राजस्थान में जनजागृति, राजनीतिक चेतना एवं प्रजामण्डल आन्दोलन
➤ परिचय: 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के बावजूद राजस्थान में राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक जागृति का विकास प्रारम्भ हो गया। यह जागृति तत्काल राजनीतिक आन्दोलन के रूप में नहीं उभरी, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, साहित्यिक तथा आर्थिक कारकों के माध्यम से विकसित हुई। आगे चलकर यही चेतना प्रजामण्डल आन्दोलन, किसान आन्दोलन और उत्तरदायी शासन की मांग का आधार बनी।
पृष्ठभूमि : राजस्थान में जनजागृति के प्रमुख कारण
1. सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक गौरव की भावना
हिन्दी, गुजराती तथा बांग्ला साहित्य में राजस्थानी वीरों एवं चरित्रों के वर्णन ने राजस्थान की जनता को अपने गौरवशाली अतीत का बोध कराया।
➤ प्रभाव
- प्राचीन गौरव के प्रति जागरूकता बढ़ी।
- आत्मसम्मान एवं राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित हुई।
मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ सांस्कृतिक पुनर्जागरण ने राजनीतिक जागृति का मार्ग प्रशस्त किया।
✔ साहित्य ने राजस्थान के गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित किया।
2. आर्य समाज एवं धार्मिक सुधार आन्दोलन
राजस्थान में राष्ट्रीय चेतना जगाने में आर्य समाज की शाखाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
➤ प्रमुख व्यक्तित्व
| व्यक्तित्व | योगदान |
|---|---|
| स्वामी दयानंद सरस्वती | स्वदेशी, राष्ट्रीयता एवं सामाजिक सुधार का प्रचार |
| स्वामी विवेकानंद | आत्मगौरव एवं राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ आर्य समाज ने राष्ट्रीय चेतना का आधार तैयार किया।
✔ स्वामी दयानंद को राजस्थान में राजनीतिक जागृति का अग्रदूत माना जाता है।
3. साहित्य एवं पत्रकारिता का योगदान
राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में समाचार-पत्रों और साहित्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➤ प्रमुख समाचार पत्र
| समाचार पत्र | विशेषता |
|---|---|
| राजस्थान समाचार | राष्ट्रीय चेतना का प्रचार |
| देश हितैषी | राजनीतिक जागृति |
| परोपकारक | सामाजिक एवं राष्ट्रीय विचार |
| सज्जन कीर्ति सुधाकर | उदयपुर से प्रकाशित |
| राजस्थान टाइम्स | 1885 ई., अजमेर से अंग्रेजी साप्ताहिक |
➤ अन्य योगदान
- बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के “वन्देमातरम्” ने राष्ट्रीय भावना को प्रेरित किया।
- समाचार-पत्रों के माध्यम से राजनीतिक चेतना का प्रसार हुआ।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ 1885 ई. में “राजस्थान टाइम्स” का प्रकाशन प्रारम्भ।
✔ पत्रकारिता राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रमुख माध्यम बनी।
4. छप्पनिया अकाल (1899-1900 ई.)
भीषण अकाल के दौरान अंग्रेजों की उपेक्षापूर्ण नीति ने जनता में असंतोष पैदा किया।
➤ परिणाम
- अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध बढ़ा।
- स्वतंत्रता प्राप्ति के विचार मजबूत हुए।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ छप्पनिया अकाल ने अंग्रेज विरोधी भावना को प्रबल बनाया।
✔ आर्थिक संकट राजनीतिक असंतोष का कारण बना।
5. केसरी सिंह बारहट एवं “चेतावनी रा चूंगटियाँ”
➤ घटना: जब महाराणा फतेह सिंह दिल्ली दरबार में भाग लेने जा रहे थे, तब शाहपुरा के क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहट ने उन्हें “चेतावनी रा चूंगटियाँ” भेंट की।
➤ परिणाम –
- महाराणा फतेह सिंह ने दिल्ली दरबार में शामिल होने से इनकार कर दिया।
- राजस्थान में आत्मसम्मान एवं राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ “चेतावनी रा चूंगटियाँ” – केसरी सिंह बारहट।
✔ सम्बंधित व्यक्ति – महाराणा फतेह सिंह (मेवाड़)।
6. अंग्रेजों की आर्थिक नीतियाँ
➤ प्रभाव
- पारंपरिक उद्योगों का पतन।
- बेरोजगारी में वृद्धि।
- आर्थिक शोषण से असंतोष का वातावरण।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ आर्थिक शोषण राजनीतिक जागरण का महत्वपूर्ण कारण बना।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राजस्थान
✦ कांग्रेस का प्रभाव
➤ प्रमुख घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना |
| 1887 | गवर्नमेंट कॉलेज, अजमेर के छात्रों ने कांग्रेस कमेटी बनाई |
| 1888 | इलाहाबाद अधिवेशन में राजस्थान के प्रतिनिधियों की भागीदारी |
➤ इलाहाबाद अधिवेशन (1888)
राजस्थान से प्रतिनिधि:
- गोपीनाथ माथुर
- किशनलाल
- हरविलास शारदा
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ राजस्थान का कांग्रेस से औपचारिक सम्पर्क 1888 ई. में हुआ।
✔ हरविलास शारदा प्रमुख कांग्रेस कार्यकर्ता थे।
राजपूताना मध्य भारत सभा
➤ स्थापना
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 1918 ई. |
| स्थान | दिल्ली, चांदनी चौक स्थित मारवाड़ी पुस्तकालय |
| प्रमुख संस्थापक | गणेशशंकर विद्यार्थी, विजयसिंह पथिक, जमनालाल बजाज, चांदकरण शारदा, गिरधर शर्मा, स्वामी नरसिंहदेव सरस्वती |
➤ उद्देश्य
- राजनीतिक चेतना का विकास
- राजस्थान की समस्याओं को राष्ट्रीय मंच पर उठाना
➤ प्रमुख अधिवेशन
| अधिवेशन | वर्ष | स्थान | अध्यक्ष |
|---|---|---|---|
| प्रथम | 1918 | दिल्ली | – |
| द्वितीय | 1919 | अमृतसर | – |
| तृतीय | मार्च 1920 | अजमेर | जमनालाल बजाज |
| चतुर्थ | दिसम्बर 1920 | नागपुर | गणेशनारायण सोमाणी (कार्यवाहक सभापति) |
➤ नागपुर अधिवेशन (1920) की उपलब्धियाँ
- राजस्थान के किसानों की स्थिति पर प्रदर्शनी।
- कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित किया कि राजाओं को प्रजा को शासन में भागीदारी देनी चाहिए।
- सभा को कांग्रेस की सहयोगी संस्था का दर्जा मिला।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ स्थापना – 1918, दिल्ली।
✔ तृतीय अधिवेशन – अजमेर, अध्यक्ष जमनालाल बजाज।
✔ चतुर्थ अधिवेशन – नागपुर (1920)।
राजस्थान सेवा संघ
➤ स्थापना
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 1919 ई. |
| स्थान | वर्धा |
| संस्थापक | विजयसिंह पथिक, रामनारायण चौधरी, हरिभाई किंकर |
➤ उद्देश्य
- जनता की समस्याओं का समाधान।
- शासकों एवं प्रजा में सौहार्द स्थापित करना।
- राजनीतिक चेतना का विकास।
✦ प्रमुख कार्य
➤ किसान आन्दोलन
- बिजौलिया आन्दोलन
- बेगूं आन्दोलन
➤ जनजातीय आन्दोलन
- भील आन्दोलन (उदयपुर एवं सिरोही)
➤ अन्य कार्य
- पुलिस अत्याचारों का विरोध
- राजनीतिक जागरण
➤ पतन
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1924 | पथिक की गिरफ्तारी |
| 1924 | तरुण राजस्थान प्रकरण |
| 1928-29 | संघ पूर्णतः प्रभावहीन |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ स्थापना – 1919, वर्धा।
✔ संस्थापक – पथिक, रामनारायण चौधरी, हरिभाई किंकर।
✔ बिजौलिया आन्दोलन का प्रमुख मार्गदर्शक संगठन।
असहयोग आन्दोलन (1921) और राजस्थान
➤ प्रभाव
महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन का प्रभाव राजस्थान के अधिकांश राज्यों में दिखाई दिया।
✦ जोधपुर
भँवरलाल सर्राफ
- हाथ में तिरंगा लेकर नगर भ्रमण।
- झण्डे पर गांधीजी का चित्र और “स्वराज” अंकित।
✦ टोंक
गिरफ्तार नेता
- मौलवी अब्दुल रहीम
- सैयद जुबेर मियाँ
- सैयद इस्माइल मियाँ
- काजी महमूद अय्यूब
✦ जयपुर
जमनालाल बजाज का योगदान
- “रायबहादुर” की उपाधि लौटाई।
- ₹1 लाख तिलक स्वराज कोष में दिये।
- ₹11,000 मुस्लिम लीग को दिये।
- कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य बने।
✦ बीकानेर
गतिविधियाँ
- मुक्ताप्रसाद वकील द्वारा विदेशी वस्त्रों की होली।
- खादी भण्डार की स्थापना।
- पुस्तकालय एवं वाचनालयों की स्थापना।
➤ प्रमुख संस्थाएँ
| संस्था | स्थान |
|---|---|
| सर्वहितकारिणी सभा | चूरू |
| विद्या प्रचारिणी सभा | सुजानगढ़, रतनगढ़ |
अजमेर राजनीतिक सम्मेलन (15 मार्च 1921)
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| सम्मेलन | द्वितीय राजनीतिक सम्मेलन |
| मुख्य अतिथि | मोतीलाल नेहरू |
| अध्यक्ष | मौलाना शौकत अली |
➤ प्रमुख निर्णय
- विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार।
- स्वदेशी का प्रचार।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ राजस्थान में असहयोग आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा।
✔ जमनालाल बजाज ने रायबहादुर की उपाधि लौटाई।
✔ टोंक में सबसे अधिक दमनात्मक कार्यवाही हुई।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की स्थिति
✦ देशी राज्यों और ब्रिटिश सरकार का गठबंधन
कारण
- प्रथम विश्वयुद्ध में राजाओं का सहयोग।
- ब्रिटिश सरकार का संरक्षण।
➤ प्रमुख घटना
| संस्था | स्थापना |
|---|---|
| नरेन्द्र मण्डल (Chamber of Princes) | प्रथम विश्वयुद्ध के बाद |
➤ बीकानेर के महाराजा गंगासिंह
- साम्राज्यिक युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य।
- साम्राज्यिक युद्ध सम्मेलन के सदस्य।
- पेरिस शांति सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि।
राज्यों की प्रतिक्रिया एवं दमन
✦ बीकानेर
महाराजा गंगासिंह ने
- शिवमूर्ति सिंह
- संपूर्णानन्द
- आनन्द वर्मा
को स्वदेशी अपनाने और तिलक स्वराज कोष में योगदान देने के कारण निलंबित कर दिया।
✦ जोधपुर
सर प्रतापसिंह ने विदेशी वस्तुओं को प्रोत्साहन दिया।
✦ मेवाड़
महाराणा फतेह सिंह
- असहयोग आन्दोलन के प्रति सहानुभूति।
28 जुलाई 1921
- शासनाधिकार युवराज भूपाल सिंह को सौंपे।
परिणाम
- अंग्रेजी प्रभाव वाला मंत्रिमंडल बना।
- राजस्व विभाग अंग्रेज अधिकारी ट्रेंच को दिया गया।
अंग्रेज मंत्रियों की नियुक्ति
➤ उद्देश्य
राज्यों में बढ़ती राजनीतिक चेतना पर नियंत्रण स्थापित करना।
➤ जिन राज्यों में अंग्रेज मंत्री नियुक्त हुए
- जयपुर
- जोधपुर
- बूंदी
- सिरोही
➤ परिणाम
- स्थानीय प्रतिभा की उपेक्षा।
- प्रशासन नौकरशाहों के हाथों में गया।
- जनता में असंतोष बढ़ा।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ अंग्रेज मंत्री नियुक्ति का उद्देश्य राजनीतिक गतिविधियों को नियंत्रित करना था।
✔ स्थानीय शिक्षित वर्ग में असंतोष बढ़ा।
➤ महत्वपूर्ण व्यक्ति
| व्यक्तित्व | योगदान |
|---|---|
| स्वामी दयानंद सरस्वती | राष्ट्रीय चेतना |
| स्वामी विवेकानंद | आत्मगौरव एवं राष्ट्रवाद |
| केसरी सिंह बारहट | चेतावनी रा चूंगटियाँ |
| महाराणा फतेह सिंह | दिल्ली दरबार का बहिष्कार |
| विजयसिंह पथिक | किसान एवं जनजागरण आन्दोलन |
| रामनारायण चौधरी | राजस्थान सेवा संघ |
| जमनालाल बजाज | असहयोग आन्दोलन |
| गणेशशंकर विद्यार्थी | राजपूताना मध्य भारत सभा |
| हरविलास शारदा | कांग्रेस प्रतिनिधि |
| भँवरलाल सर्राफ | जोधपुर में असहयोग आन्दोलन |
परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
- चेतावनी रा चूंगटियाँ – केसरी सिंह बारहट द्वारा रचित।
- राजपूताना मध्य भारत सभा – 1918, दिल्ली।
- राजस्थान सेवा संघ – 1919, वर्धा।
- तृतीय अधिवेशन (राजपूताना मध्य भारत सभा) – अजमेर, 1920।
- जमनालाल बजाज ने रायबहादुर की उपाधि लौटाई।
- अजमेर राजनीतिक सम्मेलन – 15 मार्च 1921।
- नरेन्द्र मण्डल – प्रथम विश्वयुद्ध के बाद स्थापित।
- महाराजा गंगासिंह पेरिस शांति सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि रहे।
- भँवरलाल सर्राफ – जोधपुर में असहयोग आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता।
- 1928-29 तक राजस्थान सेवा संघ प्रभावहीन हो गया।
Quick Revision Points
✔ 1857 के बाद राष्ट्रीय चेतना का विकास।
✔ आर्य समाज और पत्रकारिता ने जनजागरण को गति दी।
✔ छप्पनिया अकाल ने अंग्रेज विरोधी भावना को बढ़ाया।
✔ केसरी सिंह बारहट की “चेतावनी रा चूंगटियाँ” ऐतिहासिक रचना।
✔ 1918 – राजपूताना मध्य भारत सभा।
✔ 1919 – राजस्थान सेवा संघ।
✔ 1921 – असहयोग आन्दोलन का राजस्थान में विस्तार।
✔ जमनालाल बजाज राजस्थान में गांधीवादी आन्दोलन के प्रमुख नेता।
✔ शिक्षित वर्ग ने उत्तरदायी शासन की मांग उठाई।
✔ यही जनजागृति आगे चलकर प्रजामण्डल आन्दोलन का आधार बनी।
संभावित परीक्षा प्रश्न: वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs)
- “चेतावनी रा चूंगटियाँ” के रचयिता कौन थे?
- राजस्थान सेवा संघ की स्थापना कहाँ हुई?
- राजपूताना मध्य भारत सभा की स्थापना कब हुई?
- रायबहादुर की उपाधि किसने लौटाई?
- 15 मार्च 1921 का राजनीतिक सम्मेलन कहाँ आयोजित हुआ?
- राजस्थान टाइम्स का प्रकाशन किस वर्ष प्रारम्भ हुआ?
- बिजौलिया आन्दोलन का मार्गदर्शन किस संगठन ने किया?
- नरेन्द्र मण्डल की स्थापना किस युद्ध के बाद हुई?
वर्णनात्मक प्रश्न (RAS Mains)
- राजस्थान में जनजागृति के प्रमुख कारणों का विश्लेषण कीजिए।
- राजपूताना मध्य भारत सभा के गठन, उद्देश्यों एवं योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
- राजस्थान सेवा संघ की भूमिका एवं उपलब्धियों का समालोचनात्मक विवेचन कीजिए।
- असहयोग आन्दोलन का राजस्थान पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
- राजस्थान में राजनीतिक चेतना के विकास में पत्रकारिता एवं साहित्य के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
- राजस्थान में प्रजामण्डल आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए।
राजस्थान में प्रजामण्डलों की स्थापना एवं जन आन्दोलन (1927-1949)
➤ परिचय: राजस्थान में राजनीतिक चेतना का विकास धीरे-धीरे सामाजिक सुधार, किसान आन्दोलन, जनजातीय आन्दोलन तथा राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रभाव से हुआ। इस चेतना का संगठित स्वरूप प्रजामण्डल आन्दोलन के रूप में सामने आया। प्रजामण्डलों का मुख्य उद्देश्य रियासतों में उत्तरदायी शासन, नागरिक अधिकार, प्रतिनिधि संस्थाओं की स्थापना तथा निरंकुश शासन का विरोध था।
राजस्थान का प्रजामण्डल आन्दोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अभिन्न अंग था, जिसने अंततः राजस्थान के एकीकरण एवं लोकतांत्रिक शासन की नींव रखी।
➤ राजस्थान के स्वतंत्रता संघर्ष के चरण
| चरण | अवधि | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| प्रथम चरण | 1927 ई. से पूर्व | सामाजिक सुधार, किसान एवं जनजातीय आन्दोलन |
| द्वितीय चरण | 1927-1938 ई. | राजनीतिक संगठनों का निर्माण एवं जनचेतना |
| तृतीय चरण | 1938-1949 ई. | प्रजामण्डलों की स्थापना एवं उत्तरदायी शासन हेतु संघर्ष |
➤ महत्वपूर्ण घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1927 | ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस की स्थापना |
| 1938 | हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन |
| 1938 के बाद | विभिन्न राज्यों में प्रजामण्डलों की स्थापना |
➤ पृष्ठभूमि : प्रजामण्डलों से पूर्व के संगठन
| संगठन | स्थापना वर्ष | प्रमुख उद्देश्य |
|---|---|---|
| राजपूताना मध्य भारत सभा | 1918 | राजनीतिक चेतना |
| राजस्थान सेवा संघ | 1919 | जन समस्याओं का समाधान |
| अखिल भारतीय देशी लोक परिषद | 1920 | देशी राज्यों में राजनीतिक अधिकार |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ 1938 के हरिपुरा अधिवेशन ने प्रजामण्डल आन्दोलन को वैचारिक आधार दिया।
✔ प्रजामण्डल आन्दोलन का उद्देश्य उत्तरदायी शासन प्राप्त करना था।
राजस्थान में प्रजामण्डलों की स्थापना
| राज्य | संगठन | स्थापना वर्ष |
|---|---|---|
| जयपुर | जयपुर प्रजामण्डल | 1931 |
| मारवाड़ | मारवाड़ प्रजामण्डल | 1934 |
| कोटा | कोटा प्रजामण्डल | 1938 |
| मेवाड़ | मेवाड़ प्रजामण्डल | 1938 |
| अलवर | अलवर राज्य प्रजामण्डल | 1938 |
| भरतपुर | भरतपुर प्रजामण्डल | 1939 |
| बूंदी | बूंदी प्रजामण्डल | 1944 |
| जैसलमेर | जैसलमेर प्रजामण्डल | 1945 |
| सिरोही | सिरोही लोक परिषद | 1933 |
| बीकानेर | बीकानेर लोक परिषद | 1936 |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ राजस्थान का पहला प्रजामण्डल – जयपुर (1931)।
✔ मेवाड़ एवं कोटा में प्रजामण्डल – 1938।
✔ जैसलमेर प्रजामण्डल – 1945।
जोधपुर (मारवाड़) में जन आन्दोलन
➤ प्रमुख नेता
✦ जयनारायण व्यास
मारवाड़ का जन आन्दोलन राजस्थान का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक आन्दोलन माना जाता है।
➤ प्रमुख घटनाएँ
✦ 1938 : सुभाषचन्द्र बोस का जोधपुर आगमन
- त्याग एवं बलिदान का आह्वान।
- जनचेतना में वृद्धि।
✦ 1940
- लोक परिषद को गैरकानूनी घोषित किया गया।
- अनेक नेताओं की गिरफ्तारी।
भारत छोड़ो आन्दोलन (1942)
✦ गिरफ्तार डिक्टेटर
| क्रम | नाम |
|---|---|
| 6वें | फूलचन्द बाफना |
| 7वें | शिवदयाल दवे |
| 8वें | तुलसीदास राठी |
महिलाओं की भूमिका
✦ प्रमुख महिला कार्यकर्ता
- रमादेवी
- कृष्णा कुमारी
- दयावती
- सूरजदेवी माथुर
- सावित्रीदेवी माथुर
➤ योगदान
- प्रभात फेरियाँ
- धरना प्रदर्शन
- उत्तरदायी शासन के गीत
- ब्रिटिश विरोधी नारे
डाबरा काण्ड (अक्टूबर 1946)
➤ महत्व
- जागीरदारों द्वारा लोक परिषद कार्यकर्ताओं पर अत्याचार।
- राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना।
➤ परिणाम
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1948 | जयनारायण व्यास मंत्रिमण्डल का गठन |
| मार्च 1949 | वृहत्तर राजस्थान में विलय |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ राजस्थान का प्रथम संगठित जन आन्दोलन – मारवाड़।
✔ डाबरा काण्ड – 1946।
✔ जयनारायण व्यास स्वतंत्र मारवाड़ के प्रथम लोकप्रिय नेता बने।
बीकानेर में जन आन्दोलन
➤ प्रमुख नेता
✦ स्वामी गोपालदास
अन्य नेता:
- मधाराम वैद्य
- शार्दूल सिंह (शासक)
➤ बीकानेर षड्यंत्र केस
- स्वामी गोपालदास और साथियों को फँसाया गया।
- जेल में यातनाएँ दी गईं।
➤ संवैधानिक सुधार
✦ 1947
बीकानेर एक्ट पारित
✦ संस्थाएँ
- द्विसदनीय व्यवस्थापिका
- लोक सेवा आयोग
- हाईकोर्ट
✦ 1948
- राजनीतिक बंदियों की रिहाई।
- उत्तरदायी सरकार का आश्वासन।
संविधान सभा में भागीदारी
- प्रतिनिधि: के.एम. पणिक्कर
- तिथि: 28 अप्रैल 1947
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ बीकानेर एक्ट – 1947।
✔ संविधान सभा में प्रतिनिधि भेजने वाला अग्रणी राज्य।
✔ के.एम. पणिक्कर – संविधान सभा प्रतिनिधि।
जैसलमेर में जन आन्दोलन
➤ विशेषताएँ
- राजनीतिक चेतना का अत्यधिक अभाव।
- मरुस्थलीय क्षेत्र एवं संचार साधनों की कमी।
➤ प्रमुख नेता: सागरमल गोपा
➤ प्रमुख घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1920 | विजय समाचार पत्र प्रारम्भ |
| 1932 | माहेश्वरी समाज नवयुवक मण्डल |
| 4 अप्रैल 1946 | सागरमल गोपा की जेल में हत्या |
| 1945 | जैसलमेर प्रजामण्डल की स्थापना |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ सागरमल गोपा जैसलमेर जन आन्दोलन के शहीद माने जाते हैं।
✔ जैसलमेर प्रजामण्डल का गठन जोधपुर में हुआ।
मेवाड़ में जन आन्दोलन
➤ पृष्ठभूमि
- बिजौलिया आन्दोलन
- बेगूं आन्दोलन
इन्हीं आंदोलनों ने मेवाड़ में राजनीतिक चेतना विकसित की।
➤ मेवाड़ प्रजामण्डल
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | अप्रैल 1938 |
| संस्थापक | माणिक्यलाल वर्मा |
➤ प्रमुख घटनाएँ
✦ 1939
- माणिक्यलाल वर्मा गिरफ्तार।
✦ 1941
- प्रतिबंध हटाया गया।
- प्रथम अधिवेशन आयोजित।
✦ उपस्थित नेता
- आचार्य जे.बी. कृपलानी
- विजयलक्ष्मी पंडित
➤ सामाजिक सुधार
| संस्था | प्रमुख व्यक्ति |
|---|---|
| मेवाड़ हरिजन सेवा संघ | मोहनलाल सुखाड़िया |
| आदिवासी कल्याण कार्य | बलवन्त सिंह मेहता |
✦ 1945: अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद का सातवाँ अधिवेशन उदयपुर में हुआ।
✦ अध्यक्ष: जवाहरलाल नेहरू
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ मेवाड़ प्रजामण्डल – अप्रैल 1938।
✔ प्रथम अधिवेशन – 1941।
✔ सातवाँ लोक परिषद अधिवेशन – उदयपुर, 1945।
कोटा में जन आन्दोलन
✦ प्रमुख नेता
| नेता | योगदान |
|---|---|
| पं. नयनूराम शर्मा | बेगार विरोधी आन्दोलन |
| पं. अभिन्न हरि | कोटा प्रजामण्डल |
| विजय सिंह पथिक | मार्गदर्शक |
➤ प्रमुख घटनाएँ
✦ 1934
- हाड़ौती प्रजामण्डल की स्थापना।
✦ 1939
- कोटा राज्य प्रजामण्डल की स्थापना।
✦ 1945
- विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी।
- कोतवाली पर तिरंगा फहराया गया।
✦ 16 अगस्त 1945
- जनता एवं महाराव भीम सिंह में समझौता।
✦ परिणाम: स्वतंत्रता के बाद
➤ महाराव भीम सिंह
- राजस्थान एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका।
- राजस्थान के उप-राजप्रमुख बने।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ हाड़ौती प्रजामण्डल – 1934।
✔ कोटा में 1945 का आन्दोलन अत्यंत उग्र रहा।
✔ महाराव भीम सिंह – राजस्थान के प्रथम उपराजप्रमुख।
बूंदी में जन आन्दोलन
➤ प्रमुख नेता
- विजय सिंह पथिक
- रामनारायण चौधरी
- कान्तिलाल
- ऋषिदत्त मेहता
- बृजसुन्दर शर्मा
➤ प्रमुख घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1931 | बूंदी प्रजामण्डल स्थापना |
| 1936 | राजस्थान समाचार पर प्रतिबंध |
| 1937 | ऋषिदत्त मेहता निर्वासित |
| 1942 | आन्दोलन पुनः प्रारम्भ |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ बूंदी में आन्दोलन का प्रमुख मुद्दा – बेगार एवं कर वृद्धि।
✔ नमाणा ग्राम में पुलिस दमन प्रसिद्ध है।
जयपुर में जन आन्दोलन
➤ प्रमुख नेता
| नेता | योगदान |
|---|---|
| अर्जुनलाल सेठी | जनजागरण के अग्रदूत |
| जमनालाल बजाज | चरखा संघ (1927) |
| हीरालाल शास्त्री | प्रजामण्डल अध्यक्ष |
| बाबा हरिश्चन्द्र | उग्रवादी धारा |
➤ जयपुर प्रजामण्डल
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 1931 |
| संस्थापक | कपूरचन्द पाटनी |
➤ 1939 समझौता
परिणाम:
- प्रजामण्डल को मान्यता।
- जमनालाल बजाज की रिहाई।
1942 समझौता (शास्त्री – मिर्जा इस्माइल)
➤ प्रमुख बिंदु
- युद्ध हेतु जन-धन सहायता नहीं।
- युद्ध विरोधी अभियान की अनुमति।
- बाहरी आन्दोलनकारियों के प्रवेश पर रोक नहीं।
- उत्तरदायी शासन की दिशा में कदम।
- महाराजा के विरुद्ध सीधा आन्दोलन नहीं।
➤ संवैधानिक सुधार
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1945 | द्विसदनीय व्यवस्थापिका |
| 1947 | उत्तरदायी शासन |
| 1949 | राजस्थान संघ में विलय |
➤ स्वतंत्र राजस्थान में भूमिका
| पद | व्यक्ति |
|---|---|
| राजप्रमुख | मानसिंह |
| महाराजप्रमुख | उदयपुर महाराणा |
| उपराजप्रमुख | महाराव भीम सिंह |
| मुख्यमंत्री | हीरालाल शास्त्री |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ जयपुर प्रजामण्डल – 1931।
✔ 1942 का समझौता अत्यंत महत्वपूर्ण।
✔ हीरालाल शास्त्री – राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री।
➤ अलवर, भरतपुर, धौलपुर एवं करौली
| राज्य | प्रमुख नेता | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| अलवर | हरिनारायण शर्मा | 1938 प्रजामण्डल |
| भरतपुर | गोपीलाल यादव, मास्टर आदित्येन्द्र | 1938 सत्याग्रह |
| धौलपुर | कृष्णदत्त पालीवाल | 1936 प्रजामण्डल |
| करौली | त्रिलोकचन्द माथुर | 1938 प्रजामण्डल |
➤ मत्स्य संघ में विलय
| राज्य | विलय |
|---|---|
| अलवर | मत्स्य संघ |
| भरतपुर | मत्स्य संघ |
| धौलपुर | मत्स्य संघ |
| करौली | मत्स्य संघ |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ मत्स्य संघ के चार घटक – अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली।
✔ भरतपुर प्रजामण्डल का प्रथम सम्मेलन 1940 में हुआ।
दक्षिणी राजस्थान में जन आन्दोलन
➤ प्रमुख नेता एवं क्षेत्र
| क्षेत्र | नेता |
|---|---|
| डूंगरपुर | भोगीलाल पंड्या |
| बांसवाड़ा | भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी |
| सिरोही | गोकुल भाई भट्ट |
| प्रतापगढ़ | अमृतलाल पायक |
| डूंगरपुर | हरिदेव जोशी |
| डूंगरपुर | गौरीशंकर आचार्य |
➤ विशेष तथ्य
- भोगीलाल पंड्या को “वागड़ का गांधी” कहा जाता है।
- 1945 में डूंगरपुर प्रजामण्डल की स्थापना।
परीक्षा दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य
➤ स्थापना वर्ष (बार-बार पूछे जाते हैं)
| प्रजामण्डल | वर्ष |
|---|---|
| जयपुर | 1931 |
| मारवाड़ | 1934 |
| मेवाड़ | 1938 |
| कोटा | 1938 |
| अलवर | 1938 |
| भरतपुर | 1939 |
| बूंदी | 1944 |
| जैसलमेर | 1945 |
महत्वपूर्ण व्यक्तित्व – एक पंक्ति में
| व्यक्तित्व | पहचान |
|---|---|
| जयनारायण व्यास | मारवाड़ आन्दोलन |
| माणिक्यलाल वर्मा | मेवाड़ प्रजामण्डल |
| हीरालाल शास्त्री | जयपुर प्रजामण्डल |
| सागरमल गोपा | जैसलमेर जन आन्दोलन |
| स्वामी गोपालदास | बीकानेर जनजागरण |
| नयनूराम शर्मा | कोटा जन आन्दोलन |
| हरिनारायण शर्मा | अलवर आन्दोलन |
| भोगीलाल पंड्या | वागड़ का गांधी |
प्रजामण्डलों का मूल्यांकन एवं राजस्थान में जनजागृति आन्दोलन का समग्र विश्लेषण
➤ परिचय
राजस्थान में प्रजामण्डल आन्दोलन केवल राजनीतिक अधिकार प्राप्ति का आन्दोलन नहीं था, बल्कि यह सामाजिक जागरण, राजनीतिक चेतना, नागरिक अधिकारों, उत्तरदायी शासन तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना का व्यापक जनआन्दोलन था। प्रजामण्डलों ने रियासती राज्यों की निरंकुश व्यवस्था को चुनौती देकर जनता को संगठित किया तथा राजस्थान को लोकतांत्रिक युग में प्रवेश कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रजामण्डलों का मूल्यांकन
1. राजनीतिक जागृति का विकास
प्रजामण्डलों का सबसे बड़ा योगदान राजस्थान की जनता में राजनीतिक चेतना उत्पन्न करना था।
➤ प्रमुख उपलब्धियाँ
- जनता को नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया।
- उत्तरदायी शासन की मांग को जन आन्दोलन बनाया।
- निरंकुश एवं सामन्ती शासन का विरोध किया।
- जनता को राजनीतिक भागीदारी के लिए तैयार किया।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ प्रजामण्डलों ने जनता को “प्रजा” से “नागरिक” बनने की दिशा दी।
✔ राजनीतिक चेतना का सर्वाधिक विस्तार 1938-1947 के बीच हुआ।
2. राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़ाव
प्रजामण्डलों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यक्रमों को अपनाया और राष्ट्रीय आन्दोलन का अंग बन गए।
➤ प्रमुख आन्दोलन
| आन्दोलन | प्रजामण्डलों की भूमिका |
|---|---|
| असहयोग आन्दोलन | समर्थन एवं प्रचार |
| सविनय अवज्ञा आन्दोलन | राजनीतिक जागृति |
| भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) | सक्रिय भागीदारी |
➤ प्रभाव
- रियासतों और ब्रिटिश भारत के आन्दोलन में समन्वय स्थापित हुआ।
- राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिली।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन प्रजामण्डलों की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा थी।
✔ प्रजामण्डलों ने राष्ट्रीय आन्दोलन को राजस्थान के गाँवों तक पहुँचाया।
3. सामाजिक सुधारों में योगदान
प्रजामण्डलों ने केवल राजनीतिक अधिकारों तक स्वयं को सीमित नहीं रखा।
➤ सामाजिक क्षेत्र में योगदान
- अस्पृश्यता विरोध
- खादी प्रचार
- शिक्षा का प्रसार
- आदिवासी उत्थान
- बेगार प्रथा का विरोध
- सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जनमत निर्माण
✦ उदाहरण
| नेता | सामाजिक योगदान |
|---|---|
| भोगीलाल पंड्या | आदिवासी शिक्षा |
| हरिनारायण शर्मा | अस्पृश्यता निवारण |
| माणिक्यलाल वर्मा | जनजातीय उत्थान |
| जमनालाल बजाज | खादी एवं ग्रामोद्योग |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ प्रजामण्डलों ने सामाजिक एवं राजनीतिक सुधारों को साथ-साथ आगे बढ़ाया।
✔ आदिवासी एवं दलित उत्थान इनके प्रमुख कार्यक्रमों में शामिल था।
4. दमन के बावजूद संघर्ष
प्रारम्भ में अधिकांश राज्यों ने प्रजामण्डलों को अवैध घोषित कर दिया।
➤ शासकों द्वारा दमन
- नेताओं की गिरफ्तारी
- निर्वासन
- समाचार पत्रों पर प्रतिबंध
- सभाओं एवं जुलूसों पर रोक
- पुलिस दमन
✦ परिणाम: दमन के कारण आन्दोलन समाप्त नहीं हुआ, बल्कि और अधिक व्यापक हो गया।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ दमन ने आन्दोलन को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत किया।
✔ जेल यात्राएँ आन्दोलन की पहचान बन गईं।
5. उत्तरदायी शासन की स्थापना
प्रजामण्डलों के निरंतर दबाव के कारण कई राज्यों में संवैधानिक सुधार प्रारम्भ हुए।
➤ प्रमुख उपलब्धियाँ
| राज्य | उपलब्धि |
|---|---|
| बीकानेर | द्विसदनीय व्यवस्थापिका |
| जयपुर | प्रतिनिधि संस्थाएँ |
| मेवाड़ | नया संविधान |
| भरतपुर | जन प्रतिनिधि समिति |
| कोटा | उत्तरदायी शासन की दिशा में सुधार |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ उत्तरदायी शासन की अवधारणा प्रजामण्डलों की देन थी।
✔ लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव इसी काल में रखी गई।
6. राजस्थान एकीकरण में योगदान
✦ अप्रत्यक्ष योगदान: प्रजामण्डलों ने जनता को लोकतांत्रिक शासन के लिए तैयार किया।
✦ प्रत्यक्ष योगदान
- राजाओं पर जनदबाव बनाया।
- भारत संघ में विलय का वातावरण तैयार किया।
- लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग को मजबूत किया।
✦ परिणाम: सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन के प्रयासों को जनसमर्थन प्राप्त हुआ।
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ राजस्थान के एकीकरण की सामाजिक एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि प्रजामण्डलों ने तैयार की।
✔ प्रजामण्डल आन्दोलन के बिना राजस्थान का लोकतांत्रिक एकीकरण कठिन था।
प्रजामण्डल आन्दोलन की सीमाएँ
परीक्षाओं में आलोचनात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए सीमाएँ भी याद रखें।
| सीमा | विवरण |
|---|---|
| सीमित जनाधार | प्रारम्भ में शिक्षित वर्ग तक सीमित |
| ग्रामीण क्षेत्रों में धीमा प्रभाव | दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच कठिन |
| राज्यों के बीच समन्वय का अभाव | संयुक्त रणनीति का अभाव |
| आर्थिक संसाधनों की कमी | आन्दोलन प्रभावित हुआ |
| शासकीय दमन | कार्यों में बाधाएँ |
➤ मुख्य तथ्य (Quick Revision Points)
✔ प्रारम्भिक नेतृत्व मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग के हाथों में था।
✔ बाद में किसान, मजदूर, छात्र एवं महिलाएँ भी आन्दोलन से जुड़ गईं।
विभिन्न राज्यों के प्रमुख प्रजामण्डल नेता (सारणी)
| राज्य | प्रमुख नेता |
|---|---|
| जयपुर | हीरालाल शास्त्री, जमनालाल बजाज |
| जोधपुर | जयनारायण व्यास |
| मेवाड़ | माणिक्यलाल वर्मा |
| कोटा | नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि |
| बीकानेर | स्वामी गोपालदास |
| जैसलमेर | सागरमल गोपा |
| अलवर | हरिनारायण शर्मा |
| भरतपुर | गोपीलाल यादव, मास्टर आदित्येन्द्र |
| धौलपुर | कृष्णदत्त पालीवाल |
| डूंगरपुर | भोगीलाल पंड्या |
| सिरोही | गोकुलभाई भट्ट |
सम्पूर्ण अध्याय का अंतिम सार (One Page Revision)
➤ संगठन एवं संस्थाएँ
| संस्था | वर्ष |
|---|---|
| राजपूताना मध्य भारत सभा | 1918 |
| राजस्थान सेवा संघ | 1919 |
| अखिल भारतीय देशी लोक परिषद | 1920 |
| ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस | 1927 |
➤ महत्वपूर्ण प्रजामण्डल
| प्रजामण्डल | वर्ष |
|---|---|
| जयपुर | 1931 |
| मारवाड़ | 1934 |
| मेवाड़ | 1938 |
| कोटा | 1938 |
| अलवर | 1938 |
| भरतपुर | 1939 |
| बूंदी | 1944 |
| जैसलमेर | 1945 |
➤ अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व
| व्यक्तित्व | पहचान |
|---|---|
| केसरी सिंह बारहट | चेतावनी रा चूंगटियाँ |
| विजयसिंह पथिक | किसान आन्दोलन, राजस्थान सेवा संघ |
| जमनालाल बजाज | गांधीवादी नेता |
| जयनारायण व्यास | मारवाड़ आन्दोलन |
| माणिक्यलाल वर्मा | मेवाड़ प्रजामण्डल |
| हीरालाल शास्त्री | जयपुर प्रजामण्डल |
| सागरमल गोपा | जैसलमेर आन्दोलन |
| भोगीलाल पंड्या | वागड़ का गांधी |
| गोकुलभाई भट्ट | सिरोही आन्दोलन |
राजस्थान में प्रजामण्डल आन्दोलन लोकतांत्रिक चेतना, राजनीतिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन की स्थापना का आधार स्तम्भ था। इस आन्दोलन ने जनता को संगठित कर निरंकुश रियासती शासन को चुनौती दी, सामाजिक सुधारों को गति प्रदान की तथा स्वतंत्र भारत में राजस्थान के लोकतांत्रिक एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया। अतः प्रजामण्डल आन्दोलन को राजस्थान के आधुनिक राजनीतिक इतिहास का निर्णायक मोड़ माना जाता है।
