राजस्थान में जनजातीय आन्दोलन
➤ पृष्ठभूमि
- राजस्थान में स्थानीय सामन्तवाद एवं ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गठबंधन का सर्वप्रथम प्रतिरोध मेर, मीणा एवं भील जनजातियों द्वारा किया गया।
- जनजातीय समुदायों ने अंग्रेजी हस्तक्षेप तथा बाहरी राजनीतिक नियंत्रण का विरोध किया।
मेर विद्रोह (1818–1824 ई.)
➤ मेर क्षेत्र की स्थिति
- अंग्रेजों के आगमन से पूर्व मेरों द्वारा आबाद क्षेत्र किसी प्रत्यक्ष राजनीतिक सत्ता के नियंत्रण में नहीं था।
- मेरों के निवास क्षेत्र मेवाड़, मारवाड़ एवं अजमेर के अन्तर्गत आते थे।
- इन राज्यों का मेरों पर प्रभाव तो था, किन्तु उनका प्रत्यक्ष राजनीतिक एवं प्रशासनिक नियंत्रण नहीं था।
- अंग्रेजों ने पहली बार मेरों को अपने पूर्ण नियंत्रण में लाने का प्रयास किया।
- यही मेर विद्रोह का प्रमुख कारण बना।
➤ अंग्रेजों का पहला हस्तक्षेप (1818 ई.)
- 1818 ई. में अजमेर के अंग्रेज सुपरिन्टेन्डेन्ट एफ. विल्डर (F. Wilder) ने झाक एवं अन्य गांवों से समझौता किया।
- झाक मेरवाड़ा क्षेत्र का प्रमुख केन्द्र माना जाता था।
- समझौते के अनुसार मेरों ने लूट-पाट नहीं करने की सहमति दी।
➤ मेरवाड़ा पर आक्रमण (1819 ई.)
- मार्च, 1819 ई. में विल्डर ने एक साधारण घटना को समझौते का उल्लंघन बताकर मेरवाड़ा पर आक्रमण कर दिया।
- नसीराबाद से सेना बुलाकर मेरों के विरुद्ध दण्डात्मक अभियान चलाया गया।
- मेरों को दण्डित किया गया।
- मेरवाड़ा क्षेत्र में निगरानी हेतु पुलिस चौकियाँ स्थापित की गईं।
- इसी के साथ अंग्रेजों की “घेराबंदी नीति” प्रारम्भ हुई।
➤ मेरों का व्यापक विद्रोह (1820 ई.)
- अंग्रेजी दमन एवं पुलिस चौकियों की स्थापना के विरोध में मेरों ने 1820 ई. के प्रारम्भ से ही विद्रोह आरम्भ कर दिया।
- उन्होंने अपने क्षेत्रों से पुलिस चौकियों एवं थानों को हटाने का प्रयास किया।
- अनेक स्थानों पर अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष शुरू हो गया।
✦ झाक हत्याकाण्ड (नवम्बर, 1820 ई.)
- नवम्बर, 1820 ई. में झाक में ब्रिटिश पुलिस का हत्याकाण्ड हुआ।
- इस घटना से अंग्रेज, मेवाड़ एवं मारवाड़ की सरकारें भयभीत हो गईं।
- मेर विद्रोह अत्यन्त व्यापक एवं उग्र रूप धारण कर चुका था।
- मेरों ने अनेक अंग्रेजी पुलिस चौकियों को जला दिया।
- कई अंग्रेज सिपाहियों की हत्या कर दी गई।
➤ विद्रोह का दमन (1821 ई.)
- बढ़ते हुए विद्रोह को दबाने के लिए निम्न सेनाओं ने संयुक्त अभियान चलाया –
| पक्ष | योगदान |
|---|---|
| अंग्रेजी सेना | तीन बटालियन |
| मेवाड़ राज्य | सैन्य सहयोग |
| मारवाड़ राज्य | सैन्य सहयोग |
- संयुक्त सेनाओं ने मेरों पर व्यापक आक्रमण किया।
- संघर्ष में भारी जन-धन की हानि हुई।
- जनवरी, 1821 ई. के अन्त तक मेर विद्रोह का दमन कर दिया गया।
➤ मेरवाड़ा बटालियन की स्थापना (1822 ई.)
- 1822 ई. में मेरों से गठित मेरवाड़ा बटालियन का गठन किया गया।
- इसका मुख्यालय ब्यावर में स्थापित किया गया।
➤ विद्रोह के परिणाम
- सम्पूर्ण मेरवाड़ा क्षेत्र लम्बे समय तक ब्रिटिश नियंत्रण में रहा।
- अंग्रेजों ने उन्नीसवीं सदी के अन्त तक कठोर दमनात्मक नीतियों के माध्यम से क्षेत्र में शान्ति बनाए रखी।
- बीसवीं सदी के प्रारम्भ में मेरों के बीच समाज सुधार गतिविधियाँ प्रारम्भ की गईं।
- अंग्रेज 1947 ई. तक मेर विद्रोहों को नियंत्रित रखने में सफल रहे।
✦ मेर विद्रोह : एक दृष्टि में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| आन्दोलन | मेर विद्रोह |
| अवधि | 1818–1824 ई. |
| प्रमुख क्षेत्र | मेरवाड़ा (अजमेर, मेवाड़, मारवाड़ क्षेत्र) |
| प्रमुख अंग्रेज अधिकारी | एफ. विल्डर |
| प्रमुख घटना | झाक हत्याकाण्ड (1820 ई.) |
| दमन | जनवरी 1821 ई. तक |
| विशेष बटालियन | मेरवाड़ा बटालियन (1822 ई.) |
| मुख्यालय | ब्यावर |
भील विद्रोह (1818–1860 ई.)
• भील मूलतः एक शान्तिप्रिय जनजाति थी, जो अंग्रेजों के आगमन से पूर्व स्वतंत्र जीवन व्यतीत करती थी।
• 1818 ई. के बाद अंग्रेजों द्वारा स्थापित अर्ध-सामंती एवं अर्ध-औपनिवेशिक नियंत्रण ने भीलों को विद्रोह के लिए प्रेरित किया।
• राजस्थान में जनजातीय प्रतिरोध का सबसे व्यापक स्वरूप भील विद्रोहों में दिखाई देता है।
➤ भील विद्रोह के प्रमुख कारण (1818 ई.)
• अंग्रेजों द्वारा भीलों पर कर लगाने का प्रयास।
• अंग्रेजों की दमनात्मक नीति के कारण असंतोष।
• सहायक संधि के बाद जेम्स टॉड द्वारा उदयपुर प्रशासन अपने हाथ में लेना।
• देशी सेनाओं के विघटन से भीलों में बेरोजगारी बढ़ना।
• भीलों के परम्परागत अधिकारों – रखवाली (चौकीदारी कर) एवं बोलाई (सुरक्षा कर) को समाप्त करना।
• जेम्स टॉड द्वारा भीलों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास।
✦ तात्कालिक कारण
• भीलों से रखवाली एवं बोलाई वसूलने का अधिकार छीन लिया गया।
• भीलों ने अपने परम्परागत अधिकार छोड़ने से इंकार कर अंग्रेजों एवं उदयपुर राज्य के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।
➤ प्रारम्भिक भील विद्रोह (1818–1823 ई.)
• 1818 ई. के अन्त तक भीलों ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी।
• चेतावनी दी कि उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप किया गया तो वे विद्रोह करेंगे।
• भीलों ने अपने क्षेत्रों की नाकेबंदी कर दी।
• राज्य के अधिकारी भील क्षेत्रों में प्रवेश नहीं कर सके।
✦ अंग्रेजी सेना की असफलता (1820 ई.)
• 1820 ई. में विद्रोह के दमन हेतु अंग्रेजी सेना भेजी गई।
• सेना को सफलता नहीं मिली।
• इससे भील विद्रोह और अधिक उग्र हो गया।
✦ विद्रोह का दमन (1823 ई.)
• जनवरी 1823 ई. में ब्रिटिश एवं रियासती संयुक्त सेनाओं ने अभियान प्रारम्भ किया।
• दिसम्बर 1823 ई. तक विद्रोह दबा दिया गया।
➤ डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा के भील उपद्रव (1825 ई.)
• उदयपुर के विद्रोह से प्रभावित होकर डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा के भीलों ने भी अशांति उत्पन्न की।
• डूंगरपुर की स्थिति अधिक गंभीर हो गई।
✦ समझौता (मई 1825 ई.)
• संघर्ष शुरू होने से पहले ही भील मुखियाओं ने समझौता कर लिया।
• सिमूर वारु, देवल एवं नन्दू पालों के भीलों ने भी समझौता स्वीकार किया।
• समझौते एकपक्षीय थे, किन्तु अंग्रेजों ने इनके माध्यम से शांति बनाए रखी।
➤ दौलत सिंह एवं गोविन्दराम का विद्रोह (1826 ई.)
• उदयपुर के भीलों ने अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया।
• जनवरी 1826 ई. में गिरासिया भील मुखिया दौलत सिंह एवं गोविन्दराम ने विद्रोह किया।
• लम्बी वार्ताओं के बाद दौलत सिंह के आत्मसमर्पण से विद्रोह समाप्त हुआ।
➤ उदार नीति का दौर (1826–1838 ई.)
• दमनात्मक कार्यवाहियाँ सफल न होने के कारण अंग्रेजों ने उदार नीति अपनाई।
• छिटपुट उपद्रव जारी रहे।
• 1838 ई. तक उदयपुर क्षेत्र में अपेक्षाकृत शांति बनी रही।
✦ बांसवाड़ा उपद्रव (1836 ई.)
• बांसवाड़ा में भील उपद्रव हुए।
• अंग्रेजी सेना की सहायता से महारावल ने इन्हें दबा दिया।
➤ मेवाड़ भील कोर की स्थापना (1841 ई.)
• अंग्रेजों ने केवल दमन से काम न चलने पर नई सैनिक नीति अपनाई।
• मेरवाड़ा बटालियन की तर्ज पर मेवाड़ भील कोर बनाने का निर्णय लिया गया।
✦ प्रमुख तथ्य
• स्थापना स्वीकृति – अप्रैल 1841 ई.
• मुख्यालय – खैरवाड़ा (उदयपुर)
• प्रमुख छावनियाँ –
• खैरवाड़ा
• कोटड़ा
➤ 1844–1850 के भील विद्रोह
• 1844 ई. में बांसवाड़ा में पुनः भील उपद्रव हुए।
• इसी समय पोसीना (गुजरात) एवं सिरोही क्षेत्र में भी विद्रोह हुए।
• 1846 ई. में गुजरात के कुंवर जिवे वसावो के विद्रोह का प्रभाव बांसवाड़ा तक पहुँचा।
✦ दमन
• कोठारी केसरीसिंह ने अंग्रेजी सहायता प्राप्त की।
• 1850 ई. के अन्त तक विद्रोह दबा दिया गया।
➤ कालीबास विद्रोह (1855–1856 ई.)
• दिसम्बर 1855 ई. में उदयपुर राज्य के कालीबास क्षेत्र के भील विद्रोही हो गए।
• महाराणा ने मेहता सवाई सिंह को सेना सहित भेजा।
✦ दमन
• 1 नवम्बर 1856 को दमन अभियान चलाया गया।
• अनेक गांव जलाए गए।
• भारी संख्या में भीलों की मृत्यु हुई।
➤ 1857 की क्रांति एवं भील
• 1857 की क्रांति के समय भील विद्रोह की संभावना थी।
• किन्तु भील राष्ट्रीय क्रांति से अनभिज्ञ रहे।
• राजकीय भील पलटनों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया।
➤ 1861–1867 के भील उपद्रव
✦ 1861 ई.
• खैरवाड़ा क्षेत्र में भील उपद्रव हुए।
✦ 1863 ई.
• कोटड़ा क्षेत्र के भील हिंसक गतिविधियों में संलग्न हो गए।
• मेवाड़ भील कोर ने उदयपुर प्रशासन को दोषी माना।
• प्रशासनिक अधिकारियों के स्थानांतरण के बाद स्थिति सामान्य हुई।
✦ 1867 ई.
• देवलपाल क्षेत्र के भीलों ने विद्रोह किया।
• मेवाड़ भील कोर ने दमन कर दिया।
➤ बांसवाड़ा के विद्रोह (1872–1875 ई.)
• 1872–75 के बीच बांसवाड़ा में अनेक विद्रोह हुए।
• चिलकारी एवं शेरगढ़ के भील विशेष रूप से सक्रिय रहे।
• उनकी गतिविधियाँ सैलाना एवं झाबुआ तक फैल गईं।
➤ महान भील विद्रोह (1881–1882 ई.)
✦ विशेषता
• 19वीं शताब्दी का सबसे बड़ा एवं उग्र भील विद्रोह।
• यह वर्षों से संचित भील असंतोष का विस्फोट था।
✦ बारापाल अभियान
• 26 मार्च 1881 को मामा अमानसिंह एवं लोणारगन के नेतृत्व में सेना बारापाल पहुँची।
• श्यामलदास भी साथ था।
• 27–28 मार्च को सैकड़ों भील झोंपड़ियाँ जला दी गईं।
✦ भीलों का प्रतिरोध
• भील पहाड़ियों एवं जंगलों में पहुँच गए।
• मार्ग अवरुद्ध कर सेना को रोक दिया।
• लगभग 8000 भीलों ने रिखबदेव क्षेत्र में सेना को घेर लिया।
✦ प्रमुख नेता
• गामेती नीमा (बीलखपाल)
• खेमा (पीपली)
• जोयता (सगातारी)
✦ रिखबदेव समझौता (25 अप्रैल 1881)
• आधा बराड़ कर माफ किया गया।
• जनगणना में भीलों को परेशान न करने का आश्वासन दिया गया।
• विद्रोहियों को माफी दी गई।
• भीलों ने कानून का पालन करने का वचन दिया।
गोविन्द गुरु (गोविन्द गिरि) एवं भगत आन्दोलन
• 19वीं शताब्दी के अन्त तक मेवाड़ क्षेत्र की भील समस्या काफी हद तक नियंत्रित कर ली गई थी।
• किन्तु डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा के भीलों की समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
• परिणामस्वरूप 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में एक शक्तिशाली जनजातीय आन्दोलन उभरा।
• इस आन्दोलन का नेतृत्व गोविन्द गुरु (गोविन्द गिरि) ने किया।
➤ गोविन्द गुरु का परिचय
• गोविन्द गुरु का जन्म डूंगरपुर राज्य के बेडसा गाँव में हुआ था।
• वे जाति से बंजारा थे।
• वे स्वयं एक छोटे किसान थे।
• आर्थिक कठिनाइयों तथा पत्नी एवं पुत्रों की मृत्यु ने उन्हें अध्यात्म की ओर प्रेरित किया।
• बाद में वे संन्यासी बन गए।
• वे कोटा-बूँदी अखाड़े के साधु राजगिरि के शिष्य बने।
➤ सामाजिक एवं धार्मिक सुधार कार्य
• गोविन्द गुरु ने धूनी स्थापित कर धार्मिक उपदेश देना प्रारम्भ किया।
• उन्होंने भीलों में नैतिक एवं सामाजिक सुधार का अभियान चलाया।
• भीलों को नशा, अंधविश्वास एवं सामाजिक बुराइयों से दूर रहने का संदेश दिया।
• उनके उपदेशों से भीलों में आत्मविश्वास एवं जागरूकता बढ़ी।
✦ आन्दोलन का स्वरूप परिवर्तन
• प्रारम्भ में यह समाज एवं धर्म सुधार आन्दोलन था।
• धीरे-धीरे यह आर्थिक एवं राजनीतिक आन्दोलन में बदल गया।
• भीलों में यह विचार विकसित हुआ कि वे इस भूमि के वास्तविक स्वामी हैं।
• उन्हें सामन्ती एवं औपनिवेशिक शोषण से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए।
➤ भगत पंथ का उदय
• गोविन्द गुरु के विचारों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में भील उनके अनुयायी बने।
• उनके अनुयायियों का संगठन भगत पंथ कहलाया।
• भगत पंथ दक्षिणी राजस्थान एवं गुजरात में अत्यधिक लोकप्रिय हुआ।
✦ शासकों की प्रतिक्रिया
• राजाओं, अधिकारियों एवं जागीरदारों को गोविन्द गुरु का बढ़ता प्रभाव खतरनाक लगने लगा।
• उन्हें आशंका थी कि यह आन्दोलन उनकी सत्ता को चुनौती दे सकता है।
• परिणामस्वरूप उनके अनुयायियों पर दमन प्रारम्भ कर दिया गया।
➤ गुजरात में आन्दोलन (1908–1910)
• 1908 ई. में गोविन्द गुरु राजपूताना छोड़कर गुजरात चले गए।
• उन्होंने सूंथ एवं ईडर राज्यों के भीलों में कार्य किया।
• वहाँ भीलों को संगठित कर शक्तिशाली आन्दोलन खड़ा किया।
✦ पाल-पट्टा समझौता (24 फरवरी 1910)
• ईडर राज्य के पाल-पट्टा क्षेत्र में भील आन्दोलन अत्यन्त प्रभावशाली रहा।
• जागीरदार को भीलों के साथ समझौता करना पड़ा।
प्रमुख तथ्य
• तिथि – 24 फरवरी 1910
• कुल शर्तें – 21
• उद्देश्य – भीलों के अधिकारों की रक्षा
✦ महत्व
• यह गोविन्द गुरु के आन्दोलन की पहली बड़ी सफलता थी।
• इससे राजस्थान एवं गुजरात के भीलों में नया आत्मविश्वास जागृत हुआ।
➤ भगत आन्दोलन का पुनर्गठन (1911)
• 1911 ई. में गोविन्द गुरु पुनः अपने मूल स्थान बेडसा लौटे।
• उन्होंने आन्दोलन को नए स्वरूप में संगठित किया।
✦ प्रमुख कार्य
• प्रत्येक भील गाँव में धूनी स्थापित की।
• धूनी की सुरक्षा हेतु कोतवाल नियुक्त किए।
• धार्मिक शिक्षा के साथ राजनीतिक चेतना का प्रसार किया।
• भीलों को सामन्ती एवं औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध जागरूक किया।
✦ कोतवाल व्यवस्था
• कोतवाल केवल धार्मिक मुखिया नहीं थे।
• वे स्थानीय प्रशासनिक कार्य भी देखते थे।
• विवादों का निपटारा करते थे।
• इससे गोविन्द गुरु की एक प्रकार की समानान्तर सरकार स्थापित हो गई।
➤ आन्दोलन का विस्तार
• बेडसा आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र बन गया।
• ईडर, सूंथ, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, पंचमहल एवं खेड़ा क्षेत्र के भील यहाँ आने लगे।
• आन्दोलन का प्रभाव सम्पूर्ण दक्षिणी राजस्थान एवं गुजरात तक फैल गया।
➤ गोविन्द गुरु की गिरफ्तारी (अप्रैल 1913)
• आन्दोलन के बढ़ते प्रभाव से शासक वर्ग भयभीत हो गया।
• अप्रैल 1913 में डूंगरपुर पुलिस ने गोविन्द गुरु को गिरफ्तार कर लिया।
✦ पुलिस कार्रवाई
• उनका सामान जब्त कर लिया गया।
• उन्हें भगत पंथ छोड़ने की धमकी दी गई।
• उनके अनुयायियों पर भी दमन किया गया।
✦ परिणाम
• इस दमन से भीलों में असन्तोष और बढ़ गया।
• गोविन्द गुरु एवं उनके अनुयायियों ने भील राज स्थापित करने की अवधारणा विकसित की।
मानगढ़ धाम आन्दोलन (1913)
➤ मानगढ़ में भीलों का जमावड़ा
• अक्टूबर 1913 में गोविन्द गुरु मानगढ़ पहाड़ी पहुँचे।
• उन्होंने सन्देशवाहकों के माध्यम से भीलों को एकत्रित होने का आह्वान किया।
• बड़ी संख्या में भील मानगढ़ पहाड़ी पर पहुँचने लगे।
• वे अपने साथ राशन, पानी एवं हथियार भी लाए।
➤ अंग्रेज एवं रियासतों की प्रतिक्रिया
• सूंथ, डूंगरपुर, बांसवाड़ा एवं ईडर राज्यों में भय फैल गया।
• इन राज्यों ने अंग्रेज अधिकारियों से सहायता मांगी।
• भीलों के जमावड़े को विद्रोह की तैयारी माना गया।
➤ सैन्य कार्रवाई (6–10 नवम्बर 1913)
निम्न सैन्य टुकड़ियाँ मानगढ़ भेजी गईं—
• मेवाड़ भील कोर की 2 कम्पनियाँ
• 104 वेलेजली रायफल्स की 1 कम्पनी
• 7वीं राजपूत रेजिमेन्ट की 1 कम्पनी
✦ मानगढ़ नरसंहार (17 नवम्बर 1913)
• वार्ता के प्रयास असफल हो गए।
• 17 नवम्बर 1913 को अंग्रेजी सेना ने मानगढ़ पहाड़ी पर आक्रमण कर दिया।
• दूसरी पहाड़ी पर तोपें एवं मशीनगनें तैनात की गईं।
• पहाड़ी पर गोलाबारी शुरू कर दी गई।
✦ भीलों का प्रतिरोध
• लगभग एक घण्टे तक भीलों ने बहादुरी से मुकाबला किया।
• आधुनिक हथियारों के सामने वे अधिक देर तक टिक नहीं सके।
• अंग्रेजी सेना ने पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया।
• अंधाधुंध गोलीबारी की गई।
✦ परिणाम
• अंग्रेजी अभिलेखों के अनुसार लगभग 100 भील मारे गए।
• लगभग 900 भीलों को बन्दी बनाया गया।
• गोविन्द गुरु एवं पुन्जिया को गिरफ्तार कर लिया गया।
➤ गोविन्द गुरु को सजा
• प्रारम्भ में गोविन्द गुरु को आजीवन कारावास की सजा दी गई।
• उनकी लोकप्रियता के कारण सजा घटाकर 10 वर्ष कर दी गई।
• लगभग 7 वर्ष बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
✦ रिहाई की शर्त
• वे सूंथ, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, कुशलगढ़ एवं ईडर राज्यों में प्रवेश नहीं करेंगे।
➤ अंतिम जीवन
• रिहाई के बाद वे पंचमहल (गुजरात) के झालोद में रहने लगे।
• वहाँ भी बड़ी संख्या में भगत भील उनके प्रवचन सुनने आते रहे।
• उन्होंने जीवनभर भीलों के सामाजिक उत्थान के लिए कार्य किया।
✦ एक दृष्टि में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| प्रमुख नेता | गोविन्द गुरु (गोविन्द गिरि) |
| मूल स्थान | बेडसा (डूंगरपुर) |
| संगठन | भगत पंथ |
| महत्वपूर्ण समझौता | पाल-पट्टा समझौता (24 फरवरी 1910) |
| समानान्तर व्यवस्था | धूनी एवं कोतवाल प्रणाली |
| प्रमुख घटना | मानगढ़ नरसंहार |
| तिथि | 17 नवम्बर 1913 |
| गिरफ्तार नेता | गोविन्द गुरु एवं पुन्जिया |
| रिहाई के बाद निवास | झालोद (पंचमहल, गुजरात) |
उदयपुर राज्य में मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में आन्दोलन (1921-1929)
➤ परिचय
• असहयोग आन्दोलन की जागृति के प्रभाव में 1921 ई. में मेवाड़ एवं अन्य राज्यों के भीलों तथा गिरासियों ने मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में आन्दोलन प्रारम्भ किया।
• यह आन्दोलन आगे चलकर “एकी आन्दोलन” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
• इसका उद्देश्य आदिवासियों पर होने वाले सामन्ती, आर्थिक एवं प्रशासनिक शोषण के विरुद्ध संयुक्त संघर्ष करना था।
➤ मोतीलाल तेजावत का परिचय
• मोतीलाल तेजावत उदयपुर राज्य के झाडोल ठिकाने के अन्तर्गत कोलियारी गाँव के निवासी थे।
• वे ओसवाल बनिया जाति से सम्बन्ध रखते थे।
• उन्होंने कुछ समय तक झाडोल ठिकाने में कामदार के रूप में कार्य किया।
• इसी दौरान उनका सम्पर्क भीलों से हुआ तथा उन्होंने उनकी समस्याओं को निकट से देखा।
• झाडोल के जागीरदार से मतभेद होने पर उन्होंने नौकरी छोड़ दी।
• इसके बाद उन्होंने परचून का व्यवसाय आरम्भ किया तथा भील क्षेत्रों में घूम-घूमकर व्यापार किया।
• वे पोसीना ठिकाने के सामलिया में लगने वाले प्रसिद्ध चित्रे-विचित्र मेले में नियमित रूप से दुकान लगाते थे।
• इस प्रकार व्यापार के माध्यम से उनका सम्पर्क व्यापक आदिवासी समाज से स्थापित हुआ।
➤ एकी आन्दोलन का प्रारम्भ
• समाज सुधार कार्यों के कारण मोतीलाल तेजावत भीलों के बीच अत्यन्त लोकप्रिय हो गए।
• उन्होंने आदिवासियों में “एकी आन्दोलन” प्रारम्भ किया।
• एकी आन्दोलन का उद्देश्य था—
• भीलों एवं गिरासियों को संगठित करना।
• अन्यायपूर्ण करों का विरोध करना।
• बेगार एवं शोषण के विरुद्ध संघर्ष करना।
• सामन्ती अत्याचारों का प्रतिरोध करना।
• उनकी गतिविधियाँ प्रारम्भ में झाडोल जागीर तक सीमित थीं, किन्तु शीघ्र ही सम्पूर्ण भील क्षेत्र में फैल गईं।
➤ विजय सिंह पथिक एवं बिजौलिया आन्दोलन का प्रभाव
• मोतीलाल तेजावत की भेंट विजय सिंह पथिक एवं अन्य किसान नेताओं से हुई।
• उन्होंने आदिवासी समस्याओं के समाधान हेतु विस्तृत कार्यक्रम तैयार किया।
• वे असहयोग आन्दोलन से अत्यधिक प्रभावित थे।
• बिजौलिया किसान आन्दोलन उस समय अपने चरम पर था, जिसने तेजावत को विशेष प्रेरणा प्रदान की।
• बिजौलिया आन्दोलन के नेताओं द्वारा समर्थन का आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने आन्दोलन को अंतिम रूप दिया।
✦ करबन्दी एवं असहयोग आन्दोलन (जुलाई, 1921)
• जुलाई, 1921 में मोतीलाल तेजावत ने भीलों के मध्य करबन्दी सहित असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ किया।
• आदिवासियों से अन्यायपूर्ण करों का भुगतान न करने का आह्वान किया गया।
• आन्दोलन को तीव्र जनसमर्थन प्राप्त हुआ।
✦ मोतीलाल तेजावत की गिरफ्तारी (19 अगस्त, 1921)
• आन्दोलन की बढ़ती लोकप्रियता से झाडोल का सामन्त चिन्तित हो गया।
• 19 अगस्त, 1921 को मोतीलाल तेजावत को गिरफ्तार कर लिया गया।
• गिरफ्तारी के विरोध में हजारों भील एकत्रित हो गए।
• भीलों के भारी दबाव के कारण ठाकुर को तेजावत को रिहा करना पड़ा।
• रिहाई के बाद आन्दोलन और अधिक तीव्र हो गया।
➤ आन्दोलन की सफलता एवं प्रभाव
• दिसम्बर, 1921 तक उदयपुर राज्य में किसान एवं आदिवासी आन्दोलनों के कारण विस्फोटक स्थिति उत्पन्न हो गई।
• आन्दोलन के दबाव में ब्रिटिश अधिकारियों ने 1 जनवरी, 1922 को भीलों को कुछ रियायतें देने का निर्णय लिया।
• जागीरदारों को भी नरम रुख अपनाने की सलाह दी गई।
• यह निर्णय आन्दोलन की बड़ी सफलता माना गया।
• इससे आदिवासियों का मनोबल और अधिक बढ़ गया।
➤ सिरोही राज्य में आन्दोलन का विस्तार
• जनवरी, 1922 में मोतीलाल तेजावत सिरोही राज्य पहुँचे।
• सिरोही में बड़ी संख्या में भील एवं गिरासिया निवास करते थे।
• वे मेवाड़ के आन्दोलन से प्रभावित थे तथा अपने क्षेत्र में भी वैसा ही आन्दोलन चाहते थे।
• वास्तव में तेजावत उदयपुर के भय से नहीं भागे थे, बल्कि सिरोही के आदिवासियों ने उन्हें आमंत्रित किया था।
• सिरोही राज्य एकी आन्दोलन का दूसरा प्रमुख केन्द्र बन गया।
➤ सिरोही में आन्दोलन की गतिविधियाँ
• सिरोही के भीलों एवं गिरासियों में समाज सुधार आन्दोलन प्रारम्भ किया गया।
• करबन्दी आन्दोलन को बढ़ावा दिया गया।
• राज्य के साथ असहयोग का आह्वान किया गया।
• अनेक सभाओं के माध्यम से आदिवासियों को संगठित किया गया।
• आर्थिक एवं सामाजिक उत्थान पर विशेष बल दिया गया।
✦ असहयोग आन्दोलन की समाप्ति एवं दमन नीति
• 11 फरवरी, 1922 को कांग्रेस ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया।
• इसके बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने सम्पूर्ण भारत में किसान एवं आदिवासी आन्दोलनों को बलपूर्वक कुचलने की नीति अपनाई।
• सिरोही के दीवान रमाकान्त मालवीय ने गांधीजी, विजय सिंह पथिक तथा राजस्थान सेवा संघ की सहायता से आन्दोलन समाप्त करने का प्रयास किया।
• प्रयास असफल रहने पर राज्य ने सैनिक दमन का मार्ग अपनाया।
✦ सियावा काण्ड (12 अप्रैल, 1922)
• गिरासियों के प्रमुख गाँव सियावा में कर वसूली हेतु सेना भेजी गई।
• 12 अप्रैल, 1922 को राज्य एवं अंग्रेजी सेना ने सियावा पर आक्रमण कर दिया।
• अनेक आदिवासी मारे गए।
• सेना ने घर, अनाज एवं पशुओं को नष्ट कर भारी क्षति पहुँचाई।
✦ बलोरिया काण्ड (5 मई, 1922)
• 5 मई, 1922 को सेना ने बलोरिया गाँव पर आक्रमण किया।
• गाँव का बड़ा भाग जला दिया गया।
• इस सैनिक कार्रवाई में 11 आदिवासियों की मृत्यु हुई।
✦ भूला एवं नवावास काण्ड (6 मई, 1922)
• 6 मई, 1922 को भूला एवं नवावास गाँवों पर सैनिक कार्रवाई की गई।
• अधिकांश झोंपड़ियों को जलाकर नष्ट कर दिया गया।
• इससे आन्दोलन को भारी क्षति पहुँची।
➤ आन्दोलन का दमन
• लगातार सैनिक कार्रवाइयों ने भीलों एवं गिरासियों का मनोबल तोड़ दिया।
• 11-12 मई, 1922 को आदिवासी मुखियाओं ने सिरोही के दीवान एवं पॉलिटिकल ऑफिसर से भेंट की।
• उन्होंने एकी आन्दोलन से स्वयं को अलग घोषित कर दिया।
• इस प्रकार सिरोही का आदिवासी आन्दोलन अस्थायी रूप से दबा दिया गया।
➤ आन्दोलन का पुनः प्रयास
• 1923 ई. के प्रारम्भ में मोतीलाल तेजावत ने पुनः एकी आन्दोलन प्रारम्भ करने का प्रयास किया।
• किन्तु उन्हें अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हुई।
• फिर भी भाखर, सांथपुर एवं पिण्डवाड़ा क्षेत्रों में अशान्ति बनी रही।
• 1927 ई. में आदिवासी पंचों एवं राज्य अधिकारियों के बीच समझौता हुआ।
• इसके बाद क्षेत्र में शान्ति स्थापित हो सकी।
✦ मोतीलाल तेजावत की गिरफ्तारी (3 जून, 1929)
• जनवरी, 1924 के बाद तेजावत भूमिगत हो गए।
• उनकी गिरफ्तारी पर उदयपुर, सिरोही एवं ईडर राज्यों ने पुरस्कार घोषित कर दिया।
• 3 जून, 1929 को ईडर राज्य की पुलिस ने खेडब्रह्मा गाँव में उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
• ईडर पुलिस ने उन्हें उदयपुर राज्य को सौंप दिया।
• उनके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा चलाया गया।
✦ रिहाई (3 अप्रैल, 1936)
• 1936 तक मुकदमे का अंतिम निर्णय नहीं हुआ।
• तेजावत को जेल में ही रखा गया।
• 3 अप्रैल, 1936 को उन्हें इस शर्त पर रिहा किया गया कि वे कोई आन्दोलनात्मक गतिविधि नहीं करेंगे।
• उन्हें उदयपुर राज्य की अनुमति के बिना शहर से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।
• उदयपुर राज्य ने उन्हें 30 रुपये प्रतिमाह भत्ता स्वीकृत किया।
✦ पुनः गिरफ्तारी एवं अंतिम रिहाई
• जनवरी, 1945 में भौमट क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास करने पर उन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया।
• फरवरी, 1947 में उन्हें अन्तिम रूप से रिहा कर दिया गया।
✦ मोतीलाल तेजावत आन्दोलन : एक दृष्टि में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| आन्दोलन | एकी आन्दोलन |
| नेता | मोतीलाल तेजावत |
| प्रारम्भ | जुलाई, 1921 |
| प्रमुख क्षेत्र | मेवाड़, सिरोही, ईडर |
| प्रमुख वर्ग | भील एवं गिरासिया |
| प्रमुख नीति | करबन्दी एवं असहयोग |
| प्रमुख घटना | सियावा काण्ड (1922) |
| प्रमुख घटना | बलोरिया काण्ड (1922) |
| प्रमुख घटना | भूला-नवावास काण्ड (1922) |
| गिरफ्तारी | 3 जून, 1929 |
| रिहाई | 3 अप्रैल, 1936 |
| अंतिम रिहाई | फरवरी, 1947 |
मीणा विद्रोह (1851-1860)
• नई भूमि एवं राजस्व व्यवस्था के प्रति असन्तोष व्यक्त करने के लिए 1851 ई. में उदयपुर राज्य के जहाजपुर परगने के मीणाओं ने विद्रोह कर दिया।
• जहाजपुर क्षेत्र के मीणा पर्याप्त सीमा तक किसी भी राजनीतिक सत्ता से स्वतंत्र थे।
• वे केवल महाराणा मेवाड़ की प्रतीकात्मक सत्ता को स्वीकार करते थे।
• कर्नल टॉड ने अपने विवरण में मीणाओं की इस स्वतंत्र स्थिति का उल्लेख किया है।
• अंग्रेजों ने पहली बार इस क्षेत्र पर उदयपुर राज्य का कठोर प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित कराया।
• ब्रिटिश शासित अजमेर-मेरवाड़ा के निकट होने के कारण यह क्षेत्र अंग्रेजों के लिए विशेष महत्व रखता था।
➤ विद्रोह के कारण
• अंग्रेज आदिवासी समुदायों के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण रखते थे।
• आदिवासियों के साथ कठोर एवं दमनात्मक व्यवहार किया जाता था।
• 1820-21 में मेरों के दमन से मीणा समुदाय भली-भाँति परिचित था।
• अंग्रेज अधिकारियों एवं मीणाओं के मध्य निरन्तर अविश्वास एवं विरोध की स्थिति बनी रही।
• मीणा एवं भील विद्रोह केवल अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं थे, बल्कि उन रियासतों के विरुद्ध भी थे जिनके माध्यम से अंग्रेज अपनी नीतियाँ लागू कर रहे थे।
✦ तात्कालिक कारण
• 1851 ई. में महाराणा मेवाड़ ने जहाजपुर परगने में मेहता रघुनाथ सिंह को नया हाकिम नियुक्त किया।
• नवनियुक्त हाकिम ने परगने की आय बढ़ाने एवं खर्च कम करने पर विशेष ध्यान दिया।
• प्रशासनिक सुधारों के नाम पर जनता से अधिक धन वसूला जाने लगा।
• राजस्व वृद्धि की इस नीति से मीणा समुदाय में व्यापक असन्तोष फैल गया।
• परिणामस्वरूप मीणाओं ने विद्रोह का मार्ग अपनाया।
➤ विद्रोह का प्रारम्भ
• विद्रोही मीणाओं ने राजस्व अधिकारियों एवं सूदखोरों को निशाना बनाया।
• उन्होंने अनेक स्थानों पर लूटपाट की।
• विद्रोहियों ने अजमेर-मेरवाड़ा के अंग्रेजी क्षेत्र पर भी धावे मारे।
• इससे अंग्रेज अधिकारी अत्यन्त चिंतित हो गए।
✦ दमन की तैयारी
• अंग्रेज अधिकारियों की शिकायतों के बाद महाराणा ने मेहता रघुनाथ सिंह का स्थानान्तरण कर दिया।
• उसके स्थान पर मेहता अजीत सिंह को विद्रोह दमन हेतु नियुक्त किया गया।
• अजीत सिंह उदयपुर से सेना लेकर जहाजपुर पहुँचा।
• उसके साथ अनेक जागीरदारों की सेनाएँ भी सम्मिलित थीं।
➤ विद्रोह दमन में सहयोगी शक्तियाँ
| सहयोगी शक्ति | योगदान |
|---|---|
| शाहपुरा | सैन्य सहयोग |
| बनेड़ा | सैन्य सहयोग |
| बिजौलिया | सैन्य सहयोग |
| भैंसरोड़गढ़ | सैन्य सहयोग |
| जहाजपुर | सैन्य सहयोग |
| मांडलगढ़ | सैन्य सहयोग |
| भीम पल्टन | सैनिक सहयोग |
| एकलिंग पल्टन | सैनिक सहयोग |
| तोपखाना | दो तोपें |
➤ अंग्रेजों की घेराबन्दी नीति
• एजेन्ट टू गवर्नर जनरल (AGG) के निर्देश पर जयपुर, टोंक एवं बूंदी राज्यों ने अपनी सीमाओं पर कड़ी चौकसी कर दी।
• इसका उद्देश्य अन्य राज्यों के मीणाओं द्वारा जहाजपुर के विद्रोहियों को सहायता पहुँचाने से रोकना था।
• इस प्रकार विद्रोहियों को बाहरी समर्थन से वंचित कर दिया गया।
✦ लुहारी गाँवों पर आक्रमण
• उदयपुर की सेना ने छोटी लुहारी एवं बड़ी लुहारी गाँवों पर आक्रमण किया।
• ये गाँव मीणा विद्रोह के प्रमुख नेताओं के केन्द्र थे।
• सेना ने दोनों गाँवों को नष्ट कर दिया।
• इसके बाद मीणा परिवार सहित मनोहरगढ़ एवं देवखेड़ा की पहाड़ियों में चले गए।
• वहाँ उन्होंने रक्षात्मक मोर्चाबन्दी कर ली।
➤ मीणाओं का प्रतिरोध
• तमाम प्रतिबन्धों के बावजूद जयपुर, बूंदी एवं टोंक क्षेत्र से लगभग 5000 मीणा जहाजपुर के विद्रोहियों की सहायता हेतु पहुँच गए।
• सघन जंगलों एवं पहाड़ी भू-भाग के कारण राज्य सेना को सफलता नहीं मिली।
• विद्रोहियों ने प्रभावी प्रतिरोध किया।
• अभियान के दौरान राज्य सेना के लगभग 57 सैनिक मारे गए।
✦ निर्णायक सैन्य अभियान (1854-55)
• दिसम्बर, 1854 में AGG, मेवाड़ के पॉलिटिकल एजेन्ट तथा हाड़ौती के पॉलिटिकल एजेन्ट संयुक्त सेना सहित जहाजपुर पहुँचे।
• वे लगभग एक माह तक जहाजपुर एवं ईटोदा क्षेत्र में डटे रहे।
• लगातार दबाव के कारण जनवरी, 1855 के अन्त तक मीणा विद्रोहियों को आत्मसमर्पण करना पड़ा।
✦ देवली छावनी की स्थापना (फरवरी, 1855)
• भविष्य में मीणाओं पर नियंत्रण रखने हेतु फरवरी, 1855 में देवली छावनी स्थापित की गई।
• यह छावनी जयपुर, अजमेर, बूंदी एवं मेवाड़ की सीमाओं के निकट स्थापित की गई थी।
• छावनी के आसपास पुलिस थाने भी स्थापित किए गए।
• उद्देश्य मीणाओं की गतिविधियों पर नियमित निगरानी रखना था।
✦ 42वीं देवली रेजीमेन्ट / मीणा बटालियन
• 1855 ई. में देवली छावनी को नवगठित अनियमित सेना का मुख्यालय बनाया गया।
• 1857-1860 के मध्य यह सेना 42वीं देवली रेजीमेन्ट अथवा मीणा बटालियन के नाम से प्रसिद्ध रही।
• 1921 ई. में 42वीं देवली रेजीमेन्ट एवं 43वीं एरिनपुरा रेजीमेन्ट समाप्त कर दी गईं।
• इनके स्थान पर मीणा कोर की स्थापना की गई।
• यह आदिवासियों पर नियंत्रण स्थापित करने की अंग्रेजी नीति का भाग था।
✦ पुनः विद्रोह (जनवरी, 1860)
• जनवरी, 1860 में जहाजपुर के मीणाओं ने पुनः विद्रोह कर दिया।
• महाराणा ने 29 जनवरी, 1860 को चन्दसिंह के नेतृत्व में सेना भेजी।
• सेना ने गढ़ोली एवं लुहारी गाँवों पर आक्रमण किया।
• गाँवों में लूटपाट एवं आगजनी की गई।
• भारी संख्या में मीणाओं को बन्दी बनाया गया।
• 6 विद्रोहियों को तोप से उड़ा दिया गया।
➤ विद्रोह का अन्त
• मीणाओं को नियमित रूप से पुलिस थानों में उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बाध्य किया गया।
• कठोर दमनात्मक उपायों के माध्यम से विद्रोह को नियंत्रित किया गया।
• 1860 ई. के बाद जहाजपुर का मीणा विद्रोह पूर्णतः दबा दिया गया।
✦ मीणा विद्रोह : एक दृष्टि में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| आन्दोलन | मीणा विद्रोह |
| अवधि | 1851-1860 ई. |
| प्रमुख क्षेत्र | जहाजपुर (उदयपुर राज्य) |
| तात्कालिक कारण | नई भूमि एवं राजस्व व्यवस्था |
| प्रमुख हाकिम | मेहता रघुनाथ सिंह |
| दमन अधिकारी | मेहता अजीत सिंह |
| प्रमुख सैन्य केन्द्र | देवली छावनी |
| स्थापना | फरवरी, 1855 |
| विशेष सेना | 42वीं देवली रेजीमेन्ट (मीणा बटालियन) |
| पुनः विद्रोह | जनवरी, 1860 |
| दमनकर्ता | चन्दसिंह |
| परिणाम | विद्रोह का पूर्ण दमन |
