राजस्थान की प्रमुख सभ्यताएँ

इस भाग में क्या पढ़ेंगे

❖ राजस्थान की प्रमुख सभ्यताएँ ❖


  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (मुख्यालय – नई दिल्ली) की स्थापना 1861 ई. में अलेक्जेंडर कनिंघम के नेतृत्व में की गई।
  • 1902 ई. में जान मार्शल ने इस विभाग का पुनर्गठन किया।
  • राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण का कार्य सबसे पहले 1871 ई. में ए.सी.एल. कार्लाइल द्वारा आरम्भ किया गया। इन्होंने दौसा क्षेत्र से पाषाण उपकरणों तथा मानव अस्थियों की जानकारी प्रस्तुत की।
  • राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना 1950 में जयपुर में की गई।

बागौर सभ्यता

  • भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के तट पर बागौर सभ्यता का विकास हुआ।
  • 1967 में वीरेन्द्रनाथ मिश्र तथा डॉ. एल.एस. लेशिन ने यहाँ उत्खनन कार्य कराया।
  • उत्खनन का प्रमुख स्थल महासतियों का टिल्ला कहलाता है।
  • भारत में कृषि एवं पशुपालन के सबसे प्राचीन साक्ष्य बागौर सभ्यता से प्राप्त हुए हैं।
  • बागौर को आदिम संस्कृति का संग्रहालय भी कहा जाता है।
  • यहाँ से लघु पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं।
  • यह एक मध्य पाषाणकालीन सभ्यता स्थल है।
  • उत्खनन में प्राप्त एक कंकाल के गले में पत्थर और हड्डियों से निर्मित हार मिला है।
  • यहाँ से ताँबे के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं, जिनमें छिद्रयुक्त सुई विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

कालीबंगा सभ्यता

  • कालीबंगा हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।
  • यह सभ्यता प्राचीन दृषद्वती नदी तथा सरस्वती नदी (वर्तमान घग्घर नदी) के क्षेत्र में विकसित हुई।
  • उत्खनन के दौरान प्राप्त काली चूड़ियों के कारण इस स्थान का नाम कालीबंगा पड़ा।
  • एल.पी. टैस्सीटोरी ने सबसे पहले इस स्थल की जानकारी दी।
  • 1952 में अमलानन्द घोष (तत्कालीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक) ने इसकी खोज की।
  • 1961 से 1969 के बीच बी.बी. लाल, बी.के. थापर, एम.डी. खरे, के.एम. श्रीवास्तव तथा एस.पी. जैन के निर्देशन में यहाँ व्यवस्थित उत्खनन किया गया।
  • स्वतंत्र भारत में खोजी गई यह पहली सभ्यता मानी जाती है।
  • इसे सिंधु सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता अथवा कांस्ययुगीन सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।
  • कालीबंगा सिंधु सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था।
  • इस सभ्यता का काल 2400–2250 ई.पूर्व माना जाता है।
  • उत्खनन कार्य पाँच स्तरों में किया गया, जिनमें प्रारम्भिक दो स्तर हड़प्पा सभ्यता से भी अधिक प्राचीन पाए गए।

➣ कालीबंगा सभ्यता को दो भागों में विभाजित किया गया है—

    1. प्राक् हड़प्पा सभ्यता
    2. हड़प्पा सभ्यता
  • पाकिस्तान के कोट दीजी स्थल से कालीबंगा की प्राक् हड़प्पा सभ्यता से मिलते-जुलते अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों के संरक्षण हेतु 1985–86 में कालीबंगा संग्रहालय की स्थापना की गई।

➣ उत्खनन से निम्नलिखित महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हुए—

    • खिलौना बैलगाड़ी
    • लकड़ी की नालियाँ
    • चबूतरे, जिन पर 7 अग्निकुण्ड (वेदिकाएँ) निर्मित थीं।
    • भूकंप के प्राचीनतम साक्ष्य।
    • मिट्टी की ईंटों से बने मकान।
    • समकोण पर एक-दूसरे को काटती सड़कें।
    • लकड़ी से निर्मित छतों के प्रमाण।
    • तंदूर के अवशेष।
    • घरों में बने अण्डाकार कुएँ
  • टीले पर प्राप्त दुर्ग की दोहरी रक्षा प्राचीर के अवशेषों के आधार पर डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता की तीसरी राजधानी कहा है।
  • यहाँ से प्राप्त मृदभाण्ड मुख्यतः लाल रंग के हैं, जिन पर काले तथा सफेद रंग की रेखाओं द्वारा अलंकरण किया गया है।
  • कालीबंगा की लिपि सिंधु लिपि के समान थी तथा इसे दाएँ से बाएँ लिखा जाता था।
  • दक्षिण-पूर्व दिशा में जुते हुए खेत के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
  • एक साथ दो फसलों (गेहूँ–जौ) की खेती के साक्ष्य मिले हैं।
  • चना, बाजरा तथा सरसों की खेती के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं।
  • कालीबंगा एक विकसित नगरीय सभ्यता थी।

➣ उत्खनन से प्राप्त अन्य प्रमुख अवशेष—

    • मिट्टी की बेलनाकार मोहरें, जो मेसोपोटामिया सभ्यता (ईरान) की मोहरों से मिलती-जुलती हैं।
    • मिट्टी की वृषभ आकृति (बैल)
    • हाथीदाँत का कंघा।
    • ऊँट की हड्डियों के अवशेष।
    • पत्थर से बने तोलने के बाट।
    • गाय के मुख वाले प्याले।
    • ताँबे के बैल।
    • काँस्य के दर्पण।
    • काँच की मणियाँ।

यहाँ से शल्य चिकित्सा के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं। उत्खनन में मिले एक बालक के कंकाल की खोपड़ी में 6 छिद्र पाए गए, जिन्हें प्राचीन शल्य चिकित्सा का महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है।

आहड़ सभ्यताआहड़ (उदयपुर)

  • बनास नदी के तट पर स्थित धूलकोट टीले के नीचे लगभग 4000 वर्ष पुराना आहड़ का प्राचीन नगर दबा हुआ है।

आहड़ सभ्यता के प्रमुख उपनाम—

    • आघाटपुर (प्राचीन नाम)
    • ताम्रवती नगरी
    • बनास संस्कृति
    • मृतकों का टीला
    • धूलकोट
  • 1953 में अक्षय कीर्ति व्यास ने इस सभ्यता की खोज एवं प्रारम्भिक उत्खनन किया।
  • इसके बाद 1956 में रतनचन्द्र अग्रवाल तथा 1961–62 में एच.डी. सांकलिया एवं वी.एन. मिश्र ने यहाँ विस्तृत उत्खनन कराया।
  • उत्खनन के दौरान बस्तियों के 8 स्तर प्राप्त हुए।
  • यहाँ से दो मुँह वाला चूल्हा मिला है, जो संयुक्त परिवार अथवा सामूहिक भोजन व्यवस्था का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है। साथ ही बलुए पत्थर के सिलबट्टे भी प्राप्त हुए हैं।
  • अनाज के भंडारण के लिए बड़े-बड़े पात्र मिले हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में गोरे एवं कोठे कहा जाता है।
  • उत्खनन में सबसे अधिक संख्या मृदभाण्डों की प्राप्त हुई है।
  • यहाँ से काले एवं लाल रंग के मृदभाण्ड मिले हैं, जिसके आधार पर इसे ब्लैक एंड रेड वेयर संस्कृति से संबंधित माना जाता है।
  • आहड़ सभ्यता से ताम्रयुगीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ ताँबा प्रमुख उद्योग था तथा ताँबे को गलाने का कार्य किया जाता था।

➣ उत्खनन से प्राप्त प्रमुख ताम्र सामग्री—

    • ताँबे का पात्र।
    • ताँबे एवं लोहे की कुल्हाड़ियाँ।
    • ताँबे का टुकड़ा।
    • ताँबे के चाकू एवं चादरें।
    • ताँबे की 6 यूनानी मुद्राएँ
  • यहाँ के निवासी मृतकों को गहनों एवं आभूषणों सहित दफनाते थे।
  • आवासीय भवन ईंटों से निर्मित होते थे तथा नालियों के निर्माण में पक्की ईंटों का उपयोग किया जाता था।
  • यहाँ से लौह धातु के भी प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, किन्तु ये चाँदी से परिचित नहीं थे।
  • उत्खनन में लेपिस लाजुली नामक नीले रंग का पत्थर मिला है, जो अफगानिस्तान में पाया जाता है।
  • आहड़ के निवासी गेहूँ, जौ, बाजरा, चावल तथा ज्वार की खेती करते थे।
  • यहाँ से राम सेकाम तथा स्फटिक नामक पत्थरों के टुकड़े भी प्राप्त हुए, जिनका उपयोग औजार एवं उपकरण बनाने में किया जाता था।

गणेश्वर सभ्यतानीम का थाना (सीकर)

  • गणेश्वर सभ्यता का विकास काँटली (कांतली) नदी के किनारे हुआ।

➣ इस सभ्यता के प्रमुख उपनाम—

    • ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी
    • ताम्रयुगीन सभ्यताओं में सबसे प्राचीन
    • पुरातत्व का पुष्कर
    • ताम्र संचयी संस्कृति
  • लगभग 2800 ईसा पूर्व की इस सभ्यता की खोज 1977 में रतनचन्द्र अग्रवाल ने की।
  • यहाँ से ताम्र उपकरण सर्वाधिक मात्रा में प्राप्त हुए हैं।
  • प्राप्त ताम्र उपकरणों में लगभग 99 प्रतिशत ताँबा पाया गया है।
  • हड़प्पा सभ्यता तथा मोहनजोदड़ो को ताँबे की आपूर्ति गणेश्वर सभ्यता से की जाती थी।
  • उत्खनन में ताँबे की छड़ी तथा मछली पकड़ने का काँटा प्राप्त हुआ है।
  • यहाँ के मकान एवं बाँध मुख्यतः पत्थर से निर्मित थे।
  • यहाँ से प्राप्त मृदभाण्ड कृष्णवर्णी/गैरिक मृदभाण्ड कहलाते हैं, जिन पर काले एवं नीले रंग का अलंकरण किया गया है।

बैराठ सभ्यताकोटपूतली-बहरोड़

  • बैराठ बाणगंगा नदी के किनारे स्थित है।
  • बैराठ का प्राचीन नाम विराटनगर था।
  • महाभारत काल में यह मत्स्य जनपद की राजधानी विराटनगर के रूप में प्रसिद्ध था। मान्यता है कि पाण्डवों ने अपना अज्ञातवास यहीं व्यतीत किया था।
  • 1837 में कैप्टन बर्ट ने बीजक की पहाड़ी से सम्राट अशोक मौर्य का भाब्रू शिलालेख खोजा। यह शिलालेख वर्तमान में कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित है। इस पर बुद्ध, धम्म तथा संघ शब्द अंकित हैं।
  • 1999 में बीजक की पहाड़ी से गोल बौद्ध मंदिर, बौद्ध विहार तथा भगवान बुद्ध की प्रतिमा के अवशेष प्राप्त हुए।
  • इसी स्थल से मौर्यकालीन शिलालेख, गोल चैत्यगृह, रहस्यमयी शंख लिपि तथा त्रिरत्न चक्र के अवशेष भी मिले हैं।
  • भीमजी की डूंगरी से महाभारतकालीन भीमताल जलाशय के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसी क्षेत्र में कीचक का महल भी स्थित है।
  • गणेश डूंगरी तथा महादेव जी की डूंगरी पर भी पुरातात्विक उत्खनन किया गया।
  • 1937 में दयाराम साहनी तथा 1962 में नीलरत्न बनर्जी एवं कैलाशनाथ दीक्षित ने यहाँ उत्खनन कराया।

➣ उत्खनन में एक कक्ष से 36 चाँदी की मुद्राएँ प्राप्त हुईं, जिनमें—

  • 8 पंचमार्क चाँदी की मुद्राएँ
  • 28 भारतीय-यूनानी (इण्डोग्रीक) शासकों की मुद्राएँ।
  • इनमें से 16 मुद्राएँ यूनानी शासक मिनेण्डर की मानी जाती हैं।
  • यहाँ से चित्रित शैलाश्रयों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
  • उत्खनन में हाथ से निर्मित वस्त्र भी मिला है, जिससे स्पष्ट होता है कि यहाँ के लोग वस्त्र-बुनाई की तकनीक से परिचित थे।
  • लालसोट (दौसा), शेरगढ़ (बाराँ) तथा नगरी (चित्तौड़गढ़) भी बौद्ध धर्म के प्रमुख केन्द्र रहे हैं।

बालाथलवल्लभनगर (उदयपुर)

  • बालाथल सभ्यता का विकास बेड़च नदी के तट पर हुआ।
  • 1993 ई. में वी.एन. मिश्र ने इस स्थल की खोज की।
  • उत्खनन से 11 कमरों वाला विशाल भवन तथा दुर्गनुमा संरचना के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • यह स्थल ताम्रपाषाणकालीन आहड़ संस्कृति से संबंधित है।
  • यहाँ के गृह निर्माण से हड़प्पा सभ्यता के साथ संपर्क के प्रमाण मिलते हैं।
  • उत्खनन में लोहे के औजार बड़ी मात्रा में मिले हैं तथा लोहा गलाने की पाँच भट्टियाँ भी प्राप्त हुई हैं।

गिलूण्ड सभ्यताराजसमंद

  • गिलूण्ड सभ्यता बनास नदी के तट पर स्थित है।
  • 1957–58 में बी.बी. लाल ने यहाँ उत्खनन कराया।
  • यह ताम्रयुगीन सभ्यता का नवपाषाणकालीन पुरातात्विक स्थल है।

ओझियानाबदनोर (ब्यावर)

  • ओझियाना सभ्यता खारी नदी के किनारे स्थित है।
  • 2000 ई. में बी.आर. मीणा तथा आलोक त्रिपाठी ने यहाँ उत्खनन कराया।
  • उत्खनन से गाय एवं सफेद बैल की मृणमय प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं।

बालाथल, गिलूण्ड, ओझियाना तथा भगवानपुरा (उदयपुर) ताम्रपाषाणकालीन आहड़ संस्कृति से संबंधित प्रमुख स्थल हैं।

नोह सभ्यताभरतपुर

  • 1963–64 में रतनचन्द्र अग्रवाल ने नोह सभ्यता का उत्खनन किया।
  • यह सभ्यता रूपारेल नदी के तट पर स्थित है।

➣ यहाँ से पाँच सांस्कृतिक युगों के अवशेष प्राप्त हुए हैं—

  • लौहकालीन
  • ताम्रकालीन
  • आर्यकालीन
  • महाभारतकालीन
  • मौर्यकालीन

➣ उत्खनन में जाखबाबा (यक्ष) की प्रतिमा प्राप्त हुई है।

रैढ़ सभ्यतानिवाई (टोंक)

  • रैढ़ सभ्यता ढील नदी के किनारे स्थित है।
  • 1938–40 ई. में केदारनाथ पुरी ने यहाँ उत्खनन कराया।
  • लोहे के औजार अत्यधिक मात्रा में मिलने के कारण इसे प्राचीन राजस्थान का टाटानगर कहा जाता है।
  • यहाँ से एशिया का सिक्कों का सबसे बड़ा भंडार प्राप्त हुआ है।
  • उत्खनन में 3000 आहत चाँदी की मुद्राएँ तथा लौह सामग्री का विशाल भंडार मिला है।
  • यहाँ से यूनानी शासक अपोलोडोटस का सिक्का भी प्राप्त हुआ है।

नगर सभ्यताटोंक

  • केदारनाथ पुरी ने नगर सभ्यता का उत्खनन किया।
  • यहाँ से 6000 मालव सिक्के प्राप्त हुए हैं।
  • इसे महाभारत में वर्णित मालवों की राजधानी काकोट नगर से संबंधित माना जाता है।
  • नगर सभ्यता को खेड़ा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।

नगरी सभ्यताचित्तौड़गढ़

  • आर.जी. भंडारकर ने नगरी सभ्यता का उत्खनन किया।
  • पाणिनी ने अपनी पुस्तक अष्टाध्यायी तथा पतंजलि ने महाभाष्य में मध्यमिका (वर्तमान नगरी) का उल्लेख किया है।
  • यहाँ से नहर के अवशेष तथा शिवी जनपद के सिक्के प्राप्त हुए हैं।

रंगमहलहनुमानगढ़

  • 1952–53 में श्रीमती हन्नारिड (स्वीडन) ने रंगमहल का उत्खनन कराया।
  • यहाँ से गांधार शैली के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
  • इस सभ्यता के लोग चावल की खेती करते थे।
  • इसे कुषाणकालीन सभ्यता के समकालीन माना जाता है।

भीनमाल सभ्यताजालौर

  • 1953–54 में रतनचन्द्र अग्रवाल ने भीनमाल सभ्यता का उत्खनन किया।
  • यहाँ से प्राप्त मृदपात्रों पर रोमन प्रभाव दिखाई देता है तथा रोमन ऐम्फोरा (सुरापात्र) प्राप्त हुआ है।

तिलवाड़ा सभ्यताबालोतरा

  • तिलवाड़ा सभ्यता लूणी नदी के तट पर स्थित मध्य पाषाणकालीन सभ्यता है।

बरोरअनूपगढ़ (गंगानगर)

  • बरोर का पुरातात्विक स्थल सरस्वती नदी (वर्तमान घग्घर नदी) के तट पर स्थित है।

सुनारी सभ्यताखेतड़ी (झुंझुनू)

  • यहाँ से लोहा बनाने की भट्टियाँ प्राप्त हुई हैं।
  • इन्हें भारत की प्राचीनतम लौह भट्टियाँ माना जाता है।

जोधपुरा सभ्यताकोटपूतली-बहरोड़

  • जोधपुरा सभ्यता साबी नदी के किनारे स्थित है।
  • यहाँ उत्खनन पाँच स्तरों में किया गया।
  • तीसरे स्तर से लौह निर्मित वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं।

नागौर के सिंधी तालाब, जानकीपुरा, अमरपुरा तथा जायल से पुरापाषाणकालीन हाथ से निर्मित कुल्हाड़ियाँ प्राप्त हुई हैं।

कणसवा सभ्यताकणसवा गाँव (कोटा)

  • कणसवा सभ्यता का विकास चम्बल नदी के तट पर हुआ।
  • 778 ई. के कणसवा शिलालेख में मौर्य राजा धवल का उल्लेख मिलता है।

मल्लाह सभ्यताभरतपुर

  • घना पक्षी अभयारण्य के मध्य स्थित यह एक ताम्रकालीन सभ्यता है।

लाछूरा सभ्यताभीलवाड़ा

  • 1998 में वी.आर. मीणा ने इस स्थल का उत्खनन कराया।
गरदड़ाबूंदी
  • यह पुरातात्विक स्थल छाजा नदी के किनारे स्थित है।
  • यहाँ देश की पहली बर्ड राइडर रॉक पेंटिंग प्राप्त हुई है।
जहाजपुरभीलवाड़ा
  • यहाँ से महाभारतकालीन शिलालेख प्राप्त हुआ है।
डीडकर शैलकलाअलवर
  • यहाँ लगभग 7000 वर्ष पुराने शैलचित्र प्राप्त हुए हैं।

चन्द्रावती सभ्यतासिरोही

  • चन्द्रावती सभ्यता सेवाणी नदी के तट पर स्थित है।
  • 1822 में कर्नल जेम्स टॉड ने इस सभ्यता की खोज की।

गुरारा सभ्यतानीम का थाना (सीकर)

  • यहाँ से लगभग 2744 पंचमार्क चाँदी के सिक्के प्राप्त हुए हैं।

नलियासर सभ्यतासांभर (जयपुर)

  • टी.एच. हैण्डले ने नलियासर की पहचान एक बौद्ध कस्बे के रूप में की।
अन्य प्रमुख पुरातात्विक स्थल
  • पीलीबंगा, बड़ापोलहनुमानगढ़
  • ईसवालउदयपुर
  • किराडोतजयपुर
  • सौंथी, साबणिया, पुंगल तथा डाडाथोराबीकानेर

कुराडापरबतसर (डीडवाना-कुचामन)

  • 1934 में यहाँ ताम्र उपकरणों का विशाल भंडार प्राप्त हुआ।
  • झाडोल (उदयपुर), कुराडा, साबणिया तथा नन्दलालपुरा (जयपुर) से भी ताम्र उपकरणों के महत्वपूर्ण भंडार प्राप्त हुए हैं।
  • 1870 में सी.ए. हैकेट ने जयपुर तथा इन्द्रगढ़ से पुरापाषाणकालीन कुल्हाड़ी की खोज की।

पाषाणकाल

मानव सभ्यता के प्रारम्भिक विकास काल को पाषाणकाल कहा जाता है। इसे तीन भागों में विभाजित किया गया है।

(1) पुरापाषाणकाल

➣ प्रमुख स्थल—

  • डीडवाना – सबसे प्राचीन स्थल।
  • जायल (नागौर)
  • भानगढ़ (अलवर)
  • इन्द्रगढ़ (बूंदी)
  • दर (भरतपुर)
  • बूढ़ा पुष्कर (अजमेर)
  • होकरा

(2) मध्य पाषाणकाल

➣ प्रमुख स्थल—

    • तिलवाड़ा (बालोतरा)
    • बागौर
    • विराटनगर (कोटपूतली-बहरोड़)
    • सोजत (पाली)
    • धनेरी (आसींद-भीलवाड़ा)
  • मेसोलिथिक शब्द का अर्थ मध्य पाषाणकाल होता है।
  • इस काल के अवशेष विशेष रूप से चम्बल, बनास तथा बेड़च नदियों के किनारे प्राप्त हुए हैं।
  • इस समय के उपकरण छोटे आकार के पत्थरों से बनाए जाते थे, जिन्हें माइक्रोलिथ (लघु पाषाण उपकरण) कहा जाता है।

(3) उत्तर (नव) पाषाणकाल

➣ प्रमुख स्थल—

  • आहड़ (उदयपुर)
  • गिलूण्ड (राजसमंद)
  • कालीबंगा (हनुमानगढ़)

राजस्थान में धातु काल

(1) ताम्रकालीन संस्कृति

➣ प्रमुख ताम्रकालीन स्थल—

  • आहड़ एवं झाडोल (उदयपुर)
  • पिण्ड-पाडलियाँ (चित्तौड़गढ़)
  • साबणिया एवं पुंगल (बीकानेर)
  • नन्दलालपुरा, किराडोत तथा चौथवाड़ी (जयपुर)
  • एलाना (जालौर)
  • बूढ़ा पुष्कर (अजमेर)
(2) लौह युगीन संस्कृति

➣ प्रमुख लौह युगीन स्थल—

  • नोह (भरतपुर)
  • सुनारी (खेतड़ी-झुंझुनू)
  • जोधपुरा (कोटपूतली-बहरोड़)
  • रैढ़ (टोंक)

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