राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा

❖ राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा ❖


लोकगीतों से संबंधित कथन

  • महात्मा गाँधी के अनुसार, लोकगीत जनसामान्य की भाषा के साथ-साथ हमारी संस्कृति के सच्चे प्रहरी हैं।
  • रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लोकगीतों को संस्कृति का सुखद संदेश पहुँचाने वाली कला बताया है।
  • देवेंद्र सत्यार्थी के मतानुसार, लोकगीत किसी भी संस्कृति का सजीव एवं मुँहबोला चित्र होते हैं।

केसरिया बालम पधारो म्हारे देश

  • यह राजस्थान का राज्य गीत है।
  • इस गीत में पत्नी अपने परदेश गए पति के लिए संदेश प्रेषित करती है।
  • इसे पहली बार बीकानेर की प्रसिद्ध मांड गायिका अल्लाह जिलाई बाई ने महाराजा गंगासिंह के दरबार में प्रस्तुत किया था।

विवाह के गीत

गीत का नाम विवरण
सगाई सगाई की रस्म के अवसर पर गाया जाता है।
बधावा विवाह एवं शुभ कार्यों पर गाया जाने वाला मंगलगीत।
चाकभात कुम्हार के घर चाक पूजन के समय गाया जाता है।
रातीजगा रात्रि जागरण के दौरान गाए जाने वाले गीत।
मायरा / भात भात भरने की रस्म के समय गाया जाने वाला गीत।
घोड़ी वर की निकासी अथवा घुड़चढ़ी के समय गाया जाता है।
बन्ना-बन्नी दूल्हे और दुल्हन के सम्मान में गाए जाते हैं।
हथलेवा हथलेवा की रस्म के दौरान गाया जाता है।
तोरण तोरण मारने की रस्म के समय गाया जाता है।
पीठी वर-वधू को उबटन लगाते समय गाया जाता है।
कंवर कलेवा दूल्हे के साले द्वारा भोजन कराते समय गाया जाता है।
कांकरण डोरा हाथ-पैर में डोरा बाँधने की रस्म के समय गाया जाता है।
जुआ-जुई विवाह में जुआ (खेल) रस्म के अवसर पर गाया जाता है।
जला बारात का डेरा देखने जाते समय महिलाओं द्वारा गाया जाता है।
कामण वर को जादू-टोने से बचाने हेतु गाया जाता है।
सीठणें विवाह में महिलाओं द्वारा किया गया हँसी-मजाक/गाली-गीत।
पावणा दामाद के आगमन एवं भोजन कराते समय गाया जाता है।
बिंदोला विवाह से पूर्व वर को आमंत्रण देने व लौटने के समय गाया जाता है।
दुपट्टा दूल्हे की सालियों द्वारा गाया जाता है।
सेंजा उत्तम वर की कामना हेतु गाया जाने वाला गीत।
फलसड़ा अतिथियों के स्वागत के समय गाया जाता है।
कोयलडी मेवात क्षेत्र का गीत, पुत्री को सीख या विदाई के समय गाया जाता है।

विरह (वियोग) के गीत

लोकगीत विवरण
कुरंजा इसमें महिला कुरंजा पक्षी (साइबेरियन क्रेन) के माध्यम से अपने विदेश गए पति तक संदेश पहुँचाने की कामना करती है।
उदाहरण: “कुरंजा ए म्हारो भंवर मिला दयो ए”
सूवटिया मेवाड़ क्षेत्र में भील स्त्री अपने पति को सुवटिया (तोता) के माध्यम से संदेश भेजती है।
हिचकी मेवात क्षेत्र में प्रियजन की याद में गाया जाने वाला विरह गीत।
उदाहरण: “म्हारा पियाजी बुलाव म्हाने आवे हिचकी”
कागा कौए को संबोधित करके गाया जाने वाला विरह गीत।
झोरावा जैसलमेर क्षेत्र का गीत, जिसे पति के परदेश जाने पर उसके वियोग में गाया जाता है।
ओल्यू ओल्यू का अर्थ याद होता है। यह गीत बेटी की विदाई के समय गाया जाता है।
चिरमी चिरमी एक लाल बीज वाला पौधा है, जो मालवा (पूर्वी मैदान) क्षेत्र में पाया जाता है। नवविवाहिता अपने भाई अथवा पिता की प्रतीक्षा करते समय यह गीत गाती है।
पपैया गीत इसमें प्रेयसी पपैया पक्षी को संबोधित कर अपने प्रियतम को उपवन में मिलने का संदेश देती है।
पीपली शेखावाटी क्षेत्र में वर्षा ऋतु के दौरान गाया जाने वाला विरह गीत।
सुपनो स्वप्न का वर्णन करने वाला रात्रिकालीन विरह गीत

क्षेत्र विशेष के गीत

लोकगीत विवरण
बिछूडो हाड़ौती क्षेत्र का प्रसिद्ध लोकगीत। इसमें बिच्छू के डंक से पीड़ित महिला अपने पति से दूसरा विवाह करने का आग्रह करती है।
ढोला-मारू सिरोही क्षेत्र का लोकगीत, जो ढोला-मारू की प्रेम कथा पर आधारित है। इसे ढाढी (ढोली) जाति के लोग गाते हैं।
हमसीडो मेवाड़ क्षेत्र में भील स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से यह गीत गाते हैं।
पंछिडा हाड़ौती तथा ढूँढाड़ क्षेत्र में मेलों के अवसर पर गाया जाने वाला लोकगीत।
रतबई लोकगीत मेवात क्षेत्र की महिलाएँ रतबई लोकनृत्य के साथ इसे प्रस्तुत करती हैं। इस दौरान पुरुष अलगोजा तथा टामक वाद्ययंत्र बजाते हैं।
मूमल जैसलमेर क्षेत्र का प्रसिद्ध श्रृंगारिक लोकगीत। इसमें लोद्रवा (जैसलमेर) की राजकुमारी मूमल तथा अमरकोट (पाकिस्तान) के राजकुमार महेन्द्र की प्रेम कथा एवं सौंदर्य का वर्णन मिलता है।
उदाहरण: “म्हारी बरसाले री मूमल, हालैनी ऐ आलीजे रे देश”
रसिया भरतपुर एवं धौलपुर क्षेत्र में प्रचलित लोकगीत। इसका मूल स्वरूप उत्तर प्रदेश से माना जाता है। होली के अवसर पर बम वाद्ययंत्र के साथ गाया जाता है। यह श्रृंगार एवं भक्ति दोनों भावों से जुड़ा हुआ है तथा भगवान श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम पर आधारित है।
लोवड़ी / हरणी मेवाड़ क्षेत्र में दीपावली से लगभग 15 दिन पूर्व लड़कों की टोलियाँ गीत गाते हुए निकलती हैं, जिसे लोवड़ी / हरणी कहा जाता है। वहीं लड़कियों द्वारा गाए जाने वाले गीत घडल्यों कहलाते हैं।

धार्मिक लोकगीत

लोकगीत विवरण
गणगौर गणगौर पर्व के अवसर पर गाया जाने वाला लोकगीत।
उदाहरण: “खेलन दो गणगौर भंवर माने खेलन दो गणगौर, म्हारी सखियां जोवे बाट भंवर म्हाने खेलन दो गणगौर”
तीज श्रावण मास में महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला लोकगीत।
पावड़े गीत महापुरुषों के शौर्य एवं वीरता का गुणगान करने वाले लोकगीत।
कुकड़ी रात्रि जागरण के अंत में गाया जाने वाला अंतिम गीत।
हरजस भगवान श्रीकृष्ण तथा भगवान श्रीराम की लीलाओं का वर्णन करने वाला धार्मिक लोकगीत।
लांगुरिया गीत करौली की कैला देवी माता से संबंधित प्रसिद्ध धार्मिक लोकगीत।

श्रृंगारिक गीत

श्रृंगारिक गीत विवरण
घूमर महिलाएँ घूमर नृत्य करते समय यह श्रृंगारिक गीत गाती हैं।
उदाहरण: “म्हारी घूमर छे नखराली ए माँ”
लूर राजपूत महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला श्रृंगारिक गीत।
कांगसियो कंधे को संबोधित करते हुए गाया जाने वाला श्रृंगारिक गीत।उदाहरण: “म्हारा छेल भंवर रो कांगसियो पणियारा ले गई”
काजलयो काजल, जो सोलह श्रृंगार में सम्मिलित है, उसी पर आधारित यह गीत होली के अवसर पर चंग के साथ गाया जाता है।

अन्य प्रमुख लोकगीत

अन्य प्रमुख लोकगीत विवरण
मोरिया ऐसी युवती की मनःस्थिति को व्यक्त करने वाला गीत, जिसकी सगाई हो चुकी हो, लेकिन विवाह में विलंब हो रहा हो।
गोरबंद ऊँट के गले के आभूषण को गोरबंद कहा जाता है। ऊँट का श्रृंगार करते समय यह गीत गाया जाता है।
पनिहारी / इंडोणी महिलाएँ पानी भरते समय पतिधर्म के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने हेतु यह गीत गाती हैं।
बिंजारा मरु प्रदेश का लोकगीत, जिसमें बिंजारा और बिंजारी के बीच संवाद प्रस्तुत किया जाता है। ऊँट पर यात्रा करते हुए लंबी दूरी तय करने के दौरान इसे गाया जाता है।
सारंग संगीत दोपहर के समय गाया जाने वाला लोकगीत।
छेड़े लोकगीत शिशु की मृत्यु होने पर गाए जाने वाले लोकगीत।
जीरो पश्चिमी राजस्थान का प्रसिद्ध लोकगीत, जिसमें पत्नी अपने पति को जीरा न बोने का आग्रह करती है।
उदाहरण: “जीरो जीव रो बेरी रे, मत बोयो म्हारा पियाजी”
लावणी गीत लावणी का अर्थ बुलाना होता है। इस गीत में प्रेमी अपनी प्रेमिका को बुलाता है। फसल कटाई के समय भी यह गीत गाया जाता है।
हालरिया जैसलमेर क्षेत्र में बच्चे के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला लोकगीत।
घुघरी शिशु के जन्म पर गाया जाने वाला लोकगीत।
जच्चा / होलर पुत्र जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला लोकगीत।
केवड़ा केवड़ा एक वृक्ष है। इसके माध्यम से प्रेयसी अपने प्रियतम की स्मृति में गीत गाती है।
घुघरी एवं केवड़ा घुघरी तथा केवड़ा दोनों मरुस्थलीय क्षेत्र के प्रमुख लोकगीत माने जाते हैं।
हर के हिंडोले वृद्ध व्यक्ति की मृत्यु पर गाया जाने वाला लोकगीत।
रतन राणो अमरकोट के राणा रतन की स्मृति में गाया जाने वाला लोकगीत।
पर्वतीय गीत पटेल्या, लालर, बिछियो, माछर, नोखिला, थारी ऊँटा री असवारी, नाव री असवारी तथा शिकार गीत मेवाड़ के पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों द्वारा गाए जाते हैं।

❖ लोक गायन शैलियाँ व संगीत घराने

❖ प्रमुख गायन शैलियाँ

❖ मांड गायकी

  • मांड गायकी का उद्भव जैसलमेर में हुआ। जैसलमेर का प्राचीन नाम मांड था।
  • इस गायन शैली से जुड़े प्रमुख कलाकार निम्नलिखित हैं— अल्लाह जिलाई बाई (बीकानेर), गवरी देवी (बीकानेर), गवरी देवी (पाली), मांगी बाई (उदयपुर), जमीला बानो (जोधपुर), बन्नो बेगम (जयपुर) तथा बतुल बेगम (नागौर)
  • गवरी बाई (डूंगरपुर) को वागड़ की मीरा के नाम से जाना जाता है।

❖ मांगणियार गायकी

  • मांगणियार समुदाय मूलतः सिंध प्रांत से संबंधित मुस्लिम समुदाय है, जो वर्तमान में मुख्य रूप से जैसलमेर एवं बाड़मेर में निवास करता है।
  • इनका प्रमुख व्यवसाय गायन एवं वादन है।
  • इनके प्रमुख वाद्य यंत्र कामायचा तथा खड़ताल हैं।
  • इस परंपरा के प्रमुख कलाकारों में सदीक खाँ मांगणियार (खड़ताल वादक) प्रमुख हैं।
  • साकर खाँ मांगणियार को प्रसिद्ध कामायचा वादक के रूप में जाना जाता है।
  • रुकमा मांगणियार बाड़मेर की प्रसिद्ध विकलांग लोक गायिका थीं।
  • सदीक खाँ मांगणियार का जन्म झापली गाँव (शिव–बाड़मेर) में हुआ था। उनकी स्मृति में 2002 में जयपुर में सदीक खाँ मांगणियार लोककला एवं अनुसंधान परिषद (लोकरंग) की स्थापना की गई।

❖ लंगा गायकी

  • लंगा गायकी जैसलमेर एवं बाड़मेर क्षेत्र में रहने वाली लंगा जाति की पारंपरिक गायन शैली है।

❖ चारबैत लोकगायन शैली

  • चारबैत लोकगायन शैली का प्रमुख केंद्र टोंक है।
  • इसका मूल उद्गम अफगानिस्तान माना जाता है।
  • इस शैली के प्रवर्तक करीम खाँ निंहग थे।

❖ तालबंदी गायन शैली

  • औरंगजेब के शासनकाल में विस्थापित कलाकारों द्वारा करौली एवं सवाईमाधोपुर क्षेत्र में इस गायन शैली का विकास हुआ।

❖ हवेली संगीत गायन शैली

  • नाथद्वारा (राजसमंद) इस शैली का प्रमुख केंद्र है।
  • औरंगजेब के समय बंद कमरों में विकसित होने के कारण इसे हवेली संगीत कहा गया।

❖ ध्रुपद गायकी

  • ध्रुपद गायकी का आरंभ ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर के शासनकाल में माना जाता है। बैजू बावरा उनके दरबार के प्रसिद्ध गायक थे।
  • मानसिंह तोमर ने मान कौतूहल नामक ग्रंथ की रचना की, जिसका संबंध ध्रुपद गायन शैली से है।
  • ध्रुपद भारत की अत्यंत प्राचीन गायन शैली है, जिसकी परंपरा वेदों से चली आ रही मानी जाती है।
  • मध्यकाल में ध्रुपद की चार प्रमुख वाणियाँ विकसित हुईं।

(1) गौहरहारी वाणी

    • इसका उद्भव ग्वालियर में हुआ।
    • इसके प्रवर्तक तानसेन थे।

(2) खंडारवाणी

    • इस वाणी के प्रवर्तक समोखन सिंह थे।
    • खंडार, उणियारा (टोंक) के शासक थे।

(3) डागुरवाणी

    • इसके प्रवर्तक ब्रजनंद डागर थे, जिनका उद्भव जयपुर से माना जाता है।
    • इस वाणी को बहराम खाँ डागर ने विशेष प्रसिद्धि दिलाई।

(4) नौहारवाणी

    • इसके प्रवर्तक श्रीचंद नौहार थे।
    • इनका उद्भव जयपुर से माना जाता है।
  • अकबर के समय तानसेन, उनके गुरु स्वामी हरिदास तथा गोपाल प्रसिद्ध ध्रुपद गायक थे।
  • मधु भट्ट तैलंग राजस्थान की एकमात्र ध्रुपद गायिका हैं।
  • कबीर यात्रा एक गायन यात्रा है, जिसका आयोजन राजस्थान पुलिस द्वारा प्रतिवर्ष सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के उद्देश्य से पर्यटन विभाग तथा लोकान संस्था (बीकानेर) के सहयोग से किया जाता है।
  • जोधपुर के निवासी गणेश लाल व्यास रियासती आंदोलन के दौरान प्रसिद्ध लोकगायक रहे।

❖ संगीत घराने

  • सामवेद को सबसे प्राचीन संगीत ग्रंथ माना जाता है।
  • जब किसी संगीत गुरु की परंपरा उनके शिष्यों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है, तो उसे संगीत घराना कहा जाता है।
  • संगीत में घराना प्रणाली का प्रारंभ तानसेन के वंश से माना जाता है।

❖ प्रमुख संगीत घराने

❖ जयपुर घराना

  • जयपुर घराने के प्रवर्तक मनरंग भूपत खाँ थे, जो दिल्ली घराने के प्रवर्तक सदारंग खाँ के पुत्र थे।
  • जयपुर घराना कत्थक नृत्य शैली का आदिम घराना माना जाता है।
  • कत्थक घराने के प्रवर्तक भानूजी महाराज तथा प्रमुख कलाकार बिरजू महाराज हैं।
  • जयपुर घराने की दो प्रमुख उपशाखाएँ हैं।

(1) पटियाला घराना

    • इसके प्रवर्तक फतेह अली तथा अली बख्श थे, जो टोंक के नवाब इब्राहिम के दरबारी थे।
    • प्रसिद्ध पाकिस्तानी ग़ज़ल गायक गुलाम अली इसी घराने से संबंधित हैं।

(2) अतरौली घराना

    • इस घराने के प्रवर्तक साहेब खाँ तथा अल्लादिया खाँ थे।
    • इससे जुड़े प्रमुख कलाकार मानतौल खाँ थे, जिन्हें रुलाने वाला फकीर कहा जाता है।
    • हरिसिंह के बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने अपने राग से पत्थर तक पिघला दिया था।
    • मल्लिकार्जुन मन्सूर भी इस घराने के प्रमुख कलाकारों में शामिल हैं।

❖ डागर घराना

  • डागर घराने के संस्थापक बहराम खाँ डागर थे, जो जयपुर के महाराजा रामसिंह के दरबारी थे।
  • इस घराने के प्रमुख कलाकार अमीनूद्दीन खाँ, जहीरूद्दीन खाँ तथा फैयाजुद्दीन खाँ डागर हैं।

❖ मेवाती घराना

  • मेवाती घराने की स्थापना उस्ताद घग्घे नजीर खाँ ने की, जो जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह के दरबारी गायक थे।
  • पंडित जसराज, मोतीराम, ज्योतिराम तथा पंडित मणिराम इसी घराने से जुड़े हुए हैं।
  • इसे ग्वालियर घराने की एक शाखा माना जाता है।

❖ अल्लादिया खाँ घराना

  • इस घराने के संस्थापक अल्लादिया खाँ थे।
  • अल्लादिया खाँ को संगीत सम्राट तथा माउंट एवरेस्ट ऑफ म्यूजिक की उपाधि से सम्मानित किया जाता है।

❖ बीनकार घराना

  • बीनकार घराने के प्रवर्तक रज्जब अली बीनकार थे।

❖ सेनिया घराना

  • सेनिया घराने की स्थापना सूरत सेन, जो तानसेन के पुत्र थे, ने की।

❖ जोधपुर / रंगीला घराना

  • इस घराने के प्रवर्तक रमजान खाँ रंगीले थे।

❖ प्रमुख संगीतज्ञ

❖ अल्लाह जिलाई बाई

  • बीकानेर की प्रसिद्ध मांड गायिका थीं।
  • उन्हें 1982 में पद्मश्री तथा 2012 में मरणोपरांत राजस्थान रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • उन्हें राजस्थान की मरू कोकिला (मरूभूमि कोकिला) कहा जाता है।
  • 2003 में उनके सम्मान में 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया।

❖ जगजीत सिंह

  • गंगानगर के प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक थे।
  • उन्हें 2012 में मरणोपरांत राजस्थान रत्न पुरस्कार प्रदान किया गया।

❖ साकर खाँ मांगणियार

  • हमीरा (जैसलमेर) के प्रसिद्ध कामायचा वादक थे।
  • उन्हें 2012 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

❖ प्रेरणा श्रीमाली

  • बांसवाड़ा की निवासी एवं जयपुर घराने की वरिष्ठ नृत्यांगना हैं।

❖ महमूद धौलपुरी

  • महमूद धौलपुरी को हारमोनियम का जादूगर कहा जाता है।

❖ पं. विश्वमोहन भट्ट

  • जयपुर के प्रसिद्ध संगीतज्ञ हैं।
  • इन्होंने मोहनवीणा नामक नए वाद्य यंत्र का निर्माण किया।
  • उन्हें 2002 में पद्मश्री तथा 2012 में राजस्थान रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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