राजस्थान के लोकदेवता

पंचपीर

राजस्थान के वे पाँच लोकदेवता, जिनकी श्रद्धापूर्वक पूजा हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों द्वारा की जाती है, पंचपीर कहलाते हैं।

  1. पाबूजी राठौड़
  2. हड़बूजी
  3. रामदेवजी
  4. मेहाजी मांगलिया
  5. गोगाजी

स्मरणीय पंक्ति

पाबू हड़बू रामदे, मांगलिया मेहा।
पाँचू पीर पधारजो, गोगाजी जेहा।।

पाबूजी राठौड़

शीर्षक विवरण
जन्म 1239 ई. में कोलू (वर्तमान फलौदी, राजस्थान) में जन्म हुआ।
पिता धांधलजी राठौड़ – मारवाड़ के शासक राव आस्थान के पुत्र तथा राव सीहा के वंशज थे।
माता कमलादे
पत्नी फूलमदे (सुप्यारदे) – अमरकोट के शासक सूरजमल सोढ़ा की पुत्री थीं।
प्रसिद्ध घोड़ी केसर कालमी – यह देवल चारणी की प्रसिद्ध घोड़ी थी।

उपनाम एवं विशेषताएँ

  • गौ रक्षक देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
  • लक्ष्मण का अवतार माना जाता है।
  • प्लेग रक्षक देवता के रूप में भी इनकी मान्यता है।
  • ऊँटों के देवता के नाम से प्रसिद्ध हैं।
  • मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट लाने का श्रेय पाबूजी को दिया जाता है।
  • राइका (रेबारी) ऊँटपालक समुदाय इन्हें अपना आराध्य देव मानता है।

प्रमुख घटनाएँ – 

  • गुजरात के शासक आना बघेला के विरुद्ध विद्रोह करने वाले सात थोरी भाइयों (चांदा, देवा, खापू, पेमा आदि) को पाबूजी ने शरण प्रदान की।
  • जायल (नागौर) के जिंदराव खिची, जो पाबूजी के बहनोई थे, उन्होंने देवल चारणी की गायों का अपहरण कर लिया।
  • गायों की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए देचू गाँव (फलौदी) में पाबूजी वीरगति को प्राप्त हुए। यही उनकी समाधि स्थल है।
  • इनके प्रमुख सहयोगियों में चांदा, डेमा तथा हरमल रेबारी शामिल थे।
  • विवाह के समय पाबूजी ने केवल साढ़े तीन फेरे लिए थे।

मंदिर – 

  • प्रमुख मंदिर कोलू मण्ड (फलौदी) में स्थित है। यहाँ केसर कालमी घोड़ी पर सवार पाबूजी की प्रतिमा स्थापित है, जिसमें उनकी पाग बाईं ओर झुकी हुई तथा हाथ में भाला दर्शाया गया है।
  • यहाँ प्रत्येक वर्ष चैत्र अमावस्या को विशाल मेले का आयोजन होता है।
  • अन्य प्रमुख मंदिर आहाड़ (उदयपुर) में स्थित है।

धार्मिक मान्यता –

  • मेहर जाति के मुस्लिम समुदाय द्वारा पाबूजी को पीर के रूप में पूजा जाता है।

लोक साहित्य एवं लोक परंपरा –

  • पाबूजी के पवाड़े नायक एवं रेबारी समुदाय द्वारा माठ वाद्य यंत्र की संगत में गाए जाते हैं।
  • पाबूजी की फड़ का वाचन नायक जाति के कलाकार रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथ करते हैं।

प्रमुख रचनाएँ

रचना रचनाकार
पाबू प्रकाश आशिया मोडजी
पाबूजी रा छन्द बीठू मेहाजी
पाबूजी रा सोरठा रामनाथ कविया
पाबूजी रा दोहा लघराज
पाबूजी के गीत बांकीदास
पाबूजी री बात लक्ष्मीकुमारी चुंडावत

रामदेवजी तंवर

शीर्षक विवरण
जन्म भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (बाबे री बीज/दूज) के दिन ऊंडूकासमेर (शिव, बाड़मेर) में जन्म हुआ।
पिता अजमलजी तंवर
माता मैणादे
पत्नी नेतलदे – अमरकोट के दलैसिंह सोढ़ा की अपंग पुत्री थीं।
गुरु बालीनाथजी – जिनकी समाधि मसूरिया पहाड़ी (जोधपुर) पर स्थित है।
प्रसिद्ध घोड़ा लीला

लोकपंक्ति

“घणी घणी ओ खम्मा, अजमल जी रा कवरा।
वो मैणादे रो लाल, नेतलदे रा भरतार।।”

विशेष मान्यताएँ –

  • बीरमदेव, जो इनके बड़े भाई थे, उन्हें बलराम का अवतार माना जाता है।
  • रामदेवजी को कृष्ण का अवतार माना जाता है।

उपनाम – 

  • रुणेचा रा धणी
  • पीरों के पीर
  • रामसा पीर (मुस्लिम समुदाय द्वारा)

प्रमुख घटनाएँ –

  • बाल्यकाल में मल्लिनाथजी से पोकरण प्राप्त किया।
  • भैरव राक्षस का वध कर पोकरण को पुनः बसाया।
  • बाद में पोकरण अपनी भतीजी को दहेज स्वरूप प्रदान किया।
  • मक्का से आए पाँच पीरों ने इनके चमत्कारों से प्रभावित होकर इन्हें पीरों का पीर की उपाधि दी।
  • भाद्रपद शुक्ल एकादशी को रामसरोवर झील के किनारे स्थित रामदेवरा में 1458 ई. (वि.सं. 1515) में इन्होंने जीवित समाधि ली।
  • इनकी जीवित समाधि से एक दिन पूर्व उनकी धर्मबहन डालीबाई मेघवाल ने भी जीवित समाधि ग्रहण की।

कामड़िया पंथ –

  • समाज में ऊँच-नीच और भेदभाव समाप्त करने के उद्देश्य से रामदेवजी ने कामड़िया पंथ की स्थापना की।
  • रामदेवजी के मेले में कामड़ जाति की महिलाएँ तेरहताली नृत्य प्रस्तुत करती हैं।

मंदिर – 

  • प्रमुख मंदिर रुणेचा (रामदेवरा), जैसलमेर में स्थित है।
  • मंदिर पर फहराई जाने वाली पाँच रंगों की ध्वजा नेजा कहलाती है।
  • रामदेवजी का मंदिर देवल के नाम से जाना जाता है।
  • मंदिर में स्थापित चरणचिह्नों को पगलिये कहा जाता है।

मेला – 

  • भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक विशाल मेले का आयोजन होता है।
  • इसे राजस्थान का सबसे बड़ा सांप्रदायिक सद्भाव का मेला माना जाता है, जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय बड़ी संख्या में सम्मिलित होते हैं।

अन्य प्रमुख तथ्य –

  • मेले के दौरान होने वाला रात्रि जागरण जम्मा कहलाता है।
  • मेघवाल समुदाय के इनके भक्त रिखिया कहलाते हैं।
  • इनके चमत्कारों को पर्चा कहा जाता है।
  • भक्तों द्वारा गाए जाने वाले भजनों को ब्यावले कहा जाता है।
  • श्रद्धालु कपड़े अथवा मिट्टी के घोड़े अर्पित करते हैं।
  • रामदेवजी की फड़ का वाचन कामड़िया भोपा द्वारा रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथ किया जाता है।
  • हिंदू धर्म के शुद्धिकरण हेतु इन्होंने परावर्तन अभियान चलाया।
  • रामदेवजी एकमात्र ऐसे लोकदेवता माने जाते हैं जो कवि भी थे। उन्होंने 24 वाणियों की रचना की।

अन्य प्रमुख मंदिर – 

स्थान विशेषता
ऊंडूकासमेर (बाड़मेर) जैसलमेर के पीले पत्थरों से निर्मित
मसूरिया पहाड़ी (जोधपुर) प्रमुख मंदिर
सुरतारखेड़ा (चित्तौड़गढ़) प्रमुख मंदिर
बिराठिया (ब्यावर) प्रमुख मंदिर
खुडियास (अजमेर) राजस्थान का छोटा रामदेवरा
गुजरात छोटा रामदेवरा स्थित है

गोगाजी चौहान

शीर्षक विवरण
जन्म 1003 विक्रम संवत में ददरेवा (चूरू) में जन्म हुआ।
पिता जेवर सिंह
माता बाछल देवी
गुरु गोरखनाथजी
पत्नी केलमदेकोलू मंड की राजकुमारी थीं।

नागदेवता से संबंधित कथा –

  • विवाह से पूर्व केलमदे को सर्पदंश हो गया। इससे क्रोधित होकर गोगाजी ने सर्पों का संहार प्रारम्भ कर दिया।
  • तब नाग देवता प्रकट हुए, उन्होंने केलमदे का विष उतारा तथा गोगाजी को नागों के देवता होने का वरदान प्रदान किया।

प्रमुख घटनाएँ – 

  • अरजन और सुरजन, जो गोगाजी के मौसेरे भाई थे, उन्होंने भूमि बँटवारे के विवाद के कारण सभी गायें महमूद गजनवी को सौंप दीं।
  • गायों की रक्षा के लिए गोगाजी ने महमूद गजनवी से युद्ध किया और युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त की।
  • महमूद गजनवी ने गोगाजी को जाहर पीर (साक्षात देवता) की उपाधि दी।

शीशमेड़ी एवं धुर्मेड़ी – 

  • युद्ध के दौरान गोगाजी का शीश ददरेवा में गिरा, जिसे शीशमेड़ी कहा जाता है।
  • उनका धड़ (शरीर) गोगामेड़ी (नोहर-हनुमानगढ़) में गिरा, जो धुर्मेड़ी के नाम से प्रसिद्ध है।

उपनाम – 

  • मुस्लिम समुदाय इन्हें गोगापीर के नाम से पूजता है।
  • हिंदू समुदाय इन्हें नागराज के रूप में मानता है।
  • गोगा बाप्पा भी इनका प्रसिद्ध नाम है।

धार्मिक मान्यताएँ एवं परंपराएँ – 

  • इनके पुत्र केसरिया कुंवरजी के थान पर सफेद ध्वजा चढ़ाई जाती है।
  • गोगाजी के थान सामान्यतः खेजड़ी के वृक्ष के नीचे स्थापित होते हैं, जहाँ एक पत्थर पर सर्प की आकृति बनी होती है।

लोकप्रचलित कहावत

“गाँव-गाँव खेजड़ी, गाँव-गाँव गोगो।”

  • सांचौर (जालोर) में स्थित गोगाजी की झोपड़ी गोगाजी की ओल्डी कहलाती है।
शीर्षक विवरण
प्रमुख मेला भाद्रपद कृष्ण नवमी (गोगा नवमी) के अवसर पर प्रमुख मेले का आयोजन किया जाता है।
वाहन नीली घोड़ी पर सवार गोगाजी के हाथ में भाला दर्शाया जाता है।
घोड़े का नाम जवादिया
कृषि परंपरा किसान हल जोतने से पहले गोगाजी के नाम की गोगा राखड़ी (जिसमें 9 गाँठें होती हैं) हल तथा हाली (कृषक) दोनों को बाँधते हैं।

प्रमुख रचना –

ग्रंथ रचनाकार
गोगाजी रा रसावला बीठू मेहा

हड़बूजी सांखला

शीर्षक विवरण
परिचय हड़बूजी हड़बूजी, रामदेवजी के मौसेरे भाई थे।
जन्म भूंडेल (नागौर) में जन्म हुआ।
पिता मेहाजी सांखला
गुरु बालीनाथजी
उपनाम शकुन शास्त्र के ज्ञाता
वाहन सिया (बैलगाड़ी)
प्रमुख मंदिर बेंटी गाँव स्थित मंदिर में आज भी हड़बूजी की बैलगाड़ी की पूजा की जाती है।

प्रमुख घटना – 

  • हड़बूजी के आशीर्वाद तथा उनके द्वारा प्रदान की गई कटार के बल पर राव जोधा ने पुनः मंडोर पर अधिकार स्थापित किया।
  • इसके उपलक्ष्य में राव जोधा ने हड़बूजी को बेंटी गाँव (फलौदी) प्रदान किया।

मेहाजी मांगलिया

शीर्षक विवरण
परिचय मेहाजी मेहाजी मारवाड़ के शासक राव चूंडा के समकालीन थे।
जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (मेहाजी की अष्टमी) के दिन तापू गाँव (जोधपुर) में जन्म हुआ।
घोड़ा किरड काबरा
प्रमुख मंदिर बापणी (फलौदी) में स्थित है।
विशेष तथ्य मेहाजी के पुजारी वंश में वृद्धि नहीं करते

प्रमुख घटना – 

  • अपनी धर्मबहन पाना गुजरी की गायों की रक्षा करते हुए मेहाजी वीरगति को प्राप्त हुए।

तेजाजी

शीर्षक विवरण
जन्म 1073 ई. में माघ शुक्ल चतुर्दशी के दिन खड़नाल (नागौर) में जाट समाज के धौलिया गोत्र में जन्म हुआ।
पिता ताहड़जी
माता रामुकवरी
पत्नी पैमलदेपनेर (अजमेर) की थीं।
घोड़ी लीलण (सिणगारी)

प्रतीक – 

  • तेजाजी की प्रतिमा सामान्यतः अश्वारोही रूप में दिखाई जाती है, जिसमें वे हाथ में तलवार धारण किए रहते हैं तथा उनकी जीभ पर सर्पदंश दर्शाया जाता है।

धार्मिक परंपरा – 

  • तेजाजी के पुजारी को घोड़ला कहा जाता है, जो सर्पदंश का उपचार करने वाला माना जाता है।
  • इनके पूजा स्थल के चबूतरे को थान कहा जाता है।

प्रमुख घटना – 

  • लाछा गुजरी की गायों को मेर (आमेर) के मीणाओं से मुक्त कराते समय सुरसुरा (अजमेर) में भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजादशमी) के दिन तेजाजी वीरगति को प्राप्त हुए।
  • उनकी वीरगति का समाचार उनकी घोड़ी लीलण ने पहुँचाया, जिसके बाद उनकी पत्नी पैमलदे सती हो गईं।

उपनाम – 

  • सर्परक्षक देवता
  • काला और बाला के देवता
  • शिव का अवतार।
  • धौलिया वीर
  • कृषि उपकारक देवता

विशेष तथ्य – 

  • किसान खेतों की बुवाई के समय तेजा गीत अथवा तेजाटेर गाकर तेजाजी का स्मरण करते हैं।
  • 2011 में तेजाजी के सम्मान में ₹5 का डाक टिकट जारी किया गया।
  • अजमेर जिले के प्रमुख लोकदेवता के रूप में इनकी विशेष मान्यता है।

मुख्य मंदिर / तीर्थस्थल – 

  • प्रमुख तीर्थस्थल परबतसर (डीडवाना-कुचामन) में स्थित है।
  • महाराजा अभयसिंह के शासनकाल में तेजाजी की प्रतिमा सुरसुरा से परबतसर लाई गई थी।

अन्य प्रमुख मंदिर – 

स्थान विशेषता
सुरसुरा (अजमेर) तेजाजी की निर्वाण (मृत्यु) स्थली
सैंदरिया (ब्यावर) यहाँ तेजाजी को सर्पदंश हुआ था
भावंता (अजमेर) प्रमुख मंदिर
बाँसी दुगारी (बूंदी) तेजाजी की कर्मस्थली

मेला – 

  • परबतसर (डीडवाना-कुचामन) में प्रसिद्ध तेजाजी पशु मेला आयोजित किया जाता है।

देवनारायणजी

शीर्षक विवरण
जन्म गोठ दड़ावंत (आसींद, भीलवाड़ा) में जन्म हुआ।
पिता सवाईभोज
माता सेडू खटाणी
पत्नी पीपलदे
बचपन का नाम उदयसिंह
घोड़ा लीलागर

विशेष परिचय – 

  • भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।
  • बगड़ावत कुल के नागवंशीय गुर्जर थे।
  • आयुर्वेद एवं औषधि शास्त्र के ज्ञाता थे तथा गोबर एवं नीम के महत्व का प्रचार किया।

धार्मिक परंपरा – 

  • इनके देवरों में प्रतिमा के साथ ईंटों की भी पूजा की जाती है।

मुख्य मंदिर –

  • सवाईभोज का मंदिर आसींद में खारी नदी के किनारे स्थित है।

मेला –

  • भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को देवनारायणजी का प्रमुख मेला आयोजित होता है।

फड़ –

  • देवनारायणजी की फड़ राजस्थान की सबसे लंबी एवं सबसे प्राचीन फड़ मानी जाती है।
  • इसका वाचन गुर्जर भोपा द्वारा जंतर वाद्ययंत्र की संगत में किया जाता है।

डाक टिकट – 

  • 2 सितंबर 1992 को देवनारायणजी की फड़ पर ₹5 का डाक टिकट जारी किया गया।
  • 2011 में देवनारायणजी के सम्मान में भी ₹5 का डाक टिकट जारी किया गया।

अन्य प्रमुख मंदिर – 

स्थान विशेषता
देवमाली (ब्यावर) देवनारायणजी की देहावसान स्थली; बगड़ावतों का गाँव कहलाता है
देवधाम जोधपुरिया (टोंक) प्रमुख तीर्थस्थल
देव डूंगरी पहाड़ी (चित्तौड़गढ़) प्रमुख मंदिर

मल्लीनाथजी

शीर्षक विवरण
पिता राव सलखा – महवा (बाड़मेर) के शासक थे।
माता ज्याणी दे
दादा राव तीडा
विशेष परिचय मारवाड़ के शासक होने के बावजूद अपनी पत्नी रूपादे की प्रेरणा से उगमसी भाटी के शिष्य बने तथा योग साधना की दीक्षा ग्रहण की।
प्रमुख मंदिर तिलवाड़ा (बालोतरा) में लूणी नदी के किनारे स्थित है।
प्रमुख मेला चैत्र कृष्ण ग्यारस से चैत्र शुक्ल ग्यारस तक प्रसिद्ध मेले का आयोजन किया जाता है।

विशेष तथ्य – 

  • बाड़मेर के मालाणी क्षेत्र का नाम मल्लीनाथजी के नाम पर पड़ा।
  • मालाणी का वर्तमान नाम गुडामालानी है।
  • कुंडा पंथ की स्थापना का श्रेय मल्लीनाथजी को दिया जाता है।

तल्लीनाथजी

शीर्षक विवरण
मूल नाम गांगदेव राठौड़
गुरु जालंधरनाथ
परिचय पाबूजी जालौर जिले के प्रमुख लोकदेवता माने जाते हैं। वे मल्लीनाथजी के भाई बीरमदेव के पुत्र तथा शेरगढ़ (जोधपुर) ठिकाने के सामंत थे।
प्रमुख मंदिर पाँचोटा (जालौर) में स्थित है।
धार्मिक मान्यता जहरीले जीव-जंतु के काटने पर पाबूजी के नाम का डोरा बाँधा जाता है।
उपनाम ओरण के देवता
विशेष तथ्य ओरण उस संरक्षित क्षेत्र को कहा जाता है, जहाँ मंदिर के आसपास पेड़-पौधों की कटाई नहीं की जाती

बग्गाजी जाट

शीर्षक विवरण
जन्म रेडी गाँव (बीकानेर) में जन्म हुआ।
परिचय बिग्गाजी जाखड़ समाज के प्रमुख लोकदेवता के रूप में पूजनीय हैं।

हरिराम बाबा

  • जन्म, समाधि एवं मंदिर – झोरड़ा गाँव (नागौर) ही हरिराम बाबा का जन्मस्थान, समाधि स्थल तथा प्रमुख मंदिर है।
  • विशेष धार्मिक परंपरा – इनके मंदिर में सर्प की बांबी की पूजा की जाती है।

रूपनाथजी (झरड़ाजी)

शीर्षक विवरण
परिचय रूपनाथजी (झरड़ाजी), पाबूजी के बड़े भाई बुढोजी के पुत्र थे।
प्रमुख मंदिर कोलू मण्ड (फलौदी) में स्थित है।
प्रमुख घटना जिंदराव खींची का वध कर अपने चाचा पाबूजी की हत्या का प्रतिशोध लिया।
विशेष तथ्य हिमाचल प्रदेश में रूपनाथजी की पूजा बालकनाथ के रूप में की जाती है।

झुंझारजी

शीर्षक विवरण
जन्म इमलोहा (सीकर) में जन्म हुआ।
प्रमुख मेला रामनवमी के अवसर पर प्रतिवर्ष प्रमुख मेले का आयोजन किया जाता है।
विशेष परिचय झुंझारजी शेखावाटी क्षेत्र के प्रमुख लोकदेवता के रूप में पूजनीय माने जाते हैं।

मामादेव

  • उपनाम – वर्षा के लोकदेवता

धार्मिक परंपरा

  • मामादेव का पारंपरिक मंदिर नहीं बनाया जाता, बल्कि गाँव के मुख्य मार्ग के बाहर लकड़ी का तोरण स्थापित किया जाता है।
  • इन्हें प्रसन्न करने के लिए भैंसे की बलि दी जाती है।
  • मामादेव के लिए अर्पित किए जाने वाले मिट्टी के घोड़े हरजी गाँव (जालौर) में बनाए जाते हैं।

वीर फताजी

शीर्षक विवरण
प्रमुख मंदिर सांथू गाँव (जालौर) में स्थित है।
प्रमुख मेला भाद्रपद शुक्ल नवमी के अवसर पर प्रतिवर्ष प्रमुख मेले का आयोजन किया जाता है।

आलमजी

शीर्षक विवरण
परिचय आलमजी जैतमलोत राठौड़ वंश से संबंधित थे।
प्रमुख मंदिर आलमजी का धोरा (बाड़मेर) में लूणी नदी के किनारे स्थित है।
उपनाम घोड़ों के लोकदेवता

डूंगरजी–जवाहरजी

शीर्षक विवरण
जन्म बठोट पाटोदा (सीकर) में जन्म हुआ।
विशेष परिचय डूंगरजी–जवाहरजी शेखावाटी क्षेत्र के प्रमुख लोकदेवता के रूप में पूजनीय माने जाते हैं।

भोमियाजी

शीर्षक विवरण
उपनाम भूमि रक्षक देवता
परिचय भोमियाजी भूमि के रक्षक देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
प्रमुख मंदिर नाहरसिंह भोमिया मंदिर (जयपुर) प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है।

खेतरपाल (क्षेत्रपाल)

विशेष तथ्य

  • राजस्थान में ग्राम रक्षक देवता के रूप में इनकी पूजा की जाती है।
  • इनके सर्वाधिक मंदिर डूंगरपुर जिले में स्थित हैं।

इलोजी

उपनाम

  • मारवाड़ में छेड़छाड़ के लोकदेवता के रूप में प्रसिद्ध हैं।

विशेष मान्यता

  • ऐसी लोकमान्यता है कि वे अविवाहित युवाओं को दुल्हन का आशीर्वाद देते हैं, जबकि स्वयं आजीवन अविवाहित रहे।
  • होलिका को इनकी प्रेमिका माना जाता है।
  • बाड़मेर में होली के अवसर पर इलोजी की बारात निकाली जाती है।

भूरिया बाबा (गौतमेश्वर महोदय)

शीर्षक विवरण
परिचय भूरिया बाबा (गौतमेश्वर महोदय) गौड़वाड़ क्षेत्र की मीणा जाति के इष्ट देव के रूप में पूजे जाते हैं।
प्रमुख मंदिर पौसलिया (शिवगंज, सिरोही) में स्थित है।

देवबाबा

  • मंदिर – प्रमुख मंदिर नगला जहाज (भरतपुर) में स्थित है।
  • उपनाम – ग्वालों के पालनहार

धार्मिक परंपरा

  • इनका पूजा स्थल नीम के वृक्ष के नीचे स्थापित होता है।
  • इनकी सवारी भैंसा मानी जाती है।

वीर कल्लाजी राठौड़

परिवार

  • मेड़ता के जयमल राठौड़ के छोटे भाई आससिंह के पुत्र थे।
  • मीराबाई इनकी बुआ थीं।

प्रमुख घटना

  • अकबर के शासनकाल में चित्तौड़ के तीसरे साके के दौरान अपने चाचा जयमल राठौड़ को कंधों पर बैठाकर युद्ध किया।

उपनाम एवं मान्यता

  • शेषनाग का अवतार माना जाता है।
  • चार हाथों वाले देवता के रूप में इनकी पूजा की जाती है।
  • गुजरात में भाथी खत्री तथा मालवा में जुझारू वीर के नाम से पूजनीय हैं।

मुख्य मंदिर

  • प्रमुख मंदिर रनेला (रूणेला-सलूम्बर) में स्थित है।

अन्य प्रमुख स्थल

  • सामलिया (डूंगरपुर) में इनकी काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है, जिस पर अफीम एवं केसर अर्पित की जाती है।
  • चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भैरवपोल पर इनकी छतरी स्थित है।

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