थिक, वित्तीय तथा राजस्व संबंधी विषयों की जानकारी उपलब्ध कराता था।
- राजा की अनुपस्थिति में यदि राज्य का संचालन करता था, तो उसे देश दीवान कहा जाता था।
- दीवान अर्थ विभाग का अध्यक्ष होता था।
- इसके कार्यालय दीवान-ए-हजूरी में राज्य के महत्वपूर्ण अभिलेख सुरक्षित रखे जाते थे।
- इसके कार्यालय में महकमा-ए-बकायात भी होता था, जो बकाया राजस्व की वसूली तथा अच्छी फसल होने पर शेष राजस्व एकत्र करने का कार्य करता था।
➤ बख्शी
- सेना विभाग का अध्यक्ष होता था तथा इसका कार्य रक्षामंत्री के समान माना जाता था।
➤ अक्षपटलिक
- राज्य की आय-व्यय का पूरा लेखा-जोखा रखने वाला अधिकारी होता था।
➤ मीर मुंशी
- राजनयिक एवं कूटनीतिक पत्र-व्यवहार का दायित्व निभाने वाला अधिकारी होता था।
➤ खरीता
- राजा द्वारा अन्य राजाओं को भेजे जाने वाले पत्र को खरीता कहा जाता था।
➤ रुक्का
- राजा द्वारा सामन्तों को भेजा गया पत्र रुक्का कहलाता था।
➤ किलेदार
- किले की सुरक्षा, रख-रखाव एवं प्रबंधन का उत्तरदायित्व निभाता था।
➤ नैमित्तिक
- राज्य का राजकीय ज्योतिष होता था।
| अधिकारी / पद | मुख्य कार्य |
|---|---|
| प्रधान / प्रधानमंत्री | राजा का प्रमुख सहयोगी एवं राज्य का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी। |
| दीवान | वित्त, राजस्व एवं अर्थ विभाग का प्रमुख अधिकारी। |
| बख्शी | सेना विभाग का अध्यक्ष। |
| अक्षपटलिक | राज्य की आय-व्यय का लेखा-जोखा रखता था। |
| मीर मुंशी | राजनयिक एवं कूटनीतिक पत्र-व्यवहार का प्रभारी। |
| खरीता | राजा द्वारा अन्य राजाओं को भेजा गया पत्र। |
| रुक्का | राजा द्वारा सामन्तों को भेजा गया पत्र। |
| किलेदार | किले की सुरक्षा एवं प्रबंधन का अधिकारी। |
| नैमित्तिक | राज्य का राजकीय ज्योतिष। |
❖ सामन्तों द्वारा दिये जाने वाले कर –
➤ रेख
यह भू-राजस्व कर था, जिसके दो प्रकार थे—
- पट्टा रेख — अनुमानित वार्षिक आय के आधार पर निर्धारित कर।
- भरतु रेख — वास्तविक आय के आधार पर निर्धारित कर।
➤ उत्तराधिकारी शुल्क
- मेवाड़ में इसे कैद खालसा, तलवार बंधाई अथवा नजराना कहा जाता था।
- मारवाड़ में यही शुल्क पेशकशी तथा हुक्मनामा के नाम से जाना जाता था।
- जैसलमेर रियासत में यह कर लागू नहीं था।
➤ गनीम बराड
- युद्ध के समय लिया जाने वाला विशेष कर था।
➤ नजराना
- त्योहारों एवं उत्सवों के अवसर पर राजा को दी जाने वाली भेंट को नजराना कहा जाता था।
❖ भू-राजस्व व्यवस्था –
➤ खालसा – वह भूमि जो सीधे राजा के अधिकार एवं नियंत्रण में होती थी।
➤ जागीर –
- वह भूमि जो सामन्तों के अधीन होती थी।
- जागीर शब्द फ़ारसी भाषा से लिया गया है।
➤ भोम –
- भूमियों के अधीन लगान-मुक्त भूमि को भोम कहा जाता था।
- राजा युद्ध में वीरतापूर्वक बलिदान देने वालों को भोमिया की उपाधि प्रदान करता था।
➤ इजारा भूमि
- इसे ठेका प्रणाली अथवा आकबन्दी के नाम से भी जाना जाता था।
- बीकानेर में इसे मुक्ता कहा जाता था।
➤ साद प्रथा – मेवाड़ में किसानों से लगान की वसूली सुनिश्चित करने के लिए महाजन से आश्वासन लिया जाता था।
➤ चारागाह / चरनोता भूमि –
- यह भूमि पशुओं के चरने के लिए निर्धारित होती थी।
- इसका नियंत्रण ग्राम पंचायत के अधीन रहता था।
➤ अग्रहार
- ब्राह्मणों को दान में दी जाने वाली भूमि अग्रहार कहलाती थी।
- यह भूमि पूर्णतः कर-मुक्त होती थी।
➤ अडसट्टा
- जयपुर राज्य का भूमि संबंधी अभिलेख (रिकॉर्ड) अडसट्टा कहलाता था।
➤ ज़ब्ती
- परगनों में भूमि की नाप के आधार पर प्रति बीघा राजस्व निर्धारित कर उसकी वसूली की जाती थी, जिसे ज़ब्ती कहा जाता था।
- इस व्यवस्था की शुरुआत टोडरमल ने की थी।
➤ मिल्क / सयूरगल
- ऐसी कर-मुक्त भूमि जो विद्वानों, चारणों, भाटों तथा धार्मिक व्यक्तियों को प्रदान की जाती थी।
- मुगल काल में इस प्रकार की भूमि को मदद-ए-माश कहा जाने लगा।
