❖ राजस्थान के दुर्ग
- महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान ऐसे राज्य हैं जहाँ सर्वाधिक दुर्ग स्थित हैं।
- 21 जून 2013 को यूनेस्को ने राजस्थान के छह प्रमुख दुर्गों को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया।
| विश्व धरोहर सूची में शामिल दुर्ग | स्थान |
|---|---|
| गागरोन दुर्ग | झालावाड़ |
| जैसलमेर दुर्ग | जैसलमेर |
| रणथम्भौर दुर्ग | सवाई माधोपुर |
| चित्तौड़गढ़ दुर्ग | चित्तौड़गढ़ |
| कुंभलगढ़ दुर्ग | राजसमंद |
| आमेर दुर्ग | जयपुर |
❖ यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल राजस्थान के अन्य स्थल
| स्थल | वर्ष |
|---|---|
| केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य, भरतपुर | 1985 |
| जंतर मंतर, जयपुर | जुलाई 2010 |
| कालबेलिया नृत्य | 2010 |
| जयपुर का परकोटा | 6 जुलाई 2019 |
- दुर्गों का सबसे प्राचीन वर्गीकरण मनुस्मृति में प्राप्त होता है।
- मनुस्मृति में दुर्गों के 6 प्रकार बताए गए हैं।
➤ कौटिल्य ने अपनी प्रसिद्ध कृति अर्थशास्त्र (राजनीति पर आधारित ग्रंथ) में दुर्गों को चार श्रेणियों में विभाजित किया है—
- औदक दुर्ग – चारों ओर जल से घिरा हुआ दुर्ग।
- पर्वत दुर्ग – पर्वत अथवा ऊँची पहाड़ी पर निर्मित दुर्ग, जिसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
- धन्वन दुर्ग – मरुस्थलीय क्षेत्र से घिरा हुआ दुर्ग।
- वन दुर्ग – वनों एवं घनी झाड़ियों से सुरक्षित दुर्ग।
➤ आचार्य शुक्र ने शुक्रनीति में दुर्गों के 9 प्रकार बताए हैं—
- गिरी दुर्ग – पर्वत या पहाड़ी पर निर्मित दुर्ग।
- उदाहरण – चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़ तथा तारागढ़।
- राजस्थान के अधिकांश दुर्ग इसी श्रेणी में आते हैं।
- औदक दुर्ग (जलदुर्ग) – जल से चारों ओर घिरा हुआ दुर्ग।
- उदाहरण – गागरोन दुर्ग, भैंसरोड़गढ़ दुर्ग तथा शेरगढ़ दुर्ग (बारां)।
- वन दुर्ग – चारों ओर वन क्षेत्र से सुरक्षित दुर्ग।
- उदाहरण – सिवाना दुर्ग तथा रणथम्भौर दुर्ग।
- धन्वन दुर्ग – मरुस्थल अथवा रेत से घिरा हुआ दुर्ग।
- उदाहरण – सोनारगढ़, जूनागढ़, नागौर दुर्ग तथा भटनेर दुर्ग।
- एरण दुर्ग – जहाँ पहुँचने का मार्ग पथरीला एवं काँटेदार झाड़ियों से युक्त हो।
- उदाहरण – चित्तौड़गढ़ दुर्ग तथा जालौर दुर्ग।
- पारिख दुर्ग – जिसके चारों ओर सुरक्षा हेतु गहरी खाई बनाई गई हो।
- उदाहरण – लोहागढ़ (भरतपुर) तथा जूनागढ़ दुर्ग (बीकानेर)।
- पारिध दुर्ग – चारों ओर ऊँची एवं मजबूत परकोटेदार दीवारों से सुरक्षित दुर्ग।
- सैन्य दुर्ग – जहाँ स्थायी रूप से सेना निवास करती हो। इसे सभी प्रकार के दुर्गों में श्रेष्ठ माना गया है।
- सहाय दुर्ग – ऐसा दुर्ग जो सदैव वीर योद्धाओं के अनुकूल एवं सुरक्षित माना जाए।
❖ गागरोन दुर्ग – झालावाड़
- आहू तथा कालीसिंध नदी के संगम पर बिना नींव के कठोर चट्टान पर निर्मित यह दुर्ग राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ जलदुर्ग माना जाता है।
- इसका निर्माण 11वीं सदी में डोड परमार शासकों ने कराया था। इसी कारण इसे डोडगढ़ अथवा धूलरगढ़ के नाम से भी जाना जाता है।
- खींची राजवंश के संस्थापक देवनसिंह ने बिजलदेव डोड को पराजित कर इस दुर्ग पर अधिकार किया और इसका नाम गागरोन रखा।
- 1423 ई. में मांडू (मालवा) के शासक होशंगशाह ने अचलदास खींची पर आक्रमण किया, जिसके परिणामस्वरूप गागरोन का प्रथम शाका हुआ।
- 1444 ई. में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम ने पाल्हण सिंह पर आक्रमण किया। इस अवसर पर दूसरा शाका हुआ तथा विजय के बाद दुर्ग का नाम मुस्तफाबाद रख दिया गया।
- बाद में सम्राट अकबर ने यह दुर्ग पृथ्वीराज राठौड़ को सौंप दिया। उन्होंने यहीं वेलि किशन रुकमणी री ग्रंथ की रचना की।
➤ दुर्ग के प्रमुख दर्शनीय स्थल—
- मधुसूदन मंदिर
- औरंगजेब द्वारा निर्मित बुलंद दरवाजा
- संत हमीदुद्दीन चिश्ती (मीठे शाह) की दरगाह
- कोटा राज्य की सिक्के ढालने वाली टकसाल
- संत पीपा की छतरी
- जौहर कुंड
❖ चित्तौड़गढ़ दुर्ग
➤ उपनाम— राजस्थान का गौरव
- किलों का सिरमौर
- मालवा का प्रवेश द्वार
- राजस्थान का दक्षिण-पूर्वी प्रवेश द्वार
- अलाउद्दीन खिलजी ने इसका नाम खिजराबाद दुर्ग रखा था।
- चित्तौड़गढ़ का प्राचीन एवं वास्तविक नाम चित्रकूट माना जाता है।
- प्रसिद्ध कहावत है— “गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया।”
- यह दुर्ग धन्वन दुर्ग को छोड़कर शेष सभी श्रेणियों में सम्मिलित माना जाता है।
- गम्भीरी तथा बेड़च नदी के संगम क्षेत्र में स्थित मेसा के पठार पर लगभग 1850 फीट की ऊँचाई पर इसका निर्माण हुआ है।
- क्षेत्रफल की दृष्टि से यह राजस्थान का सबसे बड़ा किला तथा राज्य का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है।
- 7वीं सदी में मौर्य राजा चित्रांग (चित्रांगद) ने इस दुर्ग का निर्माण कराया तथा इसका नाम चित्रकोट रखा, जो समय के साथ परिवर्तित होकर चित्तौड़गढ़ कहलाया।
- 734 ई. में बप्पा रावल ने अंतिम मौर्य शासक मानमौरी को पराजित कर इस दुर्ग पर अधिकार स्थापित किया।
- चित्तौड़गढ़ दुर्ग में सर्वाधिक तीन शाके हुए हैं।
❖ चित्तौड़गढ़ दुर्ग के सात प्रवेश द्वार
| प्रवेश द्वार | विशेषता |
|---|---|
| पाडन पोल | रावत बाघसिंह का स्मारक स्थित है। |
| भैरव पोल | भैरव पोल और हनुमान पोल के मध्य जयमल राठौड़ एवं कल्ला राठौड़ की छतरियाँ स्थित हैं। |
| हनुमान पोल | उपर्युक्त स्मारकों के निकट स्थित। |
| गणेश पोल | प्रमुख प्रवेश द्वारों में एक। |
| जोड़ला (जोडन) पोल | दुर्ग के सात द्वारों में सम्मिलित। |
| लक्ष्मण पोल | प्रमुख सुरक्षा द्वार। |
| राम पोल | दुर्ग का मुख्य प्रवेश द्वार, जिसके सामने पत्ता सिसोदिया का स्मारक स्थित है। |
महाराणा कुंभा ने इन सातों प्रवेश द्वारों का निर्माण कराया, इसलिए उन्हें चित्तौड़गढ़ दुर्ग का आधुनिक निर्माता कहा जाता है।
❖ दुर्ग की प्रमुख इमारतें
➤ विजय स्तंभ
- यह 9 मंजिला तथा लगभग 122 फीट ऊँचा स्मारक है।
- इसका समर्पण भगवान विष्णु को किया गया है।
- इसे भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष, हिन्दू देवी-देवताओं का अजायबघर तथा कीर्ति स्तंभ के नाम से भी जाना जाता है।
- महाराणा कुंभा ने सारंगपुर युद्ध में महमूद खिलजी पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में इसका निर्माण 1440 ई. से 1448 ई. के बीच कराया।
- इसके प्रमुख वास्तुकार जैता तथा उनके पुत्र नापा, पूंजा और पोमा थे।
- यह राजस्थान की पहली इमारत थी, जिस पर 15 अगस्त 1949 को 1 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया।
- यह राजस्थान पुलिस तथा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिह्न भी है।
- फर्ग्यूसन ने इसकी तुलना रोम के टार्जन से की है।
- कर्नल जेम्स टॉड ने इसे कुतुबमीनार से भी श्रेष्ठ बताया है।
- इसका निर्माण लाल बलुआ पत्थर तथा सफेद संगमरमर से हुआ है। प्रवेश द्वार पर गदा और चक्र धारण किए हुए जनार्दन की प्रतिमा स्थापित है।
- प्रथम मंजिल पर ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र की प्रतिमाएँ हैं।
- दूसरी मंजिल पर हरिहर (विष्णु एवं शिव का संयुक्त स्वरूप) तथा अर्द्धनारीश्वर की मूर्तियाँ स्थित हैं।
- तीसरी मंजिल पर ‘अल्लाह’ शब्द 9 बार अंकित है।
- पाँचवीं मंजिल पर लक्ष्मी-नारायण तथा ब्रह्मा-सावित्री की युग्म प्रतिमाएँ हैं।
- छठी मंजिल पर सरस्वती, महालक्ष्मी एवं महाकाल की प्रतिमाएँ हैं, जबकि सातवीं मंजिल पर नृसिंह, रामचन्द्र, बुद्ध तथा भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की मूर्तियाँ स्थापित हैं।
- आठवीं मंजिल पर कोई प्रतिमा नहीं है।
- 1857 में इसकी नौवीं मंजिल पर बिजली गिरने से क्षति हुई थी, जिसके बाद महाराणा स्वरूप सिंह ने इसका पुनर्निर्माण कराया।
➤ जैन कीर्ति स्तम्भ
- यह स्तम्भ 7 मंजिला तथा लगभग 75 फीट ऊँचा है।
- इसका निर्माण 1301 ई. में जैन व्यापारी जीजा बघेरवाल तथा उनके पुत्र पूण्य सिंध ने कराया।
- यह प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) को समर्पित है।
❖ चित्तौड़गढ़ दुर्ग के प्रमुख मंदिर
- कालिका माता मंदिर – राजस्थान का प्राचीनतम सूर्य मंदिर माना जाता है।
- सतबीस देवरी जैन मंदिर – यहाँ 27 मंदिरों का समूह स्थित है।
- तुलजा भवानी मंदिर – इसका निर्माण बनवीर ने कराया।
- मीराबाई का मंदिर
➤ समीधेश्वर मंदिर
- यहाँ भगवान शिव की त्रिमुखी प्रतिमा स्थापित है।
- इसका निर्माण 11वीं सदी में मालवा के परमार शासक राजा भोज ने कराया।
- इसे त्रिभुवन नारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
- बाद में महाराणा मोकल ने इसका पुनर्निर्माण कराया, इसलिए इसे मोकलजी का मंदिर भी कहा जाता है।
➤ कुंभ श्याम मंदिर
- यह प्रतिहारकाल का मंदिर है, जिसे म्लेच्छों ने नष्ट कर दिया था।
- महाराणा कुंभा ने 1449 ई. में इसका पुनर्निर्माण कराकर यहाँ भगवान विष्णु के वराह अवतार की प्रतिमा स्थापित कराई।
➤ श्रृंगार चंवरी मंदिर
- इसका निर्माण 1448 ई. में महाराणा कुंभा के कोषाध्यक्ष वेलका ने कराया।
- इसी स्थान पर कुंभा की पुत्री रमाबाई के विवाह की चंवरी बनाई गई थी।
- मूल रूप से यह शांतिनाथ का जैन मंदिर है तथा इसका मध्य भाग गोलाकार गुंबद से आच्छादित है।
❖ किले के प्रमुख महल एवं स्मारक
- रानी पद्मिनी का महल
- गोरा-बादल महल
- फतह प्रकाश महल — इसका निर्माण महाराणा फतेह सिंह ने कराया।
- भामाशाह की हवेली
- अहाड़ा हिंगलू का महल
- नवलखाँ भंडार
- नवलखा बुर्ज
- नौ कोठा महल — यहीं पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान दिया।
- त्रिपोलिया दरवाजा
- कुंभा का महल
- भीमलत कुण्ड
- गोमुख कुंड
❖ कुम्भलगढ़ दुर्ग – राजसमंद
- मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा पर अरावली पर्वतमाला की 13 पहाड़ियों से घिरे गंधमादन पर्वत की चोटी पर स्थित यह एक प्रमुख गिरी दुर्ग है।
- यह दुर्ग समुद्र तल से लगभग 3600 फीट की ऊँचाई पर स्थित है।
- इसका प्रारंभिक निर्माण मौर्य शासक सम्प्रति द्वारा कराया गया था। बाद में उसी के ध्वंसावशेषों पर 1448 ई. में महाराणा कुंभा ने वर्तमान दुर्ग का निर्माण प्रारम्भ कराया।
- इस दुर्ग के प्रमुख शिल्पी (वास्तुकार) मण्डन थे।
- महाराणा कुंभा ने अपनी पत्नी कुम्भलदेवी के सम्मान में इसका नाम कुम्भलगढ़ दुर्ग रखा।
- संकट के समय मेवाड़ के शासकों की राजधानी यही दुर्ग हुआ करता था।
- इसके प्रवेश द्वारों में आरेट पोल प्रथम, हल्ला पोल द्वितीय तथा रामपोल मुख्य प्रवेश द्वार है।
- महाराणा उदयसिंह का राज्याभिषेक तथा महाराणा प्रताप का जन्म इसी कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था।
- इस दुर्ग की प्राचीर लगभग 36 किलोमीटर लंबी है। इसे भारत की सबसे बड़ी दीवार कहा जाता है, जिस पर एक साथ आठ घोड़े चल सकते हैं।
- कर्नल जेम्स टॉड ने इसकी मजबूत प्राचीरों एवं विशाल बुर्जों की तुलना एट्रूकन से की है।
- अबुल फजल के अनुसार, यह दुर्ग इतनी अधिक ऊँचाई पर स्थित है कि नीचे से ऊपर देखने पर व्यक्ति की पगड़ी तक गिर जाती है।
- दुर्ग के सबसे ऊँचे भाग में स्थित कटारगढ़ को मेवाड़ की आँख कहा जाता है।
❖ किले के प्रमुख महल एवं स्मारक
- झाली रानी का मालिया
- झालीबाब बावड़ी
- मामादेव कुंड
- बादल महल
- कुंभस्वामी विष्णु मंदिर (मामादेव मंदिर)
❖ रणथम्भौर दुर्ग – सवाई माधोपुर
- इस दुर्ग का प्राचीन नाम रतःपुर था, जो समय के साथ परिवर्तित होकर रणस्तम्भपुर कहलाया।
- इसका स्वरूप बिल्वपत्रों से आच्छादित शिवलिंग के समान दिखाई देता है।
- इसका निर्माण आठवीं शताब्दी में चौहान राजा रणथम्भन देव ने कराया।
- अरावली पर्वतमाला की सात पहाड़ियों से घिरे होने के कारण अबुल फजल ने इसकी प्रशंसा करते हुए कहा कि “अन्य सभी दुर्ग नंगे हैं, जबकि यह बख्तरबंद है।”
- इस दुर्ग में कुल सात प्रवेश द्वार हैं, जिनमें नौलखा दरवाजा मुख्य प्रवेश द्वार है। अन्य प्रमुख द्वारों में हाथीपोल, गणेशपोल तथा सूरजपोल शामिल हैं।
❖ किले के प्रमुख महल एवं स्मारक
- जोगी महल
- सुपारी महल
- रानी महल
- जौरा-भौरा महल
- पीर सदरुद्दीन की दरगाह — इसका निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने कराया।
- त्रिनेत्र गणेश मंदिर
- 32 खंभों की छतरी
❖ आमेर दुर्ग – जयपुर
- मिर्जा राजा मानसिंह ने 1592 ई. में हिन्दू एवं मुगल स्थापत्य शैली के समन्वय से इस दुर्ग का निर्माण कराया।
- इसका मुख्य प्रवेश द्वार सूरजपोल है।
- दुर्ग में स्थित प्रसिद्ध गणेशपोल का निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने कराया। फर्ग्यूसन ने इसे विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्रवेश द्वार बताया है।
- 1707 ई. में मुगल बादशाह बहादुर शाह प्रथम ने इस दुर्ग का नाम मोमीनाबाद रखा।
❖ किले के प्रमुख महल
- दीवान-ए-आम — मिर्जा राजा जयसिंह द्वारा निर्मित सार्वजनिक दरबार।
- दीवान-ए-खास — मिर्जा राजा जयसिंह द्वारा निर्मित, जिसे शीशमहल भी कहा जाता है।
- सौभाग्य मंदिर (सुहाग मंदिर)
- यश मंदिर
- शीला देवी मंदिर
- सुख निवास — राजा के विश्राम एवं आराम के लिए निर्मित कक्ष।
- बी. एम. हैबर ने आमेर के महलों की भव्यता देखकर कहा कि “मैंने क्रेमलिन में जो देखा और अलम्बरा के बारे में जो सुना, यह उससे भी बढ़कर महल है।”
❖ जयगढ़ दुर्ग – जयपुर
- इस दुर्ग का निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने कराया।
- इसका वर्तमान स्वरूप सवाई जयसिंह के समय विकसित हुआ।
- यह ईंगल की पहाड़ी पर स्थित है, जिसे चिल का टीला भी कहा जाता है।
- यह कछवाहा शासकों के खजाने का प्रमुख सुरक्षित स्थान था। इंदिरा गांधी के शासनकाल में आपातकाल के दौरान यहाँ खुदाई कराई गई। अनेक गुप्त सुरंगों के कारण इसे रहस्य दुर्ग भी कहा जाता है।
❖ जयबाण तोप
- इसे एशिया की सबसे बड़ी तोप माना जाता है।
- इसका निर्माण सवाई जयसिंह ने कराया।
❖ विजयगढ़ी
- सवाई जयसिंह ने अपने भाई विजय सिंह को इसी स्थान पर कैद रखा था।
- यहाँ मिर्जा राजा मानसिंह द्वारा स्थापित तोप ढालने का कारखाना स्थित है।
- दुर्ग में विशाल पानी के टांके भी निर्मित हैं।
❖ नाहरगढ़ / सुदर्शनगढ़ – जयपुर
- यह दुर्ग जयपुर के मुकुट के समान माना जाता है।
- इसे जयपुर की ओर झाँकता किला तथा मीठड़ी का किला भी कहा जाता है।
- सवाई जयसिंह ने 1734 ई. में मराठों से सुरक्षा के उद्देश्य से इसका निर्माण कराया।
- इसका प्राचीन नाम सुदर्शनगढ़ था, क्योंकि यहाँ भगवान कृष्ण का मंदिर स्थित है।
- बाद में नाहरसिंह भौमिया के नाम पर इसका नाम नाहरगढ़ पड़ा।
❖ माधवेंद्र भवन
- सवाई माधोसिंह द्वितीय ने अपनी 9 रानियों के लिए एक समान स्वरूप वाले 9 महलों का निर्माण कराया।
- वर्तमान में माधवेंद्र भवन परिसर में स्कल्पचर पार्क विकसित किया गया है।
❖ सोनारगढ़ – जैसलमेर
- 12 जुलाई 1155 ई. को भाटी रावल जैसल ने त्रिकूट पहाड़ी (त्रिकोणाकार पहाड़ी) पर इस दुर्ग का निर्माण कराया।
- यह धन्वन दुर्ग की श्रेणी में आता है।
❖ उपनाम
- गोल्डन फोर्ट (स्वर्णगिरि किला)
- सोनार किला
- त्रिकूटगढ़
- जैसाणगढ़
- रेत के समुद्र में लंगर डाले जहाज के समान दुर्ग
- उत्तर भड़ किवाड़ — क्योंकि भाटी शासक उत्तरी सीमा के रक्षक माने जाते थे।
- इस दुर्ग का निर्माण पीले पत्थरों से किया गया है।
- यह पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर निर्मित किया गया है। इसकी छत लकड़ी की बनी है तथा निर्माण में चूने का उपयोग नहीं किया गया।
- यह राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है।
- इसके दोहरे परकोटे को कमरकोट कहा जाता है।
- यह दुर्ग अपने अढ़ाई साकों तथा 99 बुर्जों के कारण विशेष प्रसिद्ध है।
- प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे ने सोनार किला नामक फिल्म का निर्माण किया।
- 2009 में इस दुर्ग पर ₹5 तथा 2018 में ₹12 मूल्य का डाक टिकट जारी किया गया।
❖ किले के प्रमुख महल एवं दर्शनीय स्थल
- अक्षयपोल — मुख्य प्रवेश द्वार।
- गणेशपोल
- सूरजपोल
- लक्ष्मीनारायण मंदिर — भाटी राजवंश के कुलदेवता का मंदिर, जहाँ स्थापित प्रतिमा मेड़ता से लाई गई थी।
- सर्वोत्तम विलास
- गज विलास
- जवाहर विलास
- जैसलू कुआँ — मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से इसका निर्माण किया था।
- जीनभद्रसूरी ग्रंथ भंडार — हस्तलिखित ग्रंथों का दुर्लभ संग्रहालय।
- अबुल फजल ने इस दुर्ग के संबंध में कहा कि “यह ऐसा दुर्ग है जहाँ पहुँचने के लिए पत्थर की टाँगें चाहिए।”
❖ प्रसिद्ध लोक उक्ति—
घोड़ा कीजे काट का, पग कीजे पाषाण।
बख्तर कीजे लोहे का, तब पहुँचे जैसाण।।गढ़ दिल्ली गढ़ आगरो, अधगढ़ बीकानेर।
भलो चिनायो भाटियाँ, सिरे तो जैसलमेर।।
❖ जूनागढ़ दुर्ग – बीकानेर
❖ उपनाम
- जमीन का जेवर
- रातीघाटी — क्योंकि इसका निर्माण रातीघाटी नामक स्थान पर हुआ।
- लालगढ़ — लाल पत्थरों से निर्मित होने के कारण।
- चिंतामणि — इसका प्राचीन नाम।
- 1485 ई. में राव बीका ने बीका की टेकरी पर बीकानेर के प्राचीन गढ़ की आधारशिला रखी।
- वर्तमान जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण महाराजा रायसिंह ने 1589 ई. से 1594 ई. के मध्य कराया।
- यह दुर्ग चतुर्भुज (चतुष्कोण) आकार में निर्मित है।
- इसकी स्थापत्य शैली राजपूत एवं मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट समन्वय प्रस्तुत करती है।
- दुर्ग का पहला प्रवेश द्वार करणपोल है, जबकि मुख्य प्रवेश द्वार सूरजपोल पर जयमल मेड़तिया तथा पत्ता सिसोदिया की गजारूढ़ प्रतिमाएँ स्थापित हैं।
- दुर्ग में स्थित अनूप महल वह स्थान है जहाँ बीकानेर के शासकों का राजतिलक किया जाता था।
- राजस्थान की पहली लिफ्ट इसी दुर्ग में स्थापित की गई थी।
- दीनानाथ शर्मा ने इस दुर्ग की भव्यता का वर्णन करते हुए कहा कि “दीवारों के भी कान होते हैं, लेकिन यहाँ की दीवारें तो बोलती हैं।”
❖ दुर्ग के प्रमुख महल एवं दर्शनीय स्थल
- सूरसागर झील — किले के सामने स्थित।
- गज मंदिर
- फूल महल
- कर्ण महल — इसका निर्माण महाराजा गजसिंह ने कराया।
❖ मेहरानगढ़ दुर्ग – जोधपुर
- 13 मई 1459 को राव जोधा ने चिड़ियाटूक पहाड़ी पर करणी माता के हाथों इस दुर्ग की आधारशिला रखवाई।
❖ उपनाम
- मयूरध्वजगढ़ — क्योंकि इसकी आकृति मयूर के समान मानी जाती है।
- गढ़चिंतामणि
- कागमुखी — आगे से संकरा तथा पीछे से चौड़ा होने के कारण।
- प्रसिद्ध साहित्यकार रूडयार्ड किपलिंग ने इस दुर्ग के बारे में कहा कि “इसका निर्माण देवताओं और परियों ने किया है।”
- जनश्रुति के अनुसार दुर्ग निर्माण के समय राजिया नामक व्यक्ति को जीवित ही दीवार में चुनवा दिया गया था।
❖ दुर्ग की प्रमुख तोपें
- शंभुबाण
- किलकिला — इसे महाराजा अजीतसिंह अहमदाबाद से लेकर आए थे।
- गजनीखां
- कड़क बिजली
- बिच्छूबान
- नुसरत
- गुब्बार
- नागपली
- गजक
- मीरबख्श
- रहस्यकला
❖ किले के प्रमुख महल एवं दर्शनीय स्थल
- फूल महल — इसका निर्माण महाराजा अभयसिंह ने कराया।
- मोती महल
- ख्वाबगाह महल
- चोखेलाव महल
- तख्तविलास
- भूरे खाँ की मजार
- मामा-भांजा (धन्ना एवं भींया) की छतरी
- चामुंडा माता मंदिर — इसका निर्माण राव जोधा ने कराया
- नागणेची माता मंदिर
- महाराजा मानसिंह द्वारा स्थापित पुस्तक प्रकाश संग्रहालय
- शृंगार (सिंगार) चौकी — यहाँ शासकों का राजतिलक किया जाता था। इसका निर्माण महाराजा तख्तसिंह ने कराया।
❖ तारागढ़ दुर्ग / अजमेरू – अजमेर
- इस दुर्ग का निर्माण 1113 ई. में अजयराज चौहान ने कराया।
❖ उपनाम
- राजस्थान का हृदय
- राजपूताने की कुंजी
- अरावली का अरमान
- गढ़ बिटली — बिटली पहाड़ी पर स्थित होने के कारण।
- पूर्व का जिब्राल्टर — यह उपनाम बिशप हैबर ने दिया।
- शाहजहाँ ने विट्ठलदास को इस दुर्ग का किलेदार नियुक्त किया था।
- पृथ्वीराज सिसोदिया ने यहाँ महल का निर्माण करवाकर अपनी पत्नी ताराबाई के नाम पर इसका नाम तारागढ़ रखा।
- यह दुर्ग लगभग 1300 फीट की ऊँचाई पर स्थित है।
- 1832 ई. में भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने इस दुर्ग को देखकर कहा— “ओह! दुनिया का दूसरा जिब्राल्टर।”
- इस दुर्ग में कुल 14 बुर्ज हैं, जिनमें घूंघट बुर्ज, गुगड़ी बुर्ज, इमली बुर्ज, पीपली बुर्ज, दौराई बुर्ज, बांदरा बुर्ज, फूटी बुर्ज, खिड़की बुर्ज, फतेह बुर्ज तथा शृंगार चंवरी बुर्ज प्रमुख हैं।
❖ दुर्ग के प्रमुख महल एवं दर्शनीय स्थल
- रूठी रानी उमादे का महल
- शाहजहाँ के पुत्र दाराशिकोह का जन्म इसी दुर्ग में हुआ था।
- मीर सैयद हुसैन खिंगसवार (मीरान साहब) की दरगाह तथा उनके प्रिय घोड़े की मजार यहाँ स्थित है।
- दुर्ग परिसर में नाना साहब का झालरा, इब्राहिम का झालरा, गोल झालरा तथा बड़ा झालरा नामक प्रमुख जलाशय बने हुए हैं।
- राजस्थान के अन्य दुर्गों की तुलना में सर्वाधिक स्थानीय आक्रमण इसी दुर्ग पर हुए हैं।
❖ सिवाणा दुर्ग – बालोतरा
- यह दुर्ग छप्पन की पहाड़ियों में स्थित है।
- इसका प्रारंभिक नाम कुम्थाना था।
- इसे अखलो सिवाणा दुर्ग के नाम से भी जाना जाता है।
- मारवाड़ के शासकों की संकट कालीन शरणस्थली के रूप में इसकी विशेष पहचान रही है।
- इसका निर्माण 954 ई. में वीर नारायण परमार ने कराया।
- दुर्ग के आसपास कूमट झाड़ी के वृक्ष अधिक संख्या में पाए जाने के कारण इसे कूमट दुर्ग भी कहा जाता है।
- अलाउद्दीन खिलजी ने इस दुर्ग का नाम बदलकर खैराबाद रख दिया।
- प्रजामंडल आंदोलन के दौरान जयनारायण व्यास को इसी दुर्ग में बंदी बनाकर रखा गया था।
❖ सुवर्ण गिरी दुर्ग – जालौर
- यह दुर्ग सूकड़ी नदी के तट पर स्थित है।
- शिलालेखों में जालौर का प्राचीन नाम जाबालिपुर मिलता है।
- इसके निर्माण का श्रेय गुर्जर प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम को दिया जाता है।
- कुछ इतिहासकारों के अनुसार 10वीं शताब्दी में परमार शासकों ने इसके निर्माण का कार्य प्रारम्भ कराया था।
❖ उपनाम
- सोनलगढ़
- जालौर दुर्ग
- कनकाचल
- सुवर्णगिरी दुर्ग
- सोनगिरी पहाड़ी पर स्थित होने के कारण इसे सोनलगढ़ भी कहा जाता है।
- 1311 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने इसका नाम जलालाबाद रख दिया।
❖ दुर्ग के प्रमुख स्थल
- अलाउद्दीन खिलजी की मस्जिद (तोपखाना) — इसका मूल निर्माण परमार राजा भोज ने संस्कृत पाठशाला के रूप में कराया था। बाद में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में इसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया। इसे अलाई मस्जिद भी कहा जाता है।
- दुर्ग परिसर में मालिक शाह की दरगाह भी स्थित है।
- हसन निजामी ने इस दुर्ग की प्रशंसा करते हुए लिखा कि “यह ऐसा किला है जिसका द्वार कोई आक्रमणकारी नहीं खोल सका।”
- “राइयों का भाव राते ही बीता” कहावत इसी दुर्ग से संबंधित मानी जाती है।
❖ भटनेर दुर्ग – हनुमानगढ़
- इसे राजस्थान का सबसे प्राचीन दुर्ग माना जाता है।
- इसका निर्माण 295 ई. में भाटी राजा भूपत ने घग्घर नदी के तट पर कराया।
- इसे उत्तरी प्रवेश द्वार का रक्षक कहा जाता है।
- राजस्थान में सर्वाधिक विदेशी आक्रमण इसी दुर्ग पर हुए।
- इस दुर्ग में कुल 52 बुर्ज हैं।
- 1398 ई. में तैमूर लंग ने दुलचन्द भाटी को पराजित कर इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अपनी पुस्तक तुजुक-ए-तैमूरी में उसने लिखा कि “हिंदुस्तान में इतना मजबूत दुर्ग मैंने कहीं नहीं देखा।”
- इस आक्रमण के दौरान हिन्दू एवं मुस्लिम महिलाओं ने जौहर किया।
- 1805 ई. में बीकानेर के महाराजा सूरतसिंह ने मंगलवार के दिन इस दुर्ग पर विजय प्राप्त कर इसका नाम हनुमानगढ़ रख दिया।
❖ लौहागढ़ दुर्ग – भरतपुर
- महाराजा सूरजमल ने 1733 ई. में इस दुर्ग का निर्माण कराया।
- इसे अजेय दुर्ग कहा जाता है, क्योंकि इसे कोई भी विजेता जीत नहीं सका।
- दुर्ग के चारों ओर गहरी खाई बनाई गई है, जिसमें मोती झील से सुजान गंगा नहर द्वारा जल पहुँचाया जाता है।
- 1765 ई. में महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली के लाल किले से अष्टधातु का द्वार लाकर लौहागढ़ दुर्ग में स्थापित कराया।
- 1805 ई. में अंग्रेज अधिकारी लॉर्ड लेक ने इस दुर्ग पर पाँच बार आक्रमण किया, किन्तु विजय प्राप्त नहीं कर सके।
- चार्ल्स मेटकाफ ने कहा कि “अंग्रेजों की प्रतिष्ठा भरतपुर के किले में दबकर रह गई।”
❖ किले के प्रमुख महल एवं दर्शनीय स्थल
- किशोरी महल — इसका निर्माण महाराजा सूरजमल ने कराया।
- जवाहर बुर्ज — यहाँ जाट शासकों का राजतिलक किया जाता था।
- राजेश्वरी माता मंदिर — भरतपुर जाट वंश की कुलदेवी का मंदिर।
- कोठी खास
- वजीर की कोठी
❖ बयाना दुर्ग – भरतपुर
- बयाना के प्राचीन नाम सोनितपुर, बाणपुर तथा श्रीपंथ थे।
- इस दुर्ग का निर्माण विजयपाल ने कराया।
- गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के सामंत विष्णुवर्धन पुण्डरीक ने यहाँ भीमलाट विजय स्तंभ का निर्माण कराया, जिसे राजस्थान का प्रथम विजय स्तंभ माना जाता है।
- अकबर की छतरी तथा जहाँगीरी दरवाजा भी बयाना में स्थित हैं।
❖ अकबर का किला / मैगजीन दुर्ग – अजमेर
- 1570 ई. में अकबर ने गुजरात विजय की स्मृति में इस दुर्ग का निर्माण कराया।
- इसे अकबर का दौलतखाना भी कहा जाता है।
- यह समतल भूमि पर निर्मित भूमिज शैली का दुर्ग है।
- राजस्थान का यह एकमात्र दुर्ग है जिसका निर्माण मुस्लिम स्थापत्य शैली में हुआ है।
- हल्दीघाटी युद्ध की अंतिम रणनीति इसी दुर्ग में बनाई गई थी।
- 10 जनवरी 1616 को सर टॉमस रो ने यहीं जहाँगीर से व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की।
- अंग्रेजी शासन के समय इस दुर्ग का उपयोग शस्त्रागार (मैगजीन) के रूप में किया जाता था।
- वर्तमान में यहाँ राजपूताना म्यूजियम (राजकीय संग्रहालय) संचालित है।
❖ लक्ष्मणगढ़ का किला – सीकर
- यह किला बिखरी हुई चट्टानों के टुकड़ों से निर्मित है।
❖ भैंसरोड़गढ़ का किला – चित्तौड़गढ़
- यह दुर्ग चंबल तथा बामनी नदी के संगम पर स्थित है।
- इसका निर्माण भैंसाशाह तथा रोडा नामक दो व्यापारियों ने संयुक्त रूप से कराया।
- इसे राजस्थान का वैल्लोर कहा जाता है।
- कर्नल जेम्स टॉड ने कहा था कि यदि उन्हें राजस्थान में किसी जागीर का चयन करना पड़े, तो वे भैंसरोड़गढ़ को ही चुनेंगे।
❖ चौमू का किला – जयपुर
- इस किले का निर्माण ठाकुर कर्ण सिंह ने कराया।
- इसे चौमुंहागढ़, रघुनाथगढ़ तथा धाराधारगढ़ के नाम से भी जाना जाता है।
❖ मांडलगढ़ दुर्ग – भीलवाड़ा
- इस दुर्ग का निर्माण चानणा गुर्जर ने मांडिया भील की स्मृति में कराया।
- हल्दीघाटी युद्ध से पूर्व मानसिंह ने इसी दुर्ग में पड़ाव डाला था।
❖ शेरगढ़ किला – बारां
- यह दुर्ग परवन नदी के किनारे स्थित है।
- कोशवर्द्धन पर्वत पर स्थित होने के कारण इसे कोशवर्द्धन भी कहा जाता है।
- 1542 ई. में शेरशाह सूरी ने मालवा अभियान के दौरान इसका नाम शेरगढ़ रखा।
- बाद में मुगल बादशाह फरुखशियर ने यह दुर्ग कोटा के महाराव भीमसिंह को पुरस्कारस्वरूप प्रदान किया।
❖ शेरगढ़ दुर्ग – धौलपुर
- इसका निर्माण मालवा के शासक मालदेव ने कराया।
- यह दुर्ग चंबल नदी के किनारे स्थित है।
- यहाँ प्रसिद्ध हुणहुंकार तोप स्थापित है।
- इसे दक्षिण का द्वारगढ़ भी कहा जाता है।
- 1540 ई. में शेरशाह सूरी ने इसका पुनर्निर्माण कर इसका नाम शेरगढ़ रखा।
❖ शाहाबाद का किला – बारां
- 1544 ई. में कालिंजर अभियान के दौरान शेरशाह सूरी ने अपने पुत्र सलीम शाह के नाम पर इसका नाम सलीमाबाद रखा।
- इस दुर्ग में प्रसिद्ध नवलबाण तोप स्थित है।
❖ कोटा का किला
- यह किला चंबल नदी के किनारे स्थित है।
- इसका निर्माण माधोसिंह ने कराया।
- कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार आगरा किले के बाद कोटा का परकोटा सबसे विशाल माना जाता है।
❖ नागौर का किला
- इसका निर्माण पृथ्वीराज चौहान के प्रधानमंत्री कैमास ने कराया।
- अकबर ने यहाँ शुक्र तालाब का निर्माण करवाया।
❖ कुचामन का किला – डीडवाना-कुचामन
- इस दुर्ग का निर्माण जालिम सिंह मेड़तिया ने कराया।
- इसे जागीरी किलों का सिरमौर कहा जाता है।
❖ चूरू का किला
- 1739 ई. में चूरू के ठाकुर कुशलसिंह ने इस किले का निर्माण कराया।
- 1814 ई. में बीकानेर के शासक महाराजा सूरतसिंह ने चूरू के शासक शिवसिंह पर आक्रमण किया। उस समय चूरू दुर्ग की रक्षा के लिए किले से चाँदी के गोले दागे गए थे।
❖ फतेहपुर का किला – सीकर
- इस किले का निर्माण फतेहखाँ कायमखानी ने कराया।
- किले में प्रसिद्ध तेलीन के महल स्थित हैं।
- यहाँ सरस्वती पुस्तकालय भी स्थापित है।
❖ तिमनगढ़ का किला – करौली
- इसका निर्माण त्रिभुवनपाल ने कराया।
- किले में प्रसिद्ध ननद-भोजाई कुआँ स्थित है।
❖ दौसा का किला
- यह किला छाजले (सूप) के आकार में निर्मित है।
❖ ऊँटाला का किला – उदयपुर
- इस किले के अधिकार को लेकर बल्लू शक्तावत और जैतसिंह चूण्डावत के बीच प्रसिद्ध हरावल युद्ध हुआ था।
❖ मोहनगढ़ का किला – जैसलमेर
- इसे राजस्थान का नवीनतम किला माना जाता है।
❖ बोरावाड़ा / टोडगढ़ का किला – टोडगढ़ (ब्यावर)
- इसका निर्माण कर्नल जेम्स टॉड ने कराया।
- इसके निर्माण में मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह ने आर्थिक सहयोग प्रदान किया।
❖ नवलखा दुर्ग – झालरापाटन (झालावाड़)
- इस दुर्ग का निर्माण झाला राजा पृथ्वीसिंह ने कराया।
❖ अचलगढ़ / बसंतीगढ़ – माउंट आबू (सिरोही)
- परमार शासकों द्वारा निर्मित आबू के प्राचीन किले के भग्नावशेषों पर महाराणा कुंभा ने इस दुर्ग का निर्माण कराया।
❖ बाला किला – अलवर
- इसकी दीवारों में बंदूकों के लिए बनाए गए छिद्रों के कारण इसे आँख वाला किला कहा जाता है।
- इसे कुँवारा किला के नाम से भी जाना जाता है।
- दुर्ग परिसर में सलीम सागर तथा सूरजकुंड स्थित हैं। सलीम सागर का निर्माण शेरशाह सूरी के हकीम हाजी खाँ ने कराया था।
- खानवा युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद बाबर कुछ समय के लिए इसी किले में रुका था।
❖ फलौदी दुर्ग – फलौदी
- इसका निर्माण राठौड़ शासक राव सूजा के शासनकाल में कराया गया।
❖ सोजत दुर्ग – सोजत (पाली)
- इस दुर्ग का निर्माण राव जोधा के पुत्र निम्बा ने कराया।
❖ तारागढ़ दुर्ग – बूंदी
- इसकी आकृति आकाश में चमकते तारे के समान प्रतीत होती है।
- इस दुर्ग का निर्माण 1354 ई. में बरसिंह हाड़ा ने कराया।
- प्रसिद्ध अंग्रेज़ी उपन्यासकार रूडयार्ड किपलिंग ने इसकी भव्यता देखकर कहा कि “यह मानव द्वारा नहीं, बल्कि भूत-प्रेतों द्वारा निर्मित प्रतीत होता है।”
- महाराव उम्मेदसिंह के शासनकाल में निर्मित चित्रशाला (रंगविलास) यहाँ स्थित है, जिसे बूंदी चित्रशैली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।
- कर्नल जेम्स टॉड ने कहा कि “राजस्थान के सभी महलों में बूंदी के महल सर्वश्रेष्ठ हैं।”
❖ दुर्ग के प्रमुख स्थल
- गर्भगुंजन तोप
- अनिरुद्ध महल
- सुख महल
- छत्रशाल
❖ कांकनबाड़ी किला – सरिस्का (अलवर)
- इसका निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने कराया।
- औरंगजेब ने अपने भाई दाराशिकोह को इसी किले में बंदी बनाकर रखा था।
❖ भानगढ़ किला (भूतों का भानगढ़) – अलवर
- यह रहस्यमयी पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।
- इसका निर्माण आमेर के शासक भगवंत दास के पुत्र माधव सिंह ने कराया।
❖ सराडा किला – सलूम्बर
- इसे मेवाड़ का काला पानी कहा जाता है।
❖ गुगोर किला – बारां
- यह किला बारां जिले में स्थित है।
❖ सावर (सरवाड़) का दुर्ग – केकड़ी (अजमेर)
- यह दुर्ग केकड़ी (अजमेर) क्षेत्र में स्थित है।
❖ प्रमुख दुर्गों की कुंजियाँ
| दुर्ग | कुंजी (सुरक्षा दुर्ग) |
|---|---|
| रणथम्भौर दुर्ग | झाईन दुर्ग (सवाई माधोपुर) |
| जालौर दुर्ग | सिवाणा दुर्ग |
| ग्वालियर दुर्ग | मंडरायल दुर्ग (करौली) |
❖ राजस्थान में प्रसिद्ध ‘नवलखा’ स्थल
| नाम | स्थान |
|---|---|
| नवलखा (नौलखा महल) | उदयपुर |
| नवलखा दुर्ग | झालावाड़ |
| नवलखा झील | बूंदी |
| नवलखा बावड़ी | डूंगरपुर |
| नवलखा भंडार | चित्तौड़गढ़ दुर्ग |
| नवलखा मंदिर / तीर्थ | पाली |
