तिब्बत के इतिहासकार तारानाथ ने 7वीं शताब्दी में मरूप्रदेश (मारवाड़) के श्रृंगधर नामक चित्रकार का उल्लेख किया है।
राजस्थान में प्राप्त सबसे प्राचीन चित्रित ग्रंथ 1060 ई. में रचित ओध नियुक्ति वृत्ति तथा दस वैकालिक सूत्र चूर्णि हैं, जो जैसलमेर ग्रंथ भंडार से प्राप्त हुए हैं।
10वीं से 15वीं शताब्दी के बीच राजस्थान में अजन्ता चित्रकला का प्रभाव बना रहा। लगभग 1500 ई. के आसपास राजस्थानी चित्रकला की स्वतंत्र परंपरा का प्रारंभ माना जाता है।
17वीं शताब्दी को राजस्थानी चित्रकला का स्वर्णकाल माना जाता है।
प्रारंभिक दौर में इस चित्रशैली पर जैन शैली, गुजरात शैली तथा अपभ्रंश शैली का प्रभाव था, जबकि बाद के समय में यह मुगल चित्रकला से भी प्रभावित हुई।
1916 ई. में आनन्द कुमार स्वामी ने अपनी पुस्तक राजपूत पेंटिंग्स में राजस्थानी चित्रकला का पहला वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया।
❖ राजस्थानी चित्रकला के उपनाम
आनन्द कुमार स्वामी, ओ.सी. गांगुली तथा हैवल ने राजस्थानी चित्रकला को राजपूत चित्रकला की संज्ञा दी।
W.H. ब्राउन ने इसे राजपूत कला कहा।
राय कृष्ण दास ने इस शैली को राजस्थान चित्रकला नाम दिया।
एच.सी. मेहता के अनुसार यह हिन्दू शैली है।
विलियम लॉरेन्स के मतानुसार राजस्थानी चित्रशैली पूर्णतः भारतीय स्वरूप की चित्रकला है।
डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राजस्थानी चित्रशैली को स्त्रियों की सुंदरता की खान बताया है।
❖ चित्रकला के संग्रहालय
संग्रहालय / ग्रंथ भंडार
स्थान
विशेषता
जिनभद्रसूरि ग्रंथ भंडार
जैसलमेर दुर्ग
चित्रित ग्रंथों का संग्रह
मान प्रकाश पुस्तकालय
मेहरानगढ़ दुर्ग
चित्र एवं पांडुलिपियों का संग्रह
सरस्वती भंडार
उदयपुर
महत्वपूर्ण चित्रित ग्रंथ सुरक्षित
पोथीखाना संग्रहालय
जयपुर
प्राचीन पांडुलिपियों का संग्रह
अनूप पुस्तकालय
बीकानेर
खजूर के पत्तों पर लिखी पांडुलिपियों का संग्रह
❖ राजस्थान में चित्रकला की प्रमुख संस्थाएँ
स्थान
प्रमुख संस्थाएँ
जोधपुर
धोरां, चितेरा
भीलवाड़ा
अंकन
उदयपुर
टखमण-28, तूलिका कलाकार परिषद
जयपुर
पैग, आयाम, कलावृत, क्रिएटिव आर्टिस्ट ग्रुप
❖ राजस्थानी चित्रकला का वर्गीकरण
राजस्थानी चित्रकला को चार प्रमुख स्कूलों में विभाजित किया गया है।
जोधपुर शैली, बीकानेर शैली, किशनगढ़ शैली, अजमेर शैली, नागौर शैली, सिरोही शैली, जैसलमेर तथा घाणेराव (पाली), रियां (नागौर), भिनाय (अजमेर) और जुनियाँ (अजमेर) सहित विभिन्न ठिकानों की चित्रकला।
(3) हाड़ौती स्कूल
बूँदी शैली, कोटा शैली तथा झालावाड़ शैली।
(4) ढूंढाड़ शैली
आमेर शैली, जयपुर शैली, शेखावाटी शैली, अलवर शैली, उणियारा उपशैली तथा झिलाय, ईसरदा, शाहपुरा और सामोड के ठिकानों की चित्रकला।
❖ (1) मेवाड़ स्कूल
❖ उदयपुर शैली
उदयपुर शैली को राजस्थानी चित्रशैली की जन्मभूमि तथा सबसे प्राचीन शैली माना जाता है।
1260 ई. का श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि इस शैली का प्रथम चित्रित ग्रंथ माना जाता है। इसे चित्रकार कमलचन्द्र ने महाराणा तेजसिंह के शासनकाल में ताड़ के पत्तों पर चित्रित किया।
1423 ई. में देलवाड़ा में महाराणा मोकल के समय हीरानंद ने सुपासनाह चरियम ग्रंथ का चित्रांकन किया।
1540 ई. में विल्हण द्वारा चौर पंचाशिका का चित्रण किया गया।
इसी वर्ष 1540 ई. में महाराणा उदयसिंह के काल में चित्रकार नानाराम ने भागवत पुराण के पारिजात अवतरण चित्र का निर्माण किया।
महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628–1652 ई.) का शासनकाल उदयपुर शैली का स्वर्णकाल माना जाता है। उन्होंने चित्रकारों को संरक्षण प्रदान किया तथा चित्रकला के लिए एक विशेष विभाग स्थापित कराया, जिसे चितेरों की ओवरी अथवा तसवीरां रो कारखानों के नाम से जाना जाता था।
महाराणा जगतसिंह प्रथम के दरबार के प्रमुख चित्रकार नसीरुद्दीन, साहबदीन और मनोहर थे।
इनके शासनकाल में रागमाला, रसिक प्रिया, गीतगोविन्द, भागवत पुराण (चित्रकार – साहबदीन), रामायण (चित्रकार – मनोहर) तथा आर्ष रामायण (चित्रकार – साहबदीन) का चित्रांकन हुआ।
महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय के समय गीत गोविन्द, सुन्दर श्रृंगार, मुल्ला दो प्याजा के लतीफे तथा कलिला-दमना (पंचतंत्र की कहानियों पर आधारित) ग्रंथों के चित्र विशेष रूप से बनाए गए।
चित्रकार नरोत्तम शर्मा द्वारा निर्मित मुरली मनोहर चित्र को मेवाड़ चित्रशैली का मोनालिसा माना जाता है।
इस शैली में सूरसागर, मालती माधव, रसिक प्रिया तथा नल-दमयंती जैसे ग्रंथों का भी चित्रांकन किया गया।
अटपटी पगड़ीमेवाड़ चित्रशैली की प्रमुख पहचान मानी जाती है।
इस शैली में फरुखफाल का एक चित्र भी मिलता है, जिस पर “आसिफ खाँ रो बेटो” अंकित है।
चित्रों में प्रमुख रूप से लाल रंग का प्रयोग किया गया है। इसके साथ पीला, हरा, नीला तथा सफेद रंग भी प्रयुक्त हुए हैं।
इस शैली में कदंब प्रमुख रूप से चित्रित वृक्ष है।
➤ प्रमुख चित्रकार
साहबदीन, मनोहर, कृपाराम, भैरूराम, जीवा, उमरा तथा नासिरुद्दीन।
❖ चावंड शैली
महाराणा प्रताप के शासनकाल में चावंड शैली का प्रारंभ हुआ।
1592 ई. में ढोला-मारू चित्र का निर्माण हुआ, जो वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली में सुरक्षित है।
इस शैली का स्वर्णकालमहाराणा अमरसिंह प्रथम का शासनकाल माना जाता है।
1605 ई. में महाराणा अमरसिंह के समय चित्रकार निसारदीन ने रागमाला का चित्रांकन किया।
❖ देवगढ़ शैली
1680 ई. में महाराणा जयसिंह के शासनकाल के दौरान द्वारिकादास चूण्डावत ने देवगढ़ ठिकाने की स्थापना की, जिसके साथ देवगढ़ चित्रशैली का विकास हुआ।
देवगढ़ (राजसमंद) के सामंत 16वें उमराव कहलाते थे।
इस चित्रशैली को प्रकाश में लाने का श्रेय डॉ. श्रीधर अंधारे को दिया जाता है।
इस शैली के भित्ति चित्र अजारा की ओवरी तथा मोती महल में देखे जा सकते हैं।
मेवाड़, मारवाड़ तथा जयपुर शैली का प्रभाव इस शैली पर स्पष्ट दिखाई देता है।
➤ प्रमुख चित्रकार
बगता, बैजनाथ, कवला, चोखा, [अस्पष्ट], [अस्पष्ट]।
❖ नाथद्वारा शैली
1672 ई. में महाराणा राजसिंह के शासनकाल के दौरान श्रीनाथजी मंदिर की स्थापना के साथ इस शैली का प्रारंभ माना जाता है।
यह शैली उदयपुर शैली और ब्रज शैली के समन्वय से विकसित हुई।
पिछवाई चित्रों में श्रीनाथजी की प्रतिमा के पीछे कपड़े पर भगवान कृष्ण के जीवन एवं रासलीला से जुड़े प्रसंगों का चित्रण किया जाता है।
इस शैली की प्रमुख विशेषताओं में केले की सांझी, कृष्ण चरित्र का व्यापक चित्रण, यशोदा, नन्द, बाल-ग्वाल, गायों के मनोहारी दृश्य, आकाश में देवताओं का अंकन, सघन वनस्पति, कदली वृक्षों की प्रधानता तथा वल्लभ सम्प्रदाय के संतों का चित्रांकन शामिल है।
➤ प्रमुख चित्रकार
देवकृष्ण, रामलिंग, नारायण, चतुर्भुज, घासीराम, चंपालाल तथा बाबा रामचन्द्र।
महिला चित्रकार – कमला एवं इलायची।
❖ (2) मारवाड़ स्कूल
❖ जोधपुर शैली
राव मालदेव के शासनकाल में जोधपुर चित्रशैली का विकास प्रारंभ हुआ। इसके प्रारंभिक प्रमाण मेहरानगढ़ दुर्ग के चोखेलाव महल तथा उत्तराध्ययन सूत्र के चित्रों से प्राप्त होते हैं।
1623 ई. में चित्रकार वीरजी ने पाली के वीर पुरुष विट्ठलदास चंपावत के लिए रागमाला चित्रावली का चित्रण किया।
महाराजा मानसिंह का शासनकाल इस शैली का स्वर्णकाल माना जाता है। उनके समय नाथ सम्प्रदाय से संबंधित अनेक चित्रों का निर्माण हुआ।
मानसिंह के काल में मतिराम द्वारा रचित रसराज पर आधारित नाथ सम्प्रदाय के चित्र भी तैयार किए गए।
चित्रों के संरक्षण हेतु महाराजा मानसिंह ने मेहरानगढ़ दुर्ग में मान प्रकाश पुस्तकालय की स्थापना कराई।
प्रेमाख्यान विषय पर ढोला-मारू, मूमल-महेन्द्र, रूपमती-बाजबहादुर तथा कल्याण-रागिनी जैसे चित्रों का निर्माण किया गया।
इस शैली की प्रमुख विशेषताओं में बादाम के आकार की आँखें, लंबे एवं गठीले पुरुष, ऊँची पगड़ी तथा चित्रों में लाल और पीले रंगों की प्रधानता शामिल है।
पंचतंत्र का चित्रांकन जोधपुर शैली की प्रमुख विशेषता माना जाता है।
महाराजा रायसिंह के शासनकाल में बीकानेर शैली का विकास प्रारंभ हुआ तथा इसी समय इस पर मुगल चित्रशैली का प्रभाव दिखाई देने लगा।
महाराजा रायसिंह के काल में चित्रित भागवत पुराण इस शैली के प्रारंभिक चित्रों में प्रमुख माना जाता है।
कालिदास के मेघदूत ग्रंथ में बीकानेर की मौलिक चित्रशैली के प्रारंभिक स्वरूप के दर्शन होते हैं।
महाराजा अनूपसिंह का शासनकाल बीकानेर शैली का स्वर्णकाल माना जाता है।
इस शैली के विकास में दो प्रमुख चित्रकार परिवारों का विशेष योगदान रहा।
(1) उस्ता कला
ऊँट की खाल पर सोने से चित्रांकन करना इस कला की प्रमुख विशेषता थी।
महाराजा अनूपसिंह के समय उस्ता परिवार के कलाकारों ने हिन्दू कथाओं, हिन्दी एवं राजस्थानी काव्य को आधार बनाकर सैकड़ों चित्र तैयार किए। ये कलाकार अपने चित्रों पर नाम और तिथि भी अंकित करते थे।
(2) मथेरण कला
मथेरण समुदाय के चित्रकार पारंपरिक जैन मिश्रित राजस्थानी शैली में चित्र बनाते थे।
मथेरण समुदाय के कलाकार स्वयं को महात्मा कहा करते थे।
बीकानेर शैली की प्रमुख विशेषताओं में शाहजहाँ एवं औरंगजेब कालीन पगड़ियों के साथ ऊँची मारवाड़ी पगड़ियाँ, ऊँट एवं हिरण का चित्रण तथा पीले रंग की प्रमुखता शामिल है।
इस शैली में आम प्रमुख वृक्ष के रूप में चित्रित किया गया है।
इस चित्रशैली को प्रकाश में लाने का श्रेय एरिक डिक्सन तथा फैयाज अली को दिया जाता है।
राजा सावंतसिंह (1748–1764 ई.) का शासनकाल किशनगढ़ शैली का स्वर्णकाल माना जाता है।
राजा सावंतसिंह ने नागरीदास उपनाम से कविताओं की रचना की, इसलिए वे नागरीदास के नाम से भी प्रसिद्ध हुए। उनकी रचनाओं का संकलन नागर समुच्चय नाम से जाना जाता है।
सावंतसिंह का निधन वृंदावन में हुआ। वहाँ उनके निवास स्थान को नागरीदास का डेरा कहा जाता था।
इस शैली पर कांगड़ा शैली (हिमाचल प्रदेश) तथा ब्रज शैली का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
इस शैली में केला प्रमुख रूप से चित्रित वृक्ष है।
चाँदनी रात की संगोष्ठी नामक प्रसिद्ध चित्र का निर्माण अमरचंद ने किया।
➤ बनी-ठणी
मोरध्वज निहालचंद, जो सावंतसिंह के दरबारी चित्रकार थे, उन्होंने बनी-ठणी को राधा के स्वरूप में चित्रित किया।
बनी-ठणी का मूल नाम विष्णु प्रिया था, जो सावंतसिंह की प्रेमिका थीं।
एरिक डिक्सन ने बनी-ठणी को भारत की मोनालिसा की उपाधि दी।
5 मई 1973 को भारत सरकार ने बनी-ठणी चित्र पर 20 पैसे का डाक टिकट जारी किया।
इस चित्र की प्रमुख विशेषताओं में लंबी नाक, नुकीली ठोड़ी, सुराहीदार गर्दन, तोते जैसी नाक, पतली कमर, कमल की पंखुड़ी जैसी आँखें तथा सफेद, गुलाबी और सिंदूरी रंगों का प्रयोग शामिल है।
दूर तक फैली झील, हंस, बतख, तैरती नौकाएँ तथा चाँदनी रात में राधा-कृष्ण की लीलाओं का चित्रण किशनगढ़ शैली की प्रमुख पहचान है।
चाँदनी रात की संगोष्ठी का चित्र अमरचंद द्वारा निर्मित है।
1775 ई. में यह शैली जयपुर से अलग होकर राव प्रतापसिंह के शासनकाल में स्वतंत्र रूप से विकसित हुई।
प्रतापसिंह के समय चित्रकार शिवकुमार तथा डालूराम जयपुर से अलवर आए।
इस शैली का स्वर्णकालमहाराजा विनयसिंह का शासनकाल माना जाता है।
विनयसिंह स्वयं चित्रकार बलदेव से चित्रकला सीखते थे।
विनयसिंह ने शेख सादी की कृति गुलिस्तां को रत्नों की स्याही से चित्रित करवाया, जिसके चित्र बलदेव और गुलाम अली ने बनाए।
महाराजा शिवदान सिंह के काल में कामशास्त्र एवं योगासन आधारित चित्र मिलते हैं, जबकि महाराजा मंगलसिंह के समय मूलचंद एवं उदयराम ने हाथी दांत पर सूक्ष्म चित्रांकन किया।
इस शैली पर ईरानी, मुगल तथा जयपुर चित्रकला का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
अलवर के शासक बलवंत सिंह के समय छोटेलाल एवं सालिराम ने दुंगा सरस्वती का चित्रण किया।
यह शैली जयपुर तथा बूँदी चित्रशैली का मिश्रित स्वरूप है।
➤ प्रमुख चित्रकार
धीमा, मीरबख्श, काशी, रामलखन, भीम।
❖ शेखावाटी शैली
शेखावाटी क्षेत्र की 19वीं शताब्दी की हवेलियाँ भित्ति चित्रों के लिए अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
यहाँ के भित्ति चित्रों के कारण शेखावाटी को ओपन आर्ट गैलरी कहा जाता है।
इस शैली में चित्रों में मुख्य रूप से कत्थई, नीला तथा गुलाबी रंगों की प्रधानता देखी जाती है।
❖ भित्ति चित्र एवं तकनीक
भित्ति चित्र का अर्थ होता है दीवारों पर बनाए गए चित्र।
गीली प्लास्टर दीवार पर चित्रांकन की तकनीक को फ्रैस्को बुनो कहा जाता है, जिसे आलागीला, आरायश या मोराकसी भी कहा जाता है, जबकि शेखावाटी में इसे पणा कहा जाता है।
यह तकनीक अकबर के काल में इटली से भारत आई थी।
राजस्थान में इसका सर्वप्रथम प्रयोग आमेर में हुआ।
सूखी दीवार पर चित्र बनाने की तकनीक को फ्रैस्को सेक़ो कहा जाता है।
❖ लघु चित्रकला (मिनिएचर पेंटिंग)
यह अत्यंत सूक्ष्म एवं छोटी आकृतियों वाली चित्रकला होती है, जिसमें कभी-कभी हाथी दांत पर भी चित्र बनाए जाते हैं।
यह शैली मूलतः मुगल परंपरा से विकसित हुई।
तिलक गिताई को इस चित्रकला में पद्मश्री सम्मान प्राप्त है।
❖ कजली पेंटिंग
इस चित्रकला में काजल (काली स्याही) का प्रयोग कर चित्र बनाए जाते हैं।
इसमें किसी प्रकार के ब्रश का उपयोग नहीं किया जाता।
❖ राजस्थान के प्रमुख चित्रकार
देवकी नंदन शर्मा (अलवर) – इन्हें मास्टर ऑफ नेचर एंड लिविंग ऑब्जेक्ट कहा जाता है, ये पशु-पक्षी चित्रण के लिए प्रसिद्ध हैं।
कुन्दन लाल मिस्त्री – राजस्थान में आधुनिक चित्रकला के विकास का श्रेय इन्हें दिया जाता है।
परमानन्द चोयल (कोटा) – भैंसों के चित्र बनाने के कारण इन्हें भैंसों का चित्रकार कहा जाता है।
रामगोपाल विजयवर्गीय (बालेर, सवाईमाधोपुर) – राजस्थान में चित्र प्रदर्शनी की शुरुआत करने का श्रेय इन्हें है, प्रमुख रचना अभिसार निशा है।
गोवर्धन लाल बाबा (राजसमंद) – भीलों के चित्रों के कारण इन्हें भीलों का चित्रकार कहा जाता है, प्रमुख चित्र बारात है।
सौभाग्यमल गहलोत (जयपुर) – घोंसलों के चित्र के कारण इन्हें नीड़ का चित्रकार कहा जाता है।
भूर सिंह शेखावत (बीकानेर) – स्वतंत्रता सेनानियों के चित्र बनाए।
जगमोहन माथोडिया (जयपुर) – इन्हें श्वान (कुत्तों) का चित्रकार कहा जाता है।
टॉक अशोक शिवानी (पुष्कर) – ऊँटों के ब्यूटीशियन के रूप में प्रसिद्ध।