❖ करणी माता
➤ जन्म एवं परिवार
- करणी माता का जन्म फलौदी के सुआप गाँव में हुआ।
- इनके पिता का नाम मेहाजी चारण तथा माता का नाम देवल बाई था।
- बचपन में इन्हें रिद्धि बाई के नाम से जाना जाता था।
➤ मंदिर
- करणी माता का प्रसिद्ध मंदिर बीकानेर के देशनोक में स्थित है।
- मंदिर का वर्तमान स्वरूप महाराजा गंगासिंह ने प्रदान कराया।
- मंदिर के स्वर्ण द्वार अलवर के महाराजा बख्तावर सिंह द्वारा लगवाए गए थे।
➤ विशेष तथ्य
- बीकानेर के राठौड़ वंश की कुलदेवी के रूप में इनकी पूजा की जाती है।
- इन्हें चूहों वाली देवी तथा चारणों की कुलदेवी के नाम से भी जाना जाता है।
- मंदिर में पाए जाने वाले दो सफेद चूहों को काबा कहा जाता है।
- मंदिर परिसर में सावन और भादवा नाम की दो बड़ी कड़ाहियाँ स्थापित हैं।
- करणी माता के मंदिर को मठ कहा जाता है।
- करणी माता का एक स्वरूप सफेद चील भी माना जाता है।
- इनकी इष्ट देवी तेमड राय माता हैं।
- करणी माता की स्तुति में गाए जाने वाले गीत चारण चरजाएँ कहलाते हैं।
➤ मेला
- चैत्र एवं आश्विन के नवरात्रों में यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है।
❖ जीण माता
➤ जन्म
- जीण माता का मूल नाम जयंती बाई था।
- इनका जन्म चूरू जिले के घांघू गाँव में हुआ।
➤ मंदिर
- जीण माता मंदिर का निर्माण राजा हट्टड़ ने पृथ्वीराज चौहान प्रथम के शासनकाल में 1064 ई. में कराया।
- यह मंदिर सीकर के रेवासा स्थित काजल शिखर पर बना हुआ है।
- मंदिर के निकट हर्षगिरी पहाड़ी पर इनके भाई हर्षनाथ का मंदिर स्थित है।
➤ विशेष तथ्य
- जीण माता को मधुमक्खियों की देवी कहा जाता है।
- इन्हें शेखावाटी की प्रमुख लोकदेवी माना जाता है।
- सीकर के चौहानों की कुलदेवी के रूप में इनकी मान्यता है।
- जीण माता की प्रतिमा अष्टभुजी स्वरूप में स्थापित है।
- इन्हें माँ दुर्गा का स्वरूप तथा इनके भाई हर्ष को भैरव का अवतार माना जाता है।
- राजस्थानी लोक साहित्य में जीण माता का गीत सबसे लंबा माना जाता है, जिसे कनफटे जोगी डमरू और सारंगी की संगति में गाते हैं। इस गायन को चिरंजा कहा जाता है।
- यहाँ ढाई प्याला शराब चढ़ाने तथा बकरे के कानों की बलि देने की परंपरा प्रचलित है।
➤ मेला
- चैत्र एवं आश्विन के नवरात्रों में यहाँ मेला आयोजित होता है।
➤ महत्वपूर्ण तथ्य
- हर्षद माता मंदिर आबानेरी (दौसा) में स्थित है।
❖ कैला देवी
➤ विशेष तथ्य
- करौली के यादव वंश की कुलदेवी कैला देवी हैं।
- इन्हें महालक्ष्मी का अवतार माना जाता है।
- इनकी आराधना के समय लांगुरिया गीत गाए जाते हैं।
- मूल रूप से यहाँ हनुमान जी की माता अंजना का मंदिर माना जाता है।
➤ मंदिर
- मंदिर करौली में कालीसिल नदी के तट पर स्थित त्रिकूट पहाड़ी पर बना है।
- मंदिर परिसर में हनुमान जी का मंदिर भी स्थित है।
- मंदिर के सामने बोहरा जी की छतरी बनी हुई है।
- यहाँ बलि प्रथा का प्रचलन नहीं है।
➤ मेला
- चैत्र शुक्ल अष्टमी के अवसर पर प्रसिद्ध लक्खी मेला आयोजित होता है।
❖ शीतला माता
➤ विशेष तथ्य
- शीतला माता का वाहन गधा माना जाता है।
- इनके मंदिर के पुजारी कुम्हार जाति से होते हैं।
- यहाँ देवी की खण्डित प्रतिमा की पूजा की जाती है।
- इन्हें सेढल माता, महामाई, बच्चों की संरक्षिका देवी तथा चेचक की देवी के नाम से भी जाना जाता है।
- चैत्र कृष्ण अष्टमी को शीतलाष्टमी मनाई जाती है। इस दिन बास्योडा की परंपरा के अनुसार एक दिन पहले बनाया गया ठंडा भोजन ग्रहण किया जाता है।
- खेजड़ी (जांटी) को शीतला माता का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।
➤ मंदिर
- प्रमुख मंदिर जयपुर जिले के चाकसू स्थित शील की डूंगरी में है।
- इस मंदिर का निर्माण सवाई माधोसिंह प्रथम ने कराया।
❖ केवाय माता
- डीडवाना-कुचामन जिले के परबतसर क्षेत्र के किणसरिया गाँव में इनका मंदिर स्थित है।
- मंदिर का निर्माण दहिया सामंत चच्चदेव ने कराया।
- दहिया राजवंश की कुलदेवी के रूप में इनकी पूजा होती है।
❖ नारायणी माता
➤ मंदिर
- अलवर के राजगढ़ क्षेत्र की बरवा की डूंगरी में इनका मंदिर स्थित है।
- मंदिर का निर्माण प्रतिहार शैली में किया गया है।
➤ विशेष तथ्य
- नाई जाति की कुलदेवी के रूप में इनकी मान्यता है।
- मंदिर के पुजारी मीणा जाति से होते हैं।
- इनके पति को साँप ने डस लिया था। उस समय मीणा जाति के युवकों ने चिता तैयार करने में सहायता की थी।
- बाद में नारायणी माता अपने पति के साथ सती हो गई थीं।
❖ आई माता
- जोधपुर जिले के बिलाड़ा में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
- सीरवी जाति के क्षत्रियों की कुलदेवी मानी जाती हैं।
- रामदेव जी की शिष्या थीं।
- मंदिर में दीपक की ज्योति से केसर टपकने की मान्यता है।
- मंदिर को दरगाह तथा थान को बडेर कहा जाता है।
❖ स्वांगिया माता
- जैसलमेर के भाटी वंश की कुलदेवी हैं।
- जैसलमेर के राज्यचिह्न में सबसे ऊपर सुगनचिड़ी तथा देवी के हाथ में मुड़ा हुआ स्वांग (भाला) अंकित किया गया है।
❖ आवड़ माता
- हिंगलाज माता का अवतार माना जाता है।
- जैसलमेर के तेमडा पर्वत पर इनका मंदिर स्थित है, इसलिए इन्हें तेमडा ताई भी कहा जाता है।
- जैसलमेर के भाटी राजवंश की आराध्य देवी हैं।
❖ आशापुरी माता / महोदरी माता
- जालौर के सोनगरा चौहानों की कुलदेवी हैं।
❖ शीला देवी
➤ विशेष तथ्य
- कच्छवाहा वंश की इष्ट देवी एवं आराध्य देवी हैं।
- मिर्जा राजा मानसिंह ने पूर्वी बंगाल के राजा केदार को पराजित करने के बाद देवी की प्रतिमा बंगाल से आमेर लाकर मंदिर का निर्माण कराया।
- मंदिर में संगमरमर का कार्य मानसिंह द्वितीय द्वारा कराया गया।
❖ जमुवाय माता
- इनका मंदिर जयपुर जिले के जमवारामगढ़ में स्थित है।
- कच्छवाहा वंश की कुलदेवी हैं।
- जमवारामगढ़ (जयपुर) को डुंडांड का पुष्कर कहा जाता है।
❖ राणी सती
- प्रमुख मंदिर झुंझुनूं में स्थित है।
- इनका मूल नाम नारायणी बाई था।
- इनके पति का नाम तन धन दास था।
- भाद्रपद अमावस्या को यहाँ विशाल मेला आयोजित होता है।
- इन्हें दादी जी तथा राणी दादी के नाम से भी जाना जाता है।
❖ सकराय माता
- झुंझुनूं जिले के उदयपुरवाटी में इनका मंदिर स्थित है।
- अकाल के समय लोगों की सहायता हेतु फल एवं सब्जियाँ उत्पन्न करने के कारण इन्हें शाकम्भरी कहा गया।
- खंडेलवालों की कुलदेवी हैं।
❖ सुगाली माता
➤ मंदिर
- इनका मंदिर पाली जिले के आउवा में स्थित है।
➤ विशेष तथ्य
- आउवा के चंपावतों की कुलदेवी हैं।
- इन्हें 1857 की क्रांति की देवी भी कहा जाता है।
- इनका स्वरूप 10 सिर एवं 54 हाथ वाला माना जाता है, जिसे 64 योगिनी माता से संबंधित माना जाता है।
- वर्तमान में इनकी प्रतिमा पाली संग्रहालय (बांगड़ म्यूजियम) में सुरक्षित रखी गई है।
❖ ब्राह्मणी माता
- प्रमुख मंदिर बारां जिले के सोरसन में स्थित है।
- इस मंदिर में देवी की पीठ की पूजा की जाती है।
- प्रत्येक वर्ष माघ शुक्ल सप्तमी को यहाँ गधों का मेला आयोजित होता है।
❖ पथवारी माता
- तीर्थयात्रा पर जाते समय तथा वापस लौटने पर पथवारी माता की पूजा की जाती है।
- इनकी स्थापना सामान्यतः गाँव के बाहर मार्ग के किनारे की जाती है।
❖ जिलानी माता
- कोटपूतली-बहरोड़ जिले के बहरोड़ में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
❖ अधर देवी (अर्बुदा)
➤ मंदिर
- सिरोही जिले के माउंट आबू में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
➤ विशेष तथ्य
- इन्हें राजस्थान की वैष्णो देवी के नाम से जाना जाता है।
❖ तनोट माता
➤ मंदिर
- जैसलमेर जिले के तनोट में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
➤ विशेष तथ्य
- मंदिर में बी.एस.एफ. (B.S.F.) के जवान नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते हैं।
- 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना द्वारा मंदिर परिसर में अनेक बम गिराए गए थे।
- इन्हें थार की वैष्णो देवी तथा रूमाल वाली देवी के नाम से भी जाना जाता है।
❖ सच्चियाय माता
- जोधपुर जिले के ओसियां में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
- ओसवाल समाज की कुलदेवी के रूप में इनकी पूजा की जाती है।
❖ ज्वाला माता
- जयपुर जिले के जोबनेर में इनका मंदिर स्थित है।
- खंगरातों की कुलदेवी मानी जाती हैं।
❖ बड़ली माता
- चित्तौड़गढ़ जिले के अकोला में इनका मंदिर स्थित है।
- ऐसी मान्यता है कि मंदिर की तिबारियों से बीमार बच्चों को निकालने पर उनकी बीमारी दूर हो जाती है।
❖ लटियाल माता
- फलौदी में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
- कल्ला ब्राह्मणों की कुलदेवी हैं।
- मंदिर के सामने खेजड़ी वृक्ष स्थित होने के कारण इन्हें खेजड़बेरी राय भवानी भी कहा जाता है।
❖ शाकम्भरी देवी
- जयपुर जिले के सांभर में इनका मंदिर स्थित है।
- अजमेर के चौहानों की कुलदेवी मानी जाती हैं।
❖ त्रिपुरा सुंदरी
➤ मंदिर
- बाँसवाड़ा जिले के तलवाड़ा क्षेत्र के उमराई गाँव में इनका मंदिर स्थित है।
➤ विशेष तथ्य
- पांचाल जाति की कुलदेवी हैं।
- इनकी 18 भुजाओं वाली काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है।
- इन्हें तुरताई माता तथा त्रिपुरा महालक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है।
❖ चौथ माता
- सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
- कंजर जाति की कुलदेवी मानी जाती हैं।
❖ आवरी / असावरी माता
- चित्तौड़गढ़ जिले के निकुंभ में इनका मंदिर स्थित है।
- ऐसी मान्यता है कि यहाँ लकवा रोग के उपचार हेतु श्रद्धालु आते हैं।
❖ बाण माता
- चित्तौड़गढ़ में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
- मेवाड़ के सिसोदिया वंश की कुलदेवी हैं।
❖ नागणेची माता
➤ मंदिर
- बालोतरा जिले के नगाणा गाँव में इनका मंदिर स्थित है।
- मंदिर का निर्माण राव धूहड़ ने कराया।
➤ विशेष तथ्य
- जोधपुर के राठौड़ों की कुलदेवी हैं।
- इनकी 18 भुजाओं वाली काठ की प्रतिमा राव बीका द्वारा स्थापित कराई गई थी।
❖ चामुंडा माता
➤ मंदिर
- जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
➤ विशेष तथ्य
- जोधपुर के राठौड़ वंश की इष्ट देवी हैं।
- गुर्जर प्रतिहार वंश की कुलदेवी भी मानी जाती हैं।
- 2008 में मंदिर में हुई भगदड़ की जाँच जसराज चोपड़ा आयोग द्वारा की गई थी।
❖ कंठेसरी माता
- आदिवासी समुदाय की प्रमुख आराध्य देवी मानी जाती हैं।
❖ धोलागढ़ देवी
- अलवर जिले के बहुतकलां में इनका मंदिर स्थित है।
❖ दधिमती माता
- नागौर जिले के गोठ मांगलोद में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
- इस मंदिर का संबंध गुर्जर प्रतिहार काल से माना जाता है।
❖ इंद्र माता / बिजासन माता
- बूंदी जिले के इन्द्रगढ़ में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
❖ घेवर माता
- राजसमंद झील की पाल पर इनका मंदिर स्थित है।
❖ छींक माता
- जयपुर में इनका मंदिर स्थित है।
❖ छींच माता
- बांसवाड़ा में इनका मंदिर स्थित है।
❖ भदाना माता
- कोटा में इनका मंदिर स्थित है।
❖ नकटी माता
- जयपुर में इनका मंदिर स्थित है।
❖ जलदेवी माता
- राजसमंद जिले के रेलमगरा क्षेत्र के सांसेरा में इनका मंदिर स्थित है।
