राजस्थान की भाषा व बोलियाँ

राजस्थान की भाषा व बोलियाँ

  • राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति शौरसेनी प्राकृत के गुर्जरी अपभ्रंश से 12 वीं शताब्दी में मानी जाती है
  • मोतीलाल मेनारिया, डॉ. माहेश्वरी तथा K.M. मुंशी के अनुसार भी राजस्थानी भाषा का उद्भव गुर्जरी अपभ्रंश से ही हुआ है
  • L.P. टेस्सीटोरी के अनुसार गुर्जर अपभ्रंश से राजस्थानी भाषा का विकास हुआ तथा 12 वीं शताब्दी के लगभग यह भाषा अस्तित्व में आ चुकी थी
  • राजपूताने की प्राचीन लिपि ब्राह्मी लिपि थी
  • जार्ज ग्रियर्सन तथा पुरुषोत्तम लाल मेनारिया के अनुसार राजस्थानी भाषा का उद्गम नागर अपभ्रंश से हुआ है
  • राजस्थानी भाषा पश्चिमी इंडो-आर्यन भाषा परिवार से संबंधित है
  • हिन्दी दिवस 14 सितम्बर को मनाया जाता है
  • राजस्थानी भाषा दिवस 21 फरवरी को मनाया जाता है
  • हिन्दी बोलने वाले राज्यों में उत्तरप्रदेश पहले स्थान पर तथा राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर आता है
  • राजस्थानी भाषा का स्वतंत्र काल 16 वीं सदी माना जाता है
  • राजस्थानी भाषा का स्वर्ण काल 1650 – 1850 ई माना जाता है
  • 778 ई में उद्योतन सूरी द्वारा रचित कुवलयमाला ग्रंथ में 18 देशी भाषाओं में मरूभाषा का उल्लेख किया गया है, जो पश्चिमी राजस्थान की भाषा है
  • आइन ए अकबरी (रचयिता अबुल फजल) तथा कवि कुशललाभ की रचना पिंगल शिरोमणि में भी मारवाड़ी भाषा का उल्लेख मिलता है

❖ राजस्थानी भाषा की डिंगल व पिंगल शैली –

❖ डिंगल

  • पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी बोली) का साहित्यिक स्वरूप है
  • चारण साहित्य में प्रयुक्त होने वाली विशुद्ध राजस्थानी भाषा है
  • यह मुख्यतः गीतों के रूप में मिलती है तथा गुर्जरी अपभ्रंश से निर्मित मानी जाती है
  • प्रमुख ग्रंथ – अचलदास खींची री वचनिका (रचयिता शिवदास गाडण), राजरूपक (वीरभान), राव जैतसी रो छंद (बीठू सूजा), ढोला मारू रा दूहा (कवि कलोल), सगत रासो (गिरधर आसिया), वेलि कृष्ण रुकमणी री (पृथ्वीराज राठौड़)
  • डिंगल साहित्य में वयन (वैण) सगाई अलंकार पाया जाता है, जिसमें दोहा छंद का पहला और अंतिम शब्द एक ही वर्ण से प्रारंभ होता है

❖ पिंगल –

  • पूर्वी राजस्थानी तथा ब्रजभाषा का साहित्यिक रूप है
  • यह भाटों द्वारा प्रयुक्त ब्रज मिश्रित राजस्थानी है
  • इसमें छंद और पदों का प्रयोग मिलता है तथा इसकी उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से मानी जाती है
  • प्रमुख ग्रंथ – पृथ्वीराज रासो, विजयपाल रासो (नल्ल सिंह), खुमाण रासो (दलपत विजय), बंश भास्कर

❖ जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन

  • राजस्थान की भाषा के लिए सर्वप्रथम 1912 ई में अपनी पुस्तक Linguistic Survey of India में राजस्थानी शब्द का प्रयोग किया गया

❖ इन्होंने राजस्थानी बोलियों को पाँच भागों में विभाजित किया

(1) पश्चिमी राजस्थानी – मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी, ढ़टकी, बीकानेरी, शेखावाटी, देवड़ावाटी
(2) उत्तर पूर्वी राजस्थानी – मेवाती, अहीरवाटी
(3) मध्य पूर्वी राजस्थानी – ढूँढाड़ी, तोरावाटी, हाड़ौती
(4) दक्षिण पूर्वी राजस्थानी – रांगड़ी, सौंधवाड़ी
(5) दक्षिणी राजस्थानी – निमाड़ी

❖ L.P. टेस्सीटोरी के अनुसार राजस्थानी बोलियों को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जा सकता है

    1. पश्चिमी राजस्थानी – मारवाड़ी, शेखावाटी, ढ़टकी
    2. पूर्वी राजस्थानी – ढूँढाड़ी, हाड़ौती
  • 1961 तक राजस्थान में 73 बोलियाँ जीवित अवस्था में थीं
  • जनगणना 2011 के अनुसार राजस्थान में 71 बोलियाँ पाई जाती हैं
  • राजस्थानी भाषा की लिपि महाजनी / मुड़िया है
  • मुड़िया अक्षरों के आविष्कारकर्ता टोडरमल थे

❖ राजस्थानी की प्रमुख बोलियाँ –

❖ मारवाड़ी –

  • क्षेत्रफल की दृष्टि से यह राजस्थान की सबसे बड़ी बोली है तथा सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाती है
  • इसे राजस्थान की प्राचीन तथा मानक बोली माना जाता है
  • यह मुख्यतः जोधपुर के आसपास के जिलों में बोली जाती है
  • मारवाड़ी का साहित्यिक रूप डिंगल है
  • राजस्थान का अधिकांश साहित्य इसी भाषा में लिखा गया है
  • मीराबाई की रचनाएँ, जैन साहित्य तथा राजिये रा सोरठा (लेखक कृपाराम जी) इसी भाषा में रचित हैं
  • मारवाड़ी की उपबोलियाँ – मेवाड़ी, शेखावाटी, बागड़ी, देवड़ावाटी, खैराड़ी, थली, गोडवाड़ी, नागौरी, बीकानेरी, ढ़टकी

❖ मेवाड़ी –

  • उदयपुर के आसपास के क्षेत्रों में यह बोली जाती है
  • महाराणा कुंभा के ग्रंथ इसी भाषा में रचे गए हैं
  • धावड़ी (उदयपुर) मेवाड़ी की उपबोली है
  • मेवाड़ी भाषा में महाराज चतुर सिंह जी (जन्म करजली, उदयपुर) द्वारा योगसूत्र, भगवत गीता, सांख्यकारिका तथा श्री गीता जी जैसे ग्रंथों की रचना की गई

❖ वागड़ी –

  • वागड़ क्षेत्र (डूंगरपुर + बांसवाड़ा), प्रतापगढ़ तथा सिरोही में बोली जाती है
  • गुजरात की निकटता के कारण इसमें गुजराती भाषा का प्रभाव देखने को मिलता है
  • जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने इसे भीली बोली के रूप में वर्गीकृत किया था
  • संत मावजी की रचनाएँ इसी भाषा में मिलती हैं

❖ खैराड़ी –

  • जहाजपुर (शाहपुरा – भीलवाड़ा), टोंक तथा बूंदी के कुछ क्षेत्रों में बोली जाती है
  • यह ढूँढाड़ी, मेवाड़ी तथा हाड़ौती का मिश्रित रूप है

❖ शेखावाटी –

    • शेखावाटी क्षेत्र (चूरू, सीकर, झुंझुनूं) में बोली जाने वाली बोली है

❖ गोडवाड़ी –

    • जालौर की आहोर तथा पाली की बाली तहसील में बोली जाती है
    • बीसलदेव रासो इस बोली की प्रमुख रचना है
  • देवड़ावाटी – सिरोही क्षेत्र में बोली जाती है
  • थली – बीकानेर, जैसलमेर तथा बाड़मेर क्षेत्रों में बोली जाती है
  • ढ़ाटी – बाड़मेर क्षेत्र में बोली जाती है
  • ढ़टकी – जैसलमेर जिले में बोली जाती है

❖ ढूँढाड़ी –

  • इसे जयपुरी / झाड़शाही बोली भी कहा जाता है
  • यह पूर्वी राजस्थान के जयपुर, किशनगढ़, अलवर तथा दौसा जिलों में बोली जाती है
  • इसमें ‘छै’ शब्द का प्रयोग प्रमुख रूप से होता है
  • इसमें गुजराती तथा ब्रजभाषा का प्रभाव पाया जाता है
  • संत दादू दयाल तथा सुंदरदास की रचनाएँ इसी भाषा में मिलती हैं
  • इसका प्राचीन उल्लेख 18 वीं सदी में ‘आठ देस गुजरी’ पुस्तक में मिलता है

ढूँढाड़ी की उपबोलियाँ – हाड़ौती, चौरासी, राजावाटी, काठेड़ी, जगरोती (करौली), तोरावाटी (नीम का थाना), नागरचोल (सवाईमाधोपुर + टोंक), किशनगढ़, अजमेरी

❖ हाड़ौती –

  • हाड़ा राजपूतों के शासन के कारण कोटा, बूंदी तथा झालावाड़ का क्षेत्र हाड़ौती कहलाया
  • यह बोली हाड़ौती क्षेत्र में बोली जाती है तथा ढूँढाड़ी की उपबोली है
  • हाड़ौती भाषा शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम Mr. कैलाग ने अपनी पुस्तक हिंदी ग्रामर में 1875 में किया था
  • इसे वर्तनी की दृष्टि से सबसे कठिन भाषा माना जाता है
  • सूर्यमल मिश्रण की रचनाएँ इसी भाषा में मिलती हैं

❖ मेवाती बोली –

  • मेवात क्षेत्र (अलवर + भरतपुर) में बोली जाती है
  • इसमें ब्रजभाषा का प्रभाव दिखाई देता है
  • चरणदास जी, लालदास जी, दयाबाई तथा सहजोबाई के ग्रंथ इसी भाषा में रचित हैं
  • यह पश्चिमी हिंदी तथा राजस्थानी के बीच सेतु का कार्य करती है

➤ मेवाती की उपबोलियाँ – राठी, कठेर, महेठा

  • नहेड़ा मेवाती – भरतपुर, अलवर, प्रतापगढ़, अजबगढ़, थानागाजी, बलदेवगढ़ क्षेत्रों में बोली जाती है

❖ मालवी –

  • यह मुख्यतः मालवा क्षेत्र (M.P) की बोली है
  • राजस्थान के दक्षिण पूर्वी जिलों कोटा, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ तथा झालावाड़ में बोली जाती है
  • इसमें मराठी भाषा का प्रभाव देखने को मिलता है
  • मालवी की उपबोलियाँ निमाड़ी, रांगड़ी, सोडवाड़ी, पाटवी, रतलामी तथा उमठवाड़ी हैं
  • मालवी की लिपि देवनागरी है

➤ रांगड़ी –

  • यह मालवा क्षेत्र के राजपूतों की बोली है
  • यह मारवाड़ी तथा मालवी का मिश्रित रूप है

➤ निमाड़ी – दक्षिणी राजस्थान की बोली है

❖ अहीरवाटी / राठी –

  • यह बोली अहीर जाति के प्रभाव वाले क्षेत्र में बोली जाने के कारण अहीरवाटी / हीरवाटी / हीरवाल के नाम से भी जानी जाती है
  • मुंडावर (खैरथल-तिजारा), बहरोड़, कोटपूतली क्षेत्र तथा हरियाणा के गुड़गाँव एवं महेंद्रगढ़ क्षेत्रों में इसका प्रमुख रूप से प्रयोग होता है
  • अलवर-भरतपुर (मेवात क्षेत्र), खैरथल-तिजारा तथा डीग जैसे हरियाणा सीमा से जुड़े क्षेत्रों को राठ कहा जाता है, इसलिए यहाँ बोली जाने वाली भाषा राठी कहलाती है
  • जोधराज के हम्मीर रासो महाकाव्य, शंकर राव के भीम विलास काव्य तथा अलवर के रसखान कहलाने वाले अलीबख्शी के ख्याल नाट्य में अहीरवाटी बोली का प्रयोग मिलता है

❖ बागड़ी –

  • यह बोली हनुमानगढ़ तथा गंगानगर जिलों में बोली जाती है
  • पंजाब के अबोहर, फाजिल्का तथा भटिंडा क्षेत्रों में भी इसका प्रभाव देखने को मिलता है

➤ प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के प्रयोग को अनिवार्य करने हेतु राजस्थानी राजभाषा अधिनियम 1967 लागू किया गया

❖ राजस्थानी भाषा के शब्द –

  • अगेती – जल्दी खेत में बुवाई करने की प्रक्रिया
  • पछेती – देर से बुवाई करना पछेती कहलाता है
  • सूड़ – बुवाई से पहले खेत में खड़ी झाड़ियों को हटाने की प्रक्रिया
  • चावर / पटेला / पाटा / हमाड़ों – जुताई के बाद खेत की भूमि को समतल करने के लिए लकड़ी का भारी पाटा चलाना
  • अडवौ – खेत में फसल की सुरक्षा हेतु पशु-पक्षियों को डराने के लिए खड़े किए जाने वाले पुतले
  • कातरौ – फसल में लगने वाला रोग
  • लूरबो – खेत में घास-फूस को उखाड़ने की प्रक्रिया
  • तंग, मोरखा, गोरबंद, पलाण, मोहरा, पर्चनी – ऊँट की सजावट में उपयोग होने वाली वस्तुएँ
  • पाकट – बूढ़े ऊँट के लिए प्रयुक्त शब्द
  • उदई – दीमक के लिए प्रयुक्त शब्द
  • रेवड़ – पशुओं का समूह रेवड़ कहलाता है
  • आधतिया – दलाल
  • पावड़ा – बहादुरों के वर्णन पर आधारित लोककथा
  • खरड़ा – मजदूरों से वसूली जाने वाली राशि
  • बटेवड़ा – उपलों या कंडों का संग्रह
  • बजेडा – पान की खेती वाला खेत
  • पगतिया उतारणौ – आश्वासन देना
  • चेजारा – चिनाई का कार्य करने वाला व्यक्ति
  • सींकला, झेरना, नेतरा, गिडगिड़ी – दही बिलोने में उपयोग होने वाले उपकरण
  • कावड़ बंचना (वाचन) – ऐसी परंपरा जिसमें रामायण, महाभारत और पुराणों की कथाएँ सुनाई जाती हैं
  • कुसुम्बा – अफीम तथा शराब के लिए प्रयुक्त शब्द
  • गोरमो – गाँव की सीमा को कहा जाता है
  • कांकड़ – राजस्व संबंधी गाँव की सीमा
  • नोहरा – पशुओं को रखने का स्थान
  • मोकड़ी – लाख से बनी चूड़ियाँ
  • औरण – पश्चिमी क्षेत्र में पवित्र स्थान जहाँ पेड़-पौधे नहीं काटे जाते
  • गंजीफा, चारभर, नार-छटी, मारदड़ी – पारंपरिक खेलों के प्रकार
  • चड़स – कुएँ से पानी निकालने के लिए चमड़े से बना पात्र
  • थरपणौ – किसी देवमूर्ति को निश्चित स्थान पर स्थापित करना
  • चाँदमारी – बंदूक से निशाना लगाने का अभ्यास
  • चांक – खेत में फसल पर चिन्ह लगाने की क्रिया
  • धराड़ी – खाद्यान्न संग्रहण की व्यवस्था
  • सीरावन – ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों का सुबह का नाश्ता
  • सोगरा – बाजरे की रोटी
  • पंचकुटा – कैर, सांगरी, कुमटिया, अमचूर और गूंदा को धूप में सुखाकर बनाई जाने वाली पारंपरिक सब्जी

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