राजस्थान के प्रमुख किसान आंदोलन

इस भाग में क्या पढ़ेंगे

किसान आंदोलनों के उदय के कारण 

  • राजस्थान में ब्रिटिश सरकार के आधिपत्य की स्थापना के पश्चात् यहाँ की आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में परिवर्तन आया।
  • अंग्रेजी संरक्षण के कारण शासक स्वयं को सुरक्षित मानने लगे।
  • शासकों का अपनी किसान जनता के प्रति निरंकुश व्यवहार बढ़ने लगा।
  • अंग्रेजों की नीतियों के कारण कुटीर उद्योग-धंधे बर्बाद होने लगे।
  • भूमि पर आश्रित जनसंख्या का प्रतिशत बढ़ने लगा।
  • किसानों में असंतोष बढ़ता गया।
  • किसानों के बढ़ते असंतोष का परिणाम विभिन्न किसान आंदोलनों के रूप में सामने आया।

बिजौलिया आन्दोलन

परिचय

  • बिजौलिया वर्तमान में भीलवाड़ा जिले में स्थित है।
  • यह मेवाड़ राज्य का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था।
  • इस जागीर की भौगोलिक बनावट ऐसी थी कि आन्दोलन के समय किसान बड़ी सुगमता से पड़ोसी सीमावर्ती राज्यों में पलायन कर सकते थे।
  • यहाँ के अधिकांश लोगों का जीवन-निर्वाह कृषि पर आधारित था।

कृषकों की स्थिति

  • कृषकों में अधिकांश धाकड़ जाति के लोग थे।
  • धाकड़ किसान अपने परिश्रम एवं दक्षता के लिए प्रसिद्ध थे।
  • जातिगत रूप से संगठित थे।
  • पंचायत व्यवस्था में उनकी दृढ़ निष्ठा थी।

आन्दोलन का कारण

  • 1894 ई. में राव गोविन्ददास की मृत्यु के बाद बिजौलिया ठिकाने के जागीरदारों एवं किसानों के संबंधों में विभिन्न कारणों से कटुता उत्पन्न हुई।
  • यही कटुता बिजौलिया किसान आन्दोलन का कारण बनी।

बिजौलिया किसान आन्दोलन के चरण

➤ प्रथम चरण (1897 ई. – 1915 ई.)

  • प्रथम चरण 1897 ई. से 1915 ई. तक रहा।
  • इस काल में आन्दोलन का नेतृत्व स्थानीय लोगों द्वारा किया गया।

➤ द्वितीय चरण (1915 ई. – 1923 ई.)

  • द्वितीय चरण 1915 ई. से आरम्भ होकर 1923 ई. तक चला।
  • यह आन्दोलन का अत्यन्त महत्वपूर्ण काल था।
  • इस काल में आन्दोलन का संचालन राष्ट्रीय स्तर के योग्य एवं अनुभवी व्यक्तियों द्वारा किया गया।
  • इस चरण में आन्दोलन राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ गया।

➤ तृतीय चरण

  • यह आन्दोलन का पराभव काल था।
  • यह चरण 1941 ई. में समाप्त हुआ।

प्रथम चरण (1897–1915 ई.)

➤ आन्दोलन का प्रारम्भ

  • 1897 ई. में बिजौलिया ठिकाने के हजारों किसान गिरधरपुरा गांव में एक मृत्यु-भोज के अवसर पर एकत्रित हुए।
  • ठिकाने के अत्याचारों एवं शोषण से पीड़ित किसानों ने आपस में विचार-विमर्श किया।
  • किसानों ने निर्णय लिया कि उनके प्रतिनिधि उदयपुर जाकर महाराणा फतहसिंह से न्याय की गुहार करेंगे।
  • किसानों की इस पुकार का कोई परिणाम नहीं निकला।

➤ रियासती सरकार की उदासीनता

  • रियासती सरकार द्वारा अपनाई गई निष्क्रियता एवं उदासीनता ने बिजौलिया के शासक को किसान-विरोधी नीति अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।
  • बिजौलिया का किसान पहले से ही विभिन्न प्रकार की लागों के बोझ से दबा हुआ था।

➤ चँवरी कर (1903 ई.)

  • 1903 ई. में राव कृष्णसिंह ने बिजौलिया क्षेत्र में चँवरी कर नामक नया कर लगाया।
  • प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पुत्री के विवाह के अवसर पर 13 रुपये (कुछ साक्ष्यों के अनुसार 5 रुपये) ठिकाने में जमा करवाने पड़ते थे।
  • विवाह के बाद वर को राव साहब के समक्ष उपस्थित होकर नतमस्तक होना तथा आशीर्वाद प्राप्त करना आवश्यक था।
  • इस अपमानजनक कर के कारण किसानों में व्यापक रोष उत्पन्न हुआ।

➤ किसानों का विरोध

  • किसानों ने चँवरी कर का मूक विरोध किया।
  • किसानों ने लगभग दो वर्षों तक अपनी कन्याओं का विवाह नहीं किया।
  • बाद में राव ने कुछ नाममात्र की रियायतें प्रदान कीं।
  • यद्यपि किसान पूर्णतः संतुष्ट नहीं हुए, परन्तु उन्हें अपनी सामूहिक शक्ति का अहसास अवश्य हुआ।

➤ पृथ्वीसिंह का शासन एवं दमनात्मक नीति

  • 1906 ई. में राव कृष्णसिंह का निःसन्तान निधन हो गया।
  • उसके बाद उसका निकट सम्बन्धी पृथ्वीसिंह बिजौलिया का शासक बना।
  • मेवाड़ राज्य द्वारा नए जागीरदार से तलवार बँधाई के रूप में ली गई राशि का भार पृथ्वीसिंह ने जनता पर डाल दिया।
  • किसानों ने इसका विरोध किया।

➤ दमनात्मक कार्यवाही

  • स्थानीय शासक ने किसान आन्दोलन से जुड़े लोगों के विरुद्ध कठोर रुख अपनाया।
  • दमनकारी नीति का अनुसरण किया गया।
  • साधु सीतारामदास को ठिकाने के पुस्तकालय की सेवा से मुक्त कर दिया गया।
  • अन्य किसान नेताओं को जेल में डाल दिया गया।

➤ प्रथम चरण का समापन

  • 1914 ई. में राव पृथ्वीसिंह का देहांत हो गया।
  • उसका पुत्र केसरी सिंह अल्पवयस्क था।
  • परिणामस्वरूप जागीरी प्रशासन कोर्ट ऑफ वार्ड्स (महाराणा) के नियंत्रण में चला गया।
  • इसके बावजूद किसानों की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ।
  • किसानों के हालात पूर्ववत बने रहे।
  • इसी के साथ बिजौलिया किसान आन्दोलन का प्रथम चरण (1897–1915 ई.) पूर्ण होता है।

द्वितीय चरण (1915–1923 ई.)

➤ विजय सिंह पथिक का आन्दोलन से जुड़ना

  • 1916 ई. में विजय सिंह पथिक (वास्तविक नाम – भूपसिंह) बिजौलिया किसान आन्दोलन से जुड़े।
  • विजय सिंह पथिक में कार्य करने की अपूर्व क्षमता थी।
  • उन्होंने किसानों को सुनियोजित रूप से संगठित किया।
  • आन्दोलन को व्यवस्थित एवं संगठित स्वरूप प्रदान किया।

➤ विद्या प्रचारिणी सभा की स्थापना

  • विजय सिंह पथिक ने बिजौलिया में विद्या प्रचारिणी सभा का गठन किया।
  • सभा के तत्वावधान में निम्न संस्थाएँ प्रारम्भ की गईं –
    • पुस्तकालय
    • पाठशाला
    • अखाड़ा
  • ये संस्थाएँ आगे चलकर राजनीतिक गतिविधियों के केन्द्र बन गईं।

➤ माणिक्यलाल वर्मा का योगदान

  • माणिक्यलाल वर्मा इस समय बिजौलिया ठिकाने में कर्मचारी के पद पर कार्यरत थे।
  • वे विजय सिंह पथिक के सम्पर्क में आए।
  • पथिक से प्रभावित होकर उन्होंने ठिकाने की नौकरी छोड़ दी।
  • उन्होंने पथिक से आजीवन देश सेवा की दीक्षा ग्रहण की।
  • इसके बाद वे पथिक के साथ किसानों को संगठित करने के कार्य में जुट गए।

➤ साधु सीतारामदास का सहयोग

  • किसानों को संगठित करने के कार्य में साधु सीतारामदास ने भी विजय सिंह पथिक को महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।

➤ ऊपरमाल क्षेत्र में लोकप्रियता

  • विजय सिंह पथिक ऊपरमाल क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय हो गए थे।
  • वहाँ के निवासी उन्हें “महात्माजी” कहकर सम्बोधित करते थे।
  • लोग उनके आदेशों का पालन करने के लिए सदैव तैयार रहते थे।

➤ आन्दोलन को सक्रिय स्वरूप

  • विजय सिंह पथिक किसानों की दुर्दशा से भली-भाँति परिचित हो चुके थे।
  • किसानों की इस भयावह स्थिति के निवारण के लिए उन्होंने आन्दोलन को सक्रिय बनाने का निर्णय लिया।

➤ क्रान्ति का बिगुल (1917 ई.)

  • 1917 ई. में हरियाली अमावस्या के दिन आन्दोलन को नया मोड़ मिला।
  • ऊपरमाल पंच बोर्ड के तत्वावधान में क्रान्ति का बिगुल बजाया गया।
  • इसी के साथ बिजौलिया किसान आन्दोलन का द्वितीय चरण सक्रिय रूप से आगे बढ़ा।

➤ किसानों का प्रतिरोध एवं प्रथम विजय

  • विजय सिंह पथिक ने किसानों को युद्ध का चंदा न देने का आह्वान किया।
  • किसानों ने घोषणा की कि वे बेगार नहीं करेंगे।
  • गोविन्द निवास गाँव के नारायणजी पटेल ने ठिकाने में बेगार करने से इंकार कर दिया।
  • इसके परिणामस्वरूप ठिकाने के कर्मचारियों ने उन्हें पकड़कर कैद में डाल दिया।
  • सूचना मिलते ही किसान-पंचायत के आदेशानुसार किसानों के जत्थे बिजौलिया पहुँचने लगे।
  • किसानों की एकता देखकर ठिकाने के प्रशासक भयभीत हो गए।
  • अंततः नारायणजी पटेल को जेल से मुक्त कर दिया गया।
  • यह किसानों की प्रथम विजय थी।

आन्दोलन का राष्ट्रीय प्रचार

  • विजय सिंह पथिक ने बिजौलिया किसान आन्दोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने तथा सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से ‘प्रताप’ समाचार-पत्र के सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी से सम्पर्क स्थापित किया।
  • गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने समाचार-पत्र ‘प्रताप’ में बिजौलिया आन्दोलन सम्बन्धी समाचारों के लिए एक स्थायी स्तम्भ प्रारम्भ किया।
  • इस प्रचार के परिणामस्वरूप देशवासियों का ध्यान बिजौलिया किसान आन्दोलन की ओर आकर्षित हुआ।

➤ महात्मा गाँधी का समर्थन

  • महात्मा गाँधी ने बिजौलिया किसान आन्दोलन की जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से विजय सिंह पथिक को बम्बई आमंत्रित किया।
  • पथिक ने गाँधीजी के समक्ष बिजौलिया के किसानों पर हो रहे अत्याचारों का विवरण प्रस्तुत किया।
  • इससे गाँधीजी प्रभावित हुए।

➤ गाँधीजी द्वारा उठाए गए कदम

  • गाँधीजी ने अपने निजी सचिव महादेव भाई को ऊपरमाल के किसानों की स्थिति की जाँच हेतु बिजौलिया भेजा।
  • गाँधीजी ने इस सम्बन्ध में महाराणा को एक पत्र भी लिखा।
  • गाँधीजी ने बिजौलिया किसान आन्दोलन को नैतिक समर्थन प्रदान किया।

➤ असहयोग आन्दोलन का प्रभाव

  • प्रारम्भ में ब्रिटिश सरकार बिजौलिया के आन्दोलनकारी किसानों को रियायतें देने के पक्ष में नहीं थी।
  • धीरे-धीरे परिस्थितियों में परिवर्तन आने लगा।
  • अगस्त 1920 ई. में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ हुआ।
  • 1921 ई. तक यह आन्दोलन व्यापक एवं उग्र रूप धारण कर चुका था।

➤ उच्चस्तरीय समिति का गठन

  • बदलती परिस्थितियों को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने बिजौलिया किसान आन्दोलन को शीघ्र शान्त करने का निर्णय लिया।
  • इस उद्देश्य से एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया।

➤ उच्चस्तरीय समिति का गठन

बिजौलिया किसान आन्दोलन को शान्त करने हेतु ब्रिटिश सरकार ने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया।

क्रम सदस्य पद
1 रॉबर्ट हॉलैंड ए.जी.जी.
2 आगल्बी सचिव
3 विल्किसन मेवाड़ के ब्रिटिश रेजीडेन्ट
4 प्रभाषचन्द्र चटर्जी मेवाड़ राज्य के दीवान
5 बिहारीलाल राज्य के सायर हाकिम

➤ बिजौलिया समझौता (11 फरवरी, 1922 ई.)

  • लम्बे विचार-विमर्श के पश्चात् 11 फरवरी, 1922 ई. को ठिकाने एवं किसान-पंचायत के मध्य समझौता सम्पन्न हुआ।
  • ए.जी.जी. हॉलैंड ने किसानों के पक्ष की औचित्यता को स्वीकार किया।

समझौते के परिणाम

  • किसानों को अनेक रियायतें प्रदान की गईं।
  • लगभग 35 लागें समाप्त कर दी गईं।
  • इस प्रकार 1922 ई. में बिजौलिया किसान आन्दोलन समाप्त हो गया।

तृतीय चरण (1923–1941 ई.)

➤ समझौते का उल्लंघन एवं आन्दोलन का पुनः आरम्भ

  • असहयोग आन्दोलन के समाप्त होते ही ए.जी.जी. किसानों के साथ हुए समझौते के प्रति उदासीन हो गया।
  • बिजौलिया के जागीरदार ने समझौते का उल्लंघन करते हुए किसानों पर पुनः नई लागें लगा दीं।
  • साथ ही लगान की माँग भी बढ़ा दी गई।
  • 1923–1926 ई. का समय किसानों ने अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में व्यतीत किया।

➤ किसान पंचायत (मार्च, 1927 ई.)

  • मार्च, 1927 ई. में किसान पंचायत आयोजित की गई।
  • इस पंचायत में रामनारायण चौधरी एवं माणिक्यलाल वर्मा उपस्थित थे।
  • विजय सिंह पथिक ने किसानों को—
    • बारानी भूमि छोड़ने तथा
    • अहिंसात्मक साधनों से आन्दोलन जारी रखने
      का सुझाव दिया।
  • किन्तु यह प्रयोग सफल नहीं हो सका।

➤ जमनालाल बजाज के प्रयास (1931 ई.)

  • 20 जुलाई, 1931 ई. को सेठ जमनालाल बजाज ने उदयपुर में महाराणा एवं सर सुखदेव प्रसाद से व्यापक विचार-विमर्श किया।
  • इसके परिणामस्वरूप समझौता हो गया।
  • किन्तु उदयपुर राज्य ने इस समझौते का पूर्ण पालन नहीं किया।

➤ मेवाड़ प्रजामण्डल आन्दोलन का प्रभाव

  • इस समय मेवाड़ प्रजामण्डल आन्दोलन का व्यापक प्रसार हो रहा था।
  • राज्य को आशंका थी कि किसान प्रजामण्डल आन्दोलन से जुड़ सकते हैं।
  • इसी कारण किसानों की समस्याओं के समाधान हेतु पहल की गई।

➤ आन्दोलन का अन्तिम समाधान (1941 ई.)

वर्ष घटना
1941 ई. मेवाड़ के दीवान टी. विजय राघवाचार्य ने डॉ. मोहनसिंह मेहता को बिजौलिया भेजा।
1941 ई. डॉ. मोहनसिंह मेहता ने किसान नेताओं एवं अन्य प्रतिनिधियों से वार्ता की।
1941 ई. किसानों की समस्याओं का समाधान किया गया।
1941 ई. किसानों को उनकी जमीनें वापस दे दी गईं।
1941 ई. बिजौलिया किसान आन्दोलन का अन्त हो गया।

बेगूं किसान आन्दोलन, मेवाड़ (1921 ई.)

➤ आन्दोलन का प्रारम्भ

  • बिजौलिया किसान आन्दोलन से प्रेरित होकर बेगूं (मेवाड़) के किसानों ने 1921 ई. में आन्दोलन प्रारम्भ किया।
  • आन्दोलन का नेतृत्व रामनारायण चौधरी ने किया।
  • किसानों ने अनावश्यक एवं अत्यधिक करों, लाग-बाग, बैठ-बेगार तथा सामन्ती अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष किया।

➤ मैनाल सम्मेलन (1921 ई.)

  • 1921 ई. में बेगूं के किसान मैनाल के भैरुकुण्ड नामक स्थान पर एकत्रित हुए।
  • किसानों ने अपनी समस्याओं एवं मांगों को संगठित रूप से प्रस्तुत किया।

➤ सामन्ती दमन एवं शहादत

  • आन्दोलन के दौरान सामन्ती दमन चक्र लगातार चलता रहा।
  • 1923 ई. में किसान नेता रूपाजी धाकड़ एवं कृपाजी धाकड़ सेना की गोलाबारी में शहीद हो गए।
  • इसके बावजूद किसान अपनी मांगों के लिए संघर्षरत रहे।

➤ समझौते का प्रयास

  • बेगूं के ठिकानेदार ने किसानों के साथ समझौते का प्रयास किया।
  • किन्तु समझौते को अमान्य घोषित कर आन्दोलन को कठोरता से दबाने का प्रयास किया गया।
  • इसके बावजूद मेवाड़ सरकार आन्दोलन को पूर्णतः दबाने में सफल नहीं हुई।

➤ बोल्शेविक समझौता

पक्ष विवरण
प्रथम पक्ष बेगूं के ठाकुर अनूपसिंह
द्वितीय पक्ष राजस्थान सेवा संघ
विशेष नाम बोल्शेविक समझौता

भरतपुर किसान आन्दोलन

➤ किसानों की स्थिति

  • भरतपुर राज्य में किसानों की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी थी।
  • राज्य की लगभग 95% भूमि सीधे राज्य के नियंत्रण में थी।

प्रमुख जातियाँ

क्रम जाति
1 ब्राह्मण
2 जाट
3 गुर्जर
4 अहीर
5 मेव
  • इन जातियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति कमोबेश समान थी।

➤ आन्दोलन का कारण

  • 1931 ई. में भरतपुर राज्य में नया भूमि बन्दोबस्त लागू किया गया।
  • इसके परिणामस्वरूप भू-राजस्व में वृद्धि हो गई।
  • भू-राजस्व अधिकारियों एवं लम्बरदारों ने बढ़े हुए भू-राजस्व का विरोध किया।

➤ आन्दोलन का प्रारम्भ

  • राज्य द्वारा मांगों पर ध्यान न दिए जाने पर 23 नवम्बर, 1931 ई. को भोजी लम्बरदार के नेतृत्व में लगभग 500 किसान भरतपुर में एकत्रित हुए।
  • भोजी लम्बरदार ने राज्य के विरुद्ध भाषण दिए।

➤ आन्दोलन का अन्त

  • नवम्बर, 1931 ई. में भोजी लम्बरदार को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • उनकी गिरफ्तारी के साथ ही भरतपुर किसान आन्दोलन समाप्त हो गया।

मेव किसान आन्दोलन

➤ आन्दोलन का संगठन (1932 ई.)

  • 1932 ई. में मोहम्मद हादी ने ‘अन्जुमन खादिम उल इस्लाम’ नामक संस्था की स्थापना की।
  • इस संस्था ने मेव किसान आन्दोलन को एक संगठित स्वरूप प्रदान किया।
  • यह आन्दोलन मुख्यतः अलवर एवं भरतपुर क्षेत्र में सक्रिय था।

नेतृत्व

क्षेत्र नेतृत्व
अलवर चौधरी यासीन खान (गुड़गांव)
  • चौधरी यासीन खान के नेतृत्व में किसानों ने आन्दोलन को आगे बढ़ाया।

➤ किसानों का विरोध

  • किसानों ने खरीफ फसल का लगान देना बन्द कर दिया।
  • आन्दोलन धीरे-धीरे अधिक व्यापक एवं प्रभावशाली बन गया।

➤ राज्य सरकार के प्रयास

  • मेव किसानों को संतुष्ट करने के लिए राज्य सरकार ने राज्य कॉन्सिल में एक मुस्लिम सदस्य को शामिल किया।
पद नाम
राज्य कॉन्सिल सदस्य खान बहादुर काजी अजीजुद्दीन बिलग्रामी
  • इसके बावजूद आन्दोलन न केवल जारी रहा, बल्कि अधिक उग्र हो गया।

➤ विशेष समिति का गठन (1937 ई.)

  • 1937 ई. में मेव संकट की जाँच हेतु एक विशेष समिति का गठन किया गया।
  • यह समिति मि. बिलग्रामी के अधीन कार्यरत थी।

➤ समिति की सिफारिशें एवं परिणाम

समिति की रिपोर्ट के आधार पर मेव किसानों को निम्न रियायतें प्रदान की गईं—

  • भू-राजस्व में छूट
  • अन्य करों में राहत
  • सामाजिक समस्याओं का समाधान
  • धार्मिक समस्याओं का समाधान

अलवर किसान आन्दोलन एवं नीमूचाणा हत्याकाण्ड (1921–1925 ई.)

➤ आन्दोलन का प्रारम्भ (1921 ई.)

  • अलवर रियासत में जंगली सुअरों को अनाज खिलाकर रोधों में पाला जाता था।
  • ये सुअर किसानों की खड़ी फसल को भारी नुकसान पहुँचाते थे।
  • किसानों को सुअरों को मारने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि रियासती सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा था।
  • सुअरों की समस्या के समाधान हेतु किसानों ने 1921 ई. में आन्दोलन प्रारम्भ किया।

➤ किसानों की प्रथम सफलता

  • किसानों के निरन्तर विरोध के कारण सरकार को समझौता करना पड़ा।
  • सरकार ने किसानों को सुअर मारने की अनुमति प्रदान कर दी।
  • इससे किसानों की एक प्रमुख समस्या का समाधान हुआ।

➤ लगान वृद्धि एवं किसान असन्तोष

  • 1923–24 ई. में महाराजा जयसिंह ने लगान की दरों में वृद्धि कर दी।
  • बढ़े हुए लगान का किसानों ने व्यापक विरोध किया।
  • विरोध के स्वरूप किसानों ने संगठित आन्दोलन प्रारम्भ किया।

➤ नीमूचाणा हत्याकाण्ड (14 मई, 1925 ई.)

  • 14 मई, 1925 ई. को लगभग 800 किसान अलवर के नीमूचाणा गाँव में एकत्रित हुए।
  • किसानों की सभा पर रियासती सैनिकों ने मशीनगनों से अंधाधुंध गोलाबारी कर दी।
  • इस गोलीकाण्ड में सैकड़ों किसान मारे गए।

➤ नीमूचाणा हत्याकाण्ड : एक नजर में

तथ्य विवरण
तिथि 14 मई, 1925 ई.
स्थान नीमूचाणा (अलवर)
कारण बढ़े हुए लगान का विरोध
सहभागी लगभग 800 किसान
परिणाम सैकड़ों किसानों की मृत्यु

➤ महात्मा गाँधी की प्रतिक्रिया

  • महात्मा गाँधी ने इस घटना को “जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड से भी वीभत्स” बताया।
  • उन्होंने इसे “डायरवाद गहरा एवं व्यापक” की संज्ञा दी।

➤ आन्दोलन का परिणाम

  • नीमूचाणा हत्याकाण्ड के बाद सरकार पर दबाव बढ़ गया।
  • अंततः सरकार को लगान सम्बन्धी मांगों के विषय में किसानों के समक्ष झुकना पड़ा।
  • इसके बाद अलवर किसान आन्दोलन समाप्त हो गया।

बूंदी राज्य में किसान आन्दोलन

➤ आन्दोलन की पृष्ठभूमि

  • बूंदी राज्य के किसानों को लगभग 25 प्रकार की लागें, बेगार तथा उच्च दरों पर लगान देना पड़ता था।
  • किसान बिजौलिया एवं बेगूं किसान आन्दोलन से अत्यधिक प्रभावित थे।
  • इन्हीं परिस्थितियों के कारण किसानों में असन्तोष बढ़ता गया।

➤ आन्दोलन का प्रारम्भ (अप्रैल, 1922 ई.)

  • अप्रैल, 1922 ई. में बूंदी राज्य के बरड़ क्षेत्र के किसानों ने आन्दोलन प्रारम्भ किया।
  • यह क्षेत्र बिजौलिया की सीमा से जुड़ा हुआ था।
  • आन्दोलन का नेतृत्व राजस्थान सेवा संघ के कर्मठ कार्यकर्ता नैनूराम ने किया।
तथ्य विवरण
प्रारम्भ अप्रैल, 1922 ई.
क्षेत्र बरड़ (बूंदी राज्य)
नेतृत्व नैनूराम
संगठन राजस्थान सेवा संघ

➤ दमनात्मक कार्यवाही

  • बूंदी राज्य ने आन्दोलनकारी किसानों पर अत्याचार प्रारम्भ कर दिए।
  • राजस्थान सेवा संघ ने बूंदी राज्य के दमनचक्र की व्यापक आलोचना की।
  • आन्दोलन के समर्थन में जनमत तैयार किया गया।

➤ डाबी काण्ड (2 अप्रैल, 1923 ई.)

  • 2 अप्रैल, 1923 ई. को डाबी गाँव में किसानों की एक सभा आयोजित की गई।
  • सभा में उपस्थित किसानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया तथा गोलियाँ चलाईं।
  • इस गोलीकाण्ड में नानक भील एवं देवलाल गुर्जर शहीद हो गए।

➤ डाबी काण्ड : एक नजर में

तथ्य विवरण
तिथि 2 अप्रैल, 1923 ई.
स्थान डाबी गाँव
कार्रवाई लाठीचार्ज एवं गोलीबारी
शहीद नानक भील, देवलाल गुर्जर

➤ आन्दोलन का प्रथम चरण समाप्त

  • डाबी काण्ड की व्यापक निन्दा हुई।
  • बूंदी सरकार ने किसानों की कुछ शिकायतों का समाधान किया।
  • लाग-बाग एवं बेगार में कुछ रियायतें प्रदान की गईं।
  • किसान पूर्णतः सन्तुष्ट नहीं थे।
  • राजस्थान सेवा संघ से मार्गदर्शन बन्द हो जाने के कारण आन्दोलन कमजोर पड़ गया।
  • 1923 ई. के अन्त तक आन्दोलन लगभग समाप्त हो गया।

➤ आन्दोलन का पुनः आरम्भ (1936 ई.)

  • 1936 ई. में बरड़ क्षेत्र में किसान आन्दोलन पुनः प्रारम्भ हुआ।
  • किसानों ने अपनी मांगों को लेकर पुनः संगठित संघर्ष शुरू किया।

➤ हूदेश्वर महादेव सम्मेलन (5 अक्टूबर, 1936 ई.)

  • 5 अक्टूबर, 1936 ई. को हिण्डोली स्थित हूदेश्वर महादेव मन्दिर में एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया गया।
  • सम्मेलन में 90 गाँवों के गुर्जर एवं मीणा किसानों के लगभग 500 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए।
  • किसानों ने एक मांग-पत्र तैयार कर सरकार को भेजा।

➤ सम्मेलन : एक नजर में

तथ्य विवरण
तिथि 5 अक्टूबर, 1936 ई.
स्थान हूदेश्वर महादेव मन्दिर, हिण्डोली
सहभागी गाँव 90
प्रतिनिधि लगभग 500
प्रमुख समुदाय गुर्जर एवं मीणा किसान

➤ आन्दोलन का परिणाम

  • सरकार ने प्रारम्भ में किसानों की मांगों पर ध्यान नहीं दिया।
  • किसानों ने राज्य के विरुद्ध आन्दोलन जारी रखा।
  • अन्ततः सरकार को कुछ रियायतें देनी पड़ीं।

प्रमुख रियायतें

  • चराई कर में छूट
  • युद्ध ऋण की वसूली में बल प्रयोग बन्द
  • गिरफ्तार आन्दोलनकारियों की रिहाई

✦ आन्दोलन का निष्कर्ष

  • किसानों के दबाव के कारण सरकार को रियायतें देनी पड़ीं।
  • आन्दोलनकारियों को रिहा किया गया।
  • किसानों की प्रमुख मांगों पर आंशिक रूप से सहमति बनी।
  • इसके साथ ही बूंदी राज्य का किसान आन्दोलन समाप्त हो गया।

जयपुर राज्य में किसान आन्दोलन

➤ आन्दोलन का केन्द्र

  • जयपुर राज्य के किसानों की स्थिति भी अन्य रियासतों के किसानों की भाँति दयनीय थी।
  • किसान शासकों के अत्याचार, आतंक एवं शोषण से पीड़ित थे।
  • आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र जयपुर राज्य का पश्चिमी भाग था।

प्रमुख क्षेत्र

क्षेत्र
शेखावटी
तोरावटी
साँभर
सीकर
खेतड़ी
  • किसान आन्दोलन का प्रारम्भ सीकर ठिकाने से हुआ।

➤ सीकर किसान आन्दोलन का प्रारम्भ (1922 ई.)

  • 1922 ई. में सीकर के नये रावराजा कल्याणसिंह ने भूमिकर में 25% से 50% तक वृद्धि कर दी।
  • किसानों को लागों में छूट देने का आश्वासन दिया गया, किन्तु वचन पूरा नहीं किया गया।
  • इससे किसानों में असन्तोष फैल गया और आन्दोलन प्रारम्भ हो गया।

➤ आन्दोलन को मिला प्रोत्साहन

नेता योगदान
रामनारायण चौधरी किसान आन्दोलन को प्रोत्साहन
हरि ब्रह्मचारी किसानों को संगठित किया
  • सीकर आन्दोलन की गूँज केन्द्रीय असेम्बली एवं ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमंस तक पहुँची।

➤ भूमि बन्दोबस्त एवं जरीब विवाद

  • ब्रिटिश सरकार ने रावराजा को नियमित भूमि बन्दोबस्त की सलाह दी।
  • भूमि सर्वेक्षण में छोटी जरीब का प्रयोग किया गया।
  • रावराजा ने ‘इजाफा’ के नाम पर प्रति बीघा दो आना भूमिकर बढ़ा दिया।
  • जरीब की लम्बाई एवं बढ़े हुए भूमिकर के कारण किसानों में पुनः असन्तोष फैल गया।

➤ बगड़ जाट सभा अधिवेशन (अक्टूबर, 1925 ई.)

  • अक्टूबर, 1925 ई. में बगड़ (शेखावटी) में जाट सभा का अधिवेशन आयोजित हुआ।
  • जाटों के सामाजिक एवं आर्थिक शोषण के विरुद्ध आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की गई।
  • किसानों को भूमि लगान न देने के लिए प्रेरित किया गया।

प्रमुख योगदान

नेता योगदान
देशराज (भरतपुर) जाट किसानों में जागृति एवं संगठन

➤ झुंझुनूं जाट महासभा (1932 ई.)

  • वसन्त पंचमी, 1932 ई. को झुंझुनूं में जाट महासभा का विशाल आयोजन हुआ।
  • इसमें लगभग 60,000 जाट किसानों ने भाग लिया।
  • इससे किसान आन्दोलन को नई शक्ति मिली।

➤ पलथाना सभा (सितम्बर, 1933 ई.)

  • देशराज ने किसानों को संगठित करने हेतु पलथाना में सभा आयोजित की।
  • सभा में सीकर में महायज्ञ आयोजित करने का निर्णय लिया गया।

➤ सीकर महायज्ञ एवं दमन (जनवरी, 1934 ई.)

  • रावराजा ने महायज्ञ अध्यक्ष की सवारी हेतु हाथी देने से इन्कार कर दिया।
  • महायज्ञ के दौरान किसानों ने ठिकाने की नीतियों की आलोचना की।
  • जाट सभा के सचिव चन्द्रभान को गिरफ्तार कर:
    • 6 सप्ताह का कारावास
    • 51 रुपये जुर्माना
      दिया गया।

➤ जाट महिला सम्मेलन (25 अप्रैल, 1934 ई.)

  • सोतिया का बास गाँव में किसान महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के विरोध में सम्मेलन आयोजित किया गया।
  • सम्मेलन में लगभग 10,000 महिलाओं ने भाग लिया।
तथ्य विवरण
तिथि 25 अप्रैल, 1934 ई.
अध्यक्ष किशोरी देवी
सहभागिता लगभग 10,000 महिलाएँ

➤ कूदन गोलीकाण्ड (अप्रैल, 1935 ई.)

  • राजस्व अधिकारी पुलिस बल के साथ कूदन गाँव में लगान वसूली हेतु पहुँचा।
  • किसानों एवं प्रशासन के बीच संघर्ष हुआ।
  • पुलिस ने गोलीबारी कर दी।

कूदन गोलीकाण्ड : एक नजर में

तथ्य विवरण
वर्ष 1935 ई.
स्थान कूदन गाँव
शहीद चेतराम, टीकूराम तथा अन्य किसान
घायल 14 किसान
गिरफ्तार लगभग 175 जाट किसान
  • इस घटना की गूँज ब्रिटिश संसद तक पहुँची।

➤ आन्दोलन की प्रमुख प्रेरणा एवं नेतृत्व

प्रेरणा

  • धापी दादी ने किसानों को संगठित होने की प्रेरणा दी।

प्रमुख किसान नेता

प्रमुख नेता
सरदार हरलाल सिंह
नेतराम सिंह
पृथ्वीसिंह गोठड़ा
पन्ने सिंह बाटड़ानाउ
हरूसिंह पलथाना
गौरूसिंह कटराथल
ईश्वरसिंह भैरूपुरा
लेखराम कसवाली

➤ शेखावटी क्षेत्र में आन्दोलन का विस्तार

  • मार्च, 1933 ई. में आन्दोलन शेखावटी के अनेक ठिकानों में फैल गया।

प्रमुख ठिकाने

ठिकाने
खेतड़ी
डूँडलोद
नवलगढ़
मण्डावा
बिसाऊ
सूरजगढ़
हमीरवास
इस्माइलपुर
जखारा
मलसीसर
अलसीसर
पाटन
  • किसानों ने भूमि कर देने से इन्कार कर दिया।

➤ हनुमानपुरा घटना (16 मई, 1934 ई.)

  • हमीरवास के ठाकुर कल्याणसिंह के आदमियों ने हनुमानपुरा गाँव में जाट किसानों के घरों में आग लगा दी।
  • इस घटना में 33 घर जलकर राख हो गए।

➤ किसानों का प्रतिरोध

  • डूँडलोद के ठाकुर एवं उसके समर्थकों ने किसानों पर अत्याचार किए।
  • किसानों ने संगठित होकर जागीरदारों का विरोध किया।
  • 9 अक्टूबर, 1934 ई. को शेखावटी जाट किसान पंचायत ने जयपुर महाराजा को माँग-पत्र भेजा।

➤ भूमि सर्वेक्षण एवं बन्दोबस्त (1936 ई.)

  • शेखावटी के नाजिम ने किसानों की शिकायतों की पुष्टि की।
  • उसकी रिपोर्ट के आधार पर 1936 ई. में भूमि सर्वेक्षण एवं भूमि बन्दोबस्त का कार्य प्रारम्भ हुआ।
  • इससे सीकर एवं शेखावटी क्षेत्र में स्थिति कुछ शांत हुई।

➤ आन्दोलन का अन्त (मार्च, 1947 ई.)

तथ्य विवरण
वर्ष मार्च, 1947 ई.
प्रमुख घटना जयपुर में लोकप्रिय सरकार का गठन
नेतृत्व हीरालाल शास्त्री
राजस्व मंत्री टीकाराम पालीवाल
परिणाम गैर-खालसा क्षेत्र में भूमि बन्दोबस्त की व्यवस्था

✦ आन्दोलन का निष्कर्ष

  • सीकर एवं शेखावटी का किसान आन्दोलन राजस्थान के सबसे व्यापक किसान आन्दोलनों में से एक था।
  • इस आन्दोलन ने किसानों में राजनीतिक चेतना एवं संगठन शक्ति का विकास किया।
  • मार्च, 1947 ई. में लोकप्रिय सरकार के गठन के साथ इसका अन्त हुआ।

मारवाड़ किसान आन्दोलन

➤ आन्दोलन की पृष्ठभूमि

  • जयपुर राज्य के शेखावटी जाट आन्दोलन का प्रभाव मारवाड़ राज्य के किसानों पर भी पड़ा।
  • विशेष रूप से डीडवाना, साँभर परगना तथा शेखावटी से लगे क्षेत्रों के जाट किसान इससे प्रभावित हुए।
  • किसानों में जागीरदारों के अत्याचारों एवं शोषण के विरुद्ध असन्तोष बढ़ने लगा।

➤ मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना (मई, 1938 ई.)

  • मई, 1938 ई. में मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना हुई।
  • लोक परिषद ने किसानों की माँगों का जोरदार समर्थन किया।
  • परिषद ने सरकार एवं जागीरदारों की नीतियों की आलोचना की।
  • जागीरदारों ने किसान आन्दोलन के लिए लोक परिषद को उत्तरदायी ठहराया।
  • परिणामस्वरूप परिषद के कार्यकर्ताओं के प्रति कठोर एवं दमनात्मक रवैया अपनाया गया।
तथ्य विवरण
स्थापना मई, 1938 ई.
संगठन मारवाड़ लोक परिषद
उद्देश्य किसानों की माँगों का समर्थन

➤ चंद्रावल काण्ड (28 मार्च, 1942 ई.)

  • 28 मार्च, 1942 ई. को लोक परिषद ने चंद्रावल गाँव में उत्तरदायी शासन दिवस मनाने का निर्णय लिया।
  • चंद्रावल के ठाकुर ने कार्यक्रम को रोकने के लिए अपने लोगों को भेजा।
  • परिषद के कार्यकर्ताओं पर लाठियों एवं तेज धार वाले हथियारों से हमला किया गया।
  • इस हमले में लगभग 25 व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हुए।

प्रमुख घायल

नाम
मीठालाल (सोजत)
विजयशंकर (सोजत)
मार्कन्देश्वर (कंटालिया)
हरिराम (कंटालिया)
रामसुख (चंद्रावल)
चाँदमल (चंद्रावल)

➤ डाबड़ा काण्ड (13 मार्च, 1947 ई.)

  • 13 मार्च, 1947 ई. को डाबड़ा (डीडवाना परगना) में किसान सभा एवं लोक परिषद द्वारा किसान सम्मेलन आयोजित किया गया।
  • सम्मेलन में लोक परिषद के अनेक नेता भाग लेने पहुँचे।

प्रमुख नेता

नाम
मथुरादास माथुर
द्वारकादास पुरोहित
राधाकिशन बोहरा
किशनलाल शाह
नरसिंह कच्छवाह
बंशीधर पुरोहित
हरीन्द्र कुमार चौधरी
सी.आर. चौपासनीवाला
  • सभी नेता स्थानीय किसान नेता मोतीलाल चौधरी के निवास पर ठहरे हुए थे।

➤ जागीरदारों का हमला

  • जागीरदारों ने किसान सम्मेलन को विफल करने की पूर्व तैयारी कर रखी थी।
  • लोक परिषद के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं पर लाठियों तथा तेज धार वाले हथियारों से हमला किया गया।
  • मोतीलाल चौधरी के परिवार पर भी अमानवीय अत्याचार किए गए।

डाबड़ा काण्ड की प्रमुख घटनाएँ

  • मोतीलाल चौधरी की माता के पैर काट दिए गए।
  • उनके पिता एवं भाई की हत्या कर दी गई।
  • उनकी पत्नी का चेहरा विकृत कर दिया गया।
  • पूरे गाँव में आतंक का वातावरण फैल गया।

➤ डाबड़ा काण्ड का प्रभाव

  • डाबड़ा काण्ड की सर्वत्र निन्दा की गई।
  • इस घटना ने मारवाड़ किसान आन्दोलन को और अधिक चर्चा में ला दिया।
  • जागीरदारों के दमनात्मक स्वरूप के विरुद्ध जनमत तैयार हुआ।

✦ मारवाड़ किसान आन्दोलन : प्रमुख तथ्य

  • मई, 1938 ई. — मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना।
  • 28 मार्च, 1942 ई. — चंद्रावल काण्ड।
  • 13 मार्च, 1947 ई. — डाबड़ा काण्ड।
  • किसान आन्दोलन को मारवाड़ लोक परिषद का सक्रिय समर्थन प्राप्त था।
  • आन्दोलन का मुख्य लक्ष्य किसानों को जागीरी अत्याचारों से राहत दिलाना था।

बीकानेर किसान आन्दोलन

➤ आन्दोलन की पृष्ठभूमि

  • बीकानेर राज्य में कुल 2917 गाँव थे।
  • इनमें से 1393 गाँव जागीरी क्षेत्र में स्थित थे।
  • शेखावटी एवं सीकर के जाट आन्दोलनों का बीकानेर के जाट किसानों पर गहरा प्रभाव पड़ा।
  • बीकानेर के अनेक जाट प्रतिनिधियों ने:
    • झुंझुनूं के अखिल भारतीय जाट महासभा अधिवेशन में भाग लिया।
    • 20–29 जनवरी, 1934 ई. को सीकर में आयोजित जाट प्रजापति महायज्ञ में भाग लिया।
  • इन घटनाओं से किसानों में राजनीतिक चेतना एवं जागीरदारों के विरुद्ध संघर्ष का साहस उत्पन्न हुआ।

➤ किसानों की प्रमुख समस्याएँ

  • जागीरी क्षेत्र में 37 प्रकार की लागें प्रचलित थीं।
  • किसानों से बेगार ली जाती थी।
  • जागीरदारों द्वारा विभिन्न प्रकार के अत्याचार किए जाते थे।

➤ उदरासर किसान आन्दोलन (1937 ई.)

  • 1937 ई. में उदरासर के किसानों ने लाग-बाग के विरुद्ध आन्दोलन प्रारम्भ किया।
  • किसान नेता जीवन चौधरी के आग्रह पर बीकानेर प्रजामण्डल ने किसानों की शिकायतें राज्य सरकार के समक्ष रखीं।
  • किन्तु सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

➤ दूधवाखारा किसान आन्दोलन

  • चूरू के निकट स्थित दूधवाखारा गाँव का आन्दोलन बीकानेर किसान आन्दोलन का महत्वपूर्ण भाग था।
  • किसान नेता हनुमानसिंह ने जागीरदारों के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई।

➤ हनुमानसिंह का संघर्ष

  • हनुमानसिंह पहले महाराजा शार्दूलसिंह से भादरा में मिले।
  • बाद में वे अपने साथियों के साथ माउण्ट आबू में महाराजा से मिले।
  • महाराजा द्वारा कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया।

➤ हनुमानसिंह की गिरफ्तारी (जून, 1945 ई.)

  • माउण्ट आबू से लौटते समय रतनगढ़ में हनुमानसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया।
  • उन्हें 5 वर्ष का कारावास दिया गया।

प्रमुख घटनाएँ

वर्ष/तिथि घटना
जून, 1945 ई. रतनगढ़ में गिरफ्तारी
10 अगस्त, 1945 ई. जेल से रिहाई
4 जनवरी, 1948 ई. लोकप्रिय सरकार बनने के बाद अंतिम रिहाई
  • जेल में उन्होंने भूख हड़ताल की।
  • स्वास्थ्य खराब होने पर 10 अगस्त, 1945 ई. को उन्हें रिहा कर दिया गया।
  • महाराजा ने उन्हें गंगानगर क्षेत्र में 100 मुरबा भूमि देने का प्रलोभन दिया, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
  • रिहाई के बाद भी वे संघर्ष करते रहे और पुनः जेल गए।
  • 4 जनवरी, 1948 ई. को लोकप्रिय सरकार बनने के बाद उन्हें मुक्त किया गया।

✦ दूधवाखारा आन्दोलन का महत्व

  • आन्दोलन पूर्णतः सफल नहीं रहा।
  • किसानों में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ।
  • किसानों का आत्मविश्वास बढ़ा।
  • वे अत्याचारों के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाने लगे।

➤ रायसिंहनगर काण्ड (30 जून–1 जुलाई, 1946 ई.)

  • प्रजा परिषद ने रायसिंहनगर में राजनीतिक सभा आयोजित की।
  • पुलिस ने सभा पर लाठीचार्ज किया।
  • अनेक कार्यकर्ता घायल हुए।
  • उग्र भीड़ ने राजकीय विश्राम गृह को घेर लिया।
  • भीड़ को हटाने हेतु पुलिस ने गोलीबारी की।

परिणाम

  • बीरबलसिंह की मृत्यु हो गई।
  • घटना की जाँच एवं समीक्षा की गई।

समीक्षा करने वाले प्रमुख नेता

नाम
हीरालाल शास्त्री
गोकुलभाई भट्ट
रघुवरदयाल गोयल

➤ हरदत्तसिंह चौधरी

  • हनुमानगढ़ में नियुक्त मुंसिफ मजिस्ट्रेट हरदत्तसिंह चौधरी राष्ट्रीय चेतना से प्रभावित हुए।
  • उन्होंने सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे दिया।
  • बाद में प्रजा परिषद की सदस्यता ग्रहण कर ली।

➤ गोगामेड़ी किसान सभा (3 सितम्बर, 1946 ई.)

  • 3 सितम्बर, 1946 ई. को गोगामेड़ी गाँव में विशाल किसान सभा आयोजित की गई।
  • सभा में जागीर प्रथा के उन्मूलन का नारा बुलन्द किया गया।

➤ काँगड़ काण्ड (अक्टूबर, 1946 ई.)

  • अकाल एवं सूखे के बावजूद काँगड़ के जागीरदार ने किसानों से पूरा लगान वसूलने का प्रयास किया।
  • किसानों ने इसका विरोध किया।
  • कुछ किसान अपनी शिकायत लेकर बीकानेर महाराजा के पास पहुँचे।
  • इससे जागीरदार क्रोधित हो गया और किसानों पर अमानवीय अत्याचार किए गए।

परिणाम

  • काँगड़ काण्ड की व्यापक निन्दा हुई।
  • किसान संघर्ष जारी रहा।
  • अन्ततः 1948 ई. में लोकप्रिय मंत्रिमण्डल के गठन के बाद यह संघर्ष समाप्त हुआ।

➤ कुम्भाराम आर्य का योगदान

तथ्य विवरण
प्रमुख नेता कुम्भाराम आर्य
सम्बद्ध संगठन बीकानेर प्रजा परिषद
प्रमुख कार्य लाग-बाग एवं बेगार के विरोध का बिगुल
पुस्तक “किसान यूनियन क्यों”
  • कुम्भाराम आर्य ने किसानों को संगठित किया।
  • सामन्ती व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष किया।
  • स्वतंत्रता के बाद भी किसानों के हितों के लिए कार्य करते रहे।

राजस्थान के प्रमुख किसान आन्दोलन : त्वरित पुनरावलोकन (Revision Notes)

आन्दोलन प्रारम्भ वर्ष क्षेत्र प्रमुख नेता/व्यक्ति प्रमुख घटना/विशेषता
बिजौलिया किसान आन्दोलन 1897 ई. मेवाड़ विजय सिंह पथिक, साधु सीतारामदास, माणिक्यलाल वर्मा राजस्थान का प्रथम एवं सर्वाधिक दीर्घकालीन किसान आन्दोलन
बेगूं किसान आन्दोलन 1921 ई. मेवाड़ रामनारायण चौधरी रूपाजी धाकड़ एवं कृपाजी धाकड़ शहीद
भरतपुर किसान आन्दोलन 1931 ई. भरतपुर भोजी लम्बरदार बढ़े हुए भू-राजस्व के विरोध में आन्दोलन
मेव किसान आन्दोलन 1932 ई. अलवर-भरतपुर चौधरी यासीन खान, मोहम्मद हादी अन्जुमन खादिम उल इस्लाम की स्थापना
अलवर किसान आन्दोलन 1921 ई. अलवर नीमूचाणा हत्याकाण्ड (14 मई, 1925 ई.)
बूंदी किसान आन्दोलन 1922 ई. बरड़ क्षेत्र (बूंदी) नैनूराम डाबी काण्ड (2 अप्रैल, 1923 ई.)
जयपुर किसान आन्दोलन 1922 ई. सीकर-शेखावटी रामनारायण चौधरी, हरि ब्रह्मचारी, देशराज जाट आन्दोलन, कूदन गोलीकाण्ड
मारवाड़ किसान आन्दोलन 1938 ई. मारवाड़ मारवाड़ लोक परिषद चंद्रावल काण्ड (1942), डाबड़ा काण्ड (1947)
बीकानेर किसान आन्दोलन 1937 ई. बीकानेर हनुमानसिंह, जीवन चौधरी, कुम्भाराम आर्य रायसिंहनगर काण्ड, काँगड़ काण्ड

✦ प्रमुख किसान आन्दोलन एवं प्रमुख काण्ड

काण्ड वर्ष
नीमूचाणा हत्याकाण्ड 14 मई, 1925 ई.
डाबी काण्ड 2 अप्रैल, 1923 ई.
कूदन गोलीकाण्ड 1935 ई.
चंद्रावल काण्ड 28 मार्च, 1942 ई.
डाबड़ा काण्ड 13 मार्च, 1947 ई.
रायसिंहनगर काण्ड 30 जून–1 जुलाई, 1946 ई.
काँगड़ काण्ड अक्टूबर, 1946 ई.

✦ परीक्षा हेतु अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य

  • राजस्थान का प्रथम एवं सबसे लम्बा किसान आन्दोलन — बिजौलिया किसान आन्दोलन
  • बिजौलिया आन्दोलन का प्रमुख नेता — विजय सिंह पथिक
  • बिजौलिया समझौता — 11 फरवरी, 1922 ई.
  • बेगूं आन्दोलन को दबाने के लिए गोलीकाण्ड में शहीद — रूपाजी धाकड़ एवं कृपाजी धाकड़
  • बेगूं आन्दोलन का समझौता — बोल्शेविक समझौता
  • मेव आन्दोलन से सम्बन्धित संस्था — अन्जुमन खादिम उल इस्लाम
  • नीमूचाणा हत्याकाण्ड को गांधीजी ने “जलियाँवाला बाग से भी वीभत्स” बताया।
  • बूंदी आन्दोलन का प्रमुख काण्ड — डाबी काण्ड
  • जयपुर किसान आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र — सीकर एवं शेखावटी
  • जयपुर आन्दोलन की प्रेरणास्रोत महिला — धापी दादी
  • जाट महिला सम्मेलन (1934 ई.) की अध्यक्ष — किशोरी देवी
  • मारवाड़ किसान आन्दोलन का प्रमुख संगठन — मारवाड़ लोक परिषद
  • बीकानेर किसान आन्दोलन के प्रमुख नेता — हनुमानसिंह एवं कुम्भाराम आर्य

✦ एक पंक्ति में याद रखें

“बिजौलिया से शुरुआत, बेगूं से विस्तार, नीमूचाणा से बलिदान, शेखावटी से संगठन, मारवाड़-बीकानेर से संघर्ष और अंततः किसान चेतना का विस्तार।”

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