राजस्थान में मिट्टियाँ

राजस्थान में मिट्टियाँ

  • मृदा शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सोलम (Solum)’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ फर्श होता है।
  • मिट्टियों के अध्ययन को मृदा विज्ञान (Pedology) कहा जाता है।

मृदा का वर्गीकरण

• मृदा का वर्गीकरण मुख्यतः निम्न आधारों पर किया जाता है—

  1. वैज्ञानिक वर्गीकरण
  2. भौगोलिक वर्गीकरण
  3. कृषि विभाग का वर्गीकरण

(1) वैज्ञानिक / नवीन वर्गीकरण

  • अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा किए गए वर्गीकरण के अनुसार राजस्थान की मिट्टियों को 5 प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है।

(1) एन्टीसोल्स (Entisols)

  • यह मृदा राजस्थान के पश्चिमी भाग के सभी जिलों में पाई जाती है।
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से यह सबसे अधिक विस्तृत मृदा है।

इसके दो प्रमुख उपमृदाक हैं—

  1. सोमेन्ट्स (Psamments)
  2. फ्लूवेन्ट्स (Fluvents)

(2) एरीडीसोल्स (Aridisols)

  • यह मृदा अर्द्धशुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में विकसित होती है।
  • प्रमुख जिले— जोधपुर, पाली, जालौर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, चूरू, सीकर एवं झुंझुनूं
  • इसका प्रमुख मृदा उपकण ऑरिथड (Orthids) है, जिसके अंतर्गत कैम्बो ऑरिथड्स, कैल्सी ऑरिथड्स तथा सेलो ऑरिथड्स राजस्थान में पाए जाते हैं।

(3) इनसेप्टीसोल्स (Inceptisols)

  • यह मृदा उप-आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में मिलती है।
  • प्रमुख जिले— सिरोही, पाली, राजसमंद, उदयपुर, भीलवाड़ा, सलूम्बर तथा चित्तौड़गढ़
  • इसका प्रमुख मृदा उपकण उस्टोक्रैफ्टस (Ustochrepts) है।

(4) अल्फीसोल्स (जलोढ़ मिट्टी)

  • यह मृदा आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में पाई जाती है।
  • प्रमुख जिले— अलवर, खैरथल-तिजारा, जयपुर, दौसा, डीग, कोटपूतली-बहरोड़, भरतपुर, करौली, टोंक, सवाईमाधोपुर तथा धौलपुर
  • इसका प्रमुख मृदा उपकण हेप्लूस्टालफस (Haplustalfs) है।

(5) वर्टीसोल्स (काली मिट्टी)

  • यह मृदा राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग अर्थात हाड़ौती पठार में पाई जाती है।
  • इसका विस्तार आर्द्र एवं अति आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में होता है।
  • प्रमुख जिले— कोटा, बूँदी, बांरा, झालावाड़, डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा
  • इसके प्रमुख मृदा उपकण पेल्यूस्टर्टस एवं क्रोस्टर्टस हैं।

(2) भौगोलिक वर्गीकरण

(1) रेतीली बलुई मिट्टी (मरुस्थलीय मृदा)

  • यह मृदा राजस्थान के पश्चिमी भाग में व्यापक रूप से पाई जाती है।
  • राज्य के लगभग दो-तिहाई भू-भाग पर इसका विस्तार होने के कारण यह सर्वाधिक क्षेत्रफल वाली मिट्टी है।
  • थार मरुस्थल में ग्रेनाइट तथा बलुआ पत्थर के अपक्षय से इसका निर्माण हुआ है।
  • इस मिट्टी का pH मान अधिक होता है तथा इसमें जैविक पदार्थों की कमी रहती है।
  • इसमें कैल्शियम-फॉस्फेट की मात्रा अधिक तथा नाइट्रोजन की मात्रा कम होती है।
  • मोटे कणों वाली यह मिट्टी पहले नदियों द्वारा लाई गई थी, परंतु वर्तमान में अपेक्षाकृत अनुपजाऊ है तथा इसमें लवणता अधिक पाई जाती है।
  • यह मृदा पवनों द्वारा निरंतर एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानांतरित होती रहती है।
  • मोटे कण होने के कारण इसकी जलधारण क्षमता कम होती है।
  • प्रमुख जिले— जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, बीकानेर, जोधपुर, फलौदी, नागौर, चूरू, सीकर तथा झुंझुनूं

➤ रेतीली मिट्टी के मुख्य तीन प्रकार हैं—

(क) लाल रेतीली मिट्टी

    • प्रमुख जिले— जोधपुर, पाली, जालौर, चूरू एवं झुंझुनूं
    • पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध होने पर यह मिट्टी कृषि के लिए उपयुक्त सिद्ध होती है।

(ख) खारी मिट्टी

    • इस मिट्टी में लवणों की मात्रा अधिक होने से खेती करना कठिन होता है।
    • प्रमुख जिले— जैसलमेर, बाड़मेर एवं नागौर

(ग) पीली-भूरी रेतीली मिट्टी

    • यह मिट्टी नागौर एवं पाली जिलों में पाई जाती है।

(2) भूरी रेतीली बलुई मिट्टी / सिरोज्म मिट्टी

  • प्रमुख जिले— नागौर, पाली, अजमेर तथा जयपुर
  • नाइट्रेट की उपस्थिति के कारण इसकी उर्वरता अपेक्षाकृत अधिक होती है।
  • इसे घूसर मरुस्थलीय मिट्टी भी कहा जाता है।

(3) भूरी मिट्टी

  • इसका विस्तार बनास बेसिन क्षेत्र में मिलता है।
  • प्रमुख जिले— भीलवाड़ा, बूँदी, टोंक, सवाईमाधोपुर, करौली तथा अजमेर

(4) लाल-पीली मिट्टी

  • लौह ऑक्साइड की अधिकता के कारण इसका रंग लाल दिखाई देता है, जबकि जल के संपर्क में यह पीली प्रतीत होती है।
  • इसमें नाइट्रोजन एवं कैल्शियम जैसे उपजाऊ तत्वों की कमी रहती है।
  • इसका निर्माण ग्रेनाइट, नीस तथा शिस्ट चट्टानों के अपक्षय से हुआ है।
  • मूँगफली, कपास एवं मक्का की खेती के लिए यह उपयुक्त मानी जाती है।
  • प्रमुख जिले— सवाईमाधोपुर, सिरोही, भीलवाड़ा तथा अजमेर

(5) जलोढ़ / दोमट / कछारी मिट्टी

  • इस मिट्टी का रंग सामान्यतः लाल एवं भूरा होता है।
  • इसे राजस्थान की सबसे अधिक उपजाऊ मिट्टी माना जाता है।
  • इसका निर्माण नदियों द्वारा बहाकर लाए गए अवसादों से हुआ है।
  • इसमें गेहूँ, सरसों, कपास तथा तम्बाकू की खेती प्रमुख रूप से की जाती है।
  • इसमें चूना, पोटाश, फॉस्फोरस एवं लौह तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं, जबकि नाइट्रोजन की कमी रहती है।
  • इसका विस्तार राजस्थान के पूर्वी मैदानी भागों में है।
  • प्रमुख जिले— जयपुर, अलवर, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड़, दौसा, टोंक, सवाईमाधोपुर, करौली, धौलपुर, भरतपुर, गंगानगर तथा हनुमानगढ़

(6) काली / मध्यम काली / रेगुर मिट्टी

  • इसका प्रमुख क्षेत्र हाड़ौती है, जिसमें कोटा, बूँदी, बांरा एवं झालावाड़ शामिल हैं।
  • इसका निर्माण दक्कन लावा (बैसाल्ट) चट्टानों के अपरदन से हुआ है।
  • कपास, चावल, गन्ना एवं सोयाबीन की खेती के लिए यह अत्यंत उपयोगी मानी जाती है।
  • गीली होने पर यह फूल जाती है, इसलिए इसे स्वतः जुताई वाली मिट्टी भी कहा जाता है।
  • इसमें कैल्शियम एवं पोटाश पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, जबकि नाइट्रोजन, फॉस्फेट तथा जैविक पदार्थों की कमी रहती है।
  • क्ले की मात्रा अधिक होने से यह चीका प्रधान मिट्टी कहलाती है।

(7) लाल-काली मिट्टी

  • प्रमुख जिले— चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, उदयपुर, डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा

(8) लवणीय मृदा

  • इस मृदा को ऊसर, कल्लर, रेह तथा अल्कालाईन मृदा के नाम से भी जाना जाता है।
  • प्रमुख जिले— बाड़मेर एवं जालौर

(9) पर्वतीय / लिथोसोल्स मिट्टी

  • यह मिट्टी मुख्यतः अरावली पर्वतमाला में पाई जाती है।

(10) लाल-लोमी / लेटेराइट मिट्टी

  • इसका विस्तार दक्षिणी राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर एवं चित्तौड़गढ़ जिलों में है।
  • लौह तत्व की अधिकता के कारण इसका रंग लाल दिखाई देता है।
  • इसका निर्माण ग्रेनाइट, नीस तथा क्वार्टजाइट जैसी कायांतरित चट्टानों से हुआ है।
  • इस मिट्टी में नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस की कमी पाई जाती है।

(3) कृषि विभाग का मृदा वर्गीकरण

कृषि विभाग के अनुसार राजस्थान की मिट्टियों का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया गया है—

मृदा का प्रकार प्रमुख क्षेत्र / जिले
साई रोजेक्स गंगानगर
रेवेरिना गंगानगर
मरुस्थलीय मृदा जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर एवं शेखावाटी क्षेत्र
जिप्सीफेरस मृदा बीकानेर
ग्रे-ब्राउन जलोढ़ मृदा पाली, नागौर, अजमेर, जालौर एवं सिरोही
नॉन-केल्सिल ब्राउन मृदा जयपुर, सीकर, झुंझुनूं, अलवर, नागौर एवं अजमेर
नवीन जलोढ़ मृदा जयपुर, अलवर, भरतपुर, डीग, सवाईमाधोपुर एवं खैरथल-तिजारा
पीली-भूरी मृदा टोंक, सवाईमाधोपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा एवं चित्तौड़गढ़
नवीन भूरी मृदा भीलवाड़ा, अजमेर एवं ब्यावर
पर्वतीय मृदा उदयपुर, सलूम्बर एवं कोटा
लाल-लोम मृदा डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा
काली मध्यम मृदा कोटा, बूँदी, झालावाड़, चित्तौड़गढ़ एवं भीलवाड़ा
केल्सी ब्राउन मरुस्थलीय मृदा जैसलमेर एवं बीकानेर
मरुस्थल एवं बालूका स्तूप बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर एवं जोधपुर

मृदा अपरदन

  • मिट्टी का एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होना मृदा अपरदन कहलाता है।
  • मृदा अपरदन को रेंगती मृत्यु तथा कृषि का क्षय रोग भी कहा जाता है।

राजस्थान में मृदा अपरदन मुख्यतः दो प्रकार का होता है—

  1. वायु अपरदन
  2. जल अपरदन

(1) वायु अपरदन

  • राजस्थान में सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र वायु अपरदन से प्रभावित हैं।
  • जब हवा मिट्टी के कणों को उड़ाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है, तो इसे वायु अपरदन, क्षैतिज अपरदन अथवा परत अपरदन कहा जाता है।
  • राजस्थान में सर्वाधिक वायु अपरदन वाला जिला जैसलमेर तथा न्यूनतम धौलपुर है।

(2) जल अपरदन

  • बहते हुए जल के साथ मिट्टी का कटकर बह जाना जल अपरदन कहलाता है।
  • चम्बल प्रदेश जल अपरदन से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र है।
  • हाड़ौती पठार का सम्पूर्ण क्षेत्र जल अपरदन की समस्या से प्रभावित है।
  • कोटा जल अपरदन से सर्वाधिक प्रभावित जिला है।

लम्बवत / अवनालिका अपरदन

  • तेज गति से बहने वाला जल मिट्टी को काटकर दूसरे स्थान तक ले जाता है, इसे लम्बवत या अवनालिका अपरदन कहा जाता है।
  • राजस्थान में चम्बल नदी में सर्वाधिक अवनालिका अपरदन होता है।
  • इस प्रकार के अपरदन से सर्वाधिक प्रभावित जिला कोटा है।

चादरी अपरदन

  • वर्षा का जल जब पहाड़ियों की ऊपरी मिट्टी को परत के रूप में बहा ले जाता है, तो उसे चादरी अपरदन कहते हैं।
  • सिरोही में इस प्रकार का अपरदन सर्वाधिक पाया जाता है।

मृदा अपरदन के कारण

  • वनोन्मूलन के कारण मिट्टी का संरक्षण कम हो जाता है, जिससे अपरदन बढ़ता है।
  • झूमिंग कृषि में पहाड़ी ढालों के वनों को काटकर खेती की जाती है, जिससे मृदा क्षरण होता है।
  • अत्यधिक पशु चारण से चारागाहों की वनस्पति नष्ट हो जाती है और मिट्टी खुली रह जाती है।
  • सही फसल चक्र का पालन न करना, समान्तर जुताई का अभाव तथा अनुचित बुवाई भी अपरदन के प्रमुख कारण हैं।
  • अत्यधिक सिंचाई तथा बाढ़ भी मृदा अपरदन को बढ़ावा देती हैं।
मृदा संरक्षण / मृदा अपरदन रोकने के उपाय
  • वृक्षों की कटाई पर नियंत्रण किया जाए तथा वृक्षों की श्रृंखला विकसित कर बालू के टीलों के विस्तार को रोका जाए।
  • फसल चक्र (फसलों का हेर-फेर) अपनाया जाए।
  • जल की गति कम करने के लिए मेड़बंदी की जाए।
  • मृदा में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का सीमित उपयोग किया जाए।

मरुस्थलीकरण के कारण

  • उच्च तापमान एवं कम वर्षा जैसी कठोर जलवायु।
  • वनस्पति की कमी तथा वनोन्मूलन
  • जनसंख्या में वृद्धि
  • अनियंत्रित पशु चारण (अतिचारण) एवं अत्यधिक जुताई
  • भू-जल स्तर का लगातार नीचे जाना।
  • लगातार सूखे की स्थिति बने रहना।
  • वायु अपरदन (मृदा अपरदन) में वृद्धि होना।

सेम / जलाधिक्यता की समस्या

  • मरुस्थलीय क्षेत्रों में भूमि के नीचे चूने की परत होने के कारण नहरों एवं नदियों का जल अधिक गहराई तक नहीं पहुँच पाता। परिणामस्वरूप भूमि में जलभराव एवं दलदली स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसे सेम अथवा जलाधिक्यता कहा जाता है।
  • हनुमानगढ़ एवं गंगानगर इस समस्या से सर्वाधिक प्रभावित जिले हैं।
  • हनुमानगढ़ के बड़ोपल, भगवानदास, देईदास एवं गंधेली गाँव सबसे अधिक प्रभावित हैं।
  • इंदिरा गाँधी नहर क्षेत्र तथा गगनहर सिंचित क्षेत्रों में सेम की समस्या सर्वाधिक पाई जाती है।
  • इस समस्या के नियंत्रण के लिए सफेदा के वृक्ष लगाए जाते हैं।
  • नहरों द्वारा सिंचाई के कारण क्षेत्र की पारिस्थितिकी में भी परिवर्तन आया है।

मृदा गुण

  • यदि मृदा का pH मान 7 से कम हो तो मिट्टी अम्लीय होती है तथा इसमें चूने की मात्रा कम होती है।
  • pH मान 7 से अधिक होने पर मिट्टी क्षारीय अथवा लवणीय कहलाती है।
  • pH मान 7 होने पर मिट्टी उदासीन मानी जाती है।
  • अम्लीय मिट्टी के सुधार के लिए चूने का प्रयोग किया जाता है।
  • राजस्थान के पश्चिमी भाग, विशेषकर जोधपुर एवं पाली में लवणीयता की समस्या अधिक पाई जाती है।
  • लवणता, खारापन अथवा क्षारीयता को कम करने के लिए जिप्सम का उपयोग किया जाता है।
  • मिट्टी की निचली सतह से ऊपर की ओर जल के रिसाव के कारण मिट्टी अम्लीय अथवा क्षारीय बन सकती है।
मृदा के पोषक तत्व
  • मुख्य पोषक तत्वजैविक कार्बन, फॉस्फोरस एवं पोटाश
  • द्वितीयक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वसल्फर, जस्ता, लोहा, ताँबा, मैंगनीज तथा बोरोन
  • मृदा के मुख्य घटकखनिज कण, ह्यूमस (जैविक खाद), जल तथा वायु

राजस्थान बंजर भूमि एवं चारागाह विकास बोर्ड

  • राजस्थान की बंजर भूमि एवं चारागाहों के विकास के उद्देश्य से 22 दिसम्बर 2016 को राजस्थान बंजर भूमि एवं चारागाह विकास बोर्ड के नाम से इसका पुनर्गठन किया गया।
  • यह बोर्ड ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग द्वारा संचालित किया जाता है।

महत्वपूर्ण शब्दावली

  • हकत-बकतसिंचाई कृषि के लिए उपयुक्त भूमि।
  • खसरा — भूमि का वह अभिलेख जिसमें गाँव का नक्शा तथा सम्पूर्ण भूमि का विवरण दर्ज होता है।
  • बंजर भूमि — ऐसी अनुपयोगी भूमि जिस पर कृषि नहीं की जाती।
  • राजस्थान में सर्वाधिक बंजर/बेकार भूमि जैसलमेर, राजसमंद एवं बीकानेर में पाई जाती है।
  • परती भूमि — भूमि की उर्वरता बढ़ाने के लिए किसानों द्वारा 1–2 वर्ष तक खाली छोड़ी गई भूमि।
  • माल भूमिकाली एवं उपजाऊ भूमि

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