❖ राजस्थान के पुरातात्विक साक्ष्य ❖
प्रमुख शिलालेख
❖ बड़ली का शिलालेख (443 ई. पूर्व) – भिनाय (अजमेर)
- राजस्थान का सबसे प्राचीन ज्ञात अभिलेख बड़ली के निकट स्थित भिलोत माता मंदिर से प्राप्त हुआ है।
- यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण किया गया है।
❖ घोसुण्डी शिलालेख (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व) – घोसुण्डी गाँव (चित्तौड़गढ़)
- यह शिलालेख घोसुण्डी गाँव से प्राप्त हुआ है।
- राजस्थान में भागवत/वैष्णव सम्प्रदाय से संबंधित यह सबसे प्राचीन उपलब्ध अभिलेख माना जाता है।
- इसकी भाषा संस्कृत तथा लिपि ब्राह्मी है।
- इसमें वासुदेव के पूजा-गृह के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी के निर्माण तथा गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न कराने का उल्लेख मिलता है।
❖ बड़वा यूप अभिलेख (238 ई.) – बड़वा गाँव (कोटा)
- यहाँ से तीन यूप अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
- इन अभिलेखों में मौखरी वंश के शासकों का विवरण मिलता है।
- मौखरी महासेनापति बल के तीन पुत्रों द्वारा यज्ञ सम्पन्न कराने का उल्लेख भी किया गया है।
❖ बरनाला अभिलेख (278 ई.) – जयपुर
- इस अभिलेख में भगवान विष्णु की स्तुति एवं वैष्णव सम्प्रदाय का उल्लेख किया गया है।
❖ अपराजित का शिलालेख (661 ई.) – नागदा (उदयपुर)
- इसके रचयिता दामोदर हैं।
- इस शिलालेख से मेवाड़ के गुहिल शासक अपराजित के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
❖ मंडोर शिलालेख (685 ई.) – जोधपुर
- यह शिलालेख मंडोर के गुर्जर-प्रतिहार वंश का विवरण प्रस्तुत करता है।
नोट: 837 ई. में गुर्जर-प्रतिहार नरेश बाउक द्वारा मंडोर का एक अन्य शिलालेख भी उत्कीर्ण कराया गया था।
- दस्तूर कौमवार (32 खण्ड), जयपुर राज्य के अभिलेखों का एक महत्वपूर्ण संकलन है, जिससे जयपुर रियासत के इतिहास एवं प्रशासन की जानकारी प्राप्त होती है।
❖ मानमोरी अभिलेख (713 ई.)
- इस अभिलेख से चित्तौड़ की प्राचीन स्थिति तथा मोरी वंश (विशेष रूप से चित्रांगद मौर्य) के संबंध में जानकारी मिलती है।
- इसे चित्तौड़ के निकट मानसरोवर झील के तट से कर्नल जेम्स टॉड ने प्राप्त किया था।
- कर्नल जेम्स टॉड जब इंग्लैण्ड जा रहे थे, तब अधिक भार होने के कारण उन्होंने इसे समुद्र में फेंक दिया।
❖ बचुकला अभिलेख (815 ई.)
- यह अभिलेख बिलाड़ा के निकट स्थित बचुकला गाँव (जोधपुर) से प्राप्त हुआ है।
- इसका संबंध प्रतिहार शासक वत्सराज के पुत्र नागभट्ट के शासनकाल से है।
❖ घटियाला शिलालेख (861 ई.) – घटियाला (फलौदी)
- इसमें मंडोर के प्रतिहार वंश की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है।
- प्रतिहार वंश के राजा हरिश्चन्द्र तथा उनके उत्तराधिकारियों का वर्णन किया गया है।
- यह शिलालेख कुक्कुक के समय संस्कृत एवं प्राकृत दोनों भाषाओं में लिखा गया था।
- इसमें मग जाति के ब्राह्मणों तथा जैन मंदिर के निर्माण का भी उल्लेख मिलता है।
❖ नाथ प्रशस्ति
- इसके रचयिता वेदांग मुनि के शिष्य आम्र कवि हैं।
- उदयपुर स्थित लकुलिश मंदिर में स्थापित शिलालेख को नाथ प्रशस्ति कहा जाता है।
- यह संस्कृत भाषा में लिखी गई मेवाड़ के इतिहास से संबंधित प्रशस्ति है।
❖ हर्षनाथ की प्रशस्ति (973 ई.) – हर्षनाथ (सीकर)
- यह प्रशस्ति चौहान शासक विग्रहराज द्वितीय के समय की है।
- इसमें हर्षनाथ मंदिर का निर्माण अल्लट द्वारा कराए जाने का उल्लेख मिलता है।
- साथ ही चौहान शासकों का विवरण तथा पाशुपत सम्प्रदाय के गुरु विश्वरूप का उल्लेख भी किया गया है।
❖ बिजौलिया अभिलेख (1170 ई.)
- जैन श्रावक लोलाक ने इस अभिलेख को बिजौलिया (भीलवाड़ा) स्थित पार्श्वनाथ मंदिर की एक चट्टान पर उत्कीर्ण कराया था।
- इसके रचयिता गुणभद्र तथा उत्कीर्णक गोविन्द थे।
- यह अभिलेख संस्कृत भाषा में लिखा गया है।
- इसमें चौहानों को वत्सगोत्र का ब्राह्मण बताया गया है।
इस अभिलेख से प्राचीन स्थान जाबालिपुर (जालौर), शाकम्भरी (सांभर) तथा श्रीमाल (भीनमाल) की जानकारी प्राप्त होती है। - यह अभिलेख पृथ्वीराज चौहान तृतीय के पिता सोमेश्वर के शासनकाल का है।
- इससे यह भी ज्ञात होता है कि विग्रहराज चतुर्थ ने दिल्लिका (दिल्ली) को अपने अधिकार में कर लिया था।
❖ नेमिनाथ (आबू) मंदिर प्रशस्ति (1230 ई.)
- इसकी रचना सोमेश्वर देव तथा शुभचन्द्र से संबंधित मानी जाती है।
- शुभचन्द्र को सुरथोत्सव काव्य का लेखक माना जाता है।
❖ चीरवे का शिलालेख (1273 ई.) – चीरवा (उदयपुर)
- यह शिलालेख संस्कृत भाषा में लिखा गया है।
- इसमें मेवाड़ के प्रारम्भिक गुहिलवंशीय शासकों, चीरवा गाँव की स्थिति तथा विष्णु मंदिर की स्थापना का उल्लेख मिलता है।
- इसके प्रशस्तिकार रत्नप्रभसूरी, लेखक पार्श्वचन्द्र तथा शिल्पी देलहण थे।
❖ रसिया की छत्री अभिलेख (1274 ई.)
- यह अभिलेख चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित रसिया की छत्री में स्थापित है।
- इससे मेवाड़ के गुहिल वंश के शासकों की जानकारी बाप्पा से नरवर्मा तक प्राप्त होती है।
❖ अचलेश्वर शिलालेख (1285 ई.)
- इसके रचयिता वेदशर्मा हैं।
- इस अभिलेख के लेखक शुभचन्द्र थे।
❖ रणकपुर प्रशस्ति (1439 ई.)
- यह प्रशस्ति रणकपुर जैन मंदिर में स्थापित है।
- इसमें बाप्पा रावल से राणा कुम्भा तक के शासकों का वर्णन किया गया है।
- इस प्रशस्ति में बाप्पा और कालभोज को दो अलग-अलग व्यक्तियों के रूप में दर्शाया गया है।
❖ कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति (1460 ई.)
- इसके रचयिता अत्रि तथा महेश भट्ट हैं।
- इस प्रशस्ति से राणा कुम्भा द्वारा रचित ग्रन्थों पर महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
महाराणा कुम्भा के शासनकाल का सबसे प्राचीन ज्ञात अभिलेख परदड़ा गाँव से 1433 ई. का प्राप्त हुआ है।
❖ कुम्भलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.)
- इसके रचयिता महेश हैं।
- इसकी लिपि देवनागरी तथा भाषा संस्कृत है।
- इस प्रशस्ति से मेवाड़ की भौगोलिक एवं सामाजिक स्थिति की जानकारी प्राप्त होती है।
- इसमें मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली का वर्णन किया गया है तथा बाप्पा रावल को विप्रवंशीय (ब्राह्मण) बताया गया है।
❖ एकलिंगजी मंदिर प्रशस्ति (1488 ई.)
- इसके लेखक महेश भट्ट हैं।
- महाराणा रायमल ने एकलिंगजी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाकर इस प्रशस्ति को सूत्रधार अर्जुन से उत्कीर्ण कराया।
- इसमें बाप्पा रावल के संन्यास ग्रहण करने का उल्लेख मिलता है।
❖ रायसिंह की प्रशस्ति (1594 ई.)
- यह प्रशस्ति बीकानेर दुर्ग के सूरजपोल द्वार पर स्थापित है।
- इसे बीकानेर के महाराजा रायसिंह ने लिखवाया था।
- इसके रचयिता जैन मुनि जैता हैं।
- यह संस्कृत भाषा में लिखी गई है।
- इसमें राव बीका से रायसिंह तक का इतिहास वर्णित है।
❖ जगन्नाथराय प्रशस्ति (1652 ई.)
- यह प्रशस्ति उदयपुर स्थित जगदीश मंदिर में उत्कीर्ण है।
- इससे मेवाड़ के शासकों के इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है।
- यह संस्कृत भाषा में अंकित है।
- इसके रचयिता कृष्ण भट्ट हैं।
❖ बेडवास गाँव की प्रशस्ति (1668 ई.)
- यह प्रशस्ति महाराणा राजसिंह के शासनकाल की है।
- इसकी भाषा मेवाड़ी तथा लिपि नागरी है।
❖ राजप्रशस्ति (1676 ई.)
- यह राजसमंद झील की नौ चौकी पाल पर स्थापित 25 काले पत्थरों की शिलाओं पर उत्कीर्ण राजप्रशस्ति महाकाव्य है।
- यह संस्कृत भाषा में 24 सर्गों तथा कुल 1106 श्लोकों में अंकित है।
- इसे रणछोड़ भट्ट तैलंग ने महाराणा राजसिंह के आदेश पर रचा।
- इसे विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति माना जाता है।
- इसमें मेवाड़ का विस्तृत इतिहास वर्णित है।
- साथ ही मुग़ल–मेवाड़ संधि का भी उल्लेख मिलता है।
❖ ताम्रपत्र
❖ आहड़ के ताम्रपत्र (1206 ई.)
- इन ताम्रपत्रों में गुजरात के मूलराज से भीमदेव द्वितीय तक सोलंकी राजाओं की वंशावली का उल्लेख मिलता है।
❖ खेरोदा के ताम्रपत्र (1437 ई.)
- इनसे महाराणा कुम्भा द्वारा दान में दिए गए खेतों, उनके आसपास से गुजरने वाले प्रमुख मार्गों तथा उस समय प्रचलित मुद्रा की जानकारी प्राप्त होती है।
❖ चीकली ताम्रपत्र (1483 ई.)
- इससे किसानों से वसूले जाने वाले लाग-बाग की जानकारी मिलती है।
❖ पुर (भीलवाड़ा) का ताम्रपत्र (1535 ई.)
- इसमें हाड़ी रानी कर्मावती द्वारा जौहर में प्रवेश करने के समय दिए गए भूमि अनुदान का उल्लेख मिलता है।
- यह चित्तौड़ पर बहादुरशाह के आक्रमण की जानकारी भी प्रदान करता है।
❖ राजस्थान के सिक्के
- राजस्थान में सबसे पहले आहत मुद्राएँ (पंचमार्क सिक्के) प्रचलन में थीं।
- पंचमार्क सिक्कों का उपयोग भारत में 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक होता रहा।
- 10वीं–11वीं शताब्दी के दौरान प्रचलित जिन सिक्कों पर गधे की आकृति अंकित होती थी, उन्हें गधिया सिक्के कहा जाता था। ऐसे सिक्के उदयपुर और सिरोही से प्राप्त हुए हैं।
- मुग़ल शासकों से मैत्रीपूर्ण संबंध होने के कारण जयपुर के कछवाह शासकों को अपने राज्य में सबसे पहले टकसाल स्थापित करने की अनुमति प्राप्त हुई।
❖ जयपुर रियासत के सिक्के
- झाड़शाही – इस सिक्के पर छह टहनियों वाले झाड़ का चिह्न अंकित होता था।
- माधोशाही – यह सिक्का माधोसिंह के शासनकाल में प्रचलित था।
- हाली सिक्का – माधोसिंह के समय प्रचलित रुपये को हाली सिक्का कहा जाता था।
- मुहम्मदशाही।
❖ मेवाड़ के सिक्के
- मेवाड़ में प्रचलित ताँबे के प्रमुख सिक्के थे— ढींगला, त्रिशूलिया, भिलाड़ी तथा भींडरिया।
- एलची सिक्का – चित्तौड़ विजय के बाद अकबर ने मेवाड़ में इसे जारी किया।
- स्वरूपशाही सिक्का – महाराणा स्वरूप सिंह ने इन सिक्कों के एक ओर चित्रकूट उदयपुर तथा दूसरी ओर दोस्ती लंदन अंकित कराया।
- अन्य प्रमुख सिक्के— उदयपुरी, चितौड़ी, चांदौड़ी, फतेहशाही, नाथद्वारिया तथा शाहअलमी।
➤ गंगाशाही सिक्के – बीकानेर
- इन सिक्कों के एक ओर महारानी विक्टोरिया का चित्र तथा उसके चारों ओर अंग्रेज़ी में “Victoria Empress” अंकित होता था, जबकि दूसरी ओर “महाराजा गंगासिंह बहादुर” लिखा होता था।
➤ इक्तीसंदा रुपया
- 1838 ई. में कुचामन के ठाकुर ने महाराजा मानसिंह की अनुमति प्राप्त कर कुचामनिया नामक चाँदी का सिक्का जारी कराया। इस पर शाहआलम द्वितीय के शासन के 31वें वर्ष का उल्लेख होने के कारण इसे इक्तीसंदा रुपया कहा गया।
➤ नोट: इंडो-सासैनिक सिक्के 5वीं सदी में राजस्थान में हूणों के आगमन का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
➤ नोट: जैसलमेर में प्रचलित ताँबे के सिक्के को डोलिया (डोडिया) कहा जाता था।
- ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के बाद कलदार रुपये का प्रचलन हुआ और धीरे-धीरे राजपूत रियासतों में स्थानीय रूप से ढाले जाने वाले सिक्कों का प्रचलन समाप्त हो गया।
❖ अन्य रियासतों के सिक्के
| रियासत | प्रमुख सिक्के |
|---|---|
| जैसलमेर | अखैशाही |
| जोधपुर | गजशाही, विजयशाही, डब्बूशाही |
| बीकानेर | आलमशाही, मुगलिया |
| सोजत (पाली) | लिल्लुलिया / लल्लूशाही |
| अलवर | रावशाही |
| भरतपुर | शाहअलमी |
| झालावाड़ | मदनशाही |
| धौलपुर | तमचाशाही |
| करौली | माणकशाही |
| प्रतापगढ़ | सालिमशाही |
| कोटा | गुमानशाही |
