राजस्थान का एकीकरण : प्रारम्भिक प्रयास (1946–1947)
➤ परिचय: स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व वर्तमान राजस्थान अनेक देशी रियासतों में विभाजित था। वर्ष 1946 तक यह स्पष्ट होने लगा था कि भारत शीघ्र ही स्वतंत्र होने वाला है। ऐसी स्थिति में राजस्थान की छोटी-बड़ी रियासतों के भविष्य का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया। इसी पृष्ठभूमि में राजस्थान के एकीकरण के प्रारम्भिक प्रयास शुरू हुए।
स्वतंत्रता से पूर्व राजस्थान में—
| इकाई | संख्या |
|---|---|
| रियासतें | 19 |
| ठिकाने | 3 |
| केन्द्र शासित प्रदेश | अजमेर-मेरवाड़ा (1) |
➤ पृष्ठभूमि
ब्रिटिश सत्ता के समाप्त होने के बाद देशी रियासतों को अपने भविष्य का निर्णय करना था। अधिकांश छोटी रियासतें प्रशासनिक, आर्थिक एवं सैन्य दृष्टि से स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने में सक्षम नहीं थीं। इसलिए राजस्थान के दूरदर्शी शासकों ने समय रहते एक संयुक्त संघ (Union) बनाने की आवश्यकता महसूस की।
➤ मुख्य कारण
- भारत की संभावित स्वतंत्रता।
- छोटी रियासतों का कमजोर प्रशासनिक ढाँचा।
- आर्थिक एवं सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ।
- भविष्य में बड़े प्रशासनिक इकाई के रूप में अस्तित्व बनाए रखने की आवश्यकता।
- भारतीय संघ में सम्मानजनक स्थिति प्राप्त करने की इच्छा।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ 1946 तक राजस्थान 19 रियासतों में विभाजित था।
✔ स्वतंत्रता की संभावना ने एकीकरण की आवश्यकता को जन्म दिया।
✔ छोटी रियासतों का पृथक अस्तित्व संकट में था।
मेवाड़ द्वारा एकीकरण का प्रथम प्रयास
✦ उदयपुर सम्मेलन (25–26 जून, 1946)
राजस्थान के एकीकरण की दिशा में पहला महत्वपूर्ण प्रयास मेवाड़ के महाराणा भूपाल सिंह द्वारा किया गया।
➤ सम्मेलन की प्रमुख बातें
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 25–26 जून 1946 |
| स्थान | उदयपुर |
| अध्यक्षता/आयोजन | महाराणा भूपाल सिंह |
| उद्देश्य | राजस्थान यूनियन का गठन |
| उपस्थित शासक | 22 राजा-महाराजा |
| प्रस्ताव | “राजस्थान संघ” की स्थापना |
महाराणा भूपाल सिंह ने राजस्थान, गुजरात एवं मालवा के शासकों को एक मंच पर लाकर “राजस्थान संघ” बनाने की योजना प्रस्तुत की।
हालाँकि सम्मेलन में उपस्थित शासकों ने इस प्रस्ताव पर विचार करने का आश्वासन दिया, लेकिन कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ राजस्थान एकीकरण का प्रथम संगठित प्रयास – जून 1946।
✔ स्थान – उदयपुर।
✔ आयोजक – महाराणा भूपाल सिंह।
✔ 22 राजा-महाराजा सम्मेलन में उपस्थित हुए।
✔ “राजस्थान संघ” की अवधारणा प्रस्तुत की गई।
✦ दूसरा उदयपुर सम्मेलन (23 मई, 1947)
पहले सम्मेलन की असफलता के बाद भी महाराणा भूपाल सिंह ने अपने प्रयास जारी रखे।
✦ के.एम. मुंशी की नियुक्ति
राजस्थान संघ की योजना को व्यवहारिक रूप देने के लिए महाराणा ने प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ के.एम. मुंशी को अपना संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया।
✦ के.एम. मुंशी की भूमिका
- एकीकरण योजना को संवैधानिक आधार प्रदान किया।
- राजाओं को संघ निर्माण के लिए प्रेरित किया।
- उदयपुर सम्मेलन में महाराणा के प्रस्ताव का समर्थन किया।
➤ सम्मेलन की प्रमुख बातें
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 23 मई 1947 |
| स्थान | उदयपुर |
| आयोजक | महाराणा भूपाल सिंह |
| संवैधानिक सलाहकार | के.एम. मुंशी |
➤ महाराणा की चेतावनी
महाराणा ने शासकों को स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि सभी रियासतें मिलकर एक संघ का निर्माण नहीं करेंगी, तो जो रियासतें बड़े प्रान्तों के समकक्ष नहीं हैं उनका पृथक अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
➤ परिणाम
- के.एम. मुंशी ने योजना का जोरदार समर्थन किया।
- शासकों में सहमति नहीं बन सकी।
- सम्मेलन बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हो गया।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ 23 मई 1947 को दूसरा उदयपुर सम्मेलन आयोजित हुआ।
✔ के.एम. मुंशी महाराणा के संवैधानिक सलाहकार थे।
✔ मुंशी ने राजस्थान संघ की योजना का समर्थन किया।
✔ सम्मेलन का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।
जयपुर राज्य का एकीकरण प्रयास
राजस्थान के एकीकरण के लिए केवल मेवाड़ ही नहीं, बल्कि जयपुर राज्य ने भी महत्वपूर्ण पहल की।
✦ सर वी.टी. कृष्णाचारी की योजना
जयपुर के महाराजा मानसिंह की स्वीकृति से जयपुर के दीवान सर वी.टी. कृष्णाचारी ने विभिन्न रियासतों के शासकों एवं प्रतिनिधियों का सम्मेलन बुलाया।
➤ प्रस्ताव के मुख्य बिंदु
- राजस्थान की रियासतों का एक संघ बनाया जाए।
- निम्न विषय संघ सरकार को सौंपे जाएँ—
- हाईकोर्ट
- उच्च शिक्षा
- पुलिस
- अन्य विषय संबंधित रियासतों के पास रहें।
➤ वैकल्पिक प्रस्ताव
यदि संघ निर्माण स्वीकार न हो तो—
- जो छोटी रियासतें स्वतंत्र रूप से अस्तित्व बनाए रखने में सक्षम नहीं हैं,
- उन्हें पड़ोसी बड़ी रियासतों में मिला दिया जाए।
➤ परिणाम
सम्मेलन में विभिन्न रियासतों के हितों के कारण सहमति नहीं बन सकी और बैठक बिना किसी निर्णय के समाप्त हो गई।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ जयपुर के दीवान – सर वी.टी. कृष्णाचारी।
✔ जयपुर के महाराजा – मानसिंह।
✔ संघीय व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया।
✔ हाईकोर्ट, उच्च शिक्षा एवं पुलिस को संघ के अधीन रखने का सुझाव।
✔ सम्मेलन बिना निर्णय समाप्त हुआ।
➤ महत्वपूर्ण व्यक्ति
| व्यक्ति | योगदान |
|---|---|
| महाराणा भूपाल सिंह | राजस्थान एकीकरण के प्रथम संगठित प्रयास के अग्रदूत |
| के.एम. मुंशी | संवैधानिक सलाहकार, राजस्थान संघ योजना के समर्थक |
| महाराजा मानसिंह (जयपुर) | जयपुर राज्य की ओर से एकीकरण प्रयासों को समर्थन |
| सर वी.टी. कृष्णाचारी | संघीय व्यवस्था का प्रस्ताव प्रस्तुत किया |
➤ तुलना : मेवाड़ एवं जयपुर की एकीकरण योजनाएँ
| आधार | मेवाड़ योजना | जयपुर योजना |
|---|---|---|
| प्रमुख व्यक्ति | महाराणा भूपाल सिंह | सर वी.टी. कृष्णाचारी |
| वर्ष | 1946 एवं 1947 | 1947 |
| उद्देश्य | राजस्थान संघ का गठन | संघीय व्यवस्था का गठन |
| विशेषता | सभी रियासतों को एक मंच पर लाना | विषयों का संघ एवं राज्यों में विभाजन |
| परिणाम | असफल | असफल |
राजस्थान का एकीकरण : प्रथम चरण (1948)
➤ मत्स्य संघ, राजस्थान संघ एवं संयुक्त राज्य राजस्थान
भारत की स्वतंत्रता (1947) एवं देश विभाजन के बाद देशी रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई। राजस्थान की अधिकांश रियासतें आकार, जनसंख्या एवं संसाधनों की दृष्टि से स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने में सक्षम नहीं थीं। इसी कारण भारत सरकार तथा रियासती विभाग ने चरणबद्ध तरीके से राजस्थान के राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ की।
राजस्थान एकीकरण का प्रथम चरण 18 मार्च 1948 से प्रारम्भ माना जाता है, जब मत्स्य संघ अस्तित्व में आया।
➤ विभाजन एवं साम्प्रदायिक दंगों का प्रभाव
1947 में भारत-विभाजन के बाद सम्पूर्ण उत्तर भारत की तरह राजस्थान की कुछ रियासतों में भी साम्प्रदायिक तनाव एवं दंगे फैल गए।
विशेष रूप से—
- अलवर
- भरतपुर
इन दोनों राज्यों में स्थिति अत्यन्त गंभीर हो गई।
➤ अलवर की स्थिति
भारत सरकार को शिकायतें प्राप्त हुईं कि—
- अलवर में हुए दंगों में स्वयं राज्य प्रशासन की भूमिका संदिग्ध थी।
- कानून व्यवस्था पूरी तरह विफल हो चुकी थी।
➤ भारत सरकार की कार्रवाई
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 7 फरवरी 1948 |
| कार्रवाई | अलवर प्रशासन भारत सरकार ने अपने हाथ में लिया |
| नजरबंद किए गए | महाराजा अलवर एवं डॉ. एन.बी. खरे |
➤ भरतपुर की स्थिति
भारत सरकार ने पाया कि—
- राज्य प्रशासन कानून व्यवस्था बनाए रखने में असफल रहा।
- स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी।
भारत सरकार के हस्तक्षेप से पूर्व ही भरतपुर के महाराजा ने राज्य का प्रशासन भारत सरकार को सौंप दिया।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ विभाजन के बाद अलवर एवं भरतपुर में साम्प्रदायिक दंगे हुए।
✔ 7 फरवरी 1948 को अलवर का प्रशासन भारत सरकार ने अपने हाथ में लिया।
✔ डॉ. एन.बी. खरे एवं अलवर महाराजा नजरबंद किए गए।
✔ भरतपुर के महाराजा ने स्वयं प्रशासन भारत सरकार को सौंप दिया।
प्रथम चरण : मत्स्य संघ का निर्माण
✦ मत्स्य संघ (Matsya Union)
➤ गठन
अलवर एवं भरतपुर के साथ—
- धौलपुर
- करौली
इन चार रियासतों को मिलाकर मत्स्य संघ का गठन किया गया।
इन रियासतों को भारत सरकार द्वारा निर्धारित मापदण्डों के अनुसार स्वतंत्र राज्य के रूप में बनाए रखना व्यावहारिक नहीं माना गया।
➤ मत्स्य संघ की संरचना
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| गठन | 18 मार्च 1948 |
| उद्घाटन | 17 मार्च 1948 |
| उद्घाटनकर्ता | एन.बी. गाडगिल |
| शामिल रियासतें | अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली |
| राजप्रमुख | महाराजा धौलपुर |
| उप-राजप्रमुख | महाराजा करौली |
| प्रधानमंत्री | शोभाराम कुमावत |
➤ शोभाराम कुमावत
- अलवर प्रजामण्डल के प्रमुख नेता।
- मत्स्य संघ के प्रथम प्रधानमंत्री बने।
- राजस्थान के लोकतांत्रिक नेतृत्व को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ राजस्थान एकीकरण का प्रथम चरण – मत्स्य संघ।
✔ गठन – 18 मार्च 1948।
✔ चार रियासतें – अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली।
✔ राजप्रमुख – धौलपुर के महाराजा।
✔ प्रधानमंत्री – शोभाराम कुमावत।
✔ उद्घाटनकर्ता – एन.बी. गाडगिल।
राजस्थान संघ का निर्माण
✦ रियासती विभाग का प्रस्ताव
➤ तिथि : 3 मार्च 1948
रियासती विभाग ने निम्न रियासतों को मिलाकर “राजस्थान संघ” बनाने का प्रस्ताव रखा—
| क्रम | रियासत |
|---|---|
| 1 | कोटा |
| 2 | बून्दी |
| 3 | झालावाड़ |
| 4 | टोंक |
| 5 | डूंगरपुर |
| 6 | बाँसवाड़ा |
| 7 | प्रतापगढ़ |
| 8 | किशनगढ़ |
| 9 | शाहपुरा |
➤ मेवाड़ का प्रारम्भिक विरोध
राजस्थान संघ में शामिल रियासतें चाहती थीं कि—
✦ मेवाड़ भी संघ में सम्मिलित हो।
किन्तु—
- महाराणा भूपाल सिंह प्रारम्भ में सहमत नहीं थे।
- मेवाड़ प्रजामण्डल ने इस निर्णय का विरोध किया।
- फिर भी प्रारम्भिक राजस्थान संघ बिना मेवाड़ के ही बना।
✦ विलय-पत्र (Covenant)
सभी शासकों ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।
➤ महत्वपूर्ण घटना
✦ बाँसवाड़ा के महारावल चन्द्रवीर सिंह ने प्रारम्भ में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने में हिचकिचाहट दिखाई। उन्होंने हस्ताक्षर करते समय कहा—
“मैं अपने डेथ वारंट पर हस्ताक्षर कर रहा हूँ।”
यह कथन देशी रियासतों के समाप्त होते राजनीतिक अस्तित्व का प्रतीक माना जाता है।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ राजस्थान संघ प्रस्ताव – 3 मार्च 1948।
✔ कुल 9 रियासतें शामिल हुईं।
✔ मेवाड़ प्रारम्भ में शामिल नहीं हुआ।
✔ चन्द्रवीर सिंह – बाँसवाड़ा के महारावल।
✔ “डेथ वारंट” कथन परीक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण।
मेवाड़ का राजस्थान संघ में विलय
5 अप्रैल 1948 का गोलीकाण्ड मेवाड़ में हुए गोलीकाण्ड के बाद राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदलीं।
➤ प्रजामण्डल की मांगें
- पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना।
- गोलीकाण्ड की न्यायिक जाँच।
- जनप्रतिनिधि शासन की व्यवस्था।
➤ महाराणा की रणनीति
प्रजामण्डल के बढ़ते दबाव से बचने हेतु महाराणा ने राजस्थान संघ में शामिल होने का निर्णय लिया।
उन्होंने वार्ता हेतु दिल्ली भेजा—
- सर राममूर्ति
- डॉ. मोहन सिंह मेहता
- अन्य सलाहकार
➤ प्रिवीपर्स विवाद
महाराणा की मांग
| मांग | राशि |
|---|---|
| वार्षिक प्रिवीपर्स | ₹20 लाख |
➤ रियासती विभाग का समाधान
| मद | राशि |
|---|---|
| प्रिवीपर्स | ₹10 लाख |
| राजप्रमुख भत्ता | ₹5 लाख |
| धार्मिक परम्पराओं हेतु | ₹5 लाख |
| कुल | ₹20 लाख |
➤ अतिरिक्त रियायत
महाराणा भूपाल सिंह को संयुक्त राजस्थान का आजीवन राजप्रमुख स्वीकार किया गया। यह सुविधा किसी अन्य रियासत के शासक को नहीं मिली थी।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ मेवाड़ विलय का प्रमुख कारण – प्रजामण्डल का दबाव।
✔ वार्ता हेतु सर राममूर्ति एवं डॉ. मोहन सिंह मेहता दिल्ली गए।
✔ महाराणा को कुल ₹20 लाख के समतुल्य सुविधा दी गई।
✔ उन्हें आजीवन राजप्रमुख बनाया गया।
द्वितीय चरण: राजस्थान संघ का उद्घाटन
✦ उद्घाटन समारोह: 25 मार्च 1948
हालाँकि मेवाड़ के विलय की प्रक्रिया चल रही थी, फिर भी उद्घाटन नियत तिथि पर किया गया।
✦ उद्घाटनकर्ता: एन.वी. गाडगिल
➤ प्रमुख पदाधिकारी
| पद | व्यक्ति |
|---|---|
| राजप्रमुख | महाराव कोटा |
| प्रधानमंत्री | गोकुललाल असावा |
➤ वी.पी. मेनन की भूमिका
- मेवाड़ के संभावित विलय को देखते हुए उद्घाटन स्थगित करने की सलाह दी।
- परन्तु कोटा के महाराव ने तैयारी पूर्ण होने का तर्क दिया।
- परिणामस्वरूप उद्घाटन नियत समय पर हुआ।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ राजस्थान संघ उद्घाटन – 25 मार्च 1948।
✔ उद्घाटनकर्ता – एन.वी. गाडगिल।
✔ राजप्रमुख – महाराव कोटा।
✔ प्रधानमंत्री – गोकुललाल असावा।
✔ वी.पी. मेनन ने उद्घाटन स्थगित करने का सुझाव दिया था।
तृतीय चरण: संयुक्त राज्य राजस्थान का निर्माण
मेवाड़ के विलय के बाद राजस्थान संघ का स्वरूप विस्तृत हुआ और संयुक्त राज्य राजस्थान (United State of Rajasthan) अस्तित्व में आया।
➤ उद्घाटन
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 18 अप्रैल 1948 |
| स्थान | उदयपुर |
| उद्घाटनकर्ता | पं. जवाहरलाल नेहरू |
➤ प्रमुख पदाधिकारी
| पद | व्यक्ति |
|---|---|
| राजप्रमुख | महाराणा भूपाल सिंह |
| प्रधानमंत्री | माणिक्यलाल वर्मा |
➤ माणिक्यलाल वर्मा एवं मंत्रिमण्डल विवाद
राजप्रमुख महाराणा भूपाल सिंह चाहते थे कि—
- मंत्रिमण्डल में जागीरदारों को प्रतिनिधित्व मिले।
किन्तु—
माणिक्यलाल वर्मा ने इसे स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया। फलस्वरूप संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया।
✦ नेहरू का हस्तक्षेप
पं. नेहरू ने सलाह दी कि—
- वर्मा पहले शपथ लें।
- बाद में मंत्रिमण्डल निर्माण संबंधी समस्या का समाधान किया जाए।
इसके बाद—
- वर्मा ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
- अपनी इच्छानुसार मंत्रिमण्डल का गठन किया।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ संयुक्त राज्य राजस्थान उद्घाटन – 18 अप्रैल 1948।
✔ उद्घाटनकर्ता – जवाहरलाल नेहरू।
✔ राजप्रमुख – महाराणा भूपाल सिंह।
✔ प्रधानमंत्री – माणिक्यलाल वर्मा।
✔ जागीरदार प्रतिनिधित्व विवाद महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य है।
➤ महत्वपूर्ण व्यक्ति
| व्यक्ति | योगदान |
|---|---|
| एन.बी. गाडगिल | मत्स्य संघ उद्घाटन |
| एन.वी. गाडगिल | राजस्थान संघ उद्घाटन |
| शोभाराम कुमावत | मत्स्य संघ के प्रधानमंत्री |
| गोकुललाल असावा | राजस्थान संघ के प्रधानमंत्री |
| महाराणा भूपाल सिंह | संयुक्त राजस्थान के राजप्रमुख |
| माणिक्यलाल वर्मा | संयुक्त राज्य राजस्थान के प्रधानमंत्री |
| वी.पी. मेनन | रियासतों के विलय के प्रमुख शिल्पकार |
| सर राममूर्ति | मेवाड़ विलय वार्ता प्रतिनिधि |
| डॉ. मोहन सिंह मेहता | मेवाड़ विलय वार्ता प्रतिनिधि |
➤ तुलना तालिका : प्रथम चरण के राज्य
| आधार | मत्स्य संघ | राजस्थान संघ | संयुक्त राज्य राजस्थान |
|---|---|---|---|
| गठन | 18 मार्च 1948 | 25 मार्च 1948 | 18 अप्रैल 1948 |
| रियासतें | 4 | 9 | मेवाड़ सहित |
| राजप्रमुख | धौलपुर महाराजा | महाराव कोटा | महाराणा भूपाल सिंह |
| प्रधानमंत्री | शोभाराम कुमावत | गोकुललाल असावा | माणिक्यलाल वर्मा |
| उद्घाटनकर्ता | एन.बी. गाडगिल | एन.वी. गाडगिल | जवाहरलाल नेहरू |
वृहत् राजस्थान का निर्माण (चतुर्थ चरण) – 30 मार्च 1949
राजस्थान एकीकरण की प्रक्रिया में 30 मार्च 1949 का दिन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन राजस्थान की प्रमुख एवं बड़ी रियासतों—जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं जैसलमेर—का संयुक्त राज्य राजस्थान में विलय हुआ और वृहत् राजस्थान (Greater Rajasthan) का निर्माण हुआ। यही कारण है कि 30 मार्च को प्रतिवर्ष “राजस्थान दिवस” मनाया जाता है।
➤ वृहत् राजस्थान की मांग –
राजस्थान के पूर्ण एकीकरण की मांग सर्वप्रथम राजनीतिक संगठनों द्वारा उठाई गई।
➤ महत्वपूर्ण प्रस्ताव
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| संगठन | अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् |
| इकाई | राजपूताना प्रान्तीय सभा |
| तिथि | 20 जनवरी 1948 |
| मांग | सभी रियासतों को मिलाकर वृहत् राजस्थान का निर्माण |
➤ भारत सरकार के समक्ष कठिनाइयाँ
वृहत् राजस्थान के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा प्रदेश की कुछ बड़ी रियासतें थीं।
➤ प्रमुख रियासतें
- जयपुर
- जोधपुर
- बीकानेर
ये रियासतें भारत सरकार द्वारा निर्धारित मापदण्डों के अनुसार स्वतंत्र इकाई के रूप में अस्तित्व बनाए रखने में सक्षम मानी जाती थीं।
➤ फिर भी विलय क्यों आवश्यक था?
1. राष्ट्रीय सुरक्षा
- जोधपुर, बीकानेर एवं जैसलमेर की सीमाएँ पाकिस्तान से लगती थीं।
- विभाजन के बाद सीमा सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन गया था।
- भविष्य में बाहरी आक्रमण का खतरा बना हुआ था।
2. थार मरुस्थल का विकास
- ये तीनों राज्य विशाल थार मरुस्थल क्षेत्र में स्थित थे।
- मरुस्थलीय विकास योजनाएँ अत्यधिक खर्चीली थीं।
- अकेले राज्यों के लिए विकास सम्भव नहीं था।
3. प्रशासनिक एकरूपता
- सम्पूर्ण राजस्थान को एक प्रशासनिक इकाई बनाना आवश्यक था।
- अलग-अलग रियासतों की व्यवस्था राष्ट्रीय एकता के अनुकूल नहीं थी।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ 20 जनवरी 1948 को वृहत् राजस्थान की मांग उठी।
✔ मांग अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् ने की।
✔ जोधपुर, बीकानेर और जयपुर स्वतंत्र रहने के इच्छुक थे।
✔ राष्ट्रीय सुरक्षा एवं मरुस्थलीय विकास विलय के प्रमुख कारण थे।
➤ वी.पी. मेनन एवं सरदार पटेल की भूमिका
प्रारम्भिक वार्ताएँ दिसम्बर 1948 सरदार पटेल की स्वीकृति से वी.पी. मेनन ने
- जयपुर
- जोधपुर
- बीकानेर
के शासकों से वार्ता प्रारम्भ की।
➤ शासकों की प्रारम्भिक स्थिति
| रियासत | प्रारम्भिक रुख |
|---|---|
| जयपुर | पृथक अस्तित्व के पक्ष में |
| जोधपुर | पृथक अस्तित्व के पक्ष में |
| बीकानेर | पृथक अस्तित्व के पक्ष में |
कई दौर की बैठकों और समझाइश के बाद वी.पी. मेनन इन शासकों को विलय के लिए तैयार करने में सफल हुए।
➤ सरदार पटेल की ऐतिहासिक घोषणा
✦ तिथि : 14 जनवरी 1949
✦ स्थान : उदयपुर
सरदार पटेल ने सार्वजनिक सभा में घोषणा की कि—
- जयपुर
- जोधपुर
- बीकानेर
ने राजस्थान में विलय स्वीकार कर लिया है। यह घोषणा राजस्थान एकीकरण के इतिहास की निर्णायक घटना मानी जाती है।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ दिसम्बर 1948 में वार्ताएँ प्रारम्भ हुईं।
✔ वी.पी. मेनन ने विलय वार्ता संचालित की।
✔ 14 जनवरी 1949 को उदयपुर में ऐतिहासिक घोषणा हुई।
✔ सरदार पटेल ने विलय की सार्वजनिक घोषणा की।
➤ दिल्ली बैठक (3 फरवरी 1949)
वृहत् राजस्थान की प्रशासनिक संरचना तय करने हेतु दिल्ली में बैठक आयोजित की गई।
➤ अध्यक्षता
- वी.पी. मेनन
➤ प्रमुख निर्णय
✦ राजप्रमुख पद
| पद | व्यक्ति |
|---|---|
| राजप्रमुख | महाराजा सवाई मानसिंह (जयपुर) |
| महाराज प्रमुख | महाराणा भूपाल सिंह (मेवाड़) |
✦ “महाराज प्रमुख” पद क्यों?
मेवाड़ के सिसोदिया वंश की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा एवं प्राचीनता को सम्मान देने हेतु यह विशेष पद सृजित किया गया।
➤ माणिक्यलाल वर्मा की भूमिका
- बैठक में उपस्थित नहीं हो सके।
- अगले दिन समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए।
- इस प्रकार वृहत् राजस्थान निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ दिल्ली बैठक – 3 फरवरी 1949।
✔ राजप्रमुख – सवाई मानसिंह।
✔ महाराज प्रमुख – महाराणा भूपाल सिंह।
✔ मेवाड़ की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा को विशेष सम्मान दिया गया।
➤ राजस्थान की राजधानी का निर्धारण
पी. सत्यनारायण राव समिति राजधानी चयन का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण था। सरदार पटेल ने विशेषज्ञ समिति गठित की।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| समिति | पी. सत्यनारायण राव समिति |
| उद्देश्य | राजधानी का चयन |
➤ समिति की सिफारिश
समिति ने— जयपुर को राजस्थान की राजधानी बनाने की अनुशंसा की।
✦ जयपुर को राजधानी बनाने के कारण
- भौगोलिक स्थिति अपेक्षाकृत उपयुक्त।
- बेहतर प्रशासनिक ढाँचा।
- यातायात एवं संचार सुविधाएँ।
- नियोजित नगर होने का लाभ।
➤ विभिन्न विभागों का वितरण
राज्य के अन्य प्रमुख नगरों का महत्व बनाए रखने हेतु महत्वपूर्ण विभाग अलग-अलग नगरों में स्थापित किए गए।
| विभाग | स्थान |
|---|---|
| उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) | जोधपुर |
| शिक्षा विभाग | बीकानेर |
| खनिज विभाग | उदयपुर |
| कस्टम एवं एक्साइज | उदयपुर |
| वन विभाग | कोटा |
| सहकारी विभाग | कोटा |
| कृषि विभाग | भरतपुर |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ राजधानी चयन समिति – पी. सत्यनारायण राव समिति।
✔ राजधानी – जयपुर।
✔ हाईकोर्ट – जोधपुर।
✔ शिक्षा विभाग – बीकानेर।
✔ कृषि विभाग – भरतपुर।
➤ वृहत् राजस्थान का उद्घाटन
✦ ऐतिहासिक उद्घाटन
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 30 मार्च 1949 |
| उद्घाटनकर्ता | सरदार वल्लभभाई पटेल |
| राज्य | वृहत् राजस्थान |
✦ प्रथम प्रधानमंत्री
| पद | व्यक्ति |
|---|---|
| प्रधानमंत्री | हीरालाल शास्त्री |
➤ राजस्थान दिवस
30 मार्च 1949 को वृहत् राजस्थान के निर्माण की स्मृति में— 30 मार्च को राजस्थान दिवस मनाया जाने लगा।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ वृहत् राजस्थान उद्घाटन – 30 मार्च 1949।
✔ उद्घाटनकर्ता – सरदार पटेल।
✔ प्रथम प्रधानमंत्री – हीरालाल शास्त्री।
✔ 30 मार्च = राजस्थान दिवस।
➤ वृहत् राजस्थान का ऐतिहासिक महत्व
✦ राजशाही का अंत वृहत् राजस्थान के निर्माण के साथ—
- सदियों पुरानी राजशाही व्यवस्था समाप्त हो गई।
- देशी रियासतों का स्वतंत्र अस्तित्व खत्म हो गया।
- लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना हुई।
➤ प्रमुख प्राचीन राजवंश
| राजवंश | रियासत |
|---|---|
| गुहिल/सिसोदिया | मेवाड़ |
| भाटी | जैसलमेर |
| कछवाहा | जयपुर |
| हाड़ा चौहान | बूंदी |
➤ रक्तहीन क्रांति (Bloodless Revolution)
राजस्थान का एकीकरण विश्व इतिहास की एक अनूठी घटना माना जाता है क्योंकि—
- विशाल क्षेत्र का एकीकरण हुआ।
- अनेक राजवंशों ने स्वेच्छा से सत्ता छोड़ी।
- किसी बड़े गृहयुद्ध या रक्तपात की आवश्यकता नहीं पड़ी।
इसी कारण इसे अक्सर—
“रक्तहीन क्रांति”
कहा जाता है।
➤ महत्वपूर्ण व्यक्ति
| व्यक्ति | योगदान |
|---|---|
| सरदार वल्लभभाई पटेल | वृहत् राजस्थान निर्माण के प्रमुख शिल्पकार |
| वी.पी. मेनन | विलय वार्ताओं के संचालक |
| सवाई मानसिंह | वृहत् राजस्थान के प्रथम राजप्रमुख |
| महाराणा भूपाल सिंह | महाराज प्रमुख |
| हीरालाल शास्त्री | वृहत् राजस्थान के प्रथम प्रधानमंत्री |
| पी. सत्यनारायण राव | राजधानी चयन समिति के अध्यक्ष |
➤ तुलना तालिका : संयुक्त राज्य राजस्थान बनाम वृहत् राजस्थान
| आधार | संयुक्त राज्य राजस्थान | वृहत् राजस्थान |
|---|---|---|
| गठन | 18 अप्रैल 1948 | 30 मार्च 1949 |
| उद्घाटनकर्ता | जवाहरलाल नेहरू | सरदार पटेल |
| राजप्रमुख | महाराणा भूपाल सिंह | सवाई मानसिंह |
| प्रधानमंत्री | माणिक्यलाल वर्मा | हीरालाल शास्त्री |
| राजधानी | निश्चित नहीं | जयपुर |
| विशेषता | मेवाड़ का विलय | बड़ी रियासतों का विलय |
राजस्थान का एकीकरण : पंचम, षष्ठ एवं सप्तम चरण
मत्स्य संघ का विलय, सिरोही प्रश्न एवं अजमेर का विलय
30 मार्च 1949 को वृहत् राजस्थान के निर्माण के बाद भी राजस्थान का एकीकरण पूर्ण नहीं हुआ था। अभी मत्स्य संघ, सिरोही तथा अजमेर-मेरवाड़ा का प्रश्न शेष था। इन समस्याओं के समाधान के साथ राजस्थान का वर्तमान स्वरूप अस्तित्व में आया। यह काल राजस्थान एकीकरण के पंचम, षष्ठ एवं सप्तम चरण का प्रतिनिधित्व करता है।
➤ राजस्थान एकीकरण के सात चरण (Exam Master Table)
| चरण | नाम | सम्मिलित रियासतें/क्षेत्र | तिथि |
|---|---|---|---|
| प्रथम | मत्स्य संघ | अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली | 18 मार्च 1948 |
| द्वितीय | राजस्थान संघ | कोटा, बूंदी, झालावाड़, टोंक, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, किशनगढ़, शाहपुरा | 25 मार्च 1948 |
| तृतीय | संयुक्त राज्य राजस्थान | मेवाड़ (उदयपुर) | 18 अप्रैल 1948 |
| चतुर्थ | वृहत् राजस्थान | जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर | 30 मार्च 1949 |
| पंचम | संयुक्त वृहत् राजस्थान | मत्स्य संघ का विलय | 15 मई 1949 |
| षष्ठ | संयुक्त राजस्थान | सिरोही राज्य का अधिकांश भाग | 26 जनवरी 1950 |
| सप्तम | पुनर्गठित राजस्थान | अजमेर, आबू रोड क्षेत्र, सुनेल टप्पा आदि | 1 नवम्बर 1956 |
पंचम चरण : संयुक्त वृहत् राजस्थान (15 मई 1949)
➤ मत्स्य संघ का विलय –
30 मार्च 1949 को वृहत् राजस्थान बनने के बाद—
- जयपुर
- जोधपुर
- बीकानेर
- जैसलमेर
भी राजस्थान का हिस्सा बन चुके थे। ऐसी स्थिति में अलवर, भरतपुर, धौलपुर एवं करौली से बने मत्स्य संघ को अलग इकाई के रूप में बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं रह गया था।
✦ डॉ. शंकरराव देव समिति
मत्स्य संघ के भविष्य का निर्णय करने हेतु भारत सरकार ने—
✦ डॉ. शंकरराव देव समिति
का गठन किया।
✦ समिति की सिफारिश
मत्स्य संघ की चारों रियासतों को राजस्थान में मिला दिया जाए।
➤ विलय
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 15 मई 1949 |
| घटना | मत्स्य संघ का वृहत् राजस्थान में विलय |
| नया नाम | संयुक्त वृहत् राजस्थान |
➤ महत्वपूर्ण तथ्य
मत्स्य संघ के प्रधानमंत्री शोभाराम कुमावत को हीरालाल शास्त्री मंत्रिमण्डल में सम्मिलित कर लिया गया।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ पंचम चरण – 15 मई 1949।
✔ मत्स्य संघ का विलय हुआ।
✔ डॉ. शंकरराव देव समिति की सिफारिश पर विलय।
✔ शोभाराम कुमावत को शास्त्री मंत्रिमंडल में शामिल किया गया।
षष्ठ चरण : सिरोही का प्रश्न (26 जनवरी 1950)
सिरोही राज्य राजस्थान एकीकरण की सबसे जटिल समस्याओं में से एक था।
➤ विवाद का कारण
माउंट आबू और उससे संबंधित क्षेत्र को लेकर—
- गुजरात के नेता
- राजस्थान के नेता
दोनों दावा कर रहे थे।
➤ रियासती विभाग का निर्णय
गुजरात के नेताओं के प्रभाव में आकर—
✦ नवम्बर 1947 रियासती विभाग ने सिरोही को राजपूताना एजेंसी से हटाकर गुजरात एजेंसी के अधीन कर दिया। इस निर्णय का सिरोही की जनता ने विरोध किया।
➤ जनता की मांग
सिरोही की जनता चाहती थी कि—
सिरोही का विलय राजस्थान में हो, बम्बई/गुजरात में नहीं।
➤ हीरालाल शास्त्री की भूमिका
✦ 10 अप्रैल 1948
हीरालाल शास्त्री ने सरदार पटेल को तार भेजकर कहा—
“हमारे लिए सिरोही का अर्थ है गोकुलभाई। बिना गोकुलभाई के हम राजस्थान को नहीं चला सकते।”
यहाँ गोकुलभाई से आशय था—
गोकुलभाई भट्ट
जो सिरोही प्रजामण्डल के प्रमुख नेता थे।
✦ नेहरू का हस्तक्षेप
18 अप्रैल 1948 को संयुक्त राज्य राजस्थान के उद्घाटन अवसर पर—
- राजस्थान के नेताओं ने
- पं. जवाहरलाल नेहरू
को सिरोही की जनता की भावनाओं से अवगत कराया।
नेहरू ने सरदार पटेल से चर्चा भी की, किन्तु तत्काल कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
➤ आन्दोलन
जब सिरोही का अधिकांश भाग गुजरात में रखने का निर्णय हुआ—
- व्यापक जनआन्दोलन प्रारम्भ हो गया।
- भारत सरकार को पुनर्विचार का आश्वासन देना पड़ा।
➤ अंतिम समाधान
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 26 जनवरी 1950 |
| घटना | सिरोही राज्य का अधिकांश भाग राजस्थान में मिला |
| अपवाद | आबू रोड क्षेत्र प्रारम्भ में बाहर रहा |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ सिरोही विवाद माउंट आबू को लेकर था।
✔ नवम्बर 1947 में सिरोही गुजरात एजेंसी के अधीन किया गया।
✔ गोकुलभाई भट्ट सिरोही आन्दोलन के प्रमुख नेता थे।
✔ 26 जनवरी 1950 को सिरोही का अधिकांश भाग राजस्थान में शामिल हुआ।
सप्तम चरण : पुनर्गठित राजस्थान (1 नवम्बर 1956)
स्वतंत्रता के बाद भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का प्रश्न उठा। इसके लिए केन्द्र सरकार ने— राज्य पुनर्गठन आयोग (1953) का गठन किया।
➤ अजमेर का प्रश्न
✦ मांग: अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् की राजपूताना प्रान्तीय सभा लगातार मांग कर रही थी कि— अजमेर-मेरवाड़ा को राजस्थान में मिलाया जाए।
✦ विरोध: अजमेर कांग्रेस नेतृत्व इस विलय के पक्ष में नहीं था।
✦ प्रमुख नेता: हरिभाऊ उपाध्याय के नेतृत्व में वहाँ कांग्रेस सरकार कार्यरत थी।
उनका तर्क था—
- छोटे राज्य प्रशासन की दृष्टि से अधिक उपयुक्त होते हैं।
➤ राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश
आयोग ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए अनुशंसा की कि— अजमेर का राजस्थान में विलय कर दिया जाए।
➤ अंतिम विलय
1 नवम्बर 1956 राजस्थान में निम्न क्षेत्र सम्मिलित किए गए—
| क्षेत्र | स्रोत |
|---|---|
| अजमेर-मेरवाड़ा | ‘ग’ श्रेणी राज्य |
| आबू रोड क्षेत्र | पूर्व बम्बई राज्य |
| माउंट आबू क्षेत्र | सिरोही क्षेत्र |
| सुनेल टप्पा | मध्य भारत |
परिणाम: 1 नवम्बर 1956 को राजस्थान का वर्तमान स्वरूप पूर्ण रूप से स्थापित हो गया। इसी के साथ मार्च 1948 में आरम्भ हुई राजस्थान एकीकरण की प्रक्रिया पूर्ण हुई।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ 1 नवम्बर 1956 – राजस्थान का अंतिम पुनर्गठन।
✔ अजमेर-मेरवाड़ा राजस्थान में मिला।
✔ माउंट आबू क्षेत्र राजस्थान में सम्मिलित हुआ।
✔ सुनेल टप्पा मध्य भारत से राजस्थान में आया।
✔ वर्तमान राजस्थान का निर्माण 1956 में पूर्ण हुआ।
➤ महत्वपूर्ण व्यक्ति
| व्यक्ति | योगदान |
|---|---|
| डॉ. शंकरराव देव | मत्स्य संघ विलय समिति |
| शोभाराम कुमावत | मत्स्य संघ के प्रधानमंत्री |
| हीरालाल शास्त्री | संयुक्त वृहत् राजस्थान के प्रधानमंत्री |
| गोकुलभाई भट्ट | सिरोही आन्दोलन के प्रमुख नेता |
| सरदार वल्लभभाई पटेल | सिरोही एवं राजस्थान एकीकरण में निर्णायक भूमिका |
| जवाहरलाल नेहरू | सिरोही प्रश्न पर हस्तक्षेप |
| हरिभाऊ उपाध्याय | अजमेर कांग्रेस नेतृत्व |
| वी.पी. मेनन | एकीकरण प्रक्रिया के प्रमुख प्रशासक |
परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य (Complete Chapter)
राजस्थान एकीकरण : महत्वपूर्ण तिथियाँ
| घटना | तिथि |
|---|---|
| प्रथम उदयपुर सम्मेलन | 25–26 जून 1946 |
| द्वितीय उदयपुर सम्मेलन | 23 मई 1947 |
| मत्स्य संघ | 18 मार्च 1948 |
| राजस्थान संघ | 25 मार्च 1948 |
| संयुक्त राज्य राजस्थान | 18 अप्रैल 1948 |
| वृहत् राजस्थान | 30 मार्च 1949 |
| संयुक्त वृहत् राजस्थान | 15 मई 1949 |
| संयुक्त राजस्थान | 26 जनवरी 1950 |
| पुनर्गठित राजस्थान | 1 नवम्बर 1956 |
राजस्थान एकीकरण के प्रमुख शिल्पकार
| व्यक्ति | योगदान |
|---|---|
| महाराणा भूपाल सिंह | राजस्थान संघ की प्रारम्भिक अवधारणा प्रस्तुत की |
| के.एम. मुंशी | संवैधानिक सलाहकार |
| सरदार वल्लभभाई पटेल | राजस्थान एकीकरण के मुख्य शिल्पकार |
| वी.पी. मेनन | विलय प्रक्रिया के प्रमुख प्रशासक |
| माणिक्यलाल वर्मा | संयुक्त राज्य राजस्थान के प्रथम प्रधानमंत्री |
| हीरालाल शास्त्री | वृहत् राजस्थान के प्रथम प्रधानमंत्री |
| शोभाराम कुमावत | मत्स्य संघ के प्रधानमंत्री |
| गोकुललाल असावा | राजस्थान संघ के प्रधानमंत्री |
| गोकुलभाई भट्ट | सिरोही आन्दोलन के प्रमुख नेता |
उद्घाटनकर्ता (Exam Favourite)
| राज्य/संघ | उद्घाटनकर्ता |
|---|---|
| मत्स्य संघ | एन.बी. गाडगिल |
| राजस्थान संघ | एन.वी. गाडगिल |
| संयुक्त राज्य राजस्थान | पं. जवाहरलाल नेहरू |
| वृहत् राजस्थान | सरदार वल्लभभाई पटेल |
राजप्रमुख एवं प्रधानमंत्री
| चरण | राजप्रमुख | प्रधानमंत्री |
|---|---|---|
| मत्स्य संघ | धौलपुर महाराजा | शोभाराम कुमावत |
| राजस्थान संघ | महाराव कोटा | गोकुललाल असावा |
| संयुक्त राज्य राजस्थान | महाराणा भूपाल सिंह | माणिक्यलाल वर्मा |
| वृहत् राजस्थान | सवाई मानसिंह | हीरालाल शास्त्री |
समितियाँ एवं आयोग
| समिति/आयोग | उद्देश्य |
|---|---|
| पी. सत्यनारायण राव समिति | राजस्थान की राजधानी का चयन |
| डॉ. शंकरराव देव समिति | मत्स्य संघ के विलय की सिफारिश |
| राज्य पुनर्गठन आयोग | राजस्थान के अंतिम पुनर्गठन की सिफारिश |
राजधानी एवं विभाग
| विभाग | स्थान |
|---|---|
| राजधानी | जयपुर |
| उच्च न्यायालय | जोधपुर |
| शिक्षा विभाग | बीकानेर |
| कृषि विभाग | भरतपुर |
| वन विभाग | कोटा |
| सहकारी विभाग | कोटा |
| खनिज विभाग | उदयपुर |
| कस्टम एवं एक्साइज | उदयपुर |
बार-बार पूछे जाने वाले तथ्य
- राजस्थान दिवस – 30 मार्च
- राजस्थान एकीकरण का प्रथम चरण – मत्स्य संघ (18 मार्च 1948)
- राजस्थान का अंतिम स्वरूप – 1 नवम्बर 1956
- “डेथ वारंट” कथन – महारावल चन्द्रवीर सिंह (बाँसवाड़ा)
- “रक्तहीन क्रांति” – राजस्थान एकीकरण
- आजीवन राजप्रमुख – महाराणा भूपाल सिंह
- प्रथम राजप्रमुख (वृहत् राजस्थान) – सवाई मानसिंह
- प्रथम प्रधानमंत्री (वृहत् राजस्थान) – हीरालाल शास्त्री
- सिरोही आन्दोलन के नेता – गोकुलभाई भट्ट
सम्पूर्ण राजस्थान एकीकरण : अंतिम Revision Chart
| चरण | नाम | सम्मिलित रियासतें/क्षेत्र | तिथि |
|---|---|---|---|
| प्रथम | मत्स्य संघ | अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली | 18 मार्च 1948 |
| द्वितीय | राजस्थान संघ | कोटा, बूंदी, झालावाड़, टोंक, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, किशनगढ़, शाहपुरा | 25 मार्च 1948 |
| तृतीय | संयुक्त राज्य राजस्थान | मेवाड़ (उदयपुर) राजस्थान संघ में सम्मिलित | 18 अप्रैल 1948 |
| चतुर्थ | वृहत् राजस्थान | जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर का विलय | 30 मार्च 1949 |
| पंचम | संयुक्त वृहत् राजस्थान | मत्स्य संघ का वृहत् राजस्थान में विलय | 15 मई 1949 |
| षष्ठ | संयुक्त राजस्थान | सिरोही राज्य का अधिकांश भाग सम्मिलित | 26 जनवरी 1950 |
| सप्तम | पुनर्गठित राजस्थान | अजमेर-मेरवाड़ा, आबू रोड क्षेत्र, माउंट आबू, सुनेल टप्पा आदि का विलय | 1 नवम्बर 1956 |
राजस्थान का एकीकरण भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और अद्वितीय राजनीतिक प्रक्रियाओं में से एक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय वर्तमान राजस्थान क्षेत्र 19 रियासतों, 3 ठिकानों तथा अजमेर-मेरवाड़ा जैसे पृथक प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित था। दूरदर्शी नेतृत्व, जनआन्दोलन, प्रजामण्डलों के संघर्ष तथा सरदार वल्लभभाई पटेल एवं वी.पी. मेनन के कुशल प्रयासों के परिणामस्वरूप इन सभी इकाइयों का क्रमिक विलय संभव हो सका।
18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ के गठन से प्रारम्भ हुई यह प्रक्रिया 1 नवम्बर 1956 को पुनर्गठित राजस्थान के निर्माण के साथ पूर्ण हुई। इस दौरान राजस्थान ने मत्स्य संघ, राजस्थान संघ, संयुक्त राज्य राजस्थान, वृहत् राजस्थान तथा संयुक्त वृहत् राजस्थान जैसे विभिन्न चरणों से गुजरते हुए अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त किया।
राजस्थान का एकीकरण केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं था, बल्कि यह सदियों पुरानी रियासती व्यवस्था से लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की ओर संक्रमण का प्रतीक भी था। विश्व इतिहास में इतने विशाल भूभाग, अनेक प्राचीन राजवंशों और विभिन्न राजनीतिक इकाइयों का अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण ढंग से एकीकरण अत्यंत दुर्लभ है। इसी कारण राजस्थान एकीकरण को प्रायः “रक्तहीन क्रांति” की संज्ञा दी जाती है।
