राजस्थान के लोकनृत्य

राजस्थान में लोक नृत्य दो प्रकार के होते हैं—
क्षेत्रीय लोक नृत्य (क्षेत्र विशेष के)
जनजातीय लोक नृत्य

इस भाग में क्या पढ़ेंगे

(1) क्षेत्रीय लोक नृत्य

❖ घूमर

  • राजस्थान का राज्य नृत्य है।
  • इसे नृत्यों का सिरमौर तथा लोक नृत्यों की आत्मा कहा जाता है।
  • यह केवल महिलाओं द्वारा किया जाता है।
  • गणगौर पर्व पर सर्वाधिक किया जाता है।
  • इस नृत्य का शुद्ध रूप राजा-महाराजाओं के दरबारों में देखने को मिलता है, इसलिए इसे रजवाड़ी नृत्य भी कहा जाता है।
  • नृत्य के दौरान 8 अंक का निर्माण होता है, जिसे सवाई कहते हैं।
  • इस लोक नृत्य का विकास भील जनजाति ने किया।
  • नृत्य में लहंगे की घूम (लहंगे का बॉर्डर) के गोल-गोल घूमने के कारण इसे घूमर नृत्य कहा जाता है।
  • नृत्य की प्रमुख विशेषता हाथों का लचकदार संचालन है।
  • प्रयुक्त वाद्ययंत्र — ढोलक, नगाड़ा, मंजीरा एवं शहनाई
  • घूमर लोक नृत्य को संरक्षित एवं बढ़ावा देने के लिए 1986 में गणगौर घूमर नृत्य अकादमी की स्थापना गोवर्धन कुमारी (किशनगढ़ की राजकुमारी) द्वारा मुंबई में की गई।

घूमर के तीन प्रकार प्रचलित हैं—

  • घूमरमहिलाओं द्वारा किया जाता है।
  • लूरगरासिया जनजाति की महिलाओं द्वारा किया जाता है।
  • झुमरियाबालिकाओं द्वारा किया जाता है।

❖ कच्ची घोड़ी नृत्य

  • शेखावाटी क्षेत्र में केवल पुरुषों द्वारा किया जाता है।
  • यह व्यवसायिक नृत्य है।
  • विवाह के अवसर पर किया जाता है।
  • नृत्य में झांझ वाद्ययंत्र का प्रयोग किया जाता है।
  • ढोल, बाँकिया एवं थाली वाद्ययंत्रों का भी प्रयोग किया जाता है।
  • पुरुष कमर पर नकली काठ की घोड़ी बाँधकर आगे-पीछे बढ़ते हैं, जिससे फूल की पंखुड़ियों के खिलने एवं बंद होने का आभास होता है।

❖ अग्नि नृत्य

  • उद्गमकतरियासर (बीकानेर)
  • यह जसनाथी संप्रदाय का नृत्य है।
  • इसमें पुरुषों द्वारा धधकते अंगारों पर नृत्य किया जाता है।
  • अंगारों के ढेर को धूणा कहते हैं।
  • नृत्य करते समय “फत्ते-फत्ते” का उच्चारण किया जाता है।

❖ ढोल नृत्य

  • यह जालौर का नृत्य है।
  • ढोली, भील एवं माली जाति के पुरुषों द्वारा बड़े-बड़े ढोलों के साथ किया जाता है।
  • इस नृत्य को प्रकाश में लाने का श्रेय जयनारायण व्यास को दिया जाता है।

❖ घुड़ला नृत्य

  • जोधपुर में महिलाओं द्वारा चैत्र कृष्ण अष्टमी को किया जाता है।
  • इसका प्रारंभ राव सातलदेव के काल में हुआ।
  • इसमें छिद्रित मटका होता है, जिसमें दीपक जलता है। इस मटके को घुड़ला कहते हैं।
  • रूपायन संस्थान (बोरुंदा) के कोमल कोठारी ने इस नृत्य को संरक्षण दिया।

❖ तेरहताली नृत्य

  • कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा रामदेव जी के मेले पर किया जाता है।
  • उद्भवपादरला गाँव (पाली)
  • यह व्यवसायिक नृत्य है।
  • प्रमुख वाद्ययंत्र — चौतारा, मंजीरा, तानपुरा, करताल एवं चिमटा
  • प्रमुख कलाकार — मांगी बाई, मोहनी एवं लक्ष्मणदास कामड़
  • महिला बैठकर नृत्य करती है तथा 9 मंजीरे दाएँ पैर में, 2 मंजीरे कोहनियों में एवं 2 मंजीरे हाथों में, इस प्रकार कुल 13 मंजीरे धारण करती है। पुरुष वाद्ययंत्र बजाते हैं।

❖ चरी नृत्य

  • किशनगढ़ (अजमेर) में गुर्जर महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नृत्य है।
  • इसमें सिर पर चरी (टोकरी) रखकर नृत्य किया जाता है।
  • चरी में जलते हुए कपास के बीज रखे जाते हैं।
  • प्रमुख कलाकार — फल्कू बाई (किशनगढ़), सुनीता रावत एवं श्री मोहनगौड़ (किशनगढ़)

❖ भवाई नृत्य

  • यह उदयपुर क्षेत्र का नृत्य है।
  • प्रवर्तकबाघाजी / नागोजी (अजमेर)
  • यह भवाई जाति द्वारा किया जाता है।
  • इसमें स्त्री एवं पुरुष दोनों भाग लेते हैं।
  • यह व्यवसायिक नृत्य है।
  • इसमें सिर पर 7 या 9 मटके रखकर नृत्य करना, ग्लास, थाली एवं प्लेट पर नृत्य करना तथा मुँह से रुमाल उठाना जैसी क्रियाएँ की जाती हैं।
  • प्रमुख कलाकार — रूप सिंह शेखावत, अस्मिता काला (जयपुर), श्रेष्ठा सोनी, दयाराम, तारा शर्मा एवं कृष्णा व्यास छंगाणी

❖ गीदड़ नृत्य

  • यह शेखावाटी का नृत्य है।
  • होली के त्योहार पर किया जाता है।
  • इसमें महिलाओं की भूमिका पुरुष निभाते हैं, जिन्हें गणगौर / महरी कहा जाता है।
  • यह नृत्य स्वांग कला के लिए प्रसिद्ध है।
  • इसमें मुख्यतः साधु, शिकारी, सेठ-सेठानी, दूल्हा-दुल्हन, सरदार, पादरी, बाजीगर तथा राम-कृष्ण के स्वांग किए जाते हैं।

❖ चंग नृत्य / डफ नृत्य

  • शेखावाटी के पुरुष होली के अवसर पर चंग / डफ वाद्ययंत्र लेकर नृत्य करते हैं।

❖ बम नृत्य

  • यह भरतपुर एवं अलवर का नृत्य है।
  • फाल्गुन माह (होली) में नई फसल आने की खुशी में किया जाता है।
  • इसमें नगाड़ा (बम) वाद्ययंत्र के साथ रसिया गीत गाए जाते हैं, इसलिए इसे बम रसिया नृत्य भी कहा जाता है।

❖ नाहर नृत्य

  • यह मांडल (भीलवाड़ा) का नृत्य है।
  • इस नृत्य का आरंभ खुर्रम (शाहजहाँ) के समय हुआ।
  • नर्तक अपने शरीर पर रुई लगाकर नाहर (सींगों वाले शेर) का स्वांग करते हैं।
  • यह होली के 13 दिन बाद आयोजित होता है।

❖ डांडिया नृत्य

  • यह मारवाड़ क्षेत्र का नृत्य है।
  • होली के बाद पुरुषों की टोली डांडिया लेकर नृत्य करती है।
  • गीतों में बड़ली गाँव (जोधपुर) के मैरुजी का गुणगान किया जाता है।

❖ गरबा नृत्य

  • डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा में नवरात्रों के अवसर पर किया जाता है।
  • इसका मूल रूप गुजरात का है।

❖ बिंदोरी नृत्य

  • झालावाड़ में पुरुषों द्वारा होली के अवसर पर किया जाता है।

❖ डांग नृत्य

  • नाथद्वारा में होली पर्व पर स्त्री एवं पुरुष दोनों द्वारा किया जाता है।
  • इसमें ढोल, थाली एवं मांदल वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है।

❖ लांगुरिया नृत्य

  • कैला देवी माता मंदिर पर मीणा जनजाति द्वारा किया जाता है।

❖ भैरव नृत्य / मयूर नृत्य

  • ब्यावर में बादशाह मेले के दौरान बादशाह की सवारी के आगे बीरबल का पात्र निभाने वाला कलाकार यह नृत्य करता है।
    • झूमर नृत्य – हाड़ौती क्षेत्र में महिलाओं द्वारा किया जाता है।
    • लूंबर नृत्य – जालौर में होली के अवसर पर महिलाओं द्वारा किया जाता है।
    • पेजन नृत्य – बागड़ क्षेत्र में दीपावली के अवसर पर किया जाता है।
    • झांझी नृत्य – मारवाड़ में महिलाओं द्वारा किया जाता है।
    • सूकर नृत्य – दक्षिणी राजस्थान में आदिवासियों द्वारा किया जाता है।

(2) जनजातीय लोक नृत्य

❖ भील जनजाति के नृत्य

★ गवरी (राई नृत्य)
  • मेवाड़ में भील पुरुषों द्वारा किया जाता है।
  • यह रक्षाबंधन के अगले दिन से प्रारंभ होकर 40 दिन तक चलता है।
  • यह शिव-भस्मासुर की कहानी पर आधारित है।
  • माता पार्वती के पात्र गौरी के कारण इसका नाम गवरी पड़ा।
  • माता पार्वती के पात्र को राई कहा जाता है।
  • शिव के पात्र को पुरिया / बुदिया कहा जाता है, जो नृत्य का मुख्य पात्र होता है।
  • झामट्या नाम का पात्र कविता बोलता है तथा उसे दोहराने वाला पात्र खटकड़िया कहलाता है।
  • नाट्य का सूत्रधार कुटकुडिया कहलाता है।
  • अन्य पात्रों को खैले / खेला कहा जाता है।
  • गवरी के नर्तक मुख्य पात्र पुरिया के चारों ओर थाली एवं मांदल के साथ नृत्य करते हैं।
  • गवरी राजस्थान का सबसे प्राचीन लोकनाट्य है। इसे लोकनाट्य का मेरुनाट्य कहा जाता है।

❖ गैर नृत्य

  • होली के अवसर पर भील पुरुषों द्वारा किया जाता है।
  • गोल घेरे में नृत्य करने के कारण इसे गैर तथा नृत्य करने वालों को गेरिये कहा जाता है।
  • प्रमुख वाद्ययंत्र — ढोल, बांकिया एवं थाली
  • नर्तक के हाथ में छड़ी होती है, जिसे खांडा कहा जाता है तथा वे विशेष पोशाक पहनते हैं, जिसे ऑंगी कहा जाता है।
  • यह मेवाड़ (उदयपुर) तथा कनाना गाँव (बालोतरा) का प्रसिद्ध नृत्य है।
  • नृत्य के समय पैरों में रमझोल (घुंघरू की पट्टी) पहनी जाती है।
  • तलवारों की गैरमेनार (उदयपुर)
★ हाथीमना
  • पुरुष विवाह के अवसर पर घुटनों के बल बैठकर तलवारों को घुमाते हुए नृत्य करते हैं। यह नकली युद्ध का प्रदर्शन होता है।
★ द्विचक्री
  • पुरुष एवं महिलाएँ विवाह के अवसर पर दो चक्र बनाकर नृत्य करते हैं।
★ नेजा
  • भीलों द्वारा होली के तीसरे दिन किया जाता है।
  • लड़कियाँ हाथों में छड़ी / कोरड़े लेकर नारियल उतारने वाले पुरुषों पर प्रहार करती हैं।
★ भील जनजाति के अन्य नृत्य
  1. युद्ध नृत्य
  2. घूमरा नृत्य

❖ गरासिया जनजाति के नृत्य

★ वालर
  • गरासिया जनजाति के महिला एवं पुरुष द्वारा किया जाता है।
  • इसमें वाद्ययंत्रों का प्रयोग नहीं किया जाता है।
  • बाहरी अर्द्धवृत्त में पुरुष तथा भीतरी अर्द्धवृत्त में महिलाएँ नृत्य करती हैं।
★ कूद नृत्य
  • यह भी बिना वाद्ययंत्र के किया जाता है।
  • महिला एवं पुरुष ताली बजाते हुए नृत्य करते हैं।

» गरासिया जनजाति के अन्य नृत्य —

  • लूर
  • मोरिया
  • मांदल
  • जवारा
  • गौर
  • रायण
  • गरवा

❖ कंजर जनजाति के नृत्य

★ चकरी नृत्य
  • बूंदी एवं कोटा में कजली तीज के अवसर पर कंजर जाति की अविवाहित युवतियाँ चक्राकार नृत्य करती हैं।
★ धाकड़ नृत्य
  • हथियार लेकर युद्धकला का प्रदर्शन किया जाता है।
★ लाठी नृत्य
  • हाड़ौती क्षेत्र में किया जाता है।

❖ कालबेलिया जाति के नृत्य

★ कालबेलिया नृत्य
  • कालबेलिया जाति द्वारा किया जाता है।
  • इसमें खंजरी, पूंगी, डफली एवं घुरालियो वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है।
  • कालबेलिया नृत्य (स्नेक चार्मर डांस) को 2010 में यूनेस्को की अमूर्त विरासत सूची में शामिल किया गया।
  • प्रसिद्ध नृत्यांगना — गुलाबो सपेरा (कोटड़ा गाँव, अजमेर)
★ शंकरिया
  • प्रेम कहानी पर आधारित युगल नृत्य है।
★ पणिहारी
  • पणिहारी गीत पर आधारित युगल नृत्य है।

» कालबेलिया जाति के अन्य नृत्य —

  • बागड़िया
  • इंडोणी

❖ सहरिया जाति के नृत्य

  • शिकारी
  • लहंगी
  • सांग नृत्ययुगल नृत्य
  • बिंछवाकेवल महिलाओं द्वारा किया जाता है।
  • झेलाफसल पकने के समय किया जाने वाला युगल नृत्य

❖ अन्य नृत्य व जानकारी

  • कथौड़ी जाति के नृत्य — होली, मावलिया
  • मीणा जनजाति के नृत्य — रसिया, सुगनी (पाली में)
  • गुर्जर जाति के नृत्य — चरी, झूमर
  • मेव जाति के नृत्य — रतवई, रणबाजा (मेवात क्षेत्र में)
  • भाट जाति का नृत्य — बालदिया नृत्य (घुमंतू जीवन व्यतीत करने वाली जाति)।
  • नट जाति का नृत्य — कठपुतली
  • कठपुतली नृत्य मनोरंजन एवं सामाजिक मुद्दे उठाने के लिए प्रसिद्ध है।
  • बंजारा जाति का नृत्य — मछली नृत्य

❖ अन्य नृत्य

★ थाली नृत्य
  • पाबूजी के भक्तों द्वारा किया जाता है।
★ राड़ नृत्य
  • वागड़ क्षेत्र (डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा) का नृत्य है।

❖ कथक नृत्य

  • राजस्थान का एकमात्र शास्त्रीय नृत्य है।
  • प्रवर्तकभानूजी महाराज
  • प्रसिद्ध कलाकार — बिरजू महाराज
  • अन्य कलाकार — पं. बाबूलाल (चूरू), प्रेरणा श्रीमाली (बांसवाड़ा)
  • कथक शैली का आदिम घरानाजयपुर घराना
  • लखनऊ घराना एवं बनारस घराना भी कथक के प्रमुख घराने हैं।

नोट – भवाई नृत्य, कच्ची घोड़ी नृत्य एवं तेरहताली नृत्य राजस्थान के प्रमुख व्यवसायिक नृत्य हैं.

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