❖ भौतिक विज्ञान ❖
भौतिकी प्राकृतिक विज्ञान की वह प्रमुख शाखा है जिसमें द्रव्य (Matter), ऊर्जा (Energy) तथा इनके बीच होने वाली विभिन्न परस्पर क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। प्राकृतिक जगत को समझने में भौतिकी की भूमिका आधारभूत मानी जाती है, क्योंकि विज्ञान की अधिकांश अन्य शाखाओं का विकास काफी हद तक इसके सिद्धांतों एवं ज्ञान पर आधारित है।
❖ मात्रक
- किसी भौतिक राशि के मापन के लिए निर्धारित मानक को मात्रक (Unit) कहा जाता है।
➤ मात्रकों को मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है—
- मूल मात्रक (Fundamental Unit)
- व्युत्पन्न मात्रक (Derived Unit)
➤ S.I. पद्धति में कुल सात मूल मात्रक निर्धारित किए गए हैं, जिन्हें निम्न सारणी में दर्शाया गया है—
| भौतिक राशि | S.I. का मूल मात्रक | संकेत |
|---|---|---|
| 1. लम्बाई | मीटर (metre) | m (मी) |
| 2. द्रव्यमान | किलोग्राम (kilogram) | kg (किग्रा) |
| 3. समय | सेकण्ड (second) | s (से) |
| 4. ताप | केल्विन (kelvin) | K (के) |
| 5. विद्युत धारा | ऐम्पियर (ampere) | A (ऐ) |
| 6. ज्योति-तीव्रता | कैण्डेला (candela) | cd (कैण्ड) |
| 7. पदार्थ का परिमाण | मोल (mole) | mol (मोल) |
➤ S.I. पद्धति के सम्पूरक मूल मात्रक निम्न हैं—
- समतल कोण का मात्रक रेडियन (radian) तथा उसका संकेत rad है।
- घन कोण (Solid Angle) का मात्रक स्टेरेडियन (steradian) तथा उसका संकेत sr है।
➤ S.I. पद्धति में कुछ पुराने मात्रकों के नाम एवं संकेतों को परिवर्तित किया गया है—
| भौतिक राशि | पुराना नाम एवं संकेत | नया नाम एवं संकेत |
|---|---|---|
| ताप | डिग्री सेन्टीग्रेड, °C | डिग्री सेल्सियस, °C |
| आवृत्ति | कम्पन प्रति सेकण्ड, cps | हर्ट्ज, Hz |
| ज्योति-तीव्रता | कैण्डल शक्ति, C.P. | कैण्डेला, cd |
- वे सभी मात्रक, जिन्हें मूल मात्रकों के संयोजन द्वारा व्यक्त किया जाता है, व्युत्पन्न मात्रक कहलाते हैं।
- अत्यधिक बड़ी दूरियों के मापन के लिए प्रकाशवर्ष (Light Year) का उपयोग किया जाता है। यह दूरी का मात्रक है।
1 प्रकाशवर्ष = 9.46 × 10¹⁵ मीटर
- दूरी की सबसे बड़ी प्रचलित इकाई पारसेक (Parsec) मानी जाती है।
1 पारसेक = 3.26 प्रकाशवर्ष = 3.08 × 10¹⁶ मीटर
- बल का C.G.S. पद्धति में मात्रक डाइन (Dyne) तथा S.I. पद्धति में मात्रक न्यूटन (Newton) होता है।
1 न्यूटन = 10⁵ डाइन
- कार्य का C.G.S. पद्धति में मात्रक अर्ग (Erg) तथा S.I. पद्धति में मात्रक जूल (Joule) होता है।
1 जूल = 10⁷ अर्ग
- भौतिकी में अत्यन्त बड़ी एवं अत्यन्त छोटी राशियों को सामान्यतः दस की घात (Power of 10) के रूप में व्यक्त किया जाता है। इसके लिए कुछ विशेष पूर्व प्रत्यय (Prefixes) एवं उनके संकेत निर्धारित किए गए हैं—
| दस का घात | पूर्व प्रत्यय (Prefix) | प्रतीक (Symbol) | दस का घात | पूर्व प्रत्यय (Prefix) | प्रतीक (Symbol) |
|---|---|---|---|---|---|
| 10¹⁸ | एक्सा (exa) | E | 10⁻¹⁸ | एटो (atto) | a |
| 10¹⁵ | पेटा (peta) | P | 10⁻¹⁵ | फेम्टो (femto) | f |
| 10¹² | टेरा (tera) | T | 10⁻¹² | पीको (pico) | p |
| 10⁹ | गीगा (giga) | G | 10⁻⁹ | नैनो (nano) | n |
| 10⁶ | मेगा (mega) | M | 10⁻⁶ | माइक्रो (micro) | μ |
| 10³ | किलो (kilo) | k | 10⁻³ | मिली (milli) | m |
| 10² | हेक्टो (hecto) | h | 10⁻² | सेण्टी (centi) | c |
| 10¹ | डेका (deca) | da | 10⁻¹ | डेसी (deci) | d |
❖ गति
- अदिश राशियाँ (Scalar Quantities): वे भौतिक राशियाँ जिनमें केवल परिमाण होता है तथा दिशा का कोई महत्व नहीं होता, उन्हें अदिश राशियाँ (Scalar Quantities) कहा जाता है।
- द्रव्यमान, चाल, आयतन, कार्य, समय तथा ऊर्जा इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
➤ विद्युत धारा (Current), ताप (Temperature) तथा दाब (Pressure) भी अदिश राशियाँ हैं।
- सदिश राशियाँ (Vector Quantities): जिन भौतिक राशियों में परिमाण के साथ-साथ दिशा भी विद्यमान होती है तथा जिनका योग निश्चित नियमों के अनुसार किया जाता है, उन्हें सदिश राशियाँ (Vector Quantities) कहा जाता है।
- वेग, विस्थापन, बल तथा त्वरण इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- दूरी (Distance): किसी वस्तु द्वारा निश्चित समयांतराल में तय किए गए वास्तविक पथ की कुल लंबाई को दूरी (Distance) कहा जाता है।
- दूरी एक अदिश राशि है तथा इसका मान सदैव धनात्मक (+ve) होता है।
- विस्थापन (Displacement): किसी वस्तु की प्रारम्भिक तथा अंतिम स्थिति के बीच एक निश्चित दिशा में प्राप्त न्यूनतम दूरी को विस्थापन (Displacement) कहा जाता है।
- विस्थापन एक सदिश राशि है तथा इसका S.I. मात्रक मीटर (m) है।
- विस्थापन का मान धनात्मक, ऋणात्मक अथवा शून्य भी हो सकता है।
- चाल (Speed): किसी वस्तु द्वारा प्रति सेकण्ड तय की गई दूरी को उसकी चाल (Speed) कहा जाता है।
चाल = दूरी / समय
-
- चाल एक अदिश राशि है तथा इसका S.I. मात्रक मी./से. है।
- वेग (Velocity): किसी वस्तु के विस्थापन में परिवर्तन की दर अथवा किसी निश्चित दिशा में प्रति सेकण्ड तय की गई दूरी को वेग (Velocity) कहा जाता है।
- वेग एक सदिश राशि है तथा इसका S.I. मात्रक मी./से. होता है।
- त्वरण (Acceleration): किसी वस्तु के वेग में समय के साथ होने वाले परिवर्तन की दर को त्वरण (Acceleration) कहा जाता है।
- त्वरण एक सदिश राशि है तथा इसका S.I. मात्रक मी./से.² होता है।
- यदि समय के साथ किसी वस्तु का वेग घटता है, तो उस स्थिति में प्राप्त ऋणात्मक त्वरण को मंदन (Retardation) कहा जाता है।
- वृतीय गति (Circular Motion): जब कोई वस्तु किसी वृत्ताकार पथ पर गति करती है, तब उसकी गति को वृतीय गति (Circular Motion) कहा जाता है।
- यदि वस्तु पूरे वृत्तीय पथ पर समान चाल बनाए रखती है, तो यह गति एकसमान वृतीय गति कहलाती है।
- वृतीय गति को त्वरित गति माना जाता है, क्योंकि गति के दौरान वस्तु के वेग की दिशा निरंतर बदलती रहती है।
- कोणीय वेग (Angular Velocity) वृत्तीय पथ पर गतिमान कण को केन्द्र से जोड़ने वाली रेखा एक सेकण्ड में जितने कोण से घूमती है, वही उस कण का कोणीय वेग (Angular Velocity) कहलाता है।
- कोणीय वेग को सामान्यतः ω (ओमेगा) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। —
अर्थात् ω = θ / t
- यदि कोई कण 1 सेकण्ड में n चक्कर पूरा करता है, तो— ω = 2πn क्योंकि एक पूर्ण चक्कर में कण 2π (360°) रेडियन का कोण बनाता है। यदि वृत्तीय पथ की त्रिज्या r हो तथा कण 1 सेकण्ड में n चक्कर लगाए, तो एक सेकण्ड में तय की गई दूरी—
= वृत्त की परिधि × n = 2πrn
- यही दूरी उस कण की रेखीय चाल (Linear Speed) के बराबर होती है।
अतः— v = 2πrn
इसलिए— v = 2πn × r = ω × r (क्योंकि— ω = 2πn)
अतः— रेखीय चाल = कोणीय चाल × त्रिज्या
❖ न्यूटन के गति नियम: —
- भौतिकी के जनक वैज्ञानिक न्यूटन ने सन् 1687 ई. में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘प्रिंसिपिया’ में पहली बार गति के नियमों का प्रतिपादन किया।
- इन नियमों ने वस्तुओं की गति तथा उन पर कार्य करने वाले बलों के बीच संबंध को स्पष्ट किया।
(1) न्यूटन का प्रथम गति नियम: —
- यदि कोई वस्तु विराम अवस्था में है, तो वह विराम में बनी रहती है तथा यदि कोई वस्तु एकसमान चाल से सीधी रेखा में गतिमान है, तो वह उसी अवस्था में चलती रहती है, जब तक उस पर कोई बाह्य बल लगाकर उसकी वर्तमान स्थिति में परिवर्तन न किया जाए।
- न्यूटन के प्रथम नियम को गैलीलियो का नियम अथवा जड़त्व का नियम भी कहा जाता है।
- किसी वस्तु की वह प्राकृतिक प्रवृत्ति जिसके कारण वह बाहरी प्रभाव के अभाव में अपनी विराम अवस्था अथवा एकसमान गति की अवस्था को बनाए रखती है, जड़त्व कहलाती है।
- प्रथम गति नियम से बल की परिभाषा प्राप्त होती है।
➤ बल की परिभाषा : —
- बल वह बाह्य कारण है जो किसी वस्तु की वर्तमान अवस्था में परिवर्तन करता है अथवा परिवर्तन उत्पन्न करने का प्रयास करता है।
- बल एक सदिश राशि है।
- बल का S.I. मात्रक न्यूटन (Newton) है।
➤ जड़त्व के उदाहरण : —
- स्थिर खड़ी मोटर या रेलगाड़ी के अचानक चलने पर उसमें बैठे यात्री पीछे की ओर झुक जाते हैं।
- गतिमान मोटरकार के अचानक रुक जाने पर उसमें बैठे व्यक्ति आगे की दिशा में झुक जाते हैं।
- हाथ से पकड़े गए कम्बल को डण्डे से पीटने पर उसमें उपस्थित धूल के कण अलग होकर नीचे गिर जाते हैं।
➤ संवेग : —
- किसी वस्तु के द्रव्यमान तथा वेग के गुणनफल को उस वस्तु का संवेग (Momentum) कहा जाता है।
: — संवेग = द्रव्यमान × वेग
- संवेग एक सदिश राशि है।
- इसका S.I. मात्रक किग्रा. × मी./से. होता है।
(2) न्यूटन का द्वितीय गति नियम: —
- किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस पर लगाए गए बल के समानुपाती होती है तथा यह परिवर्तन उसी दिशा में होता है जिस दिशा में बल लगाया जाता है।
- यदि किसी वस्तु का द्रव्यमान m, उत्पन्न त्वरण a तथा आरोपित बल F हो, तो— F = ma
- इस प्रकार न्यूटन के द्वितीय नियम से बल का व्यंजक प्राप्त होता है।
- प्रथम गति नियम, वास्तव में द्वितीय गति नियम का ही एक विशेष रूप माना जाता है।
(3) न्यूटन का तृतीय गति नियम: —
- प्रत्येक क्रिया के लिए उसके बराबर परिमाण की तथा विपरीत दिशा में एक प्रतिक्रिया अवश्य उत्पन्न होती है।
➤ उदाहरण
- बन्दूक से गोली चलाने पर गोली आगे की ओर जाती है जबकि बन्दूक पीछे की ओर धक्का देती है।
- नाव से किनारे पर छलांग लगाने पर नाव पीछे की दिशा में खिसक जाती है।
- रॉकेट का प्रक्षेपण भी इसी सिद्धांत पर आधारित होता है।
➤ संवेग संरक्षण का सिद्धांत: —
- यदि किसी कण समूह अथवा निकाय पर कोई बाह्य बल कार्य नहीं कर रहा हो, तो उस निकाय का कुल संवेग अपरिवर्तित बना रहता है।
- अर्थात् टक्कर से पहले तथा टक्कर के बाद निकाय का कुल संवेग समान रहता है।
➤ आवेग: —
- जब किसी वस्तु पर बहुत कम समय के लिए बड़ा बल कार्य करता है, तब बल तथा समय-अंतराल के गुणनफल को उस बल का आवेग (Impulse) कहा जाता है।
: — आवेग = बल × समय अंतराल = संवेग में परिवर्तन
- आवेग एक सदिश राशि है।
- इसका मात्रक न्यूटन-सेकण्ड (Ns) होता है।
- इसकी दिशा वही होती है जो लगाए गए बल की दिशा होती है।
➤ अभिकेंद्रीय बल : —
- जब कोई वस्तु वृत्ताकार मार्ग पर गति करती है, तब उस पर एक ऐसा बल कार्य करता है जिसकी दिशा सदैव वृत्त के केन्द्र की ओर होती है।
- इस केन्द्राभिमुख बल को अभिकेंद्रीय बल (Centripetal Force) कहा जाता है।
- इसी बल की उपस्थिति के कारण वस्तु वृत्तीय पथ पर बनी रहती है।
- यदि यह बल उपस्थित न हो तो वस्तु वृत्ताकार मार्ग पर गति नहीं कर सकती।
- यदि किसी पिण्ड का द्रव्यमान m, चाल v तथा वृत्तीय पथ की त्रिज्या r हो, तो
आवश्यक अभिकेंद्रीय बल— F = mv²/r
➤ अपकेन्द्रीय बल : —
- अजड़त्वीय फ्रेम (Non-Inertial Frame) में न्यूटन के नियमों को लागू करने के लिए कुछ काल्पनिक बलों की कल्पना करनी पड़ती है, जिन्हें किसी वास्तविक पिण्ड से संबद्ध नहीं किया जा सकता।
- ऐसे बलों को छद्म बल अथवा जड़त्वीय बल कहा जाता है।
- अपकेन्द्रीय बल (Centrifugal Force) इसी प्रकार का एक छद्म बल है।
- इसकी दिशा सदैव अभिकेंद्रीय बल की दिशा के विपरीत होती है।
- कपड़ा सुखाने की मशीन तथा दूध से मक्खन निकालने की मशीन इसी सिद्धांत पर कार्य करती हैं।
- वृत्तीय गति में कार्य करने वाले अभिकेंद्रीय बल की प्रतिक्रिया भी उत्पन्न होती है।
- उदाहरणस्वरूप ‘मौत के कुएँ’ में कुएँ की दीवार मोटर-साइकिल पर केन्द्र की ओर क्रिया बल लगाती है जबकि मोटर-साइकिल दीवार पर बाहर की दिशा में प्रतिक्रिया बल लगाती है।
- कई बार इस बाहरी दिशा में लगने वाले प्रतिक्रिया बल को गलती से अपकेन्द्रीय बल समझ लिया जाता है, जबकि यह धारणा सही नहीं है।
➤ बल-आघूर्ण : —
- किसी पिण्ड को किसी अक्ष के चारों ओर घुमाने की बल की प्रवृत्ति को बल-आघूर्ण (Moment of Force) कहा जाता है।
- किसी अक्ष के सापेक्ष किसी बल का बल-आघूर्ण, उस बल के परिमाण तथा अक्ष से बल की क्रिया रेखा की लंबवत दूरी के गुणनफल के बराबर होता है।
: — बल-आघूर्ण (T) = बल × आघूर्ण भुजा
- यह एक सदिश राशि है।
- इसका मात्रक न्यूटन-मीटर (N-m) होता है।
➤ सरल मशीन : —
- सरल मशीनें मुख्यतः बल-आघूर्ण के सिद्धांत पर कार्य करती हैं।
- यह ऐसी युक्तियाँ होती हैं जिनकी सहायता से सुविधाजनक स्थान पर बल लगाकर किसी अन्य स्थान पर रखे गए भार को उठाया जाता है।
- उत्तोलक, घिरनी, आनत तल तथा स्क्रू जैक इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
➤ उत्तोलक: —
- उत्तोलक (Lever) एक सीधी अथवा टेढ़ी मजबूत छड़ होती है जो किसी निश्चित बिन्दु के चारों ओर स्वतंत्र रूप से घूम सकती है।
❖ किसी भी उत्तोलक में तीन मुख्य बिन्दु होते हैं—
- आलंब (Fulcrum): — वह निश्चित बिन्दु जिसके चारों ओर उत्तोलक स्वतंत्र रूप से घूमता है, आलंब कहलाता है।
- आयास (Effort): — उत्तोलक को संचालित करने के लिए लगाया जाने वाला बल, आयास कहलाता है।
- भार (Load): — उत्तोलक की सहायता से उठाया जाने वाला बोझ अथवा हटाई जाने वाली रुकावट को भार कहा जाता है।
➤ उत्तोलक के प्रकार: — उत्तोलक मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं—
(1) प्रथम श्रेणी का उत्तोलक: —
- इस प्रकार के उत्तोलक में आलंब (F), आयास (E) तथा भार (W) के बीच स्थित होता है।
- इस वर्ग में यांत्रिक लाभ का मान 1 से अधिक, 1 के बराबर अथवा 1 से कम भी हो सकता है।
इसके उदाहरण हैं— कैंची, पिलाश, सँडासी, कील उखाड़ने की मशीन, शीश झूला, साइकिल का ब्रेक तथा हैंड पम्प।
(2) द्वितीय श्रेणी का उत्तोलक: —
- इस वर्ग के उत्तोलकों में आलंब (F) तथा आयास (E) के बीच भार (W) स्थित रहता है।
- इस प्रकार के उत्तोलकों का यांत्रिक लाभ सदैव 1 से अधिक होता है।
इसके उदाहरण हैं— सरीता, नींबू निचोड़ने की मशीन तथा एक पहिये की कूड़ा ढोने वाली गाड़ी।
(3) तृतीय श्रेणी का उत्तोलक
- इस वर्ग में आलंब (F) तथा भार (W) के मध्य आयास (E) स्थित रहता है।
- इस प्रकार के उत्तोलकों का यांत्रिक लाभ सदैव 1 से कम होता है।
इसके उदाहरण हैं— चिमटा तथा मनुष्य का हाथ।
➤ गुरुत्व केन्द्र: —
- किसी वस्तु का वह बिन्दु जहाँ उसका सम्पूर्ण भार प्रभावी माना जाता है, उस वस्तु का गुरुत्व केन्द्र (Centre of Gravity) कहलाता है।
- वस्तु का भार सदैव गुरुत्व केन्द्र से ठीक नीचे की दिशा में कार्य करता है।
- यदि गुरुत्व केन्द्र पर वस्तु के भार के बराबर ऊपर की ओर बल लगाया जाए, तो वस्तु को संतुलित रखा जा सकता है।
➤ संतुलन के प्रकार: — संतुलन मुख्यतः तीन प्रकार का होता है—
- स्थायी संतुलन: — यदि किसी वस्तु को उसकी संतुलन स्थिति से थोड़ा हटाकर छोड़ दिया जाए और वह पुनः अपनी प्रारम्भिक स्थिति में लौट आए, तो इस प्रकार का संतुलन स्थायी संतुलन (Stable Equilibrium) कहलाता है।
- अस्थायी संतुलन: — यदि किसी वस्तु को उसकी संतुलन अवस्था से थोड़ा विस्थापित करने के बाद छोड़ने पर वह पुनः अपनी पुरानी स्थिति में वापस न लौटे, तो उसे अस्थायी संतुलन (Unstable Equilibrium) कहा जाता है।
- उदासीन संतुलन: — यदि किसी वस्तु को उसकी संतुलन अवस्था से थोड़ा हटाने पर उसका गुरुत्व केन्द्र (G) उसी ऊँचाई पर बना रहे तथा छोड़ देने पर वस्तु नई स्थिति में ही संतुलित हो जाए, तो इसे उदासीन संतुलन (Neutral Equilibrium) कहा जाता है।
➤ स्थायी संतुलन की शर्तें
- किसी वस्तु के स्थायी संतुलन के लिए निम्न दो शर्तों का पूरा होना आवश्यक है—
- वस्तु का गुरुत्व केन्द्र अधिक से अधिक नीचे स्थित होना चाहिए।
- गुरुत्व केन्द्र से गुजरने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा वस्तु के आधार क्षेत्र के भीतर से गुजरनी चाहिए।
❖ कार्य, ऊर्जा एवं शक्ति
➤ कार्य (Work)
- लगाए गए बल तथा बल की दिशा में वस्तु के हुए विस्थापन के गुणनफल को कार्य कहते हैं।
- कार्य एक अदिश राशि है।
- कार्य का S.I. मात्रक जूल (J) होता है।
कार्य का सूत्र — W = F × S
- यदि बल (F) तथा विस्थापन (S) के मध्य θ कोण हो, तो कार्य का सूत्र होगा — W = F × S × cos θ
➤ ऊर्जा (Energy)
- किसी वस्तु की कार्य करने की क्षमता को उसकी ऊर्जा कहा जाता है।
- ऊर्जा एक अदिश राशि है।
- ऊर्जा का S.I. मात्रक जूल (J) होता है।
- कार्य के कारण प्राप्त ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा कहते हैं।
यांत्रिक ऊर्जा मुख्यतः दो प्रकार की होती है —
- गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy)
- स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy)
❖ गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy)
- किसी वस्तु में उसकी गति के कारण उत्पन्न कार्य करने की क्षमता को गतिज ऊर्जा कहते हैं।
- यदि किसी वस्तु का द्रव्यमान m तथा वेग v हो, तो उसकी गतिज ऊर्जा होगी — KE = 1/2 mv²
❖ स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy)
- किसी वस्तु में उसकी स्थिति अथवा विशेष अवस्था के कारण उत्पन्न कार्य करने की क्षमता को स्थितिज ऊर्जा कहा जाता है।
उदाहरण —
- बाँध बनाकर संग्रहित जल की ऊर्जा।
- घड़ी की चाभी में संचित ऊर्जा।
- तनी हुई स्प्रिंग या कमानी में संचित ऊर्जा।
- गुरुत्व बल के विरुद्ध संचित स्थितिज ऊर्जा का सूत्र — PE = mgh
- जहाँ — m = द्रव्यमान, g = गुरुत्वजनित त्वरण, h = ऊँचाई
➤ ऊर्जा संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Energy)
- ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है।
- ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है।
- जब किसी रूप में ऊर्जा समाप्त होती है, तो उतनी ही मात्रा में ऊर्जा किसी अन्य रूप में प्राप्त हो जाती है।
- इसलिए ब्रह्माण्ड में कुल ऊर्जा का परिमाण सदैव स्थिर बना रहता है।
- यही सिद्धान्त ऊर्जा संरक्षण का नियम कहलाता है।
❖ ऊर्जा रूपान्तरित करने वाले कुछ उपकरण
| उपकरण | ऊर्जा का रूपान्तरण |
|---|---|
| डायनेमो | यांत्रिक ऊर्जा → विद्युत् ऊर्जा |
| मोमबत्ती | रासायनिक ऊर्जा → प्रकाश एवं ऊष्मा ऊर्जा |
| माइक्रोफोन | ध्वनि ऊर्जा → विद्युत् ऊर्जा |
| लाऊडस्पीकर | विद्युत् ऊर्जा → ध्वनि ऊर्जा |
| सोलर सेल | सौर ऊर्जा → विद्युत् ऊर्जा |
| ट्यूब लाइट | विद्युत् ऊर्जा → प्रकाश ऊर्जा |
| विद्युत् मोटर | विद्युत् ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जा |
| विद्युत् बल्ब | विद्युत् ऊर्जा → प्रकाश एवं ऊष्मा ऊर्जा |
| विद्युत् सेल | रासायनिक ऊर्जा → विद्युत् ऊर्जा |
| सितार | यांत्रिक ऊर्जा → ध्वनि ऊर्जा |
➤ संवेग एवं गतिज ऊर्जा में सम्बन्ध
KE = P² / 2m
- जहाँ — P = mv
- यहाँ P वस्तु का संवेग है।
- यदि किसी वस्तु का संवेग दुगुना कर दिया जाए, तो उसकी गतिज ऊर्जा चार गुनी हो जाती है।
❖ शक्ति (Power)
- कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं।
- यदि कोई कर्ता W कार्य को t समय में पूरा करता है, तो उसकी शक्ति होगी — P = W / t
- शक्ति का S.I. मात्रक वाट (W) है।
- इस इकाई का नाम वैज्ञानिक जेम्स वाट के सम्मान में रखा गया है।
P = W / t = J / s = W = 10⁷ अर्ग/सेकण्ड
1 kW = 1000 W
1 MW = 10⁶ W
- अश्व शक्ति (H.P.) शक्ति की एक अन्य इकाई है।
- अश्व शक्ति की इकाई जेम्स वाट द्वारा दी गई थी।
1 H.P. = 746 W
1 H.P. = 550 ft-lbs
1 H.P. = 746 × 10⁷ अर्ग/सेकण्ड
1 kW = 1000 / 746 = 1.34 H.P.
❖ वाट-सेकण्ड (Ws)
1 Ws = 1 W × 1 सेकण्ड = 1 J
1 Wh = 3600 J
1 kWh = 1000 Wh = 3.6 × 10⁶ J
- W, kW, MW तथा H.P. शक्ति के मात्रक हैं।
- Ws, Wh तथा kWh कार्य अथवा ऊर्जा के मात्रक हैं।
❖ गुरुत्वाकर्षण
➤ न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम (Newton’s Law of Gravitation)
- किसी भी दो पिण्डों के मध्य कार्य करने वाला आकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
- यदि दो पिण्डों के द्रव्यमान m1 तथा m2 हों और उनके बीच की दूरी R हो, तो उनके मध्य लगने वाला आकर्षण बल होगा — F = Gm1m2 / R²
- यहाँ G एक नियतांक है, जिसे सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहा जाता है।
इसका मान होता है — G = 6.67 × 10^-11 Nm²/kg²
➤ गुरुत्व (Gravity)
- न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम के अनुसार प्रत्येक दो पिण्डों के मध्य आकर्षण बल कार्य करता है।
- यदि इन दोनों पिण्डों में से एक पृथ्वी हो, तो इस आकर्षण बल को गुरुत्व कहा जाता है।
- अर्थात् पृथ्वी जिस बल द्वारा किसी वस्तु को अपने केन्द्र की ओर आकर्षित करती है, उसे गुरुत्व बल कहते हैं।
- इस बल के कारण उत्पन्न त्वरण को गुरुत्वजनित त्वरण कहते हैं।
- इसे g से प्रदर्शित किया जाता है।
इसका मान होता है — g = 9.8 m/s²
- g का मान वस्तु के द्रव्यमान, आकार अथवा रूप पर निर्भर नहीं करता है।
➤ g के मान में परिवर्तन
- पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर g का मान घटता है।
- पृथ्वी की सतह के नीचे जाने पर भी g का मान घटता है।
- पृथ्वी के ध्रुवों (Poles) पर g का मान अधिकतम होता है।
- पृथ्वी की विषुवत रेखा (Equator) पर g का मान न्यूनतम होता है।
- पृथ्वी की घूर्णन गति बढ़ने पर g का मान कम हो जाता है।
- पृथ्वी की घूर्णन गति घटने पर g का मान बढ़ जाता है।
- यदि पृथ्वी अपनी वर्तमान कोणीय चाल से 17 गुना अधिक गति से घूमने लगे, तो भूमध्य रेखा पर स्थित वस्तुओं का भार शून्य हो जाएगा।
- ऐसी अवस्था को भारहीनता की स्थिति कहा जाता है।
- इस स्थिति में ध्रुवों पर g के मान में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
- उस समय पृथ्वी पर दिन की अवधि 24 घंटे के स्थान पर लगभग 1.4 घंटे (84 मिनट) रह जाएगी।
- यदि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमना बंद कर दे, तो ध्रुवों को छोड़कर अन्य सभी स्थानों पर g का मान बढ़ जाएगा।
➤ लिफ्ट में पिण्ड का भार (Weight of a Body in Lift)
- जब लिफ्ट ऊपर की ओर त्वरित गति करती है, तो लिफ्ट में स्थित पिण्ड का भार बढ़ा हुआ प्रतीत होता है।
- जब लिफ्ट नीचे की ओर त्वरित गति करती है, तो पिण्ड का भार कम प्रतीत होता है।
- यदि लिफ्ट ऊपर या नीचे समान वेग से चल रही हो, तो पिण्ड के भार में कोई परिवर्तन अनुभव नहीं होता।
- यदि नीचे उतरते समय लिफ्ट की डोरी टूट जाए, तो लिफ्ट तथा उसमें रखा पिण्ड दोनों मुक्त रूप से गिरते हैं।
- ऐसी स्थिति में पिण्ड का भार शून्य हो जाता है।
- यही स्थिति भारहीनता (Weightlessness) कहलाती है।
- यदि नीचे उतरती हुई लिफ्ट का त्वरण गुरुत्वजनित त्वरण g से अधिक हो जाए, तो पिण्ड फर्श से उठकर लिफ्ट की छत से टकरा सकता है।
➤ ग्रहों की गति से सम्बन्धित केप्लर के नियम
- प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार (Elliptical) कक्षा में परिक्रमा करता है।
- सूर्य इस दीर्घवृत्ताकार कक्षा के एक फोकस बिन्दु पर स्थित रहता है।
- प्रत्येक ग्रह का क्षेत्रीय वेग (Areal Velocity) नियत रहता है।
- इसी कारण जब ग्रह सूर्य के निकट होता है, तो उसका वेग बढ़ जाता है।
- जब ग्रह सूर्य से दूर होता है, तो उसका वेग कम हो जाता है।
- ग्रह सूर्य का एक चक्कर जितने समय में पूरा करता है, उसे उसका परिक्रमण काल (T) कहते हैं।
- ग्रह के परिक्रमण काल का वर्ग उसकी सूर्य से औसत दूरी के घन के अनुक्रमानुपाती होता है।
T² ∝ r³
- अतः जो ग्रह सूर्य से अधिक दूरी पर स्थित होते हैं, उनका परिक्रमण काल भी अधिक होता है।
उदाहरण —
- सूर्य के सबसे निकट स्थित ग्रह बुध का परिक्रमण काल लगभग 88 दिन है।
- सूर्य से दूर स्थित ग्रह वरुण (Neptune) का परिक्रमण काल लगभग 165 वर्ष है।
- अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (I.A.U.) ने यम (Pluto) को ग्रहों की श्रेणी से बाहर कर दिया है।
- इसलिए वर्तमान में सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह वरुण (Neptune) है।
➤ उपग्रह (Satellite)
- किसी ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करने वाले पिण्ड को उस ग्रह का उपग्रह कहते हैं।
उदाहरण — चन्द्रमा, पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है।
➤ उपग्रह की कक्षीय चाल (Orbital Speed of Satellite)
- उपग्रह की कक्षीय चाल उसकी पृथ्वी की सतह से ऊँचाई पर निर्भर करती है।
- उपग्रह जितनी अधिक ऊँचाई पर होगा, उसकी कक्षीय चाल उतनी ही कम होगी।
- कक्षीय चाल उपग्रह के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करती है।
- समान त्रिज्या वाली कक्षाओं में घूमने वाले अलग-अलग द्रव्यमान के उपग्रहों की चाल समान होती है।
- पृथ्वी के अत्यन्त निकट परिक्रमा करने वाले उपग्रह की कक्षीय चाल लगभग — 8 km/s
➤ उपग्रह का परिक्रमण काल (Period of Revolution of Satellite)
- उपग्रह अपनी कक्षा में पृथ्वी का एक चक्कर जितने समय में पूरा करता है, उसे उसका परिक्रमण काल कहते हैं।
- परिक्रमण काल का सूत्र — परिक्रमण काल = कक्षा की परिधि / कक्षीय चाल
- परिक्रमण काल भी केवल उपग्रह की ऊँचाई पर निर्भर करता है।
- उपग्रह जितनी अधिक ऊँचाई पर होगा, उसका परिक्रमण काल उतना ही अधिक होगा।
- परिक्रमण काल उपग्रह के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।
- पृथ्वी के अत्यन्त निकट स्थित उपग्रह का परिक्रमण काल लगभग — 1 घंटा 24 मिनट
➤ भू-स्थायी उपग्रह (Geo-Stationary Satellite)
- वह उपग्रह जो पृथ्वी के लम्बवत तल में पश्चिम से पूर्व दिशा में पृथ्वी की परिक्रमा करता है तथा जिसका परिक्रमण काल पृथ्वी के घूर्णन काल के बराबर होता है, भू-स्थायी उपग्रह कहलाता है।
- इसका परिक्रमण काल लगभग 24 घंटे होता है।
- यह पृथ्वी की सतह से लगभग 36,000 किमी की ऊँचाई पर स्थित रहता है।
- भू-तुल्यकालिक कक्षा (Geosynchronous Orbit) में संचार उपग्रह स्थापित करने की संभावना सर्वप्रथम आर्थर सी. क्लार्क ने व्यक्त की थी।
❖ पलायन वेग (Escape Velocity)
- वह न्यूनतम वेग जिससे किसी वस्तु को पृथ्वी की सतह से ऊपर फेंकने पर वह पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र से बाहर निकल जाए और पुनः वापस न लौटे, पलायन वेग कहलाता है।
- पृथ्वी के लिए पलायन वेग का मान — 11.2 km/s
- यदि किसी वस्तु को पृथ्वी की सतह से 11.2 km/s या उससे अधिक वेग से किसी भी दिशा में फेंका जाए, तो वह पुनः पृथ्वी पर वापस नहीं आएगी।
उपग्रह का कक्षीय वेग —
v0 = √gRe
पृथ्वी से पलायन वेग —
ve = √2gRe
अतः — ve = √2 v0
अर्थात् पलायन वेग, कक्षीय वेग का √2 गुना होता है। यदि किसी उपग्रह की कक्षीय चाल को √2 गुना (लगभग 41%) बढ़ा दिया जाए, तो वह अपनी कक्षा को छोड़कर पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र से बाहर निकल जाएगा।
❖ दाब (Pressure)
- किसी सतह के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को दाब कहते हैं।
- दाब का सूत्र — p = F / A
जहाँ — p = दाब, F = पृष्ठ के लम्बवत् लगाया गया बल, A = पृष्ठ का क्षेत्रफल
- दाब एक अदिश राशि है।
- दाब का S.I. मात्रक N/m^2 होता है।
- N/m^2 को पास्कल (Pa) भी कहते हैं।
➤ वायुमण्डलीय दाब (Atmospheric Pressure)
- सामान्यतः वायुमण्डलीय दाब वह दाब है, जो समुद्र तल पर 0°C तापमान तथा 45° अक्षांश पर 76 सेमी लम्बे पारे के स्तम्भ द्वारा लगाया जाता है।
- यह दाब 1 वर्ग सेमी अनुप्रस्थ काट वाले 76 सेमी लम्बे पारे के स्तम्भ के भार के बराबर होता है।
- वायुमण्डलीय दाब का एक मात्रक बार (bar) है।
1 bar = 10^5 N/m^2
सामान्य वायुमण्डलीय दाब का मान —
- Atmospheric Pressure = 10⁵ N/m² = 1 bar
- पृथ्वी की सतह से ऊँचाई बढ़ने पर वायुमण्डलीय दाब घटता जाता है।
- इसी कारण पर्वतीय क्षेत्रों में भोजन पकाने में कठिनाई होती है।
- इसी कारण वायुयान में यात्रा करते समय फाउंटेन पेन से स्याही रिसने लगती है।
- वायुमण्डलीय दाब को मापने के लिए बैरोमीटर का प्रयोग किया जाता है।
- बैरोमीटर की सहायता से मौसम का पूर्वानुमान भी लगाया जाता है।
- यदि बैरोमीटर का पाठ्यांक अचानक नीचे गिर जाए, तो आँधी आने की संभावना होती है।
- यदि बैरोमीटर का पाठ्यांक धीरे-धीरे नीचे गिरे, तो वर्षा होने की संभावना होती है।
- यदि बैरोमीटर का पाठ्यांक धीरे-धीरे ऊपर बढ़े, तो मौसम साफ रहने की संभावना होती है।
➤ द्रव में दाब (Pressure in Liquid)
- द्रव के अणुओं द्वारा पात्र की दीवारों अथवा तल पर प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगाए गए बल को द्रव का दाब कहते हैं।
- द्रव के भीतर किसी बिन्दु पर दाब उस बिन्दु की गहराई, द्रव के घनत्व तथा गुरुत्वीय त्वरण के गुणनफल के बराबर होता है।
- द्रव दाब का सूत्र — p = h × d × g
जहाँ — h = द्रव की सतह से गहराई, d = द्रव का घनत्व, g = गुरुत्वजनित त्वरण
द्रवों में दाब के नियम
- स्थिर द्रव के एक ही क्षैतिज तल में स्थित सभी बिन्दुओं पर दाब समान होता है।
- स्थिर द्रव के भीतर किसी बिन्दु पर दाब सभी दिशाओं में समान होता है।
- द्रव के भीतर किसी बिन्दु पर दाब उसकी गहराई के अनुक्रमानुपाती होता है।
- द्रव का घनत्व जितना अधिक होगा, दाब भी उतना ही अधिक होगा।
द्रव-दाब सम्बन्धी पास्कल का नियम
- यदि गुरुत्वीय प्रभाव को नगण्य माना जाए, तो संतुलन की अवस्था में द्रव के प्रत्येक बिन्दु पर दाब समान होता है।
- किसी बन्द पात्र में स्थित द्रव के किसी भाग पर लगाया गया बल द्रव द्वारा सभी दिशाओं में समान रूप से संचारित कर दिया जाता है।
- पास्कल के नियम पर आधारित प्रमुख यंत्र —
- हाइड्रोलिक लिफ्ट
- हाइड्रोलिक प्रेस
- हाइड्रोलिक ब्रेक
- द्रव का दाब पात्र के आकार अथवा आकृति पर निर्भर नहीं करता है।
➤ गलनांक तथा क्वथनांक पर दाब का प्रभाव
गलनांक पर प्रभाव
- जिन पदार्थों का आयतन गर्म करने पर बढ़ता है, उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर बढ़ जाता है।
उदाहरण — मोम, घी
- जिन पदार्थों का आयतन गर्म करने पर घटता है, उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर कम हो जाता है।
उदाहरण — बर्फ
❖ क्वथनांक पर प्रभाव
- सभी द्रवों का क्वथनांक दाब बढ़ने पर बढ़ जाता है।
❖ प्लवन
उत्प्लावक बल (Buoyant Force)
- द्रव द्वारा किसी वस्तु पर ऊपर की दिशा में लगाया गया बल उत्प्लावक बल कहलाता है।
- यह बल वस्तु द्वारा विस्थापित द्रव के गुरुत्व केन्द्र पर कार्य करता है।
- इस बिन्दु को उत्प्लावन केन्द्र (Centre of Buoyancy) कहते हैं।
- उत्प्लावक बल का अध्ययन सर्वप्रथम आर्किमीडीज ने किया था।
- उत्प्लावक बल द्रव में डूबे पिण्ड के आयतन तथा द्रव के घनत्व पर निर्भर करता है।
- जब पिण्ड पूर्ण रूप से द्रव में डूब जाता है, तब उत्प्लावक बल का मान अधिकतम होता है।
- उत्प्लावक बल वस्तु की प्रकृति तथा उसके भार पर निर्भर नहीं करता है।
आर्किमीडीज का सिद्धान्त
- जब कोई वस्तु किसी द्रव में पूर्ण या आंशिक रूप से डुबोई जाती है, तो उसके भार में कमी का अनुभव होता है।
- भार में यह आभासी कमी वस्तु द्वारा विस्थापित द्रव के भार के बराबर होती है।
➤ प्लवन का नियम
- संतुलन अवस्था में तैरती हुई वस्तु अपने भार के बराबर द्रव विस्थापित करती है।
- वस्तु का गुरुत्व केन्द्र तथा विस्थापित द्रव का गुरुत्व केन्द्र एक ही ऊर्ध्वाधर रेखा में होना चाहिए।
घनत्व (Density) का सूत्र — Density = Mass / Volume
अर्थात् — d = m / V
- घनत्व का S.I. मात्रक — kg/m³
आपेक्षिक घनत्व (Relative Density)
- आपेक्षिक घनत्व का सूत्र — Relative Density = वस्तु का घनत्व / 4°C पर जल का घनत्व
- आपेक्षिक घनत्व एक अनुपात है।
- इसलिए इसका कोई मात्रक नहीं होता।
- आपेक्षिक घनत्व मापने के लिए हाइड्रोमीटर का उपयोग किया जाता है।
- समुद्री जल का घनत्व सामान्य जल से अधिक होता है।
- इसी कारण समुद्री जल में तैरना अपेक्षाकृत आसान होता है।
- समुद्र के जल में तैरती हुई बर्फ का लगभग 1/10 भाग जल के ऊपर रहता है।
- यदि किसी पात्र में पानी पर बर्फ तैर रही हो, तो बर्फ के पूर्णतः पिघल जाने पर भी पानी का स्तर नहीं बढ़ता।
- दूध की शुद्धता की जाँच दुग्धमापी (Lactometer) से की जाती है।
मित केन्द्र (Meta Centre)
- तैरती हुई वस्तु द्वारा विस्थापित द्रव के गुरुत्व केन्द्र को उत्प्लावन केन्द्र कहते हैं।
- उत्प्लावन केन्द्र से जाने वाली ऊर्ध्व रेखा तथा वस्तु के गुरुत्व केन्द्र से जाने वाली प्रारम्भिक ऊर्ध्व रेखा जिस बिन्दु पर एक-दूसरे को काटती हैं, उसे मित केन्द्र कहते हैं।
तैरने वाली वस्तु के स्थायी संतुलन की शर्तें
- मित केन्द्र, गुरुत्व केन्द्र के ऊपर स्थित होना चाहिए।
- वस्तु का गुरुत्व केन्द्र तथा उत्प्लावन केन्द्र एक ही ऊर्ध्वाधर रेखा में स्थित होने चाहिए।
