❖ राजस्थान में वन सम्पदा
- राजस्थान में शिकार पर सबसे पहले प्रतिबंध 1901 में टोंक रियासत द्वारा लगाया गया।
- वन संरक्षण के लिए नियम बनाने की पहल सबसे पहले जोधपुर रियासत में की गई।
- वन अधिनियम लागू करने वाली राजस्थान की पहली रियासत अलवर थी, जहाँ इसे 1935 में लागू किया गया।
- राजस्थान वन विभाग की स्थापना 1950 में हुई तथा इसका मुख्यालय जयपुर में स्थापित किया गया।
- राष्ट्रीय वन अधिनियम, 1951 के आधार पर राजस्थान वन अधिनियम, 1953 राज्य में लागू किया गया।
- प्रथम राष्ट्रीय वन नीति, 1952 के अनुसार देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 33% भाग पर वन होना आवश्यक माना गया।
❖ वन संरक्षण अधिनियम, 1980
- इस अधिनियम के अंतर्गत किसी भी वन भूमि का अन्य कार्यों में उपयोग करने से पहले भारत सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य है।
- इसके लागू होने के बाद राज्यों की स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति इस विषय में समाप्त हो गई।
- राजस्थान की पहली वन एवं पर्यावरण नीति 18 फरवरी 2010 को जारी की गई।
- वन एवं पर्यावरण नीति जारी करने वाला राजस्थान देश का पहला राज्य बना।
- 5 जून 2023 को राजस्थान वन नीति जारी की गई, जिसमें अगले 20 वर्षों में राज्य के वन आवरण को 20% तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।
- 2010 में राजस्थान सरकार ने राजस्थान जैविक विविधता नियम बनाए तथा राजस्थान राज्य जैव विविधता बोर्ड की स्थापना की।
- राजस्थान के लगभग 33,014 वर्ग किमी क्षेत्र में वन पाए जाते हैं, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 9.64% भाग है।
❖ प्रशासनिक आधार पर राजस्थान के वनों को 3 श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
(1) आरक्षित वन (Reserved Forest) – लगभग 36.95%
- इन वनों पर पूर्ण रूप से सरकार का नियंत्रण रहता है।
- लकड़ी काटना एवं पशु चराना प्रतिबंधित होता है।
- सर्वाधिक आरक्षित वन वाले जिले – उदयपुर, चितौड़गढ़ एवं अलवर।
(2) रक्षित / सुरक्षित वन (Protected Forest) – लगभग 43.1%
- इन वनों में लकड़ी काटने तथा पशु चराने के लिए पूर्व अनुमति आवश्यक होती है।
- क्षेत्रफल की दृष्टि से यह सबसे अधिक विस्तृत वन श्रेणी है।
- सर्वाधिक रक्षित वन वाले जिले – बारां, करौली एवं उदयपुर।
(3) अवर्गीकृत वन (Unclassified Forest) – लगभग 6.62%
- इन वनों में लकड़ी काटने एवं पशु चराने पर सामान्यतः कोई प्रतिबंध नहीं होता।
- सर्वाधिक अवर्गीकृत वन वाले जिले – बीकानेर, गंगानगर एवं जैसलमेर।
❖ राजस्थान वन विभाग के प्रशासनिक प्रतिवेदन के अनुसार—
- सर्वाधिक वन क्षेत्र वाले जिले – उदयपुर, बारां, करौली, चितौड़गढ़, अलवर एवं प्रतापगढ़।
- सर्वाधिक वन प्रतिशत वाले जिले – प्रतापगढ़ (37.46%), उदयपुर (35.49%) तथा करौली।
- न्यूनतम वन क्षेत्र वाले जिले – चूरू, हनुमानगढ़ एवं नागौर।
- न्यूनतम वन प्रतिशत वाले जिले – चूरू (0.53%), जोधपुर (1.07%) तथा नागौर।
❖ भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) – 2023
- यह रिपोर्ट प्रत्येक 2 वर्ष के अंतराल पर प्रकाशित की जाती है।
- रिपोर्ट का प्रकाशन भारतीय वन सर्वेक्षण (मुख्यालय – देहरादून) द्वारा किया जाता है।
- ISFR-2023 इस श्रृंखला की 18वीं रिपोर्ट है।
❖ वनावरण (Forest Cover) – वनों से आच्छादित क्षेत्र।
- राजस्थान में कुल वनावरण लगभग 16,548.27 वर्ग किमी (लगभग 16,596 वर्ग किमी) है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 4.84% है।
- वर्ष 2021 की तुलना में राजस्थान के वनावरण में 83.80 वर्ग किमी की कमी दर्ज की गई।
❖ वृक्षावरण (Tree Cover)
- राजस्थान का कुल वृक्षावरण लगभग 10,084.12 वर्ग किमी (
लगभग 8,733 वर्ग किमी) है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 3.16% है। - राजस्थान में प्रति व्यक्ति औसत वनावरण एवं वृक्षावरण 0.037 हेक्टेयर है।
- सर्वाधिक वनावरण वाले जिले – उदयपुर, अलवर, प्रतापगढ़, चितौड़गढ़ एवं बांसवाड़ा।
- सर्वाधिक वनावरण प्रतिशत वाले जिले – उदयपुर (23.60%), प्रतापगढ़ (22.48%) तथा सिरोही।
- न्यूनतम वनावरण वाले जिले – चूरू एवं हनुमानगढ़।
- न्यूनतम वनावरण प्रतिशत वाले जिले – चूरू (0.45%) तथा जोधपुर (0.49%)।
- वनावरण में सर्वाधिक वृद्धि वाले जिले – सीकर, बाड़मेर एवं अलवर।
- वनावरण में सर्वाधिक कमी वाले जिले – बारां, प्रतापगढ़ एवं अजमेर।
❖ कार्बन स्टॉक
- राजस्थान का कुल कार्बन स्टॉक (घने वनों का क्षेत्र) 110.77 मिलियन टन है, जो देश के कुल कार्बन स्टॉक का 1.54% है।
- अत्यधिक सघन वन वाला जिला – अलवर।
- खुले वनों का सर्वाधिक विस्तार उदयपुर जिले में है।
- चैम्पियन एवं सेठ के वन वर्गीकरण के अनुसार राजस्थान में मुख्यतः 2 प्रकार के वन पाए जाते हैं—
- उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन
- उष्ण कटिबंधीय कांटेदार वन
- इन दोनों प्रमुख वर्गों को आगे 20 उपभागों में विभाजित किया गया है, जिनमें उत्तरी शुष्क मिश्रित पर्णपाती वन सबसे अधिक पाए जाते हैं।
❖ राजस्थान के वनों का वर्गीकरण
(1) शुष्क कांटेदार मरुस्थलीय वन (उष्ण कटिबंधीय कंटीले वन)
- क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान में सबसे अधिक विस्तार इसी प्रकार के वनों का है।
- ये राजस्थान के कुल वन क्षेत्र के लगभग 6.26% भाग में फैले हुए हैं।
- इन्हें मरुदभिद (जीरोफाइट) वन भी कहा जाता है।
- प्रमुख वृक्ष – खेजड़ी (सर्वाधिक), रोहिड़ा, बबूल तथा बेर।
- प्रमुख घास – सेवन एवं धामण।
- इन वनों का विस्तार राजस्थान के पश्चिमी मरुस्थलीय भाग में बीकानेर, जोधपुर तथा पाली संभागों में मिलता है।
(2) उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती (मानसूनी पतझड़) वन
- इन वनों का विस्तार राजस्थान के पूर्वी मैदानी भागों, विशेष रूप से अलवर, भरतपुर एवं धौलपुर में मिलता है।
- इसके अतिरिक्त ये वन सिरोही, उदयपुर तथा बाँसवाड़ा जिलों में भी पाए जाते हैं।
- राजस्थान के कुल वन क्षेत्र का लगभग 28.38% भाग इसी प्रकार के वनों से आच्छादित है।
- प्रमुख वृक्ष – पीपल, बरगद तथा नीम।
(3) उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती (मिश्रित पर्णपाती / पतझड़) वन
- इन वनों की विशेषता है कि वर्षा ऋतु में ये एक बार अपने पत्ते गिरा देते हैं।
- इनका विस्तार राजस्थान के दक्षिणी एवं दक्षिण-पूर्वी भागों में है।
- प्रमुख जिले – कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़, सवाई माधोपुर, उदयपुर, राजसमंद, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, चितौड़गढ़ तथा सिरोही।
- राजस्थान के कुल वन क्षेत्र का लगभग 58.11% भाग इन वनों के अंतर्गत आता है।
- औसत वर्षा – 80 से 100 सेमी।
- प्रमुख वृक्ष – खैर, साल, बाँस, धौंकड़ा, ढाक (पलाश), थोर, तेन्दू तथा सेमल।
- इन वनों में धौंक के वृक्षों की अधिकता होने के कारण इन्हें धौंकड़ा वन भी कहा जाता है।
- धौंक की लकड़ी ईंधन, कोयला बनाने तथा कृषि उपकरण तैयार करने में उपयोग की जाती है।
(4) शुष्क सागवान वन (Dry Teak Forest)
- इन वनों में सागवान (टीक) के वृक्ष सर्वाधिक मात्रा में पाए जाते हैं।
- इन्हें मानसूनी वन अथवा चौड़ी पत्ती वाले वन भी कहा जाता है।
- इनका विस्तार राजस्थान के दक्षिणी एवं दक्षिण-पूर्वी भागों में बाँसवाड़ा (सर्वाधिक), डूंगरपुर, उदयपुर, सलूम्बर, चितौड़गढ़, कोटा, बारां तथा झालावाड़ जिलों में है।
- सागवान का वृक्ष अधिक ठंड एवं पाला सहन नहीं कर पाता।
- ये वन सामान्यतः 250 से 450 मीटर की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मिलते हैं।
- औसत वर्षा – 75 से 110 सेमी।
- सागवान की लकड़ी उत्कृष्ट गुणवत्ता की होने के कारण फर्नीचर निर्माण में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।
- राजस्थान के कुल वन क्षेत्र का लगभग 6.86% भाग इन वनों से आच्छादित है।
(5) उपोष्ण (उप-उष्ण) कटिबंधीय सदाबहार वन
- राजस्थान में इस प्रकार के वन केवल माउंट आबू पर्वतीय क्षेत्र (सिरोही) में पाए जाते हैं।
- इन वनों का घनत्व अधिक होता है तथा वर्षभर हरियाली बनी रहती है।
- इनमें सदाबहार एवं अर्द्ध-सदाबहार दोनों प्रकार की वनस्पतियाँ पाई जाती हैं।
- इन्हें अर्द्ध-उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन भी कहा जाता है।
- ये राजस्थान के कुल वन क्षेत्र के लगभग 0.39% भाग में फैले हुए हैं।
- औसत वर्षा – 125 से 150 सेमी।
- प्रमुख वृक्ष – आम, जामुन एवं बेल।
- इन वनों का विस्तार लगभग 1000 से 1350 मीटर की ऊँचाई तक मिलता है।
नोट –
- राजस्थान में सर्वाधिक पाया जाने वाला वन – धौंकड़ा वन।
- शुष्क वनों में सर्वाधिक प्रमुख वृक्ष – खेजड़ी।
❖ राजस्थान की वनस्पति
❖ खेजड़ी
- वानस्पतिक नाम – प्रोसोपिस सिनेरेरिया (Prosopis cineraria)।
- प्रमुख उपनाम – राजस्थान का गौरव, शमी (ग्रंथों में), राजस्थान का कल्पवृक्ष, जांटी तथा सीमलो (राजस्थानी भाषा में)।
- 31 अक्टूबर 1983 को इसे राजस्थान का राज्यवृक्ष घोषित किया गया।
- इसकी पत्तियों को लूम (लांग) तथा फलों को सांगरी कहा जाता है। सूखने के बाद फल खोखा कहलाता है।
- दशहरा पर्व पर खेजड़ी की पूजा की जाती है।
- परमार एवं तोमर वंश का यह आराध्य वृक्ष माना जाता है।
- 1991 में खेजड़ी के संरक्षण हेतु ऑपरेशन खेजड़ा अभियान चलाया गया।
- सुन्दरलाल बहुगुणा ने 1973 में टिहरी बाँध (उत्तराखण्ड) के विरोध में चिपको आन्दोलन चलाया, जिसमें खेजड़ी को इस आन्दोलन की प्रेरणा का प्रमुख स्रोत माना जाता है।
❖ रोहिड़ा
- वानस्पतिक नाम – टिकोमेला अन्डूलेटा (Tecomella undulata)।
- प्रमुख उपनाम – मरुस्थल का सागवान तथा मारुटीका।
- 31 अक्टूबर 1983 को इसे राजस्थान का राज्यपुष्प घोषित किया गया।
- इसकी लकड़ी का उपयोग उच्च गुणवत्ता के फर्नीचर बनाने में किया जाता है।
❖ साल / सालर वन
- वानस्पतिक नाम – बोसवालिया सेराटा (Boswellia serrata)।
- ये वन अरावली की ढालों पर लगभग 450 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- इनकी लकड़ी का उपयोग पैकिंग सामग्री के डिब्बे तथा माचिस बनाने में किया जाता है।
- सालर वन उत्तम गुणवत्ता के गोंद का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
- सालर वृक्षों की अधिकता होने के कारण इन्हें सालर वन कहा जाता है।
- इनके साथ धोक, धावड़ तथा कठीरा जैसी वनस्पतियाँ भी पाई जाती हैं।
- इन वनों का सर्वाधिक विस्तार उदयपुर में है। इसके अतिरिक्त राजसमंद, चितौड़गढ़, सिरोही, अलवर, अजमेर तथा पाली में भी ये वन मिलते हैं।
❖ ढाक / पलाश वन
- वानस्पतिक नाम – ब्यूटिया मोनोस्पर्मा (Butea monosperma)।
- इसके आकर्षक लाल फूलों के कारण इसे जंगल की ज्वाला (Flame of the Forest) कहा जाता है।
- इसकी लकड़ी का उपयोग ईंधन तथा कोयला बनाने में किया जाता है।
- ये वन उन मैदानी एवं पठारी क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ भूमि कठोर एवं कंकरीली होती है।
- राजसमंद एवं चितौड़गढ़ में इन वनों का सर्वाधिक विस्तार है।
- इसके अतिरिक्त उदयपुर, सिरोही, अलवर, अजमेर तथा पाली जिलों में भी ये वन पाए जाते हैं।
❖ चंदन वन
- हल्दीघाटी एवं नाथद्वारा (राजसमंद) क्षेत्र चंदन के वनों के लिए प्रसिद्ध हैं।
नोट –
- सागवान वन, रोहिड़ा, सालर तथा शीशम से उच्च गुणवत्ता की इमारती लकड़ी प्राप्त होती है।
- धौंकड़ा, खैर, बबूल (चारकोल/लकड़ी का कोयला) तथा खेजड़ी से मुख्य रूप से ईंधन लकड़ी प्राप्त होती है।
❖ बाँस
- बाँस को आदिवासियों का हरा सोना कहा जाता है।
- बाँस का सर्वाधिक विस्तार बाँसवाड़ा, उदयपुर, चितौड़गढ़ तथा कोटा जिलों में है।
- बाँसवाड़ा जिले का नाम बाँस के वनों की अधिकता के कारण पड़ा।
- बाँस विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली घास है।
- भारत सरकार ने 2006-07 में राष्ट्रीय बाँस मिशन प्रारम्भ किया, जिसका नाम 2015-16 में बदलकर राष्ट्रीय कृषि वानिकी एवं बाँस मिशन कर दिया गया।
❖ गोंद
- खेजड़ी, बबूल, नीम, पीपल, सालर तथा ढाक से गोंद प्राप्त किया जाता है।
- चौहटन (बाड़मेर) गोंद उत्पादन के लिए प्रसिद्ध क्षेत्र है।
❖ आंवल
- यह एक झाड़ी है, जो मुख्य रूप से जोधपुर एवं पाली जिलों में पाई जाती है।
- इसका उपयोग चमड़ा साफ करने के कार्य में किया जाता है।
❖ तेंदू
- स्थानीय नाम – टिमरू।
- इसके पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने में किया जाता है।
- तेंदू के वृक्ष झालावाड़, बारां, चितौड़गढ़, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर तथा उदयपुर जिलों में पाए जाते हैं।
- सरकारी मयूर बीड़ी कारखाना टोंक में स्थित है।
- 1974 में राजस्थान में तेंदू पत्ते का राष्ट्रीयकरण किया गया, जिसके बाद इसके व्यापार का अधिकार केवल राज्य सरकार को प्राप्त हुआ।
❖ खैर (Acacia catechu)
- कथौड़ी जनजाति के लोग खैर के तने की छाल को उबालकर हांडी प्रणाली से कत्था तैयार करते हैं।
- खैर का सर्वाधिक विस्तार उदयपुर, सलूम्बर, चितौड़गढ़, बूंदी, झालावाड़, कोटा, बारां तथा सवाई माधोपुर में है।
❖ महुआ (Madhuca longifolia)
- महुआ को आदिवासियों का कल्पवृक्ष कहा जाता है।
- इसके फूलों से देशी शराब (मावड़ी) तैयार की जाती है।
- डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, उदयपुर, सलूम्बर तथा चितौड़गढ़ जिलों में यह प्रमुख रूप से पाया जाता है।
❖ अर्जुन वृक्ष
- यह एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है।
- इसका विस्तार मुख्यतः झालावाड़ एवं उदयपुर में मिलता है।
❖ अश्वगंधा
- यह एक प्रमुख औषधीय पौधा है, जिसका उपयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में किया जाता है।
- इसकी जड़ों से विभिन्न प्रकार की औषधियाँ तैयार की जाती हैं।
- कोटा संभाग में इसकी खेती की जाती है।
❖ शहतूत
- शहतूत के वृक्ष पर रेशम के कीड़े पाले जाते हैं।
- रेशम उत्पादन की इस प्रक्रिया को टसर पद्धति कहा जाता है।
❖ आड़ू
- आड़ू की लकड़ी से कठपुतली बनाई जाती है।
- इसका विस्तार उदयपुर, चितौड़गढ़ तथा अन्य निकटवर्ती क्षेत्रों में मिलता है।
नोट –
- अजमेर में लगभग 1000 वर्ष पुराने कल्पवृक्ष के दो वृक्ष स्थित हैं, जहाँ हरियाली अमावस्या के अवसर पर मेला आयोजित होता है।
- रखत – बिना जोता हुआ खेत।
- कांकड़ – खेत की सीमा, जहाँ वृक्ष लगे होते हैं।
- डांग एवं रूद शब्द वन संरक्षण से संबंधित हैं।
❖ राजस्थान की प्रमुख घास
❖ सेवन
- वानस्पतिक नाम – लेसिमुरस सिंडिक्स (Lasiurus sindicus)।
- यह पश्चिमी राजस्थान की लाठी सीरीज में पाई जाने वाली स्वादिष्ट घास है।
- इसका सर्वाधिक विस्तार जैसलमेर जिले में है।
- इसे घासों का राजा कहा जाता है।
- यह गोडावण के लिए महत्वपूर्ण आवास है, जहाँ यह पक्षी अंडे देता है।
- सूखने के बाद सेवन को लीलोण कहा जाता है।
- करड़ एवं अंजन भी पश्चिमी राजस्थान की प्रमुख घासें हैं।
❖ धामण
- यह पश्चिमी राजस्थान में मिलने वाली प्रमुख सूखी घास है।
- दुधारू पशुओं के चारे के रूप में इसका विशेष महत्व है।
❖ बूर घास
- इसे राजस्थान की सबसे अधिक सुगंधित घास माना जाता है।
- इससे सुगंधित तेल प्राप्त किया जाता है।
- इसका विस्तार मुख्यतः बीकानेर जिले में है।
❖ खस
- यह एक सुगंधित घास है, जो भरतपुर, डीग, सवाई माधोपुर, करौली तथा टोंक में पाई जाती है।
- इससे परदे एवं हाथ के पंखे बनाए जाते हैं।
- इसका उपयोग शरबत बनाने तथा कमरों को सुगंधित एवं ठंडा रखने के लिए किया जाता है।
❖ मोथा घास
- यह घना पक्षी विहार, भरतपुर में पाई जाती है।
- इस घास को पक्षी विशेष रुचि से खाते हैं।
❖ एंचा घास
- यह भी घना पक्षी विहार, भरतपुर में पाई जाती है।
- इस घास में उलझकर कई बार पक्षियों की मृत्यु हो जाती है।
❖ भूरंट
- यह काँटेदार घास की श्रेणी में आती है।
❖ गोखरू / भांसड़ी
- यह पश्चिमी राजस्थान की प्रमुख काँटेदार घास है।
- ऊँट इसे अत्यंत पसंद से खाते हैं।
❖ काग्रेस घास / गाजर घास
- यह एक हानिकारक खरपतवार घास है।
❖ मूरात (Panicum turgidum) घास
- यह शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में पाई जाने वाली महत्वपूर्ण पशु चारा घास है।
- राजस्थान में सर्वाधिक झाड़ी क्षेत्र पाली एवं अलवर जिलों में है, जबकि न्यूनतम हनुमानगढ़ एवं गंगानगर जिलों में पाया जाता है।
❖ प्रसिद्ध उद्यान
- विश्व वानिकी वृक्ष उद्यान – झालाना (जयपुर)।
- इको टूरिज्म पार्क – झालाना (जयपुर)।
- राजस्थान का पहला मरु वानस्पतिक पार्क – माचिया सफारी (जोधपुर)।
- मण्डोर गार्डन – जोधपुर।
- चम्बल उद्यान – कोटा।
- ऑक्सीजन पार्क – कोटा।
- ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग पार्क – जयपुर।
❖ प्रमुख संस्थान
❖ शुष्क वन अनुसंधान संस्थान, जोधपुर (Arid Forest Research Institute) – 1987
- इस संस्थान की स्थापना शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में अनुसंधान करने तथा ऐसी तकनीकों का विकास करने के उद्देश्य से की गई, जिनसे वनस्पति विकास को बढ़ावा मिल सके।
❖ राजस्थान में वन विभाग के प्रशिक्षण के लिए निम्नलिखित 4 प्रमुख संस्थान कार्यरत हैं—
- वन्यजीव प्रबंधन एवं रेगिस्तान पारितंत्र प्रशिक्षण केन्द्र – तालछापर अभयारण्य (चूरू)
- राजस्थान वानिकी एवं वन्यजीव प्रशिक्षण संस्थान – जयपुर
- मरु वन प्रशिक्षण केन्द्र – जोधपुर
- राजस्थान वन प्रशिक्षण केन्द्र – अलवर
❖ संयुक्त वन प्रबंधन (JFM – Joint Forest Management)
- स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से वन संरक्षण को मजबूत बनाने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम 15 मार्च 1991 से राजस्थान में प्रारम्भ किया गया।
❖ पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन निदेशालय
- पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहित करने के लिए इस निदेशालय की स्थापना 2019 में की गई।
❖ प्रमुख दिवस
- विश्व वानिकी दिवस – 21 मार्च
- विश्व जल दिवस – 22 मार्च
- विश्व पृथ्वी दिवस – 22 अप्रैल
- विश्व जैव विविधता दिवस – 22 मई
- अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष – 2010
- विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून
- विश्व ओजोन दिवस – 16 सितम्बर
❖ प्रमुख वन पुरस्कार
➤ अमृता देवी विश्नोई स्मृति वानिकी पुरस्कार
- इस पुरस्कार की शुरुआत 1994 में हुई।
- यह राजस्थान का पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में दिया जाने वाला सबसे बड़ा पुरस्कार है।
- प्रथम पुरस्कार गंगाराम विश्नोई (पाली) को प्रदान किया गया।
❖ वानिकी पंडित पुरस्कार
- वन संरक्षण एवं वानिकी कार्यक्रमों के विकास को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से यह राज्य स्तरीय पुरस्कार प्रारम्भ किया गया।
❖ राजीव गाँधी पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार
- यह पुरस्कार 2012 से प्रदान किया जा रहा है।
- प्रतिवर्ष 5 जून को इसका वितरण किया जाता है।
➤ पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को यह पुरस्कार निम्न तीन श्रेणियों में दिया जाता है—
| श्रेणी | पुरस्कार राशि |
|---|---|
| नागरिक | 2 लाख रुपये |
| संगठन | 5 लाख रुपये |
| नगरपालिका | 3 लाख रुपये |
❖ इंदिरा प्रियदर्शनी वृक्षमित्र पुरस्कार
- यह पुरस्कार 1986 से प्रदान किया जा रहा है।
- इसका वितरण प्रत्येक वर्ष 19 नवंबर (इंदिरा गाँधी की जयंती) के अवसर पर किया जाता है।
- पुरस्कार राशि – 2.5 लाख रुपये।
❖ कैलाश सांखला राष्ट्रीय वन्यजीव फैलोशिप पुरस्कार
- 1996 से भारत सरकार द्वारा यह पुरस्कार प्रदान किया जा रहा है।
- इसकी पुरस्कार राशि 50 हजार रुपये है।
- कैलाश सांखला का जन्म जोधपुर में हुआ था। उन्हें भारत का टाइगर मैन कहा जाता है तथा 1992 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
❖ इंदिरा गाँधी पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार
- यह पुरस्कार 2009 से पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जा रहा है।
- प्रतिवर्ष 5 जून को 5 लाख रुपये की पुरस्कार राशि दी जाती है।
❖ राजवायु
- राजवायु एक मोबाइल ऐप है, जिसे 5 जून 2016 को लॉन्च किया गया।
- इसके माध्यम से जयपुर, जोधपुर तथा उदयपुर की वायु गुणवत्ता संबंधी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
❖ प्रमुख वन योजनाएँ
➤ मरु वृक्षारोपण परियोजना
- इस परियोजना की शुरुआत 1978 में हुई।
- इसका संचालन राजस्थान के 10 मरुस्थलीय जिलों में किया जाता है।
❖ इंदिरा गाँधी नहर क्षेत्र वृक्षारोपण एवं चारागाह विकास योजना
- इस योजना का उद्देश्य इंदिरा गाँधी नहर के किनारों पर वृक्षारोपण एवं चारागाह विकास को बढ़ावा देना है।
- यह योजना जापान की सहायता से संचालित की गई।
❖ अरावली वृक्षारोपण परियोजना
- इस परियोजना का शुभारम्भ 1 अप्रैल 1992 को हुआ।
- जापान के सहयोग से इसे राजस्थान के 10 गैर-मरुस्थलीय जिलों— जयपुर, अलवर, नागौर, झुंझुनूं, पाली, सिरोही, दौसा, उदयपुर, बाँसवाड़ा तथा चितौड़गढ़ में संचालित किया गया।
❖ राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता परियोजना
- यह परियोजना जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी (JICA) की आर्थिक सहायता से संचालित की गई।
- इसमें 10 मरुस्थलीय जिले, 5 गैर-मरुस्थलीय जिले तथा 7 वन्यजीव अभयारण्य शामिल हैं।
- इसका मुख्य उद्देश्य वृक्षारोपण, जैव विविधता संरक्षण, मृदा संरक्षण एवं जल संरक्षण को बढ़ावा देना है।
- राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता विकास परियोजना (RFBDP) फ्रांस के सहयोग से 13 जिलों में संचालित की गई।
❖ हरित राजस्थान योजना
- इस योजना का संचालन 2009-10 में प्रारम्भ किया गया।
- वर्तमान में इसका संचालन मनरेगा के सहयोग से किया जा रहा है।
❖ घर-घर औषधीय योजना
- औषधीय पौधों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह योजना 1 अगस्त 2021 से शुरू की गई।
- इस योजना के अंतर्गत प्रत्येक परिवार को तुलसी, गिलोय, कालमेघ एवं अश्वगंधा सहित कुल 8 औषधीय पौधे निःशुल्क उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
❖ हरित राजस्थान स्वस्थ योजना
- इस योजना के अंतर्गत 5 करोड़ पौधे तैयार किए जाने का लक्ष्य रखा गया है।
- इसका प्रमुख उद्देश्य वन क्षेत्र का विस्तार करना है।
❖ प्रोजेक्ट बोल्ड (Bamboo Oasis on Land in Drought)
- इस परियोजना की शुरुआत 2021 में नीचला मांडवा गाँव (उदयपुर) से की गई।
- खादी एवं ग्रामोद्योग ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के सहयोग से तनोट माता मंदिर के निकट मरुस्थलीकरण रोकने के उद्देश्य से बाँस के पौधे लगाए।
❖ TOFIR (Tree Outside Forest in Rajasthan)
- इस कार्यक्रम के अंतर्गत 5 करोड़ पौधों के वितरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
❖ इको टूरिज्म पॉलिसी
- वन विभाग द्वारा 2010 में राजस्थान के आरक्षित वन क्षेत्रों के बाहर स्थित वन क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस नीति को अनुमोदित किया गया।
- इसके अंतर्गत जुलाई 2021 में आवश्यक संशोधन एवं विस्तार किए गए।
❖ ई-अपशिष्ट प्रबंधन नीति
- पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा 2023 में ई-अपशिष्ट प्रबंधन नीति प्रकाशित की गई।
