❖ राजस्थान की नहरें ❖
❖ इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना
➤ उपनाम
- राजस्थान की मरूगंगा
- राजस्थान की जीवन रेखा
- रेगिस्तान की स्वर्ण रेखा
- पश्चिमी राजस्थान की जीवन रेखा
➤ उद्गम
- इस नहर की शुरुआत हरिके बैराज बाँध (फिरोजपुर, पंजाब) से होती है, जो सतलज एवं व्यास नदियों के संगम पर स्थित है।
- राजस्थान में इसका प्रवेश खारा खेड़ा (टिब्बी, हनुमानगढ़) से होता है।
- मुख्य उद्देश्य – रावी एवं व्यास नदियों के जल से राजस्थान को आवंटित 8.6 M.A.F. पानी में से 7.59 M.A.F. जल का उपयोग मरुस्थलीय क्षेत्रों में पेयजल तथा सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए करना है।
- यह भारत की सबसे बड़ी मानव निर्मित नहर परियोजना है। इसकी परिकल्पना बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने की थी, जबकि इसे प्रारम्भ कराने की दिशा में पहला कदम महाराजा सार्दूल सिंह ने उठाया।
- इंजी. कंवरसेन, जिन्हें इस नहर का जन्मदाता एवं योजनाकार माना जाता है, ने इसकी रूपरेखा तैयार की तथा “बीकानेर में पानी की आवश्यकता” शीर्षक रिपोर्ट 1948 में भारत सरकार को भेजी।
- प्रारम्भ में इस परियोजना का नाम राजस्थान नहर था।
- इसका शिलान्यास 31 मार्च 1958 को तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत द्वारा किया गया।
- इन्दिरा गाँधी के निधन के बाद 2 नवम्बर 1984 को राजस्थान नहर का नाम बदलकर इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना (IGNP) कर दिया गया।
- इस परियोजना का निर्माण दो चरणों में पूरा किया गया।
- प्रथम चरण – मसीतावाली से सत्तासर गाँव (बीकानेर) तक 189 किमी लंबी मुख्य नहर का निर्माण किया गया। इस चरण में गंगानगर, हनुमानगढ़ एवं बीकानेर जिले शामिल किए गए।
- द्वितीय चरण – सत्तासर (बीकानेर) से मोहनगढ़ (जैसलमेर) तक 256 किमी लंबी मुख्य नहर का निर्माण किया गया।
- इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना की मुख्य नहर हनुमानगढ़, गंगानगर, बीकानेर, फलौदी तथा जैसलमेर—इन 5 जिलों से होकर गुजरती है।
- इन्दिरा गाँधी नहर की कुल लंबाई 649 किमी है।
- हरिके बैराज से मसीतावाली हैड तक स्थित फीडर नहर की लंबाई 204 किमी है।
- मसीतावाली से मोहनगढ़ तक स्थित मुख्य नहर की लंबाई 445 किमी है।
- मुख्य नहर मसीतावाली (हनुमानगढ़) से प्रारम्भ होकर मोहनगढ़ (जैसलमेर) तक जाती है।
- इस नहर का अंतिम छोर मोहनगढ़ (जैसलमेर) है
- भविष्य में इसे मोहनगढ़ (जैसलमेर) से गडरा रोड (बाड़मेर) तक लगभग 165 किमी आगे बढ़ाने का प्रस्ताव है।
- इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना का संभागीय (मंडलीय) मुख्यालय जयपुर में स्थित है।
➤ इन्दिरा गाँधी नहर की 9 शाखाएँ
- ट्रिक – राव सूर के पग दबे, चारण शहीद सागर में
(1) रावतसर शाखा (हनुमानगढ़)
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- यह एकमात्र शाखा है, जिसे नहर के बाँयी ओर निकाला गया है।
(2) सूरतगढ़ शाखा
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- यह शाखा हनुमानगढ़ एवं गंगानगर जिलों को लाभ पहुँचाती है।
(3) अनूपगढ़ शाखा
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- यह शाखा गंगानगर जिले में स्थित है तथा सबसे लंबी शाखा है।
(4) पूगल शाखा
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- यह शाखा बीकानेर जिले में स्थित है।
(5) दंतोर शाखा
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- यह शाखा बीकानेर जिले को लाभान्वित करती है।
(6) बरसलपुर शाखा
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- यह शाखा बीकानेर जिले में स्थित है।
(7) चारणवाला शाखा
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- यह शाखा बीकानेर, फलौदी एवं जैसलमेर जिलों से होकर गुजरती है।
(8) शहीद बीरबल राम शाखा
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- यह शाखा जैसलमेर जिले में स्थित है।
(9) सागरमल गोपा शाखा
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- यह शाखा जैसलमेर जिले में स्थित है।
- इसके अंतिम छोर से बरकतउल्ला खाँ लिफ्ट नहर, जिसका वर्तमान नाम बाबा रामदेव लिफ्ट नहर है, निकाली गई है। इसे आगे गडरा रोड तक ले जाने का प्रस्ताव है।
- इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना से कुल 12 जिले लाभान्वित होते हैं।
- इनमें 6 जिलों—गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, बीकानेर, फलौदी एवं जैसलमेर—को सिंचाई तथा पेयजल दोनों सुविधाएँ प्राप्त होती हैं।
- शेष 6 जिलों—नागौर, जोधपुर, बाड़मेर, बालोतरा, झुंझुनूं एवं सीकर—को पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
- इन्दिरा गाँधी नहर का सर्वाधिक लाभ राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र को प्राप्त हुआ है।
➤ नहर के बाँयी ओर का क्षेत्र नहर के तल से अधिक ऊँचा होने के कारण सिंचाई हेतु 7 लिफ्ट नहरों का निर्माण किया गया है।
(1) चौधरी कुम्भाराम आर्य लिफ्ट नहर
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- इसका पुराना नाम नोहर साहवा लिफ्ट नहर था।
- इससे हनुमानगढ़, चूरू, बीकानेर तथा झुंझुनूं जिले लाभान्वित होते हैं।
- झुंझुनूं को इससे पेयजल की सुविधा प्राप्त होती है।
(2) कंवरसेन लिफ्ट नहर
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- इसका पूर्व नाम बीकानेर–लूणकरणसर लिफ्ट नहर था।
- इससे गंगानगर एवं बीकानेर जिले लाभान्वित होते हैं।
- यह सबसे पहले निर्मित तथा सबसे लंबी लिफ्ट नहर है।
(3) पन्नालाल बारूपाल लिफ्ट नहर
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- इसका पुराना नाम गजेनर लिफ्ट नहर था।
- इससे बीकानेर एवं नागौर जिले लाभान्वित होते हैं।
- नागौर को केवल पेयजल की सुविधा मिलती है।
(4) वीर तेजाजी लिफ्ट नहर
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- इसका पूर्व नाम बांगड़सर लिफ्ट नहर था।
- यह बीकानेर जिले को लाभ पहुँचाती है।
- यह सबसे छोटी लिफ्ट नहर है।
(5) डॉ. करणीसिंह लिफ्ट नहर
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- इसका पुराना नाम कोलायत लिफ्ट नहर था।
- इससे बीकानेर एवं फलौदी जिले लाभान्वित होते हैं।
(6) गुरु जम्भेश्वर लिफ्ट नहर
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- इसका पूर्व नाम फलौदी लिफ्ट नहर था।
- यह बीकानेर एवं फलौदी जिलों को लाभ पहुँचाती है।
(7) जयनारायण व्यास लिफ्ट नहर
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- इसका पुराना नाम पोकरण लिफ्ट नहर था।
- इससे जैसलमेर एवं फलौदी जिले लाभान्वित होते हैं।
- इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना पूर्ण होने पर राजस्थान में लगभग 19.65 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचाई के दायरे में आएगी।
❖ पेयजल हेतु प्रमुख लिफ्ट नहरें
➤ राजीव गाँधी लिफ्ट नहर
- इसका प्रारम्भिक नाम जोधपुर लिफ्ट नहर योजना था।
- इसे जोधपुर नगर की जीवनरेखा भी कहा जाता है।
- यह नहर जोधपुर की कायलाना झील में जल पहुँचाती है।
➤ आपणी योजना (गंधेली साहवा परियोजना)
- जर्मनी के सहयोग से इन्दिरा गाँधी नहर का जल हनुमानगढ़, चूरू, झुंझुनूं तथा सीकर जिलों में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए पहुँचाया जा रहा है।
❖ गंगानहर
- राजस्थान की प्रथम नहर परियोजना के रूप में गंगानहर का विशेष महत्व है।
- प्रारम्भ में इसका नाम बीकानेर नहर था।
- महाराजा गंगासिंह के निर्देश पर इस नहर की रूपरेखा कंवरसेन ने तैयार की।
- इसका निर्माण महाराजा गंगासिंह के शासनकाल में 1921 से 1927 के बीच कराया गया।
- 1921 में महाराजा गंगासिंह ने हुसैनीवाला से गंगानहर की आधारशिला रखी।
- 1927 में लॉर्ड इरविन ने गंगानहर का उद्घाटन किया तथा इसी अवसर पर रामनगर का नाम बदलकर गंगानगर रखा गया।
- यह नहर सतलज नदी से हुसैनीवाला (फिरोजपुर, पंजाब) के पास निकाली गई है।
- राजस्थान में इसका प्रवेश खक्खा गाँव (गंगानगर) से होता है।
➤ गंगानहर की चार शाखाएँ हैं—
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- करणी जी शाखा
- लालगढ़ शाखा
- समीक्षा शाखा
- लक्ष्मीनारायण जी शाखा
- गंगानहर से गंगानगर जिले में सिंचाई की सुविधा प्राप्त होती है।
- गंगानहर को राजस्थान तक लाने का श्रेय महाराजा गंगासिंह को दिया जाता है, इसी कारण इसका नाम गंगानहर रखा गया।
- पं. जवाहर लाल नेहरू ने महाराजा गंगासिंह को आधुनिक भारत का भागीरथ कहा था।
❖ नर्मदा नहर परियोजना
- यह राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र की संयुक्त परियोजना है।
- इस परियोजना के अंतर्गत जल सरदार सरोवर बाँध (गुजरात) से नहरों के माध्यम से लाया जाता है।
- उपनाम – सरदार सरोवर परियोजना
- इस परियोजना से जालौर (सर्वाधिक) तथा बाड़मेर जिले लाभान्वित होते हैं।
- नर्मदा नहर की कुल लंबाई 532 किमी है।
- इनमें से 74 किमी लंबाई राजस्थान में स्थित है।
- राजस्थान में इसका प्रवेश सीलू गाँव (सांचौर, जालौर) से होता है।
- यह राजस्थान की पहली ऐसी परियोजना है, जिसमें संपूर्ण सिंचाई फव्वारा पद्धति (स्प्रिंकलर सिस्टम) तथा ड्रिप सिंचाई प्रणाली (जिसे इजरायल की देन माना जाता है) से की जाती है।
- नर्मदा जल में राजस्थान का निर्धारित हिस्सा 0.50 M.A.F. है।
➤ इस परियोजना से तीन लिफ्ट नहरें निकाली गई हैं—
- सांचौर लिफ्ट नहर
- भादरेडा लिफ्ट नहर
- पोरिया लिफ्ट नहर
❖ गुडगाँव नहर
- यह राजस्थान एवं हरियाणा की संयुक्त परियोजना है।
- वर्तमान में इसे पश्चिमी यमुना लिंक नहर के नाम से जाना जाता है।
- इसका उद्गम यमुना नदी से ओखला हेड वर्क्स (दिल्ली) के पास है।
- इस नहर से डीग एवं भरतपुर जिले लाभान्वित होते हैं।
- इसी नहर से अजान बाँध तथा घना पक्षी विहार को जलापूर्ति की जाती है।
❖ भरतपुर नहर
- यह राजस्थान एवं उत्तरप्रदेश की संयुक्त परियोजना है।
- इसका जल स्रोत यमुना नदी से निकलने वाली आगरा नहर है।
- इस नहर से डीग जिले में सिंचाई की जाती है।
❖ राजीव गाँधी सिद्धमुख एवं नोहर सिंचाई परियोजना
- यह राजस्थान, पंजाब तथा हरियाणा की संयुक्त परियोजना है।
- इसका शिलान्यास भिरानी गाँव (हनुमानगढ़) में किया गया।
- इस परियोजना के अंतर्गत रावी-व्यास के अतिरिक्त जल को भाखड़ा नांगल परियोजना से नहर के माध्यम से लाया गया है।
- इस परियोजना से हनुमानगढ़ जिले की नोहर एवं भादरा तहसील तथा चूरू जिले की राजगढ़ एवं तारानगर तहसील लाभान्वित होती हैं।
❖ जल संरक्षण की विधियाँ
❖ टांका / कुंड
- मरूस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा जल के संग्रहण के लिए टांका अथवा कुंड बनाए जाते हैं।
- रानीसर टांका जोधपुर में स्थित है।
❖ नाड़ी / जोहड़
- शेखावाटी क्षेत्र में निर्मित कच्चे जल स्रोत को नाड़ी या जोहड़ कहा जाता है।
- इसे तालाब का छोटा स्वरूप माना जाता है।
❖ चौका प्रणाली
- शुष्क क्षेत्रों में जल संरक्षण के लिए अपनाई जाने वाली यह विधि चौका प्रणाली कहलाती है।
- इसमें चौकोर गड्ढे बनाकर वर्षा जल का संग्रह किया जाता है।
❖ टोबा
- टोबा, नाड़ी की अपेक्षा अधिक गहरा जल स्रोत होता है।
❖ बेरी
- छोटे कुएँ अथवा कुई को बेरी कहा जाता है।
❖ खडीन
- जैसलमेर में पालीवाल ब्राह्मणों ने खडीन पद्धति का प्रारम्भ किया।
- यह जल संग्रहण की एक परम्परागत विधि है।
- खडीन का निर्माण भूमि के ढाल वाले भाग के नीचे किया जाता था।
- वर्षा जल सूख जाने के बाद बची हुई नमी वाली भूमि पर खेती की जाती थी।
➤ पालर पाणी – नाड़ी एवं टांके में संचित वर्षा जल को पालर पाणी कहा जाता है।
❖ लेवा तालाब
- लेवा तालाब एक वर्षाजल संग्रहण संरचना है।
- यह बांरा जिले में स्थित है।
❖ अमृतम् जलम् अभियान
- राजस्थान पत्रिका द्वारा जल संरक्षण के प्रति जनजागरण के उद्देश्य से अमृतम् जलम् अभियान चलाया गया।
❖ जल संरक्षण के उपाय
- शुष्क कृषि तकनीकों को अपनाना।
- वर्षा जल का अधिकतम संग्रहण करना।
- बूँद-बूँद सिंचाई प्रणाली का उपयोग बढ़ाना।
- अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना।
- कर्मभूमि से मातृभूमि अभियान के माध्यम से जल संरक्षण को बढ़ावा देना।
