राजस्थान के लोकनाट्य

❖ ख्याल

  • ख्याल राजस्थान का एक संगीत प्रधान लोकनाट्य है, जिसकी कथावस्तु मुख्यतः ऐतिहासिक लोककथाओं पर आधारित होती है।
  • ख्याल में कथा का संचालन करने वाले व्यक्ति को हलकारा कहा जाता है।
  • इस लोकनाट्य में अभिनय करने वाले कलाकार खिलाड़ी कहलाते हैं।
  • ख्याल के कलाकारों के बीच आयोजित प्रतियोगिता को दंगल के नाम से जाना जाता है।

❖ कुचामनी ख्याल

  • कुचामनी ख्याल की परंपरा का प्रारंभ लच्छीराम ने किया।
  • इसके प्रमुख खिलाड़ियों में उगमराज का विशेष स्थान माना जाता है।
  • लच्छीराम द्वारा रचित प्रमुख ख्यालों में चाँद नीलगिरी, राव रिडमल तथा मीरा मंगल शामिल हैं।

विशेषताएँ

  • इसकी प्रस्तुति शैली ओपेरा (संगीत) से मिलती-जुलती है।
  • इसका मंचन प्रायः खुले मंच पर किया जाता है।
  • इसमें महिला पात्रों का अभिनय पुरुष कलाकार करते हैं।
  • संगीत संगत के लिए ढोल, शहनाई तथा सारंगी का उपयोग किया जाता है।
  • अभिनय करने वाले कलाकार स्वयं ही गीतों का गायन भी करते हैं।

❖ शेखावाटी (चिड़ावा) ख्याल

  • शेखावाटी (चिड़ावा) ख्याल के प्रवर्तक चिड़ावा निवासी नानूराम थे।
  • इसे जन-जन तक लोकप्रिय बनाने का श्रेय उनके शिष्य दूलिया राणा को दिया जाता है।

इसकी प्रमुख ख्यालें निम्नलिखित हैं—

    • हीर राँझा
    • हरिश्चन्द्र
    • भर्तृहरि
    • जयदेव कलाली
    • ढोला मरवण
    • आल्हादेव

❖ जयपुरी ख्याल

  • जयपुरी ख्याल का प्रदर्शन मुख्यतः गुणीजन खाना से जुड़े कलाकारों द्वारा किया जाता था।
  • इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें महिला भूमिकाएँ महिलाओं द्वारा ही निभाई जाती हैं।

इसकी प्रमुख ख्यालें हैं—

  • जोगी-जोगन
  • कान-गुजरी
  • मियाँ-बीबी
  • पठान

नोट—

  • सवाई जयसिंह ने चित्रकला के संरक्षण हेतु सूरतखाना की स्थापना कराई।
  • सवाई प्रताप सिंह ने 22 विद्वान कलाकारों के लिए गुणीजनखाना की स्थापना करवाई।
  • सवाई मानसिंह द्वितीय ने जयपुर में पोथीखाना संग्रहालय का निर्माण कराया।

❖ हेला ख्याल

  • हेला ख्याल मुख्य रूप से लालसोट (दौसा) तथा सवाई माधोपुर क्षेत्र में प्रचलित है।
  • इसकी प्रस्तुति में बम एवं नौबत वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
  • इसकी सबसे प्रमुख पहचान हेला देना, अर्थात लंबी टेर लगाकर स्वर देना, है।

❖ अली बख्शी ख्याल

  • अली बख्शी ख्याल की शुरुआत मुंडावर (खैरथल-तिजारा) में राजा अली बख्श के शासनकाल के दौरान हुई।
  • अली बख्श को अलवर का रसखान कहा जाता है।
★ ढप्पाली ख्याल
    • ढप्पाली ख्याल का प्रचलन मुख्य रूप से अलवर एवं भरतपुर में है।
★ भेंट के दंगल
    • भेंट के दंगल धौलपुर जिले के बांडी एवं बसेड़ी क्षेत्र में आयोजित किए जाते हैं।

❖ कन्हैया ख्याल

  • कन्हैया ख्याल का प्रचलन करौली, सवाई माधोपुर तथा दौसा में है।
  • इस लोकनाट्य का प्रस्तोता मेडिया कहलाता है।

❖ गवरी (राई)

  • गवरी (राई) मेवाड़ क्षेत्र की भील जनजाति के पुरुषों द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला प्रमुख लोकनाट्य है।
  • इसे राजस्थान का सबसे प्राचीन लोकनाट्य माना जाता है, इसलिए इसे लोकनाट्य का मेरू नाट्य भी कहा जाता है।

इस लोकनाट्य के अंतर्गत प्रस्तुत की जाने वाली प्रमुख लघु नाटिकाएँ हैं—

    • गोमा मीणा
    • कालू कीर
    • कानगुजरी
    • मियावड़
    • नाहर

नोट: गवरी (राई) का विस्तृत अध्ययन गवरी नृत्य शीर्षक के अंतर्गत किया जाता है।

तुरा-कलंगी ख्याल

  • तुरा-कलंगी ख्याल के प्रवर्तक चंदेरी (मध्यप्रदेश) के हिन्दू संत तुकनगीर तथा मुस्लिम संत शाहअली माने जाते हैं।
  • लगभग 400 वर्ष पूर्व इन दोनों संतों ने मेवाड़ में आकर इस ख्याल परंपरा का प्रचार-प्रसार किया।
  • इस ख्याल में तुरा को भगवान शिव तथा कलंगी को माता पार्वती का प्रतीक माना जाता है।
  • राजस्थान में इस ख्याल परंपरा का आरंभ सहेडूसिंह (तुरा पक्ष) एवं हम्मिद बेग (कलंगी पक्ष) के नेतृत्व में हुआ।

★ मुख्य केन्द्र:- घौसूण्डा, निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़) तथा नीमच इसके प्रमुख केन्द्र हैं।

विशेषताएँ

  • प्रस्तुति के दौरान चंग लोकवाद्य का प्रयोग किया जाता है।
  • इस लोकनाट्य में बोले जाने वाले संवाद ‘बोल’ कहलाते हैं।
  • प्रदर्शन से पूर्व मंच को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है तथा दर्शकों की भी सक्रिय भागीदारी रहती है।

★ प्रमुख ख्यालें

  • सागर सेठ का खेल
  • रूकमणी मंगल
  • राजा हरिश्चन्द्र
  • भक्त पूरणमल
  • कृष्णलीला

★ प्रमुख कलाकार

  • जयदयाल सोनी
  • चेताराम सोनी
  • हमीद बेग
  • ताराचंद
  • ठाकुर ओंकारसिंह

रम्मत

  • रम्मत जैसलमेर एवं बीकानेर का प्रसिद्ध संगीत प्रधान लोकनाट्य है।
  • रम्मत शब्द का अर्थ रमने (खेलने) वाला होता है।
  • इसका मंचन प्रायः खुली कॉलोनी अथवा बाजार के मध्य किया जाता है।
  • बीकानेर में होली के अवसर पर रम्मतों की शुरुआत फक्कड़ दाता की रम्मत से होती है।

★ पाटा संस्कृति –

  • बीकानेर में रम्मत का मंचन लकड़ी के बड़े तख्तों (पाटों) पर किया जाता है, जिसे पाटा संस्कृति कहा जाता है।

प्रमुख रम्मतें – 

      • पूरण भक्त
      • मोरध्वज
      • अमरसिंह राठौड़ री रम्मत
      • बारह गुवाड़ री रम्मत
      • हिडाऊ मेरी की रम्मत
      • राजा हरिश्चन्द्र
      • लैला-मजनूँ
      • भक्त प्रह्लाद
  • हिडाऊ मेरी आदर्श पति-पत्नी के जीवन पर आधारित सबसे लोकप्रिय रम्मत मानी जाती है।
  • रम्मत का प्रदर्शन करने वाले कलाकार खेलार कहलाते हैं।
  • रम्मत के मुख्य कलाकारों को टेरिये कहा जाता है।
  • जैसलमेर में तेजकवि ने श्री कृष्णा कंपनी के नाम से रम्मतों का अखाड़ा स्थापित किया।
  • सन् 1943 में तेजकवि ने स्वतंत्र बावनी रम्मत की रचना कर उसे महात्मा गांधी को समर्पित किया। इसके बाद उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए गए, जिस पर उन्होंने कहा—

“कमिश्नर खोल दरवाजा हमें भी जेल जाना है,
हिन्द तेरा है न तेरे बाप का,
हमारी जमीन पर लगाया ये बंदीखाना है।”

अन्य प्रमुख कलाकार – 

  • सकमल एवं तुलसीदास
  • मनीराम व्यास
  • फागू महाराज
  • सूआ महाराज

भवाई

  • भवाई के आदि पुरुष बाघा जी जाट (केकड़ी, अजमेर) माने जाते हैं।
  • इसका मूल विकास गुजरात में हुआ, जबकि राजस्थान में इसका प्रदर्शन मुख्यतः गुजरात सीमा से लगे जिलों में किया जाता है।
  • बीकाजी-बाघा जी तथा सगाजी-सगीजी भवाई के प्रसिद्ध नाट्य हैं।
  • शांता गांधी द्वारा रचित जस्मा ओडन भवाई का प्रसिद्ध नाट्य है।
  • सांगीलाल सांगड़िया भवाई नाट्य के प्रमुख कलाकारों में शामिल हैं।

कठपुतली नाट्य

  • कठपुतली नाट्य का प्रदर्शन मुख्यतः नट जाति एवं भाट जाति द्वारा किया जाता है।
  • विश्व कठपुतली दिवस प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है।
  • राजस्थान में उदयपुर एवं चित्तौड़गढ़ कठपुतली निर्माण के प्रमुख केन्द्र हैं।

चारबैत (टोंक)

प्रारंभ – 

    • टोंक के नवाब फैजुल्ला खाँ के शासनकाल में अब्दुल करीम खाँ निंहग ने चारबैत की शुरुआत की।

विशेषता – 

    • प्रस्तुति के समय गायक ढफ बजाते हुए घुटनों के बल खड़ा होकर अपनी बात प्रस्तुत करता है।

तमाशा

  • तमाशा मूलतः महाराष्ट्र का लोकनाट्य है, जबकि राजस्थान में इसका प्रमुख विकास जयपुर में हुआ।
  • राजस्थान में इसकी शुरुआत जयपुर के शासक सवाई प्रतापसिंह के शासनकाल में हुई।
  • इसके प्रवर्तक महाराष्ट्र निवासी बंशीधर भट्ट माने जाते हैं।
  • इसका मंचन खुले मंच पर किया जाता है, जिसे अखाड़ा कहा जाता है।

प्रमुख तमाशे

  • जोगी-जोगन
  • जूठन मियां

प्रमुख कलाकार

कलाकार विशेष जानकारी
फुलजी भट्ट प्रमुख तमाशा कलाकार
गोपीकृष्ण भट्ट प्रमुख तमाशा कलाकार
गोपजी भट्ट प्रमुख तमाशा कलाकार
वासुदेव भट्ट हीर रांझा एवं गोपीचंद के रचयिता

स्वांग

  • स्वांग प्रस्तुत करने वाले कलाकार को बहुरूपिया कहा जाता है।

प्रमुख कलाकार

कलाकार विशेष जानकारी
जानकीलाल भांड (भीलवाड़ा) सन् 2024 में पद्मश्री से सम्मानित
परशुराम भांड (केलवा, राजसमंद) प्रसिद्ध बहुरूपिया कलाकार

नौटंकी

  • राजस्थान में नौटंकी का प्रचलन मुख्यतः भरतपुर, धौलपुर, करौली एवं सवाई माधोपुर में है।
  • यह लोकनाट्य उत्तर प्रदेश की हाथरसी नौटंकी से प्रभावित है।
  • इसकी प्रस्तुति में 9 प्रकार के वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
  • राजस्थान में नौटंकी के प्रचार-प्रसार का श्रेय डिग निवासी श्री भूरीलाल को दिया जाता है।

प्रमुख खिलाड़ी

  • गिरिराज प्रसाद (कांसा)
  • रामदयाल शर्मा (भरतपुर)

प्रमुख नौटंकियाँ

  • नल-दमयंती
  • लैला-मजनूँ
  • रूप बसंत
  • राजा भर्तृहरि
  • राजा हरिश्चन्द्र
  • नकाबपोश

प्रसिद्ध पार्टियाँ

  • गुलाल बाई
  • कृष्णा कुमारी
  • कमलेश लता

रामलीला

बिंदु विवरण
प्रारंभ गोस्वामी तुलसीदास
मूक रामलीला बिसाऊ (झुंझुनू)
अन्य प्रसिद्ध केंद्र पाटूदा (कोटा) एवं वेंकटेश (भरतपुर)

रासलीला

बिंदु विवरण
उत्पत्ति वल्लभ संप्रदाय के वल्लभाचार्य द्वारा
आधार श्रीकृष्ण के जीवन की लीलाओं पर आधारित
प्रमुख केंद्र फुलेरा (जयपुर)
मुख्य कलाकार शिवलाल कुमावत (भरतपुर)

टूटिया / टूंकी / खोड्या

  • वर की बारात प्रस्थान करने के बाद वर पक्ष की महिलाएँ वर-वधू का स्वांग रचते हुए प्रतीकात्मक (नकली) विवाह करती हैं।
★ गौरलीला
    • गरासिया जनजाति द्वारा गणगौर के अवसर पर गौरलीला का मंचन किया जाता है।
★ सनकादिकों की लीलाएँ
    • घोसुंडा एवं बस्सी (चित्तौड़गढ़) इस लोकनाट्य के प्रमुख केंद्र हैं।

नोट – मेवाड़ में मोतीलाल जाट ने प्रथम रासधारी नाटक की रचना की।

पारसी थियेटर

  • पारसी थियेटर रंगमंचीय शैली पर आधारित नाट्य परंपरा है।
  • जयपुर एवं अलवर में महबूब हसन ने पारसी शैली के नाटकों का मंचन किया।
बिंदु विवरण
राजस्थान का प्रथम पारसी थियेटर राम प्रकाश थियेटर, जयपुर
स्थापना वर्ष 1878
संस्थापक महाराजा रामसिंह द्वितीय

पारसी थियेटर से जुड़े प्रमुख कलाकार

माणिक्यलाल डांगी पारसी रंगमंच के प्रमुख कलाकारों में गिने जाते हैं।
गणपतलाल डांगी का नाम भी पारसी थियेटर के प्रसिद्ध कलाकारों में शामिल है।
कन्हैयालाल पंवार ने भी पारसी रंगमंच की परंपरा को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भवानी नाट्यशाला

    • राजस्थान की प्रसिद्ध भवानी नाट्यशाला झालावाड़ में स्थित है।

गंगा थियेटर

    • बीकानेर में स्थित गंगा थियेटर राजस्थान के प्रमुख रंगमंचों में से एक है।

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