राजस्थान में पशुपालन
राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का महत्वपूर्ण स्थान है। राज्य देश के प्रमुख पशुधन उत्पादक राज्यों में शामिल है तथा ऊँट, बकरी और गधों की संख्या के आधार पर राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है। प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से पशुगणना, पशुधन की स्थिति तथा विभिन्न पशु नस्लों से जुड़े तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
राजस्थान में पशुगणना
भारत में पहली पशुगणना दिसंबर 1919 से अप्रैल 1920 के मध्य आयोजित की गई थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश की पहली पशुगणना 1951 में हुई। राजस्थान में राज्य पशुपालन विभाग की स्थापना 1957 में की गई। पशुगणना का कार्य प्रत्येक 5 वर्ष बाद कराया जाता है तथा इसका संचालन राजस्व मंडल, अजमेर द्वारा किया जाता है।
पशुगणना से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं—
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| भारत में पहली पशुगणना | दिसंबर 1919 से अप्रैल 1920 |
| स्वतंत्रता के बाद पहली पशुगणना | 1951 |
| राज्य पशुपालन विभाग की स्थापना | 1957 |
| 18वीं पशुगणना | 2007 |
| विशेषता | पहली बार नस्ल के आधार पर पशुगणना |
| 20वीं पशुगणना | 2019 |
| पशुगणना का अंतराल | प्रत्येक 5 वर्ष |
| आयोजन संस्था | राजस्व मंडल, अजमेर |
राजस्थान में पशुधन की स्थिति
- भारत में सर्वाधिक पशुधन वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश प्रथम तथा राजस्थान दूसरे स्थान पर है। राजस्थान में कुल पशुधन की संख्या 568 लाख है।
- वर्ष 2012 की तुलना में राज्य के पशुधन में 1.66 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। देश के कुल पशुधन में राजस्थान की हिस्सेदारी 10.60 प्रतिशत है।
- राजस्थान का पशु घनत्व 166 पशु प्रति वर्ग किलोमीटर है। राज्य में सर्वाधिक पशु घनत्व डूंगरपुर जिले में तथा न्यूनतम पशु घनत्व जैसलमेर जिले में पाया जाता है।
राजस्थान में पशुधन से संबंधित प्रमुख तथ्य निम्न प्रकार हैं—
| विवरण | स्थिति |
|---|---|
| भारत में राजस्थान का स्थान | दूसरा |
| कुल पशुधन | 568 लाख |
| 2012 की तुलना में परिवर्तन | 1.66% कमी |
| देश के कुल पशुधन में हिस्सा | 10.60% |
| पशु घनत्व | 166 प्रति वर्ग किमी |
| सर्वाधिक पशु घनत्व | डूंगरपुर |
| न्यूनतम पशु घनत्व | जैसलमेर |
राजस्थान में सर्वाधिक संख्या में पाए जाने वाले पशुओं में क्रमशः बकरियाँ, गाय, भैंस तथा भेड़ शामिल हैं। इसी प्रकार राज्य में सर्वाधिक पशु सम्पदा वाले जिले बाड़मेर, जोधपुर तथा जयपुर हैं, जबकि न्यूनतम पशु सम्पदा वाले जिलों में धौलपुर, कोटा तथा सवाई माधोपुर शामिल हैं।
पशुधन उत्पादों में राजस्थान की स्थिति
पशुधन आधारित उत्पादन में भी राजस्थान का देश में महत्वपूर्ण योगदान है।
| उत्पादन | राजस्थान का स्थान |
|---|---|
| ऊन उत्पादन | प्रथम (47.98%) |
| दूध उत्पादन | दूसरा (14.44%) |
| अंडा उत्पादन | 13वाँ |
| माँस उत्पादन | 12वाँ |
पशुओं की प्रमुख नस्लें
❖ राजस्थान की बकरियों की प्रमुख नस्लें
| नस्ल | प्रमुख विशेषता | मूल स्थान / प्रमुख क्षेत्र |
|---|---|---|
| जखराना | बकरी की सर्वश्रेष्ठ नस्ल तथा सर्वाधिक दूध देने वाली नस्ल | मूल स्थान जखराना (बहरोड़)। मुख्यतः अलवर जिले में पाई जाती है, इसलिए इसे अलवरी भी कहा जाता है। |
| जमुनापरी | — | मूल स्थान इटावा (उत्तर प्रदेश)। राजस्थान में मुख्यतः हाड़ौती क्षेत्र में पाई जाती है। |
| बरबरी | बकरी की सर्वाधिक सुंदर नस्ल | मुख्यतः अलवर, भरतपुर, करौली एवं सवाई माधोपुर जिलों में पाई जाती है। |
| सिरोही | इसका प्रजनन केन्द्र रामसर (अजमेर) में स्थित है। | मुख्यतः सिरोही एवं जालौर जिलों में पाई जाती है। |
| मारवाड़ी | राजस्थान की प्राचीनतम बकरी नस्ल | मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी राजस्थान में पाई जाती है। |
| शेखावाटी | काजरी वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तथा बिना सींग वाली बकरी | मुख्यतः चूरू, सीकर एवं झुंझुनूं जिलों में पाई जाती है। |
| लोही | माँस उत्पादन के लिए प्रसिद्ध। नोट: लोही नस्ल भेड़ की भी होती है। | मुख्यतः बाड़मेर, जैसलमेर एवं बीकानेर जिलों में पाई जाती है। |
| परबतसरी | बीटल (हरियाणा) एवं सिरोही नस्ल के मिश्रण से विकसित | मुख्यतः नागौर एवं अजमेर जिलों में पाई जाती है। |
| झरवाड़ी | — | मुख्यतः पूर्वी राजस्थान में पाई जाती है। |
बकरी से संबंधित सामान्य तथ्य:-
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| बकरी को कहा जाता है | गरीब की गाय |
| बकरी पालन की दृष्टि से राजस्थान का स्थान | देश में प्रथम |
| राजस्थान में सर्वाधिक बकरियाँ | बाड़मेर जिले में |
| Rajasthan में न्यूनतम बकरियाँ | धौलपुर जिले में |
बकरी से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
- बकरी का माँस चेवण कहलाता है।
- वरुण गाँव (डीडवाना-कुचामन) की बकरियाँ पूरे देश में प्रसिद्ध हैं।
- बकरी विकास एवं चारा उत्पादन परियोजना के अंतर्गत बकरी प्रजनन फार्म, रामसर (अजमेर) स्विट्जरलैण्ड की सहायता से संचालित था, वर्तमान में इसका संचालन राजस्थान सरकार द्वारा किया जा रहा है।
- पश्चिम क्षेत्रीय बकरी अनुसंधान केन्द्र अविकानगर (टोंक) में स्थित है।
❖ राजस्थान की प्रमुख भेड़ नस्लें
| नस्ल | प्रमुख विशेषता | प्रमुख क्षेत्र / अन्य जानकारी |
|---|---|---|
| चोकला / छापर / भारतीय मेरिनो | सर्वश्रेष्ठ ऊन देने वाली नस्ल | मुख्यतः शेखावाटी क्षेत्र में पाई जाती है। |
| मारवाड़ी | सर्वाधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली नस्ल | मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान में पाई जाती है। राज्य की लगभग 50% भेड़ें इसी नस्ल की हैं। इसका प्रजनन केन्द्र जोधपुर में स्थित है। |
| मालपुरी | इसकी ऊन से गलीचे बनाए जाते हैं। | मुख्यतः टोंक एवं सवाई माधोपुर जिलों में पाई जाती है। |
| मगरा / चकरी | — | इसका प्रजनन केन्द्र बीकानेर में स्थित है। |
| सोनाडी / चनोथर | सर्वाधिक दूध देने वाली भेड़ नस्ल | मुख्यतः भीलवाड़ा, उदयपुर एवं चित्तौड़गढ़ जिलों में पाई जाती है। |
| नाली | — | मुख्यतः हनुमानगढ़ एवं श्रीगंगानगर जिलों में पाई जाती है। |
| पूगल | — | बीकानेर एवं जैसलमेर जिलों में पाई जाती है। |
| जैसलमेरी | सर्वाधिक ऊन देने वाली भेड़ नस्ल | — |
| बागड़ी | इसका मुँह काला होता है। | मुख्यतः अलवर जिले में पाई जाती है। |
| खेरी | — | जोधपुर, नागौर एवं पाली जिलों में पाई जाती हैं। |
भेड़ से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
- मेरिनो भेड़ विश्व की सर्वाधिक तथा सबसे उत्तम ऊन उत्पादन वाली नस्ल है, जो ऑस्ट्रेलिया में पाई जाती है।
- भेड़ की प्रमुख विदेशी नस्लों में रूसी मेरिनों, रेम्बूले, डोरसैड तथा कोरिडेल शामिल हैं।
- केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान केन्द्र (CSWRI) अविकानगर (मालपुरा, टोंक) में स्थित है।
- केन्द्रीय ऊन विकास बोर्ड का मुख्यालय जोधपुर में स्थित है।
- भेड़ एवं ऊन प्रशिक्षण केन्द्र जयपुर में स्थित है।
- ऊन उत्पादन में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान (47.98 प्रतिशत) है।
- एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी बीकानेर में स्थित है।
अविका कवच योजना
अविका कवच योजना जून 2017 में प्रारम्भ की गई थी। इस योजना के अंतर्गत भेड़ों की मृत्यु अथवा विकलांगता की स्थिति में भेड़ का अधिकतम बीमित मूल्य 1600 रुपये निर्धारित किया गया है। इसके अतिरिक्त, भेड़ प्रजनन सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत मारवाड़ी, जैसलमेरी एवं मगरा भेड़ नस्लों का चयन किया गया है।
❖ गाय की प्रमुख नस्लें
| नस्ल | प्रमुख विशेषता | प्रमुख क्षेत्र / अन्य जानकारी |
|---|---|---|
| कांकरेज | सवाई चाल के लिए प्रसिद्ध | बाड़मेर, जालौर, सिरोही एवं पाली |
| सांचौरी | कांकरेज नस्ल से मिलती-जुलती | — |
| थारपारकर (मालानी) | सर्वाधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली नस्ल | जैसलमेर, बाड़मेर एवं जोधपुर |
| राठी | राजस्थान की सर्वश्रेष्ठ गाय नस्ल, सर्वाधिक दूध देने वाली नस्ल, “राजस्थान की कामधेनु” | श्रीगंगानगर, बीकानेर एवं जैसलमेर |
| हरियाणवी | — | हरियाणा से लगने वाले सीमावर्ती जिले |
| मालवी | — | झालावाड़, कोटा, डूंगरपुर एवं बाँसवाड़ा |
| नागौरी | इसके बैल बोझा ढोने एवं हल जोतने के लिए प्रसिद्ध | नागौर, बीकानेर एवं जोधपुर |
| गिर | अजमेरा एवं रैंडा नाम से भी जानी जाती है | अजमेर |
| साहीवाल | — | सीमावर्ती जिले |
| मेवाती | — | अलवर एवं भरतपुर |
महत्वपूर्ण तथ्य
- गंगा नस्ल गिर नस्ल की एक क्लोन गाय है।
- इसे भारत की पहली क्लोन गाय माना जाता है।
गायों की प्रमुख विदेशी नस्लें
| नस्ल | मूल देश |
|---|---|
| जर्सी | अमेरिका |
| हॉलिस्टिन फीजियन | हॉलैण्ड (नीदरलैंड) |
| रेड डेन | डेनमार्क |
| स्विस ब्राउन | स्विट्जरलैंड |
❖ गाय पालन से संबंधित महत्वपूर्ण बिन्दु
| विषय | विवरण |
|---|---|
| गौ सेवा संघ | अजमेर |
| गौ सेवा आयोग | जयपुर (1995) |
| गोपालन विभाग की स्थापना | मार्च 2014 |
| राज्य की सबसे बड़ी गौशाला | आनन्दवन, पथमेडा (सांचौर-जालौर) |
| राष्ट्रीय कामधेनु विश्वविद्यालय | पथमेडा (जालौर) |
| गौमूत्र से ऑर्गेनिक फिनाइल बनाने हेतु राज्य का पहला संयंत्र | हींगोनिया गौशाला (जयपुर) |
| गाय की गर्भकाल अवधि | 281 दिन |
❖ गोपाल योजना:- 2 अक्टूबर 1990 को राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी 10 जिलों में गोपाल योजना प्रारम्भ की गई थी।
❖ कामधेनु योजना:- राज्य में गौवंश की नस्ल सुधार के उद्देश्य से 1997-98 में सम्पूर्ण राजस्थान में कामधेनु योजना प्रारम्भ की गई।
❖ भैंस की प्रमुख नस्लें
भैंस पालन की दृष्टि से राजस्थान का देश में महत्वपूर्ण स्थान है। भैंसों की संख्या के आधार पर राजस्थान का स्थान उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा है। राजस्थान में सर्वाधिक भैंसें जयपुर एवं अलवर जिलों में पाई जाती हैं, जबकि न्यूनतम भैंसें जैसलमेर जिले में पाई जाती हैं।
➻ मुर्रा (सुण्डी)
- मुर्रा नस्ल का मूल स्थान मोंटगुमरी (पाकिस्तान) है। यह भैंसों की सबसे अधिक दूध देने वाली नस्ल मानी जाती है।
- इसके सींग छोटे तथा जलेबी के आकार में मुड़े हुए होते हैं।
- राजस्थान में सर्वाधिक मुर्रा नस्ल की भैंसें पाई जाती हैं। यह नस्ल मुख्यतः जयपुर, कोटपूतली-बहरोड़, अलवर, भरतपुर, डीग एवं दौसा जिलों में मिलती है।
इसके प्रमुख प्रजनन केन्द्र निम्न हैं—
- कुम्हेर (डीग)
- डग (झालावाड़)
- नागौर
➻ सूरती:- सूरती नस्ल का मूल स्थान सूरत (गुजरात) है। इसके सींग हंसियाकार होते हैं तथा यह मुख्य रूप से उदयपुर के आसपास के क्षेत्रों में पाई जाती है।
➻ मेहसाना:- मेहसाना नस्ल का मूल स्थान मेहसाना (गुजरात) है। राजस्थान में यह नस्ल जालौर, सिरोही एवं बाड़मेर जिलों में पाई जाती है।
➻ भदावरी (बदावरी)
- भदावरी नस्ल का मूल स्थान भदावरी (आगरा) है। इसका रंग ताँबे जैसा होता है तथा इसके दूध में सर्वाधिक वसा पाई जाती है।
- यह नस्ल मुख्य रूप से भरतपुर, धौलपुर एवं करौली जिलों में पाई जाती है।
➻ जाफराबादी:- जाफराबादी नस्ल का मूल स्थान काठियावाड़ (गुजरात) है तथा यह मुख्यतः दक्षिणी राजस्थान में पाई जाती है।
➻ नागपुरी
- नागपुरी नस्ल मूलतः नागपुर (महाराष्ट्र) की नस्ल है।
- इसके अतिरिक्त भैंसों की अन्य प्रमुख नस्लों में जमना, रथ एवं नीली रावी शामिल हैं।
महत्वपूर्ण बिन्दु
- भैंस प्रजनन एवं अनुसंधान केन्द्र — वल्लभनगर (उदयपुर)
- गाय का माँस बीफ तथा भैंस का माँस कैरा बीफ कहलाता है।
❖ ऊँट की प्रमुख नस्लें
ऊँट राजस्थान की पहचान तथा मरुस्थलीय जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
- राज्य में सर्वाधिक ऊँट जैसलमेर एवं बीकानेर जिलों में पाए जाते हैं।
- राज्य में न्यूनतम ऊँट प्रतापगढ़ एवं धौलपुर जिलों में पाए जाते हैं।
| नस्ल | प्रमुख विशेषता | प्रमुख क्षेत्र / अन्य जानकारी |
|---|---|---|
| गोमठ | सवारी की दृष्टि से सबसे अच्छी नस्ल | मुख्यतः फलौदी क्षेत्र में पाई जाती है। |
| बीकानेरी | हल जोतने के लिए प्रसिद्ध | — |
| नाचना | ऊँटों की सर्वश्रेष्ठ नस्ल | मुख्यतः जैसलमेर क्षेत्र में पाई जाती है। इस नस्ल का उपयोग बी.एस.एफ. के जवानों द्वारा भी किया जाता है। |
| जैसलमेरी | तेज दौड़ने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध | — |
- ऊँटों की अन्य प्रमुख नस्लों में मेवाड़ी, मारवाड़ी, मेवाती, मालवी तथा शेखावाटी शामिल हैं।
- खाराई नस्ल समुद्री जल में लगभग 3 किलोमीटर तक तैरने में सक्षम होती है।
➻ ऊँट के आभूषण
| आभूषण | स्थान |
|---|---|
| गोरबंद | गले में |
| मोरखा | मुख पर |
| पिलान | पीठ पर |
| गिरबान | नाक में |
| तंग | पेट पर |
महत्वपूर्ण बिन्दु
- ऊँटों का प्रमुख रोग — तिबरसा (सराँ)
- केन्द्रीय ऊँट अनुसंधान केन्द्र — जोड़बीड़ (बीकानेर)
- स्थापना — आईसीएआर द्वारा 1984 में
- ऊँटनी के दूध का मिनी प्लांट — जयपुर
- ऊँट पालक प्रमुख जाति — रायका (रेबारी), जो मुख्यतः मारवाड़ क्षेत्र में निवास करती है।
❖ घोड़े
- राजस्थान में सर्वाधिक घोड़े जालौर जिले में पाए जाते हैं, जबकि न्यूनतम घोड़े डूंगरपुर जिले में पाए जाते हैं।
- राज्य की प्रमुख घोड़ा नस्लों में मालानी, काठियावाड़ी एवं मारवाड़ी शामिल हैं।
घोड़ों से संबंधित प्रमुख तथ्य निम्न हैं—
- राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र — जोड़बीड़ (बीकानेर)
- घोड़ों का तीर्थस्थल — आलम जी का धोरा (बाड़मेर)
❖ मुर्गियाँ (कुक्कुट)
- राजस्थान की कुल पशु सम्पदा में 146.23 लाख मुर्गियाँ शामिल हैं।
- अण्डा उत्पादन की दृष्टि से राजस्थान का देश में 13वाँ स्थान है। राज्य में सर्वाधिक अण्डा उत्पादन अजमेर जिले में होता है, जिसके कारण अजमेर को “अण्डों की टोकरी” कहा जाता है।
➻ मुर्गियों की प्रमुख नस्लें
- स्वदेशी नस्लें
- बरसा
- टेनी
- असील
- कड़कनाथ
- विदेशी नस्ल
- व्हाइट लेग हॉर्न — सर्वाधिक अण्डे देने वाली नस्ल
महत्वपूर्ण बिन्दु
- मुर्गी का माँस चिकन कहलाता है।
- प्रमुख रोग — रानीखेत एवं बर्ड फ्लू
- राज्य मुर्गीपालन (कुक्कुट) प्रशिक्षण संस्थान — अजमेर
दूध से संबंधित महत्वपूर्ण बिन्दु
भारत विश्व का सर्वाधिक दूध उत्पादन करने वाला देश है। दूध उत्पादन की दृष्टि से देश में उत्तर प्रदेश के बाद राजस्थान का दूसरा स्थान है। राजस्थान में सर्वाधिक दूध उत्पादन अलवर एवं जयपुर जिलों में होता है।
दूध उत्पादन एवं डेयरी क्षेत्र से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं—
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| राष्ट्रीय दुग्ध दिवस | 26 नवम्बर |
| विश्व दुग्ध दिवस | 1 जून |
| विश्व में दूध उत्पादन में भारत का स्थान | प्रथम |
| भारत में राजस्थान का स्थान | दूसरा |
| राजस्थान में सर्वाधिक दूध उत्पादन वाले जिले | अलवर, जयपुर |
| राज्य की सबसे पुरानी डेयरी | पदमा डेयरी (अजमेर) |
| राज्य का प्रथम डेयरी एवं फूड साइंस महाविद्यालय | उदयपुर |
➻ ऑपरेशन फ्लड (श्वेत क्रांति)
- भारत में श्वेत क्रांति की शुरुआत 1970 में हुई थी। इसकी शुरुआत राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड, गुजरात द्वारा आणंद गाँव से की गई थी।
- श्वेत क्रांति के जन्मदाता वर्गीज कुरियन माने जाते हैं। उनके द्वारा स्थापित आणंद डेयरी (अमूल), गुजरात ने भारत में दुग्ध सहकारिता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।
पशुपालन से संबंधित संस्थाएँ
राजस्थान में पशुपालन, पशु चिकित्सा, पशु अनुसंधान एवं डेयरी विकास से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण संस्थाएँ कार्यरत हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से विशेष महत्व रखती हैं।
| संस्था | स्थान / स्थापना |
|---|---|
| राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय | बीकानेर |
| राजस्थान का दूसरा पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय | जोबनेर (जयपुर) |
| राजस्थान पशु विकास बोर्ड | जामडोली (जयपुर) |
| राज्य का एकमात्र पक्षी चिकित्सालय | जोहरी बाजार (जयपुर) |
| पशु अनुसंधान केन्द्र | कोडमदेसर (बीकानेर) |
| केन्द्रीय पशु प्रजनन केन्द्र | सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) |
राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर राज्य का एकमात्र वेटनरी विश्वविद्यालय है।
➻ राजस्थान राज्य डेयरी विकास निगम लिमिटेड
- राजस्थान राज्य डेयरी विकास निगम लिमिटेड की स्थापना 1975 में जयपुर में की गई थी। बाद में 1977 में इसका नाम बदलकर राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन (RCDF) कर दिया गया। इसका प्रमुख उद्देश्य दुग्ध उत्पादकों को उचित मूल्य उपलब्ध कराना तथा दुग्ध एवं दुग्ध उत्पादों के वितरण में सामंजस्य स्थापित करना है।
➻ राजस्थान राज्य सहकारी क्रय-विक्रय संघ (RAJFED)
- राजस्थान राज्य सहकारी क्रय-विक्रय संघ (RAJFED) का गठन 26 नवम्बर 1957 को जयपुर में किया गया था। यह क्रय-विक्रय (विपणन) सहकारी समितियों की शीर्ष संस्था है, जो राज्य के किसानों को खाद, कीटनाशक दवाइयाँ, बीज, उर्वरक एवं कृषि यंत्र उपलब्ध कराने की व्यवस्था करती है तथा किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाना सुनिश्चित करती है।
➻ अन्य महत्वपूर्ण संस्थाएँ एवं तथ्य
- सबसे पहले महिला दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति की स्थापना बीकानेर में की गई थी।
- राजस्थान सहकारी शिक्षा एवं प्रबंधन संस्थान (RICEM) की स्थापना 1990 में जयपुर में की गई।
पशुधन विकास की योजनाएँ
राजस्थान सरकार द्वारा पशुधन विकास, पशु स्वास्थ्य, दुग्ध उत्पादन वृद्धि तथा पशुपालकों के कल्याण के लिए समय-समय पर विभिन्न योजनाएँ संचालित की गई हैं।
➻ राजस्थान की प्रथम पशुधन विकास नीति
- राजस्थान में प्रथम पशुधन विकास नीति 17 फरवरी 2010 को लागू की गई थी।
➻ पशुधन निःशुल्क आरोग्य योजना
- इस योजना की शुरुआत 15 अगस्त 2012 को की गई थी।
➻ मुख्यमंत्री दुग्ध उत्पादक सम्बल योजना
- इस योजना की शुरुआत 1 अप्रैल 2013 से की गई।
- योजना के अंतर्गत दुग्ध उत्पादकों को 5 रुपये प्रति लीटर की दर से अनुदान राशि प्रदान की जाती है।
➻ देवनारायण पशुपालक आवासीय योजना
- इस योजना की आधारशिला अगस्त 2020 में कोटा में रखी गई थी।
- इसका उद्देश्य कोटा शहर के पशुपालकों के लिए आवास, पशुरोड़ तथा पशुचारण भण्डारण की सुविधा उपलब्ध कराने हेतु आवासीय योजना विकसित करना था।
➻ कामधेनु पशु बीमा योजना
- इस योजना का शुभारम्भ 6 सितम्बर 2023 को गुलाबपुरा (भीलवाड़ा) में किया गया।
- योजना के अंतर्गत प्रत्येक परिवार की 2-2 दुधारू गाय अथवा भैंस का प्रति पशु अधिकतम 40,000 रुपये तक का बीमा निःशुल्क किया जा रहा है।
