1857 की क्रांति का उदय एवं पृष्ठभूमि
➤ मराठा शक्ति का उदय और राजस्थान में प्रवेश
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शक्ति शून्यता: औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर मराठों ने अपनी शक्ति का विस्तार किया।
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प्रवेश का मार्ग: दक्षिण भारत में प्रभुत्व के बाद मालवा और गुजरात में प्रभाव बढ़ने से राजस्थान में उनका प्रवेश सुलभ हो गया।
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प्रथम धन वसूली (1711 ई.): मई 1711 ई. में मराठों ने मंदसौर के निकट मेवाड़ क्षेत्र से पहली बार धन वसूला।
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विशेष: इस घटना से चिंतित होकर महाराणा संग्राम सिंह ने सवाई जयसिंह और मुगल सम्राट से मराठा समस्या पर विचार-विमर्श किया।
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➤ मराठा हस्तक्षेप का विस्तार
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आंतरिक राजनीति में प्रवेश (1734 ई.): अप्रैल 1734 ई. में बूंदी के पदच्युत शासक बुद्धसिंह ने मराठों की सहायता से दलेल सिंह को गद्दी से हटाया।
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महत्व: यह राजस्थान का पहला अवसर था जब किसी शासक ने आंतरिक संघर्ष में मराठों को आमंत्रित किया, जिससे उनका हस्तक्षेप बढ़ गया।
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शोषण का स्वरूप (1735 ई. के बाद): मराठों ने कोटा, मेवाड़, डूंगरपुर और बांसवाड़ा में घुसपैठ की।
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विस्तार: वे राजाओं के साथ-साथ सेठ-साहूकारों को भी लूटने लगे तथा बूंदी, जोधपुर और जयपुर की राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप करने लगे।
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➤ मराठा प्रभाव और राजपूत राज्यों की स्थिति
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राजपूतों की विवशता: नादिर शाह के आक्रमण के समय मराठों ने धर्म के नाम पर संगठित होने का प्रयास किया, किन्तु मुगल दलबन्दी के कारण राजपूत शासक आपसी संघर्षों में ही उलझे रहे।
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सवाई जयसिंह की पराजय (1732 ई.): मराठों ने सवाई जयसिंह को घेरकर पराजित किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें 28 परगने मराठों को देने पड़े।
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प्रभुत्व का काल (1761-1791 ई.): राजपूत राज्यों की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर राजस्थान के अनेक क्षेत्रों पर मराठा प्रभुत्व स्थापित हो गया।
➤ हुरड़ा सम्मेलन (17 जुलाई, 1734 ई.)
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उद्देश्य: मराठों की बढ़ती शक्ति से मुक्ति पाने हेतु सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन।
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प्रतिभागी: जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, किशनगढ़, नागौर और बीकानेर के शासक हुरड़ा (मेवाड़) में एकत्र हुए।
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समझौते की शर्तें:
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संकट के समय एक-दूसरे का सहयोग करना।
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वर्षा ऋतु के बाद रामपुरा में पुनः एकत्र होकर मराठों के विरुद्ध कार्रवाई करना।
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किसी भी शासक के शत्रु को अपने राज्य में शरण न देना।
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असफलता: आपसी मतभेद, स्वार्थी नीतियों और प्रभावी नेतृत्व के अभाव के कारण सम्मेलन अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका।
| विषय | प्रमुख तथ्य (Highlights) |
| प्रथम मराठा प्रवेश | मई 1711 ई., मंदसौर (मेवाड़ क्षेत्र) |
| प्रथम आंतरिक हस्तक्षेप | 1734 ई., बूंदी (बुद्धसिंह द्वारा आमंत्रण) |
| सवाई जयसिंह की पराजय | 1732 ई., 28 परगने खोने पड़े |
| हुरड़ा सम्मेलन | 17 जुलाई 1734 ई., असफल प्रयास |
हुरड़ा सम्मेलन की विफलता का मुख्य कारण: राजपूत शासकों की आपसी फूट, स्वार्थी नीतियां और किसी एक सर्वमान्य प्रभावी नेतृत्व का अभाव था। 1732 ई. में सवाई जयसिंह की हार ने मराठों की शक्ति को राजस्थान में स्थायी आधार प्रदान कर दिया था।
1857 की क्रान्ति: मराठा पतन और ब्रिटिश आधिपत्य का उदय
➤ मराठा-राजपूत संबंधों में नया मोड़ (1735-1791 ई.)
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असफल प्रयास (1735 ई.): मुगल और राजपूतों की संयुक्त सेना मराठों को खदेड़ने में विफल रही। इसी दौरान पेशवा बाजीराव ने उदयपुर व जयपुर के शासकों से भेंट की, किन्तु जयसिंह के मध्यस्थता के प्रयास भी असफल रहे।
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दुराहसराय की संधि (1738 ई.): इस संधि के तहत मराठों को मालवा की सूबेदारी और 50 लाख रुपये प्राप्त हुए, जिसके बाद राजपूतों को कर देने पर मजबूर होना पड़ा।
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तूंगा का युद्ध (1787 ई.): राजपूतों ने संगठित होकर मराठों को पराजित किया, लेकिन इसके बावजूद मराठा प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका।
➤ सामन्ती प्रतिस्पर्धा और राज्यों का विघटन (1791-1813 ई.)
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मेवाड़ की स्थिति: 1791 ई. में अम्बाजी इंगले ने मेवाड़ का सहयोग किया, जिससे डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ पर अधिकार हुआ। 1795 ई. में चूंडावतों का वर्चस्व और 1802 ई. में अमीर खाँ पिण्डारी द्वारा नाथद्वारा पर अधिकार ने मेवाड़ को अस्थिर कर दिया।
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जोधपुर का संकट: 1793-1813 ई. के मध्य जोधपुर निरंतर उत्तराधिकार के संघर्षों और सामन्ती प्रतिस्पर्धा से जूझता रहा।
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आर्थिक दुष्परिणाम: भाड़े के सैनिकों को जुटाने में भारी धन व्यय हुआ, जिससे राज्यों की आर्थिक स्थिति अत्यंत जर्जर हो गई।
➤ ब्रिटिश मैत्री के प्रारंभिक प्रयास (1776-1803 ई.)
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प्रथम प्रयास: जयपुर के महाराजा पृथ्वीसिंह ने 1776 ई. में अंग्रेजों से मैत्री की इच्छा व्यक्त की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
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नीति में बदलाव (1803 ई.): लासवाड़ी के युद्ध में लॉर्ड लेक ने सिंधिया को पराजित किया।
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संधि की शर्तें: कम्पनी खिराज (कर) नहीं लेगी, आंतरिक हस्तक्षेप नहीं करेगी, और सुरक्षा का दायित्व कम्पनी का होगा। भरतपुर, अलवर, जयपुर और जोधपुर ने इसे स्वीकार किया।
➤ ब्रिटिश आधिपत्य की स्थापना (1817-1823 ई.)
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उद्देश्य: गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स होलकर, सिंधिया और पिण्डारियों की शक्ति सीमित कर ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित करना चाहता था।
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प्रक्रिया: 5 नवम्बर 1817 ई. को होलकर के साथ संधि के बाद अंग्रेजों को सीधे संधि का अधिकार मिला। चार्ल्स मेटकॉफ के प्रयासों से करौली, कोटा, उदयपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जयपुर और जैसलमेर ने संधियाँ कीं।
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अंतिम रियासत: 1823 ई. में सिरोही राज्य ने संधि की। इसके साथ ही 1947 ई. तक राजस्थान पर ब्रिटिश आधिपत्य स्थिर हो गया।
| विषय | प्रमुख तथ्य (Highlights) |
| दुराहसराय संधि | 1738 ई., मराठों को मालवा की सूबेदारी व 50 लाख रु. मिले। |
| तूंगा का युद्ध | 1787 ई., राजपूतों द्वारा मराठों की पराजय। |
| अमीर खाँ पिण्डारी | 1802 ई. में नाथद्वारा पर अधिकार किया। |
| ब्रिटिश आधिपत्य | 1817-1823 ई. के मध्य पूर्ण स्थापना। |
| अंतिम संधि करने वाला राज्य | सिरोही (1823 ई.) |
ब्रिटिश संरक्षण का आधार: चार्ल्स मेटकॉफ ने 1811 ई. में ही सुझाव दिया था कि पिण्डारियों व मराठों की गतिविधियों पर नियंत्रण हेतु राजपूत राज्यों का एक संघ ब्रिटिश संरक्षण में बनाया जाए। यही नीति लॉर्ड हेस्टिंग्स द्वारा 1817-18 ई. में क्रियान्वित की गई।
1857 की क्रांति के समय राजस्थान की रियासतें एवं उनके शासक
RAS परीक्षा की दृष्टि से यह तालिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे याद करने के लिए आप रियासतों के भौगोलिक वर्गीकरण का उपयोग कर सकते हैं।
| रियासत | शासक |
| कोटा | रामसिंह |
| जोधपुर (मारवाड़) | तखत सिंह |
| भरतपुर | जसवंत सिंह |
| उदयपुर (मेवाड़) | स्वरूप सिंह |
| जयपुर | रामसिंह द्वितीय |
| सिरोही | शिव सिंह |
| धौलपुर | भगवंत सिंह |
| बीकानेर | सरदार सिंह |
| करौली | मदनपाल |
| टोंक | नवाब वजीरूद्दौला |
| बूँदी | रामसिंह |
| अलवर | विनय सिंह |
| जैसलमेर | रणजीत सिंह |
| झालावाड़ | पृथ्वी सिंह |
| प्रतापगढ़ | दलपत सिंह |
| बांसवाड़ा | लक्ष्मण सिंह |
| डूंगरपुर | उदय सिंह |
➤ परीक्षा हेतु विशेष तथ्य (Key Notes)
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बीकानेर के शासक सरदार सिंह: ये राजस्थान के एकमात्र ऐसे शासक थे, जो अपनी सेना लेकर राज्य से बाहर (हिसार, पंजाब तक) अंग्रेजों की मदद करने गए थे.
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करौली के शासक मदनपाल: इन्होंने कोटा के महाराव रामसिंह को विद्रोहियों से मुक्त करवाने हेतु अपनी सेना भेजी थी.
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उदयपुर के महाराणा स्वरूप सिंह: इन्होंने नीमच छावनी से भागे हुए 40 अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को शरण दी थी और उन्हें जगमंदिर महल में ठहराया था.
1857 की क्रांति: राजस्थान में ब्रिटिश संधियाँ, प्रभाव और असंतोष
➤ ब्रिटिश संधियाँ: स्वरूप और शर्तें
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पृष्ठभूमि: 19वीं सदी के आरंभ में राजस्थान में 20 रियासतें थीं (17 राजपूत, 2 जाट, 1 मुस्लिम)।
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समान शर्तें:
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शासकों द्वारा अंग्रेजों की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करना।
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अंग्रेजों द्वारा वंशानुगत राज्याधिकार की मान्यता और बाहरी आक्रमण से सुरक्षा का आश्वासन।
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प्रत्येक रियासत में एक ‘अंग्रेज राजनीतिक एजेंट’ (P.A.) की नियुक्ति।
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बाध्यताएँ:
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विदेश नीति का अंग्रेजों के अधीन होना।
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आपसी विवादों में अंग्रेजों की मध्यस्थता अनिवार्य।
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आवश्यकतानुसार सैन्य संसाधन उपलब्ध कराना एवं वार्षिक खिराज (कर) देना।
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➤ संधियों के आर्थिक व राजनीतिक दुष्प्रभाव
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आर्थिक शोषण: नियमित खिराज और अंग्रेजी सैन्य टुकड़ियों के भारी खर्च ने राज्यों की आर्थिक स्थिति जर्जर कर दी।
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संसाधनों पर नियंत्रण: अंग्रेजों ने सांभर झील (नमक) और मेवाड़ के अफीम उत्पादक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।
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प्रशासनिक हस्तक्षेप: शांति व्यवस्था के नाम पर P.A. का हस्तक्षेप बढ़ा, जिससे शासक शासन के प्रति उदासीन हो गए।
➤ सामंतों का पतन
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उद्देश्य: शासकों ने सामंतों पर नियंत्रण हेतु अंग्रेजों की मदद ली, वहीं अंग्रेजों ने अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सामंतों के विशेषाधिकार समाप्त किए।
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बदलाव: सामंतों की सैनिक सेवा के स्थान पर नकद राशि की वसूली शुरू हुई और उनके जागीरी विशेषाधिकार धीरे-धीरे समाप्त कर दिए गए।
➤ ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध उत्पन्न असंतोष
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डूंगरपुर: जसवंत सिंह को हटाकर दलपत सिंह को गद्दी पर बैठाने से जन-नाराजगी।
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जयपुर: राजमाता भटियाणी के अधिकारों में हस्तक्षेप के कारण कप्तान ब्लेक की हत्या।
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कोटा: महाराव किशोर सिंह के विरुद्ध फौजदार जालिम सिंह का समर्थन।
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जोधपुर: महाराजा मानसिंह द्वारा ब्रिटिश सत्ता का कड़ा विरोध।
➤ 1857 की क्रांति के समय राजस्थान में ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट
| रियासत | ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट (P.A.) |
| कोटा | मेजर बर्टन |
| जोधपुर | मैक मैसन |
| भरतपुर | मोरिसन |
| जयपुर | ईडन |
| उदयपुर | शावर्स |
| सिरोही | जे. डी. हॉल |
ब्रिटिश संरक्षण का विरोधाभास: संधियों ने सुरक्षा तो दी, परंतु इसके बदले में राजस्थान की रियासतों ने अपनी ‘राजनीतिक संप्रभुता’ खो दी। सामंतों का दमन और आंतरिक मामलों में निरंतर हस्तक्षेप ही 1857 की क्रांति से पूर्व के व्यापक जन-असंतोष का मुख्य कारण बना।
1857 की क्रांति: ब्रिटिश विरोधी वातावरण और सैन्य छावनियाँ
➤ सांस्कृतिक एवं सामाजिक हस्तक्षेप और असंतोष
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हस्तक्षेप की नीति: अंग्रेजों ने सामाजिक सुधारों (कन्या वध, सती प्रथा, दास प्रथा निषेध) के नाम पर परंपराओं में हस्तक्षेप किया, जिसे जनता ने अपनी संस्कृति पर प्रहार माना।
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धार्मिक भय: अजमेर-मेरवाड़ा में ईसाई मिशनरियों की सक्रियता से जनता में यह डर फैल गया कि अंग्रेज हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाना चाहते हैं।
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साहित्यिक योगदान: राजस्थान के कवियों और साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से अंग्रेज विरोधी भावना को प्रबल किया।
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प्रमुख साहित्यकार: कवि बांकीदास, राघोदास, सान्दू गांगजी और महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण।
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➤ ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध व्यापक असंतोष के कारण
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प्रशासनिक व आर्थिक दबाव: भारी खिराज की वसूली, आर्थिक संसाधनों (नमक, अफीम) पर नियंत्रण और सामंतों के विशेषाधिकारों में कटौती।
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जन-साधारण की नाराजगी: शासकों व सामंतों के साथ-साथ आम जनता में भी अंग्रेजी शासन के प्रति गहरा आक्रोश व्याप्त था।
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परिणाम: इन सभी कारणों से 1857 की क्रांति से पूर्व ही राजस्थान में एक सुदृढ़ ‘ब्रिटिश विरोधी वातावरण’ तैयार हो चुका था।
➤ 1857 की क्रांति के समय राजस्थान में ब्रिटिश सैन्य छावनियाँ
| क्रम | छावनी का नाम | स्थान |
| 1. | नसीराबाद | अजमेर |
| 2. | नीमच | मध्य प्रदेश (सीमावर्ती) |
| 3. | देवली | टोंक |
| 4. | ब्यावर | अजमेर |
| 5. | एरिनपुरा | पाली |
| 6. | खैरवाड़ा | उदयपुर |
➤ सैन्य स्थिति: एक दृष्टि में
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कुल सैनिक संख्या: लगभग 5,000 सैनिक।
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नेतृत्व: इन छावनियों में कोई भी अंग्रेज सैनिक नहीं था; केवल लगभग 30 अंग्रेज अधिकारी सैन्य टुकड़ियों का नेतृत्व कर रहे थे।
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ए.जी.जी. (A.G.G.) के निर्देश: मेरठ में क्रांति की सूचना मिलते ही ए.जी.जी. ने निर्देश दिए कि:
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शासक क्रांतिकारियों को अपने राज्यों में प्रवेश न करने दें।
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ब्रिटिश सत्ता के विरोधियों का कठोरता से दमन करें।
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क्रांति का आधार: राजस्थान में 1857 की क्रांति का विस्फोट केवल आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह वर्षों से चले आ रहे प्रशासनिक हस्तक्षेप, आर्थिक शोषण, सामंती असंतोष और सांस्कृतिक भय का परिणाम था। साहित्यकारों की भूमिका ने इस असंतोष को जन-आंदोलन में बदलने की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की।
नसीराबाद में विद्रोह
➤ नसीराबाद विद्रोह की पृष्ठभूमि
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सैन्य तैनाती: नसीराबाद छावनी में 15वीं व 30वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री, भारतीय तोपखाना और प्रथम बम्बई लांसर्स तैनात थे।
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विद्रोह के तात्कालिक कारण:
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अविश्वास: अजमेर शस्त्रागार से वापस भेजी गई 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री को लगा कि अंग्रेज उन पर अविश्वास कर रहे हैं।
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धार्मिक असंतोष: साधु-फकीरों के वेश में आए संदेशवाहकों द्वारा चर्बी वाले कारतूसों और ईसाई बनाने के प्रयासों का प्रचार।
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दमनकारी नीति: भारतीय सैनिकों पर नियंत्रण हेतु यूरोपीय सेना और अतिरिक्त तोपें गुप्त रूप से मंगवाना।
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➤ विद्रोह का घटनाक्रम (28 मई, 1857 ई.)
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विद्रोह की शुरुआत: सैनिकों ने तोपखाने पर अधिकार कर शस्त्रागार को लूट लिया।
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अंग्रेज अधिकारियों पर हमला:
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मृत्यु: मेजर स्पॉटिसवुड और कर्नल न्यूबरी की हत्या।
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घायल: लेफ्टिनेंट लॉक और कप्तान हार्डी घायल हुए।
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पलायन: शेष अंग्रेज अधिकारी अपनी जान बचाकर ब्यावर की ओर भाग गए।
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क्रांतिकारियों की कार्यवाही: विद्रोहियों ने चर्च व बंगलों में आग लगा दी और खजाने को लूटकर दिल्ली की ओर प्रस्थान किया।
➤ क्रांति का विस्तार
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18 जून 1857 ई. को क्रांतिकारी दिल्ली पहुँचे।
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वहाँ उन्होंने अंग्रेजी सेना पर पीछे से हमला कर उसे भारी क्षति पहुँचाई।
| विषय | प्रमुख तथ्य |
| विद्रोह की तिथि | 28 मई, 1857 ई. |
| प्रमुख विद्रोही टुकड़ी | 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री |
| मृत्यु को प्राप्त अधिकारी | मेजर स्पॉटिसवुड, कर्नल न्यूबरी |
| विद्रोह के बाद गंतव्य | दिल्ली |
नसीराबाद विद्रोह की प्रकृति: यह विद्रोह पूरी तरह से सुनियोजित नहीं था, बल्कि अंग्रेजों द्वारा की गई शंकालु सैन्य गतिविधियों (अतिरिक्त तोपें मंगाना) ने सैनिकों के दबे हुए असंतोष को अचानक भड़का दिया। सैनिकों ने चार अधिकारियों को छोड़कर अन्य किसी की हत्या नहीं की, जो उनकी मुख्य शत्रुता केवल अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध होने को दर्शाता है।
नीमच में विद्रोह
➤ नीमच विद्रोह की पृष्ठभूमि एवं घटनाक्रम (3 जून, 1857 ई.)
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तात्कालिक कारण: नसीराबाद में हुए विद्रोह की खबर मिलने के बाद नीमच के सैनिकों में तीव्र असंतोष फैल गया।
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विद्रोह का स्वरूप: 3 जून, 1857 ई. को सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध शस्त्र उठा लिए। छावनी को लूट लिया गया और कई सरकारी बंगलों में आग लगा दी गई।
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क्रांतिकारियों का मार्ग: नीमच से दिल्ली प्रस्थान के दौरान:
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शाहपुरा: शासक ने क्रांतिकारियों का स्वागत किया और भोजन-आवास की व्यवस्था की।
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निम्बाहेड़ा: स्थानीय जनता द्वारा क्रांतिकारियों का उत्साहपूर्ण स्वागत।
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आगे का पड़ाव: क्रांतिकारी देवली, टोंक और आगरा होते हुए दिल्ली पहुँचे, जहाँ उन्हें व्यापक जन-समर्थन मिला।
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➤ विद्रोह का दमन
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पुनः अधिकार (8 जून, 1857 ई.): ए.जी.जी. लॉरेन्स के निर्देश पर कप्तान शॉवर्स ने कोटा, बूंदी और मेवाड़ की संयुक्त राजकीय सेनाओं के सहयोग से नीमच पर पुनः कब्जा कर लिया।
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परिणाम: यद्यपि विद्रोह को शीघ्र ही दबा दिया गया, लेकिन इस घटना ने संपूर्ण राजस्थान में क्रांति की भावना को और अधिक प्रखर व सुदृढ़ बना दिया।
| विषय | प्रमुख तथ्य |
| विद्रोह की तिथि | 3 जून, 1857 ई. |
| नीमच पर पुनः नियंत्रण | 8 जून, 1857 ई. |
| सहयोगी रियासतें (दमन हेतु) | कोटा, बूंदी और मेवाड़ |
| क्रांतिकारियों का स्वागत | शाहपुरा और निम्बाहेड़ा की जनता |
नीमच विद्रोह का प्रभाव: नीमच का विद्रोह राजस्थान में क्रांति के प्रसार की एक महत्वपूर्ण कड़ी था। शाहपुरा और निम्बाहेड़ा में जनता द्वारा क्रांतिकारियों का स्वागत यह स्पष्ट करता है कि ब्रिटिश विरोधी भावनाएं केवल छावनियों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि आम जनता में भी गहरी पैठ बना चुकी थीं।
एरिनपुरा और आउवा का संघर्ष
➤ एरिनपुरा विद्रोह (21 अगस्त, 1857 ई.)
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विद्रोह का प्रारंभ: नसीराबाद की घटना से प्रेरित होकर एरिनपुरा स्थित ‘जोधपुर लीजन’ के सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल फूँका।
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नेतृत्व: क्रांतिकारी सैनिकों ने एरिनपुरा छावनी पर अधिकार किया और दिल्ली की ओर प्रस्थान किया।
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आउवा का संरक्षण: पाली पहुँचने पर आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह ने क्रांतिकारियों को संरक्षण प्रदान किया। कुशाल सिंह मारवाड़ के एक शक्तिशाली सामंत थे, जो अंग्रेज और जोधपुर महाराजा दोनों के विरोधी थे।
➤ आउवा के प्रमुख युद्ध
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बिथोड़ा का युद्ध (8 सितम्बर, 1857 ई.): जोधपुर महाराजा की सेना (सिंघवी कुशलराज के नेतृत्व में) और क्रांतिकारियों के मध्य युद्ध हुआ। इसमें क्रांतिकारी विजयी रहे, किलेदार अनार सिंह मारा गया और जोधपुर की तोपें व सामग्री क्रांतिकारियों के हाथ लग गई।
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चेलावास का युद्ध (18 सितम्बर, 1857 ई.): ए.जी.जी. जॉर्ज लॉरेन्स ने स्वयं सेना का नेतृत्व किया, किंतु उसे भी पराजय का सामना करना पड़ा।
➤ आउवा का पतन और दमन (20 जनवरी, 1858 ई.)
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ब्रिटिश आक्रमण: बदला लेने हेतु ब्रिगेडियर होम्स के नेतृत्व में एक विशाल सेना आउवा भेजी गई।
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परिणाम: भीषण संघर्ष के पश्चात ठाकुर कुशाल सिंह सलूम्बर चले गए और अंग्रेजों ने किले पर कब्जा कर लिया।
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अत्याचार: अंग्रेजों ने आउवा को लूटने के साथ-साथ किले को बारूद से उड़ा दिया और मूर्तियों/मंदिरों को नष्ट कर स्थानीय निवासियों पर भीषण अत्याचार किए।
| घटना | तिथि | मुख्य परिणाम |
| एरिनपुरा विद्रोह | 21 अगस्त, 1857 | जोधपुर लीजन का विद्रोह |
| बिथोड़ा का युद्ध | 8 सितम्बर, 1857 | क्रांतिकारी विजयी; कुशलराज की हार |
| चेलावास का युद्ध | 18 सितम्बर, 1857 | ए.जी.जी. लॉरेन्स की हार |
| आउवा का पतन | 20 जनवरी, 1858 | अंग्रेजों का आउवा पर अधिकार |
आउवा संघर्ष का महत्व: यह विद्रोह राजस्थान में सामंती असंतोष का सर्वोच्च उदाहरण था। ए.जी.जी. जॉर्ज लॉरेन्स और जोधपुर महाराजा की संयुक्त पराजय ने ब्रिटिश प्रतिष्ठा को भारी चोट पहुँचाई थी, जिसके कारण अंग्रेजों ने दमन के नाम पर आउवा में बर्बरता की पराकाष्ठा पार कर दी थी।
मेवाड़ में विद्रोह का दमन
➤ मेवाड़ में ब्रिटिश विरोधी असंतोष
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परिस्थितियाँ: नसीराबाद विद्रोह की खबर के बाद मेवाड़ में जनता और सामंतों के बीच ब्रिटिश सत्ता के प्रति गहरा असंतोष व्याप्त था।
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महाराणा और अंग्रेजों का सहयोग: महाराणा स्वरूप सिंह और कप्तान शॉवर्स ने सामंतों की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए आपसी सहयोग की नीति अपनाई।
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सरकारी आदेश: ए.जी.जी. के निर्देश पर 27 मई 1857 को महाराणा ने सामंतों को अंग्रेजी प्रशासन व कप्तान शॉवर्स का सहयोग करने का आदेश दिया।
➤ सामंती चुनौती और उसका दमन
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सलूम्बर के रावत केसरी सिंह की चुनौती: रावत केसरी सिंह ने अपने अधिकारों की मांग की और महाराणा को चुनौती दी कि मांगें न मानने पर वे चित्तौड़ की गद्दी पर अन्य दावेदार बैठा देंगे।
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ब्रिटिश चेतावनी: कप्तान शॉवर्स ने केसरी सिंह को चेतावनी दी कि महाराणा के विरुद्ध कार्रवाई करने पर उनकी जागीर जब्त कर उन्हें राजपूताना से निष्कासित कर दिया जाएगा।
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परिणाम: इस कठोर चेतावनी के कारण केसरी सिंह शांत हो गए और मेवाड़ में बड़े विद्रोह की संभावना टल गई।
| विषय | प्रमुख तथ्य |
| मेवाड़ के P.A. | कप्तान शॉवर्स |
| मेवाड़ के महाराणा | स्वरूप सिंह |
| विद्रोही सामंत | रावत केसरी सिंह (सलूम्बर) |
| विद्रोह रोकने का माध्यम | महाराणा व P.A. का आपसी सहयोग |
मेवाड़ में विद्रोह का अभाव: मेवाड़ में 1857 की क्रांति के समय व्यापक विद्रोह न होने का मुख्य कारण महाराणा स्वरूप सिंह की कूटनीति और कप्तान शॉवर्स की ‘कठोर दमनकारी नीति’ थी। इन्होंने सामंतों को विभाजित कर और उन्हें कड़ी चेतावनी देकर बड़े जन-आंदोलन को पनपने से पहले ही रोक दिया।
कोटा में जन-विद्रोह
➤ कोटा विद्रोह की पृष्ठभूमि
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तात्कालिक कारण: पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन द्वारा कोटा के महाराव को दी गई सलाह, जिसमें उन्होंने जयदयाल, रतनलाल और जियालाल जैसे अधिकारियों को अंग्रेजों को सौंपने की मांग की थी।
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सैनिक आक्रोश: मेजर बर्टन की योजना की सूचना मिलने पर सैनिकों में भारी आक्रोश फैल गया, जिससे उन्होंने बदला लेने का निर्णय लिया।
➤ विद्रोह का घटनाक्रम (15 अक्टूबर, 1857 ई.)
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हिंसक कार्यवाही: क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी को घेरकर आग लगा दी, जिसमें मेजर बर्टन और उसके दो पुत्रों की हत्या कर दी गई।
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महाराव की स्थिति: क्रांतिकारियों ने महाराव को महल में कैद कर लिया और उन्हें एक नौ-शर्तों वाले संधिपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया।
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प्रमुख शर्त: संधि की प्रमुख शर्त यह थी कि बर्टन व उसके पुत्रों की हत्या महाराव के आदेश से हुई है।
➤ कोटा पर क्रांतिकारियों का नियंत्रण (छह माह)
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अराजकता: शहर में सरकारी गोदामों, दुकानों, और अस्त्र-शस्त्र भंडारों को लूटा गया।
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प्रशासनिक समर्थन: ऐसा प्रतीत होता है कि रियासत के अधिकांश अधिकारियों का मौन समर्थन क्रांतिकारियों को प्राप्त था।
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जन-जीवन: लूटपाट और अत्याचारों के कारण शहर में भय और आतंक का माहौल व्याप्त हो गया था।
➤ विद्रोह का दमन (22 मार्च, 1858 ई.)
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सैन्य कार्यवाही: मेजर एच. जी. राबर्ट्स नसीराबाद से 5500 सैनिकों के साथ चम्बल नदी के तट पर पहुँचा।
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मुक्तिकरण: तोपों से गोलाबारी कर क्रांतिकारियों को खदेड़ा गया और कोटा को पुनः नियंत्रण में लिया गया।
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परिणाम: क्रांतिकारी नेता जयदयाल को गिरफ्तार कर तोप से उड़ा दिया गया।
| विषय | प्रमुख तथ्य |
| विद्रोह की तिथि | 15 अक्टूबर, 1857 ई. |
| कोटा के P.A. | मेजर बर्टन |
| विद्रोह का दमन | 22 मार्च, 1858 ई. (मेजर राबर्ट्स द्वारा) |
| प्रमुख विद्रोही नेता | जयदयाल, रतनलाल, जियालाल |
कोटा विद्रोह की विशेषता: यह राजस्थान में 1857 की क्रांति का एकमात्र ऐसा विद्रोह था जो पूर्णतः ‘जन-विद्रोह’ के स्वरूप में था। यहाँ सैनिकों के साथ-साथ आम जनता और रियासती अधिकारियों का भी सहयोग क्रांतिकारियों को प्राप्त था, जिसके कारण वे छह माह तक शहर पर अपना अधिकार बनाए रखने में सफल रहे।
अन्य रियासतों में जन-विद्रोह का प्रसार
➤ भरतपुर एवं अलवर में क्रांतिकारी वातावरण
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भरतपुर: मथुरा में विद्रोह की खबर से सेना में उत्साह बढ़ गया। महाराजा की सलाह पर P.A. मेजर मॉरिसन को भरतपुर छोड़ना पड़ा। गूजर और मेवाती समुदायों ने क्रांति में बढ़-चढ़कर भाग लिया। आगरा में अंग्रेजों की स्थिति कमजोर होने से जनता का ब्रिटिश सत्ता के पतन का विश्वास दृढ़ हुआ।
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अलवर: दिल्ली से आए क्रांतिकारियों के प्रभाव से गतिविधियाँ बढ़ीं। यहाँ के गूजरों ने अंग्रेजों का तीव्र विरोध किया और शासकों के लिए मुश्किलें खड़ी कीं।
➤ धौलपुर का संकट (अक्टूबर 1857 ई.)
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विद्रोह का स्वरूप: ग्वालियर और इंदौर के क्रांतिकारियों की संयुक्त सेना धौलपुर पहुँची।
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सहयोग: धौलपुर की सेना और अधिकारियों ने राजा का साथ छोड़कर क्रांतिकारियों का समर्थन किया।
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नेतृत्व: राव रामचन्द्र और हीरालाल ने राज्य की तोपों पर अधिकार कर आगरा पर आक्रमण किया।
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दमन: दिसंबर तक अशांति बनी रही, अंततः पटियाला के शासक की सेना की मदद से व्यवस्था बहाल हुई।
➤ जयपुर की आंतरिक स्थिति
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दोहरी नीति: राव शिवसिंह ने अंग्रेजों और मुगल सम्राट दोनों से संबंध बनाए रखने की सलाह दी।
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षड्यंत्र: नवाब विलायत खां, मियां उस्मान खां और सादुल्ला खां ब्रिटिश विरोधी षड्यंत्र कर रहे थे।
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कार्रवाई: जानकारी मिलने पर महाराजा ने सादुल्ला खां को निष्कासित कर दिया और शेष दोनों को बंदी बना लिया।
➤ टोंक में विद्रोह
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विद्रोह: नवाब अंग्रेजों का समर्थक था, परंतु मीर आलम खां के नेतृत्व में उसकी सेना ने विद्रोह कर दिया।
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घटनाक्रम: सेना ने नीमच के क्रांतिकारियों को टोंक आमंत्रित किया और नवाब के किले को घेर लिया। नवाब अपने सैनिकों को रोकने में असफल रहा।
| रियासत | मुख्य घटना/स्थिति |
| भरतपुर | मेजर मॉरिसन का पलायन, गूजर-मेवाती समुदाय की सक्रियता |
| धौलपुर | ग्वालियर-इंदौर के क्रांतिकारियों का अधिकार, राव रामचन्द्र का नेतृत्व |
| जयपुर | विद्रोही षड्यंत्रकारियों (विलायत खां आदि) की गिरफ्तारी |
| टोंक | मीर आलम खां के नेतृत्व में नवाब की सेना का विद्रोह |

व्यापक स्वरूप: ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि 1857 की क्रांति का प्रभाव केवल प्रमुख छावनियों तक सीमित नहीं था, बल्कि राजस्थान की अनेक रियासतों में जनता, सेना और स्थानीय सामंतों के बीच अंग्रेजी शासन के प्रति गहरा आक्रोश व्याप्त था। धौलपुर और टोंक के उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि शासक के अंग्रेजों के समर्थक होने के बावजूद उसकी सेना विद्रोह के लिए तत्पर थी।
सलूम्बर एवं कोठारिया का योगदान तथा क्रांति के परिणाम
➤ सलूम्बर एवं कोठारिया का ब्रिटिश विरोधी योगदान
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सामंतों की भूमिका: आउवा के ठाकुर कुशालसिंह से प्रेरित होकर सलूम्बर के रावत केसरीसिंह और कोठारिया के रावत ज्योतसिंह ने क्रांतिकारियों व उनके परिवारों को गुप्त रूप से आश्रय प्रदान किया।
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सलूम्बर का विरोध: रावत केसरीसिंह ने आउवा के ठाकुर कुशालसिंह को पूर्ण सहयोग दिया और मेवाड़ महाराणा द्वारा अंग्रेजों से की गई संधि का खुलकर विरोध किया। ए.जी. लॉरेन्स के दबाव के बावजूद महाराणा उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई नहीं कर सके।
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कोठारिया का साहस: कोठारिया के रावत ज्योतसिंह ने संकट के समय ठाकुर कुशालसिंह और पेशवा नाना साहब व उनके परिवार को अपने यहाँ शरण दी तथा सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराईं।
➤ क्रांति का समापन और शासन में बदलाव
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ब्रिटिश ताज का शासन: अगस्त 1858 ई. तक विद्रोह दबा दिया गया और नवंबर 1858 ई. में भारत का शासन ईस्ट इंडिया कम्पनी से सीधे ब्रिटिश ताज (महारानी विक्टोरिया) के अधीन आ गया।
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महाराणा का स्वागत: उदयपुर के महाराणा ने ब्रिटिश ताज के शासन का स्वागत किया और अंग्रेजों के सम्मान में भव्य दावत आयोजित की।
➤ राजस्थान पर क्रांति के दीर्घकालिक प्रभाव
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सामाजिक व प्रशासनिक परिवर्तन: आधुनिक शिक्षा का प्रसार हुआ और नए मध्यम वर्ग का उदय हुआ। प्रशासनिक सेवाओं में सामान्य नागरिकों को अवसर मिले और वैश्य समुदाय को प्रशासनिक संरक्षण व महत्वपूर्ण पद प्राप्त हुए।
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पारंपरिक सत्ता का ह्रास: राजपूतों का पारंपरिक महत्व कम होने लगा और राज्य के नरेश व जागीरदार पूरी तरह अंग्रेजों पर निर्भर हो गए।
| विषय | प्रमुख तथ्य |
| सहयोगी सामंत | रावत केसरीसिंह (सलूम्बर) व रावत ज्योतसिंह (कोठारिया) |
| संरक्षण प्रदान किया | ठाकुर कुशालसिंह और पेशवा नाना साहब को |
| ब्रिटिश ताज का शासन | नवंबर 1858 ई. से |
| क्रांति के बाद बदलाव | शिक्षा प्रसार, मध्यम वर्ग का उदय, वैश्य वर्ग का प्रभाव बढ़ा |
यद्यपि 1857 की क्रांति राजस्थान में सफल नहीं रही, किंतु इसने सामंती वर्चस्व को हिला दिया। ब्रिटिश ताज के अधीन आते ही रियासतों का चरित्र बदल गया; शासक और जागीरदार अब जन-आकांक्षाओं के बजाय ब्रिटिश सुरक्षा पर अधिक आश्रित हो गए, जिससे पारंपरिक राजपूती व्यवस्था का पतन शुरू हो गया।
1857 की क्रांति: राजस्थान में असफलता के मुख्य कारण
1857 की क्रांति राजस्थान में एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप लेने के बावजूद सफल नहीं हो सकी। इसके पीछे के प्रमुख कारणों का संक्षिप्त विश्लेषण नीचे दिया गया है:
➤ असफलता के प्रमुख कारक
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राजाओं द्वारा अंग्रेजों का समर्थन: राजस्थान की अधिकांश रियासतों (जैसे जयपुर, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सिरोही, टोंक, बीकानेर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़) के शासकों ने ब्रिटिश सत्ता का साथ दिया। उन्होंने स्थानीय क्रांतिकारियों के बजाय अंग्रेजों की सैन्य सहायता करना बेहतर समझा।
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एकता एवं समन्वय का अभाव: क्रांति का विस्फोट राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर हुआ। इस कारण अंग्रेजों को विद्रोहियों से एक साथ न निपटकर, अलग-अलग टुकड़ियों को आसानी से दबाने का अवसर मिल गया।
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तांत्या टोपे को सहयोग न मिलना: मारवाड़, मेवाड़ और जयपुर जैसे शक्तिशाली राज्यों ने तांत्या टोपे को किसी भी प्रकार की सैन्य या रणनीतिक सहायता प्रदान नहीं की, जिससे क्रांति को अपेक्षित मजबूती नहीं मिली।
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संगठन एवं नेतृत्व की कमी: संपूर्ण राजस्थान के क्रांतिकारियों के लिए कोई केंद्रीय संगठन या सर्वमान्य नेता नहीं था। जब क्रांतिकारियों ने मेवाड़ के महाराणा से नेतृत्व का अनुरोध किया, तो उन्होंने सहयोग करने के बजाय उनके गुप्त पत्र ब्रिटिश अधिकारियों को सौंप दिए।
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संसाधनों का अभाव: क्रांतिकारियों के पास धन, रसद और आधुनिक हथियारों की निरंतर कमी रही। इसके अतिरिक्त, वे अंग्रेज सैनिकों की तुलना में कम प्रशिक्षित थे।
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अंग्रेजों की सैन्य श्रेष्ठता: जून 1858 तक अंग्रेजों ने उत्तर भारत के अधिकांश विद्रोहों को दबाकर अपनी पूरी सैन्य शक्ति राजस्थान पर केंद्रित कर दी, जिससे विद्रोह को कुचलना आसान हो गया।
| कारक | प्रभाव |
| राजकीय नीति | शासकों की ब्रिटिश निष्ठा ने क्रांति की कमर तोड़ दी। |
| विद्रोह का स्वरूप | संगठित नेतृत्व के अभाव में आंदोलन बिखर गया। |
| सैन्य स्थिति | संसाधनों की कमी और अंग्रेजों की विशाल संगठित सेना। |
1857 की क्रांति की विफलता का सबसे बड़ा कारण रियासती शासकों की ‘ब्रिटिश-परस्त’ नीति और क्रांतिकारियों के बीच रणनीतिक समन्वय का अभाव था। सामंतों और जनता का समर्थन होने के बावजूद, प्रभावी केंद्रीय नेतृत्व के बिना यह आंदोलन ब्रिटिश साम्राज्य की सुदृढ़ सैन्य शक्ति के आगे टिक नहीं सका।
1857 की क्रांति: असफलता के परिणाम एवं दूरगामी प्रभाव
1857 की क्रांति की विफलता ने राजस्थान की राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। इसके प्रमुख परिणाम निम्नलिखित हैं:
➤ क्रांति के प्रमुख परिणाम
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ब्रिटिश संरक्षण का सुदृढ़ीकरण: क्रांति की असफलता के पश्चात राजस्थान की अधिकांश रियासतें पूर्णतः ब्रिटिश संरक्षण के अधीन आ गईं, जिससे उन पर अंग्रेजी प्रभाव में पहले की तुलना में और अधिक वृद्धि हुई।
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संधियों का यथावत रहना: ब्रिटिश सम्राट द्वारा ईस्ट इंडिया कम्पनी और राजस्थान की रियासतों के मध्य हुई पूर्व संधियों को बिना किसी परिवर्तन के यथावत जारी रखा गया।
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दोहरा शासन (दोहरा बोझ): राज्य की जनता पर गुलामी का दोहरा बोझ पड़ गया; वे एक ओर अपने पारंपरिक रियासती शासकों के प्रति जवाबदेह थे, तो दूसरी ओर उन पर अंग्रेजों का प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण भी स्थापित हो गया। इसके परिणामस्वरूप, निकट भविष्य में स्वतंत्रता आंदोलनों की सफलता की संभावनाएं काफी क्षीण हो गईं।
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राष्ट्रीय चेतना का उदय: अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार ने लोगों में राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया। स्वधर्म, स्वदेशी, स्वराज और स्वभाषा जैसे विचारों ने जनमानस में स्वतंत्रता की आकांक्षा को पुनः जागृत किया।
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प्रमुख नेतृत्व: इस नव-जागृति को अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहट और गोपालसिंह खरवा जैसे दूरदर्शी नेताओं ने नई दिशा प्रदान की।
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➤ क्रांति का ऐतिहासिक महत्व यद्यपि 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अपने तात्कालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रहा, किंतु इसने भविष्य में होने वाले संगठित और व्यापक स्वतंत्रता आंदोलनों की मजबूत नींव तैयार कर दी।
निष्कर्ष: 1857 की क्रांति राजस्थान के इतिहास में एक ‘संक्रमण बिंदु’ (Transition Point) थी। इसने सामंती शासन की सीमाओं को उजागर किया और जनता के बीच आधुनिक राष्ट्रवादी विचारधाराओं के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया।

