राजस्थान के मंदिर

इस भाग में क्या पढ़ेंगे

राजस्थान के मंदिर

मंदिर निर्माण की प्रमुख 3 शैलियाँ प्रचलित हैं—

(1) नागर शैली

  • यह शैली मुख्य रूप से उत्तर भारत के मंदिरों में अपनाई गई है।
  • मंदिर का शिखर आमलक (अमाक) तथा कलश में विभाजित होता है।
  • अधिकांश मंदिर ऊँचे चबूतरे पर निर्मित किए जाते हैं।
  • मंदिर का गर्भगृह (जहाँ मुख्य प्रतिमा स्थापित होती है) सामान्यतः वर्गाकार होता है।

(2) द्रविड़ शैली

  • यह शैली दक्षिण भारत के मंदिरों की प्रमुख स्थापत्य परंपरा है।
  • मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार गोपुरम कहलाता है।
  • गर्भगृह का आकार आयताकार होता है तथा उसके ऊपर पिरामिडाकार संरचना बनाई जाती है।

राजस्थान में इस शैली के प्रमुख मंदिर—

  • रंगनाथ मंदिर (पुष्कर)
  • तिरुपति बालाजी मंदिर (सूजानगढ़, चूरू)

(3) बेसर शैली

  • यह शैली नागर एवं द्रविड़ स्थापत्य का मिश्रित स्वरूप है।
  • भारत में सर्वाधिक प्रचलित मंदिर निर्माण शैली इसी को माना जाता है।

मंदिर निर्माण की अन्य शैलियाँ

पंचायतन शैली

  • इसे नागर शैली का विकसित रूप माना जाता है।
  • इस शैली में एक मुख्य मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित होता है तथा उसके चारों ओर सूर्य, शिव, गणेश एवं शक्ति के चार छोटे मंदिर बनाए जाते हैं।

राजस्थान में इस शैली के प्रमुख मंदिर—

  • हरिहर मंदिर (ओसियां) — पंचायतन शैली का सर्वप्रथम मंदिर
  • जगदीश मंदिर (उदयपुर)
  • बाड़ोली शिव मंदिर (चित्तौड़गढ़)

भूमिज शैली

  • यह नागर शैली की एक उपशैली है।
  • इस शैली के मंदिरों में खुली छत का स्वरूप देखने को मिलता है।
  • राजस्थान का सबसे प्राचीन भूमिज शैली का मंदिर सेवाड़ी जैन मंदिर (पाली) है।

अन्य प्रमुख मंदिर—

  • महानालेश्वर मंदिर (मेनाल, भीलवाड़ा)
  • भण्डदेवरा मंदिर (रामगढ़, बारां)
  • उंडेश्वर मंदिर (बिजौलिया, भीलवाड़ा)

कच्छपघात शैली

  • इस शैली का संबंध भगवान राम के पुत्र कुश से माना जाता है।

इस शैली के प्रमुख उदाहरण—

  • शांतिनाथ जैन मंदिर (झालरापाटन)
  • पदमनाभ मंदिर

गुर्जर प्रतिहार (महामारू) शैली

  • यह स्थापत्य शैली मुख्यतः 8वीं से 11वीं शताब्दी के बीच विकसित हुई।
  • इस काल में अधिकांश मंदिर नागर शैली में निर्मित हुए।

गुर्जर प्रतिहार शैली के प्रमुख मंदिर

  • सोमेश्वर मंदिर (किराड़ू)
  • कामेश्वर महादेव मंदिर (आउवा, पाली)
  • दधिमति माता मंदिर (गोठ मांगलोद, नागौर)
  • हर्षद माता मंदिर (आभानेरी, दौसा)
  • हर्षनाथ मंदिर (सीकर)
  • अंबिका माता मंदिर (जगत, सैलूंबर)
  • कुंभ श्याम मंदिर (चित्तौड़गढ़)
  • नीलकंठ महादेव मंदिर (राजोरगढ़, अलवर)
  • वराह मंदिर (आहड़) — निर्माण अल्लट द्वारा कराया गया।
  • रणछोड़ जी मंदिर (खेड़, बालोतरा)

गुप्तकालीन मंदिर

  • इन मंदिरों का निर्माण 300 ई. से 700 ई. के मध्य हुआ।
  • राजस्थान के प्रमुख गुप्तकालीन मंदिर—
  • चारचौमा शिव मंदिर (कोटा)
  • भँवर (भ्रमर) माता मंदिर (छोटी सादड़ी, प्रतापगढ़)

रणकपुर जैन मंदिरदेसूरी (पाली)

  • यह मंदिर भगवान आदिनाथ की चौमुखी प्रतिमा के कारण चौमुखा जैन मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है।
  • मुख्य प्रवेश द्वार की छतरी पर ऋषभदेव (आदिनाथ) की माता मरूदेवी की प्रतिमा स्थापित है।
  • यह मंदिर मथाई नदी के तट पर स्थित है।
  • मंदिर में कुल 1444 स्तंभ हैं, इसलिए इसे खम्भों का अजबघर कहा जाता है।
  • इसका निर्माण 1439 ई. में महाराणा कुम्भा के शासनकाल के दौरान धरणकशाह ने कराया।
  • मंदिर के वास्तुकार देपाक थे।
  • विमल सूरी ने इसे नलिनी गुल्म विमान कहा।
  • महाकवि माघ ने इसे त्रिलोक दीपक मंदिर की संज्ञा दी।
  • फर्ग्यूसन के अनुसार, उत्तरी भारत में इसके समान सुंदर एवं सुसज्जित मंदिर दूसरा नहीं है।

एकलिंग जी मंदिरकैलाशपुरी (उदयपुर)

  • यह मेवाड़ के महाराणाओं के कुलदेवता का मंदिर है।
  • मंदिर में काले रंग का चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित है।
  • इसका मूल निर्माण 734 ई. में बप्पा रावल ने कराया।
  • बाद में महाराणा मोकल ने इसका पुनर्निर्माण कराया तथा महाराणा रायमल ने इसे वर्तमान स्वरूप प्रदान किया।
  • यह पाशुपत (लकुलीश) संप्रदाय का प्रमुख मंदिर है।

शीतलेश्वर महादेव मंदिरझालरापाटन (झालावाड़)

  • इसका निर्माण 689 ई. में राजा दुर्गण के सामंत वाप्पक ने कराया।
  • यह राजस्थान का सबसे प्राचीन तिथियुक्त मंदिर माना जाता है।
  • मंदिर चन्द्रभागा नदी के किनारे स्थित है।

सात सहेलियों का मंदिरझालरापाटन (झालावाड़)

  • इसके अन्य नाम पदमनाभ मंदिर तथा सूर्य मंदिर हैं।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने इसे चारभुजा मंदिर कहा है।
  • यहाँ स्थित सूर्य मंदिर सप्तरथ शैली का है।
  • सूर्य की प्रतिमा में उन्हें घुटनों तक जूते पहने हुए दर्शाया गया है।
  • मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है।

किराड़ू के शिव मंदिरकिराड़ू (बाड़मेर)

  • किराड़ू का प्राचीन नाम किरात कूप था।
  • मंदिरों की बाहरी दीवारों पर काम क्रीड़ाओं का चित्रण होने के कारण इन्हें राजस्थान का खजुराहो कहा जाता है।
  • यहाँ कुल 5 मंदिर स्थित हैं, जिनमें सोमेश्वर मंदिर सबसे सुंदर माना जाता है।

सोमेश्वर मंदिर

  • यह किराड़ू का प्रमुख मंदिर है।
  • इसे गुर्जर प्रतिहार शैली में निर्मित राजस्थान का अंतिम मंदिर माना जाता है।

भण्डदेवरा शिव मंदिररामगढ़ पहाड़ी (बारां)

  • इसका निर्माण मेदवंशीय राजा मलय वर्मा ने कराया।
  • इसे राजस्थान का मिनी खजुराहो तथा हाड़ौती का खजुराहो कहा जाता है।

अंबिका माता मंदिरजगत (सैलूंबर)

  • यह मंदिर मेवाड़ का खजुराहो कहलाता है।
  • इसका निर्माण अल्लट के समय हुआ।
  • यह गुर्जर प्रतिहार काल की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

नाकोड़ा भैरव मंदिरनाकोड़ा (बालोतरा)

  • नाकोड़ा का प्राचीन नाम मेवा नगर था।
  • यहाँ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का मंदिर स्थित है।
  • श्रद्धालु नाकोड़ा भैरव को हाथ का हजूर तथा जागती जोत के नाम से भी जानते हैं।

सास बहू मंदिर (सहस्त्रबाहु मंदिर)नागदा (उदयपुर)

  • यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है।
  • इसका निर्माण गुर्जर प्रतिहार काल में हुआ।
  • यहाँ दो वैष्णव मंदिर हैं, जिनमें बड़ा मंदिर सास का मंदिर तथा छोटा मंदिर बहू का मंदिर कहलाता है।

दिलवाड़ा जैन मंदिरआबू पर्वत (सिरोही)

  • इन मंदिरों का निर्माण चालुक्य (सोलंकी) शासकों द्वारा कराया गया।
  • यह कुल 5 मंदिरों का समूह है।
  • भारत सरकार ने 14 अक्टूबर 2009 को इस मंदिर पर ₹5 का डाक टिकट जारी किया।
  • इस समूह में 2 विशाल मंदिर तथा 3 अनुपूरक मंदिर शामिल हैं।

(1) विमलवसाही मंदिर

  • यह जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) को समर्पित है।
  • इसका निर्माण 1031 ई. में गुजरात के चालुक्य राजा भीमदेव के मंत्री विमलसाह ने कराया।
  • इसके वास्तुकार कीर्तिधर थे।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने कहा कि ताजमहल के बाद यदि भारत में कोई अद्वितीय भवन है, तो वह विमलसाह का मंदिर है।

(2) लूनवसाही मंदिर

  • यह जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ को समर्पित है।
  • इसका निर्माण 1230 ई. में चालुक्य राजा धवल के मंत्री वास्तुपाल एवं तेजपाल ने कराया।
  • इसके वास्तुकार शोभनदेव थे।

(3) पितलहार (भीमाशाह) मंदिर

  • यहाँ ऋषभदेव (आदिनाथ) की 108 मण पीतल से निर्मित प्रतिमा स्थापित है।
  • इस मंदिर का निर्माण भीमाशाह ने कराया।

(4) पार्श्वनाथ चौमुखा मंदिर

  • यह जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित है।

(5) महावीर स्वामी मंदिर

  • यह जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को समर्पित है।

दिलवाड़ा शिलालेख

  • 1434 ई. के आबू स्थित इस शिलालेख में विमलवसाही मंदिर का उल्लेख मिलता है।
  • इस शिलालेख में कुल 18 पंक्तियाँ हैं, जिनमें 8 पंक्तियाँ संस्कृत तथा 10 पंक्तियाँ मेवाड़ी भाषा में लिखी गई हैं।

ओसियां मंदिर समूहओसियां (जोधपुर)

  • इसे राजस्थान का भुवनेश्वर कहा जाता है।
  • यहाँ भगवान महावीर स्वामी का जैन मंदिर, सच्चियाय माता मंदिर, सूर्य मंदिर, हरिहर मंदिर तथा पीपला माता मंदिर सहित अनेक मंदिर स्थित हैं।
  • हरिहर मंदिर में भगवान शिव एवं भगवान विष्णु के समन्वित स्वरूप की आराधना की जाती है।
  • इन मंदिरों का निर्माण गुर्जर प्रतिहार काल में महामारू शैली में हुआ।
  • इस मंदिर समूह में शैव, वैष्णव तथा जैन धर्म से संबंधित मंदिर विद्यमान हैं।

बाड़ौली शिव मंदिररावतभाटा (चित्तौड़गढ़)

  • यहाँ छोटे-बड़े कुल 9 मंदिरों का समूह है, जिनमें घटेश्वर मंदिर सबसे प्रमुख है।
  • मंदिर का निर्माण पंचायतन शैली में किया गया है।
  • इसका निर्माण गुर्जर प्रतिहार काल में हुआ।
  • ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार 6वीं शताब्दी में हूण शासक मिहिरकुल ने इसका निर्माण करवाया था।
  • यह मंदिर चंबल एवं ब्राह्मणी नदी के संगम पर स्थित है।
  • यहाँ भगवान शिव की नटराज प्रतिमा स्थापित थी।
  • 1821 ई. में कर्नल जेम्स टॉड ने इस मंदिर को पुनः प्रकाश में लाया।

कपिल मुनि का मंदिरकोलायत (बीकानेर)

  • यहाँ प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर विशाल मेले का आयोजन होता है।
  • पुष्कर की भाँति यहाँ भी दीपदान की परंपरा प्रचलित है।
  • कोलायत झील के किनारे कुल 52 घाट निर्मित हैं।
  • कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन का प्रतिपादन किया था।

ऋषभदेव (केसरियाजी) मंदिरधुलेव (उदयपुर)

  • यह मंदिर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) को समर्पित है।
  • प्रतिमा का रंग काला होने के कारण इन्हें काला बावजी तथा केसर अर्पित करने की परंपरा के कारण केसरियानाथ जी कहा जाता है।
  • मंदिर कोयल नदी के तट पर स्थित है।
  • यहाँ शीतलाष्टमी (चैत्र कृष्ण अष्टमी) के अवसर पर मेला आयोजित होता है।

सांवलिया मंदिरमंडपिया (चित्तौड़गढ़)

  • मंदिर में भगवान कृष्ण की काले पत्थर से निर्मित प्रतिमा स्थापित है।
  • जलझूलनी एकादशी के अवसर पर यहाँ भव्य सवारी निकाली जाती है।

33 करोड़ देवी-देवताओं की सालमंडोर (जोधपुर)

  • विशाल चट्टान को काटकर यहाँ 16 मूर्तियों का निर्माण किया गया है।
  • इसे हॉल ऑफ हीरोज के नाम से भी जाना जाता है।
  • इन प्रतिमाओं का निर्माण महाराजा अभयसिंह के शासनकाल में कराया गया।
33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिरजूनागढ़ (बीकानेर)
  • इसका निर्माण अनूपसिंह ने करवाया।
  • यहाँ हेरम्ब गणपति (शेर पर आरूढ़ गणेश जी) की प्रतिमा स्थापित है।

उषा मंदिर (उषा मस्जिद)बयाना दुर्ग (भरतपुर)

  • यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र अनिरुद्ध की पत्नी उषा को समर्पित था।
  • बाद में इल्तुतमिश ने इसे ध्वस्त कर मस्जिद का रूप दे दिया।
  • इसके पश्चात महाराजा सूरजमल ने पुनः मंदिर का निर्माण कराया।

पांडुपोल मंदिरअलवर

  • यहाँ हनुमान जी की शयन मुद्रा में प्रतिमा स्थापित है।
  • मान्यता है कि पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान यहाँ आए थे।

सालासर बालाजी मंदिरसुजानगढ़ (चूरू)

  • इस मंदिर की विशेषता दाढ़ी और मूँछ वाले हनुमान जी की प्रतिमा है।
  • यहाँ चैत्र पूर्णिमा तथा आश्विन पूर्णिमा पर विशाल मेले आयोजित होते हैं।

मेहंदीपुर बालाजी मंदिरदौसा

  • यह मंदिर भूत-प्रेत बाधा एवं मानसिक रोगों से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है।
  • यहाँ प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा पर मेला भरता है।

सोनी जी की नसियांअजमेर

  • इसका निर्माण 1864 ई. में मूलचंद सोनी ने प्रारंभ कराया, जिसे उनके पुत्र टीकमचंद सोनी ने पूर्ण कराया।
  • यह जैन धर्म का मंदिर है, जो ऋषभदेव (आदिनाथ) को समर्पित है।
  • लाल पत्थरों से निर्मित होने के कारण इसे लाल मंदिर भी कहा जाता है।
  • इसका मुख्य कक्ष स्वर्ण नगरी हॉल के नाम से प्रसिद्ध है।

जगत शिरोमणि मंदिरआमेर (जयपुर)

  • यह मंदिर आमेर दुर्ग के उत्तर-पश्चिम भाग में स्थित है।
  • इसका निर्माण 1599–1608 ई. के बीच मिर्जा राजा मानसिंह की पत्नी कनकावती ने अपने पुत्र जगतसिंह की स्मृति में कराया।
  • मंदिर राजपूत-मुगल स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • यहाँ भगवान कृष्ण की वही काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है, जिसकी पूजा मीराबाई करती थीं।
  • मानसिंह इस प्रतिमा को चित्तौड़ से लेकर आए थे।

रणछोड़राय जी का मंदिरखेड़ (बालोतरा)

  • यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है।
  • खेड़ क्षेत्र में भूरिया बाबा तथा खेड़िया बाबा को रेबारी समुदाय का आराध्य देव माना जाता है।

ब्रह्मा मंदिरपुष्कर (अजमेर)

  • यह भगवान ब्रह्मा का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ उनकी विधिवत पूजा की जाती है।
  • भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया है।
  • मंदिर का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा कराया गया।
  • इसका वर्तमान स्वरूप गोकुलचंद पारिक ने प्रदान किया।

राजस्थान के अन्य प्रमुख ब्रह्मा मंदिर

  • छीछ (बाँसवाड़ा)
  • आसोतरा (बालोतरा)

सावित्री मंदिररत्नागिरी पहाड़ी (पुष्कर, अजमेर)

  • यह मंदिर ब्रह्मा जी की प्रथम पत्नी सावित्री को समर्पित है।
  • यहाँ सावित्री की पुत्री माँ सरस्वती की प्रतिमा भी स्थापित है।

गायत्री मंदिरपुष्कर

  • मान्यता है कि पुष्कर में यज्ञ सम्पन्न कराने के लिए ब्रह्मा जी ने गायत्री से दूसरा विवाह किया था।

बेणेश्वर धामनवाटापरा (डूंगरपुर)

  • यह तीर्थ सोम, माही तथा जाखम नदी के त्रिवेणी संगम पर स्थित है।
  • यहाँ खंडित शिवलिंग की पूजा की जाती है।
  • प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा पर विशाल मेला आयोजित होता है।
  • मंदिर का निर्माण महारावल आसकरण ने कराया।
  • इसे आदिवासियों का कुम्भ तथा बागड़ का कुम्भ कहा जाता है।

भांडाशाह जैन मंदिरबीकानेर

  • इस मंदिर का निर्माण घी के व्यापारी भांडाशाह ओसवाल ने कराया।
  • इसकी नींव में घी का उपयोग किया गया था।
  • यह मंदिर जैन धर्म के 5वें तीर्थंकर सुमतिनाथ को समर्पित है।
  • इसे त्रिलोक दीपक प्रसाद मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

जगदीश मंदिर (सपने में बना मंदिर)उदयपुर

  • 1651 ई. में महाराणा जगतसिंह प्रथम ने जगदीश चौक में इस मंदिर का निर्माण पंचायतन शैली में कराया।
  • मंदिर में जगन्नाथ राय (भगवान विष्णु) की काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है।
  • मंदिर के चारों कोनों पर शिव, पार्वती, गणेश तथा सूर्य के अलग-अलग मंदिर निर्मित हैं।
  • इसका निर्माण अर्जुन की देखरेख में तथा वास्तुकार भाणा एवं उनके पुत्र मुकुंद द्वारा किया गया।
  • इस मंदिर को नष्ट करने के उद्देश्य से औरंगजेब ने आक्रमण किया था।

अर्थूना के जैन मंदिरबाँसवाड़ा

  • अर्थूना का प्राचीन नाम उत्थुनक था।
  • यह स्थान वागड़ के परमार शासकों की राजधानी रहा।
  • यहाँ का प्रमुख मंदिर मंडलेश्वर महादेव मंदिर है, जिसका निर्माण चामुण्डराज परमार ने कराया।
  • यह लकुलीश संप्रदाय से संबंधित शिव मंदिर है।

कल्याण जी का मंदिरडिग्गी (टोंक)

  • इस मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है।
  • इसका निर्माण राजा दिग्ग ने कराया।
  • यहाँ प्रतिवर्ष श्रावण अमावस्या के अवसर पर विशाल मेला आयोजित किया जाता है।

72 जिनालय जैन मंदिरभीनमाल (जालौर)

  • यह राजस्थान का सबसे बड़ा जैन मंदिर माना जाता है।
  • यहाँ पूर्व के 24, वर्तमान के 24 तथा भविष्य के 24 तीर्थंकरों को समर्पित कुल 72 जिनालय निर्मित किए गए हैं।

गंगा मंदिरभरतपुर

  • इस मंदिर का निर्माण 1845 ई. में महाराजा बलवन्त सिंह ने प्रारंभ कराया।
  • निर्माण कार्य पूर्ण होने में लगभग 90 वर्ष लगे।

रंगनाथ जी मंदिरपुष्कर

  • इसका निर्माण 1844 ई. में सेठ पूरणमल द्वारा कराया गया।

बैकुण्ठनाथ (रमा बैकुण्ठ) मंदिरपुष्कर

  • इस मंदिर का निर्माण सेठ मग्नीराम बांगड़ ने कराया।

हर्षद माता मंदिरआभानेरी (दौसा)

  • यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है।
  • इसका निर्माण गुर्जर प्रतिहार काल में हुआ।

अचलेश्वर महादेव मंदिरआबू (सिरोही)

  • इस मंदिर में भगवान शिव के अंगूठे की पूजा की जाती है।

विभीषण मंदिरकैथून (कोटा)

  • यह भारत का एकमात्र विभीषण मंदिर माना जाता है।

धुश्मेश्वर महादेव मंदिरशिवाड़ (सवाई माधोपुर)

  • इसे भगवान शिव का 12वाँ ज्योतिर्लिंग माना जाता है।

केशवराय जी मंदिरकेशोरायपाटन (बूंदी)

  • यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है।
  • इसका निर्माण बूंदी के शासक छत्रसाल ने कराया।

तिलस्वा महादेव मंदिरबिजौलिया (भीलवाड़ा)

  • यहाँ स्थित जलकुंड का पानी चर्म रोगों के उपचार में लाभकारी माना जाता है।

लोद्रवा पार्श्वनाथ जैन मंदिरजैसलमेर

  • यह मंदिर पंचायतन शैली में निर्मित है।
  • लोद्रवा अपने प्राचीन जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है।

तीजा मांझी मंदिरजोधपुर

  • इसका निर्माण जोधपुर के शासक मानसिंह की रानी प्रतापकुँवरी ने कराया।

भर्तृहरि मंदिरअलवर

  • यह स्थान उज्जैन के शासक भर्तृहरि की तपस्थली के रूप में प्रसिद्ध है।
  • इसे कनफटे साधुओं का प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है।

रानी भटियाणी मंदिरजसोल (बालोतरा)

  • रानी भटियाणी को भूआ सा के नाम से भी जाना जाता है।
  • यह मंदिर ढोली जाति की प्रमुख आस्था का केंद्र है।

सुंधा माता मंदिरभीनमाल (जालौर)

  • इस मंदिर का निर्माण चाचिकदेव ने कराया।
  • मूल रूप से यह चामुंडा माता का मंदिर है।
  • 2006 में यहाँ राजस्थान का पहला रोपवे प्रारंभ किया गया।

सिरे मंदिरजालौर

  • यह स्थान जालंधरनाथ की तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध है।

बुड्ढा जोहड़ गुरुद्वाराडाबला (श्रीगंगानगर)

  • इसका निर्माण 1954 ई. में संत फतेहसिंह ने कराया।
  • यहाँ श्रावण अमावस्या के अवसर पर मेला आयोजित होता है।

चाँदखेड़ी जैन मंदिरखानपुर (झालावाड़)

  • यह मंदिर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) को समर्पित है।

पिपला माता मंदिरराजसमंद

  • इसका निर्माण अल्लट द्वारा कराया गया।

चूलगिरी जैन मंदिरजयपुर

  • यह मंदिर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है।

भीमभड़कजोधपुर

  • यहाँ एक गुफा तथा शिवलिंग युक्त मंदिर स्थित है।
  • इस स्थल पर लगभग 8 हजार वर्ष पुराने शैलचित्र प्राप्त हुए हैं।

खाटू श्याम जी मंदिरसीकर

  • यह मंदिर भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक (खाटू श्याम) को समर्पित है।
  • यहाँ फाल्गुन शुक्ल दशमी से बारस तक विशाल मेले का आयोजन होता है।

धनोप माता मंदिरफूलियाकला (शाहपुरा, भीलवाड़ा)

बिजासन माता मंदिरबूंदी

खीमल माता मंदिरबसंतगढ़ (सिरोही)

धरणीधर मंदिरमाण्डकला (टोंक)

बूढ़ादीत सूर्य मंदिरदीगोद (कोटा)

गेपरनाथ महादेव मंदिरकोटा

भद्रकाली मंदिरहनुमानगढ़

मल्लीनाथ-नेमीनाथ मामा-भांजा मंदिरडूंगरपुर

श्री दिगम्बर जैन ज्ञानोदय तीर्थनारेली (अजमेर)

अमरेश्वर महादेवसवाई माधोपुर

काला-गोरा भैरव मंदिरसवाई माधोपुर

वशिष्ठ जी का मंदिरसिरोही

मूँछा महावीर मंदिरघाणेराव (पाली)

सप्त गौ माता मंदिररेवासा (सीकर)

रावण मंदिरजोधपुर

हरणी महादेव मंदिरभीलवाड़ा

गोकर्णेश्वर महादेव मंदिरबिसलपुर (टोंक)

नीलकंठ महादेव मंदिरअलवर

पारा नगरी मंदिरअलवर

जूना पत्रसर मंदिरबाड़मेर

पिपलाद माता मंदिरओसियां (जोधपुर)

बारह देवरा शिव मंदिर समूहजहाजपुर (भीलवाड़ा)

चन्द्रप्रभु जी जैन मंदिरतिजारा (खैरथल-तिजारा)

बोरेश्वर महादेव मंदिरसोलज गाँव (डूंगरपुर)

राजस्थान की मस्जिदें एवं दरगाह

शेख हम्मीदुद्दीन नागौरी की दरगाहनागौर

  • शेख हम्मीदुद्दीन नागौरी, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के प्रमुख शिष्य थे।
  • वे चिश्ती सूफी सिलसिले से संबंधित थे।
  • उन्हें सुल्तान-उत-तारकीन अर्थात सन्यासियों का सुल्तान कहा जाता है।
  • उन्होंने सुवाल गाँव (नागौर) को अपना प्रमुख केंद्र बनाया।
  • इल्तुतमिश ने उनकी स्मृति में नागौर में अतारकीन का दरवाजा (बुलंद दरवाजा) बनवाया।

काजी हमीदुद्दीन नागौरीनागौर

  • उन्होंने नागौर में लगभग 3 वर्ष तक काजी के रूप में कार्य किया।
  • इन्हें नागौर में सुहरावर्दी सूफी सिलसिले का संस्थापक माना जाता है।

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती

  • इनका जन्म 1143 ई. में संजर नगर (सिस्तान) में हुआ।
  • इनके पिता का नाम सैयद ग्यासुद्दीन तथा माता का नाम बीबी साहेनूर था।
  • इनके आध्यात्मिक गुरु उस्मान हारुनी थे।
  • इन्हें गरीब नवाज के नाम से भी प्रसिद्धि प्राप्त है।
  • मोहम्मद गौरी ने इन्हें सुल्तान-उल-हिन्द की उपाधि दी।
  • वे मोहम्मद गौरी के साथ पृथ्वीराज चौहान तृतीय के शासनकाल में भारत आए।
  • राजस्थान में चिश्ती सूफी सिलसिले के प्रवर्तक के रूप में इन्हें मान्यता प्राप्त है।

चिश्ती संप्रदाय की प्रमुख पारिभाषिक संज्ञाएँ

शब्द अर्थ
मुर्शद गुरु
मुरीद शिष्य
वली उत्तराधिकारी
जियारत तीर्थ यात्रा
जायरीन तीर्थ यात्री
खानकाह निवास स्थल / सूफी आश्रम

राजस्थान की प्रमुख दरगाहें, मकबरे एवं मस्जिदें

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाहअजमेर

  • यह दरगाह साम्प्रदायिक सद्भाव का प्रमुख प्रतीक मानी जाती है।
  • इसका निर्माण मांडू के सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने कराया।
  • दरगाह की सबसे प्राचीन इमारत बुलंद दरवाजा है, जिसका निर्माण महमूद खिलजी ने करवाया।
  • दरगाह का मुख्य प्रवेश द्वार निजाम द्वार कहलाता है, जिसे हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली ने बनवाया।
  • परिसर में स्थित शाहजहाँनी मस्जिद, जिसे जुमा मस्जिद भी कहा जाता है, का निर्माण 1637 ई. में शाहजहाँ ने कराया।
  • प्रत्येक वर्ष रज्जब माह की 1 से 6 तारीख तक यहाँ उर्स का आयोजन होता है।
  • उर्स के दौरान बुलंद दरवाजे पर झंडा चढ़ाने की परंपरा भीलवाड़ा के गौरी परिवार द्वारा निभाई जाती है।
  • इस दरगाह पर आने वाले प्रथम दिल्ली सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक थे।
  • यहाँ राजस्थान का सबसे बड़ा उर्स आयोजित होता है।
  • मक्का-मदीना (सऊदी अरब) के बाद इसे भारत में मुस्लिम समुदाय का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है, इसलिए अजमेर को भारत का मक्का कहा जाता है।
  • बादशाह अकबर पुत्र प्राप्ति की कामना से 14 बार पैदल जियारत के लिए यहाँ आए तथा दरगाह को 18 गाँव भेंट किए।
  • दरगाह परिसर में दो देग हैं—बड़ी देग का निर्माण अकबर ने तथा छोटी देग का निर्माण जहाँगीर ने कराया।
  • दरगाह पर नज़र (भेंट) भेजने वाले प्रमुख शासकों में मराठा सरदार छत्रपति साहू (शिवाजी के पौत्र) का नाम उल्लेखनीय है।

पीर फखरुद्दीन की दरगाहगलियाकोट (डूंगरपुर)

  • यह दरगाह माही नदी के किनारे स्थित है।
  • इसे मजार-ए-फखरी के नाम से भी जाना जाता है।
  • यह दाऊदी बोहरा संप्रदाय की प्रमुख धार्मिक पीठ है।
  • यहाँ मोहर्रम माह की 27वीं तारीख को उर्स आयोजित किया जाता है।

शक्कर पीर बाबा की दरगाहनरहड़ (झुंझुनूं)

  • शक्कर पीर बाबा, शेख सलीम चिश्ती के शिष्य थे।
  • यहाँ जन्माष्टमी के अवसर पर उर्स आयोजित होता है।
  • इन्हें बागड़ के धणी तथा नरहड़ के पीर के नाम से भी जाना जाता है।

बीबी जरीना का मकबराधौलपुर

  • यह मकबरा सिकंदर लोदी की माता बीबी जरीना की स्मृति में निर्मित है।

अब्दुला पीर का मकबराभगवानपुरा (बाँसवाड़ा)

  • यह बोहरा मुस्लिम संत अब्दुल रसूल की प्रसिद्ध मजार है।

फखरुद्दीन की दरगाहसरवाड़ (अजमेर)

  • फखरुद्दीन, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के ज्येष्ठ पुत्र थे।

अब्दुला खाँ का मकबराअजमेर

अलाउद्दीन खाँ का मकबरा (सोलह खंभा)अजमेर

गुलाब कलंदर का मकबराजोधपुर

हजरत कमरुद्दीन शाह की दरगाहझुंझुनूं

दीवान-ए-शाह की दरगाहकपासन (चित्तौड़गढ़)

हमीदुद्दीन चिश्ती (संत मिठशाह) की दरगाहगागरोन

मौलाना जियाउद्दीन साहब की दरगाहजयपुर

अब्दुल अजीज मक्की दरगाहकेशोरायपाटन (बूंदी)

शेख नजमुद्दीन परवाना की दरगाहफतेहपुर (सीकर)

शेख बाबा इसहाक की दरगाहखाटू (नागौर)

इकमीनार मस्जिदजोधपुर

चोटिला पीर दूल्हेशाह की दरगाहकेरला (पाली)

नालियासर मस्जिदसांभर (जयपुर)

चल फिर शाह की दरगाहचित्तौड़गढ़

लैला-मजनू की मजारबिंजोर गाँव (अनूपगढ़, श्रीगंगानगर)

कबीरशाह की दरगाहकरौली

अहमद अलीशाह की दरगाहजयपुर

हजरत अमानीशाह की दरगाहजयपुर

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