❖ राजस्थान की वेशभूषा और आभूषण ❖
❖ वेशभूषा
राजस्थान की पारंपरिक वेशभूषा अपने आकर्षक एवं रंग-बिरंगे परिधानों के लिए प्रसिद्ध है। इनमें लाल रंग का विशेष महत्व माना जाता है। इसी कारण एक प्रसिद्ध कहावत प्रचलित है—
“मारू थारे देश में उपजे तीन रतन,
इक ढोला, दूजी मारवण, तीजो कसूमल रंग (लाल रंग)।“
❖ पगड़ी / साफा
- राजस्थान में पुरुष सिर पर पगड़ी या साफा धारण करते हैं।
- आकार की दृष्टि से लंबी पगड़ी को पाग तथा अपेक्षाकृत छोटी को पगड़ी कहा जाता है।
- जरी से निर्मित विशेष पगड़ी पेचा कहलाती है।
➤ विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग प्रकार की पगड़ियाँ पहनने की परंपरा रही है—
- विवाह के अवसर पर मोठड़े की पगड़ी धारण की जाती है।
- श्रावण माह में लहरिया पगड़ी पहनी जाती है।
- दशहरा पर मदिल की पगड़ी का प्रचलन है।
- होली के अवसर पर फूल-पत्ती की पगड़ी पहनी जाती है।
- युद्ध तथा आखा तीज पर केसरिया पगड़ी धारण की जाती है।
- शोक के समय सफेद रंग की पगड़ी पहनने की परंपरा है।
- पगड़ी को सम्मान, प्रतिष्ठा एवं स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है।
➤ राजस्थान में प्रसिद्ध कहावत है— “पगड़ी की लाज रखना।”
- पगड़ी का वास्तविक संरक्षक अकबर को माना जाता है।
- विश्व की सबसे बड़ी पगड़ी बागोर हवेली, उदयपुर में सुरक्षित रखी गई है।
- साफा अथवा पगड़ी के अग्रभाग पर धारण किया जाने वाला आभूषण सिरपेच कहलाता है।
➤ मेवाड़ की प्रमुख पगड़ियाँ
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- अमरशाही
- उदेशाही
- अरसीशाही
- भीमशाही
- स्वरूपशाही
- अटपड़ी पगड़ी
➤ मारवाड़ की प्रमुख पगड़ियाँ
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- खिड़कियां पाग
- जसवंतशाही
- तख्तशाही
- विजयशाही
- खंजरशाही
➤ अन्य प्रमुख पगड़ियाँ
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- अमीरशाही
शिवशाही
शाहजहानी
राजशाही (लाल रंग की लहरिया पगड़ी – जयपुर)
खन्ना (मध्यकाल की एक प्रमुख पगड़ी)
- अमीरशाही
- सुनार आँटे वाली पगड़ी पहनते हैं।
- बंजारे मोटी पट्टेदार पगड़ी धारण करते हैं।
- सोने-चाँदी की कलात्मक सजावट से अलंकृत पगड़ी को फेंटा पगड़ी कहा जाता है।
- मेवाड़ की पगड़ी तथा जोधपुर का साफा विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
- जोधपुरी साफा का प्रचलन महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के शासनकाल में प्रारंभ हुआ।
➤ छाबदार
- मेवाड़ के महाराणाओं को पगड़ी बाँधने वाले व्यक्ति को छाबदार कहा जाता था।
➤ नोट – जोधपुरी कोट-पेंट को राष्ट्रीय पोशाक का दर्जा प्राप्त है।
❖ पुरुषों की वेशभूषा
- जामा – विवाह एवं युद्ध जैसे विशेष अवसरों पर शरीर के ऊपरी भाग में पहना जाने वाला पारंपरिक वस्त्र जामा कहलाता है।
- पायजामा – कमर से लेकर पैरों तक पहना जाने वाला वस्त्र पायजामा कहलाता है।
➤ अंगरखी / बुगतरी / बंडी
- अंगरखी को बुगतरी (बखतरी) के नाम से भी जाना जाता है।
- छोटी बाँह वाली अंगरखी को बांडियो कहा जाता है।
- यह बिना कॉलर एवं बिना बटन वाला कढ़ाईदार ऊपरी वस्त्र होता है, जिसे पुरुष धारण करते हैं।
➤ अंगरखी के प्रमुख प्रकार हैं—
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- मिरजाई
- दुतई
- गदर
- कानो
- डगला
- तनसुख
- गाबा
- दोढी
- अचकन, अंगरखी का विकसित अथवा संशोधित रूप है।
➤ चोगा
- चोगा, अंगरखी के ऊपर पहना जाने वाला बाहरी वस्त्र है।
- सवाई माधोसिंह प्रथम का चोगा विश्व का सबसे बड़ा चोगा माना जाता है, जो सिटी पैलेस, जयपुर में सुरक्षित है।
➤ आतमसुख
- सर्दी से बचाव के लिए अंगरखी के ऊपर पहना जाने वाला वस्त्र आतमसुख कहलाता है।
➤ घूघी
- घूघी ऊन से बना वस्त्र है, जिसे वर्षा एवं सर्दी से बचाव के लिए पहना जाता है।
➤ कमीज
- धोती के साथ पहना जाने वाला कुर्तानुमा वस्त्र कमीज कहलाता है।
➤ धोती
- कमर पर बाँधा जाने वाला पारंपरिक वस्त्र धोती कहलाता है।
- भील जनजाति के पुरुष तंग शैली की धोती पहनते हैं, जिसे ढेपाड़ा कहा जाता है।
- भील कमर पर जो लंगोटी बाँधते हैं, उसे खोयतू कहते हैं।
- भीलों द्वारा पगड़ी के स्थान पर बाँधा जाने वाला मोटा वस्त्र पोतिया कहलाता है।
- सहरिया पुरुष धोती को पंछा, साफा को खपटा तथा अंगरखी को सलूका कहते हैं।
➤ कमरबंद / पटका
- कमर पर बाँधा जाने वाला वस्त्र कमरबंद या पटका कहलाता है, जिसमें तलवार, कटार तथा खंजर रखे जाते थे।
➤ ब्रीजेस / बिरजस
- ब्रीजेस (बिरजस) पायजामे जैसा ऐसा वस्त्र था, जो पैरों से घुटनों तक कसा हुआ रहता था।
- इसका उपयोग मुख्यतः ब्रिटिश सरकार के अधिकारी करते थे।
➤ अमोवा
- खाकी रंग का यह वस्त्र शिकारियों द्वारा पहना जाता था।
➤ सूथना
- सर्दी के मौसम में बच्चों द्वारा पहना जाने वाला पायजामा सूथना कहलाता है।
➤ दोढी
- दोढी पुरुषों का एक पारंपरिक वस्त्र है।
❖ आदिवासी महिलाओं के वस्त्र
➤ नान्दणा
- नान्दणा आदिवासी महिलाओं का सबसे प्राचीन पारंपरिक वस्त्र माना जाता है।
➤ कटकी
- अविवाहित आदिवासी कन्याओं द्वारा ओढ़ी जाने वाली ओढ़नी को कटकी कहा जाता है।
- इस ओढ़नी पर बने छपे हुए अलंकरण पांवली कहलाते हैं।
- पांवली छपाई वाली ओढ़नी को पांवली भाँत की ओढ़नी कहा जाता है।
➤ तारा भाँत की ओढ़नी
- आदिवासी महिलाओं में सबसे अधिक लोकप्रिय ओढ़नी तारा भाँत की ओढ़नी मानी जाती है।
➤ ज्वार भाँत की ओढ़नी
- इस ओढ़नी पर ज्वार के दानों के समान बिंदियों की आकृतियाँ बनाई जाती हैं।
➤ केरी भाँत की ओढ़नी
- केरी भाँत की ओढ़नी की पृष्ठभूमि लाल रंग की होती है, जबकि इसकी बिंदियाँ सफेद एवं पीले रंग की होती हैं।
➤ लहर भाँत की ओढ़नी
- इस ओढ़नी पर लहरिया शैली की आकृतियाँ बनी होती हैं।
➤ जामसाई साड़ी
- विवाह के अवसर पर आदिवासी महिलाएँ जामसाई साड़ी धारण करती हैं।
- इस साड़ी पर लाल रंग के फूल एवं पत्तियों की बेल का अलंकरण बनाया जाता है।
➤ कछबू
- भील जनजाति की महिलाओं के घाघरे को कछबू कहा जाता है।
- उदयपुर के निकट भीलों की प्रसिद्ध चूनड़ी की छपाई की जाती है।
➤ रेजा
- सहरिया जनजाति की विवाहित महिलाओं का पारंपरिक वस्त्र रेजा कहलाता है।
➤ घाघरा
- घाघरा कमर से लेकर पैरों तक पहना जाने वाला महिलाओं का पारंपरिक परिधान है।
- घाघरे के छोटे रूप को लहंगा कहा जाता है।
➤ कूर्ती और कांचली
- कूर्ती एवं कांचली महिलाओं के शरीर के ऊपरी भाग में पहने जाने वाले वस्त्र हैं।
- कूर्ती बिना बाँहों की होती है।
- कांचली में बाँहें होती हैं।
➤ आंगी
- बिना बाँहों वाली चोली को आंगी कहा जाता है।
➤ दामणी
- मारवाड़ क्षेत्र में महिलाओं की लाल रंग की ओढ़नी दामणी कहलाती है।
➤ तिलका / बुर्का
- मुस्लिम महिलाओं के पारंपरिक पहनावे को तिलका अथवा बुर्का कहा जाता है।
➤ झिम्मी
- फेरे के समय मामा द्वारा वधू को भेंट की जाने वाली तथा वधू द्वारा धारण की जाने वाली गोटा-किनारी युक्त लाल ओढ़नी को झिम्मी कहा जाता है।
➤ साड़ी
राजस्थान में प्रचलित प्रमुख साड़ियों के प्रकार निम्नलिखित हैं—
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- चोल
- निचोल
- पट
- वसन
- दुकूल
- चोरसो
- चीर
- पटोरी
- धोरावाली
- चूँदड़ी
➤ स्त्रियों के परिधान
महिलाओं द्वारा धारण किए जाने वाले प्रमुख परिधान निम्नलिखित हैं—
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- जामादानी
- किमखाब
- टसर
- छींट
- मसरु
- मीर ए बादला
- नौरंगशाही
- पारचा
- चिक
- मोमजामा
➤ अंगरखा
- भील जनजाति के पुरुषों के शरीर के ऊपरी भाग पर पहना जाने वाला काले रंग का वस्त्र अंगरखा कहलाता है, जिस पर सफेद धागे से कढ़ाई की जाती है।
➤ पचेवदा / पछेवड़ा
- पचेवदा (पछेवड़ा) मोटे सूती कपड़े से बनी एक शाल होती है।
- इसका उपयोग पुरुष सर्दी से बचाव के लिए शरीर के ऊपर ओढ़ने के रूप में करते हैं।
- प्राचीन समय में पुरुष मुख्यतः सूती वस्त्रों के परिधान धारण करते थे।
❖ आभूषण
❖ सिर / मस्तक के आभूषण
- शीशफूल, मेंमद, साकली, टिकी (बिंदी), टिड्डी भलको, बोरलो (बोर), सिरमांग, रखड़ी (सुहाग का प्रतीक), फीणी, तावित तथा गोफण सिर एवं मस्तक पर धारण किए जाने वाले प्रमुख आभूषण हैं।
❖ कान के आभूषण
- कानों की शोभा बढ़ाने के लिए कर्णफूल, झेला, जमेला, पीपल पत्रा, सुरलिया, झुमका, बाली, लूंग, टोंटी, अंगोट्यां, ओगनिया, कोकरू, कुण्डल, टॉप्स तथा ओखरी का प्रयोग किया जाता है।
❖ नाक के आभूषण
- नासिका पर पहनने वाले प्रमुख आभूषणों में नथ, चूनी, चोप, कांटा, बारी, बेसरी, बुलाक, लौंग, भोगली, भंवरकड़ी, फीणी तथा लटकन शामिल हैं।
❖ दाँत के आभूषण
- रखन – दाँतों पर सोने की प्लेट लगाने की परंपरा को रखन कहा जाता है।
- चूप – दाँतों के बीच सोने की कील जड़वाने की प्रथा चूप कहलाती है।
❖ गले / कंठ के आभूषण
- गले एवं कंठ में पहने जाने वाले प्रमुख आभूषण हैं— कंठी (काँठला), गलपटियो, झालरा, रामनवमी (नांवा), मादलिया, तिमणियाँ, लॉकेट, टेवटा, मटरमाला, मुक्तमाला, चंद्रमाला, कुंदन, सरी, तुलसी, बजट्टी, हांकर, हँसली / खुंगाली, हमेल, कंठहार, चंद्रहार, हंसहार, रानीहार, निबोरी, तुस्सी (नेकलेस से बड़ा), थमण्यो, थेड्यो, आड़, मूँठया, पोत तथा चंपाकली।
❖ बाजू / भूजा के आभूषण
- बाजू एवं भुजा पर धारण किए जाने वाले प्रमुख आभूषणों में बाजूबन्द, टड्डा / अणंत, बट्टा तथा नवरत्न शामिल हैं।
❖ हाथ की कलाई के आभूषण
- कलाई पर पहने जाने वाले प्रमुख आभूषण हैं— चूड़ियाँ, मौकड़ी (लाख की चूड़ी), बंगड़ी, चांट पूंचिया (पोंच), कंगन, गोखरू, हथपान, हथफूल, बल्लया (हाथी दाँत / रबर की चूड़ियाँ), नोगरी तथा गजरा।
❖ कमर के आभूषण
- कमर में धारण किए जाने वाले प्रमुख आभूषणों में कन्दोरा (महिलाओं द्वारा कमर पर पहना जाता है), करधनी, कनकती, तगड़ी तथा जंजीर प्रमुख हैं।
❖ पैर के आभूषण
- पैरों में पहने जाने वाले प्रमुख आभूषण हैं— पायजेब, आंवला, घुंघरू, नेवरी (नेवर), नूपूर, कड़ा, पायल, तेघड़, रमझोल, लंगर (तोड़िया) तथा झाँझर।
- झाँझरिया / पैजणी – यह पैरों में पहनी जाने वाली पतली घुँघरूयुक्त साँकली होती है।
❖ पैर की अंगुली के आभूषण
- पैर की अंगुलियों में धारण किए जाने वाले प्रमुख आभूषण हैं— बीछूड़ी / बिछिया (सुहाग का प्रतीक), गोर, पगपान, फोलरी / पोलरा, अनवट तथा अनोटा।
❖ हाथ की अंगुली के आभूषण
- हाथ की अंगुलियों में पहने जाने वाले प्रमुख आभूषणों में दामणा, मूंदड़ी (बींटी, अंगूठी), हथपान, छड़ा तथा अरसी (अंगूठे की अंगूठी) शामिल हैं।
❖ पुरुषों के कान के आभूषण
- पुरुषों द्वारा कानों में धारण किए जाने वाले प्रमुख आभूषण हैं— लौंग (लूंग), मुरकियाँ, बालियाँ, छैलकड़ी तथा झाले।
- कडूल्या – हाथ एवं पैरों में पहने जाने वाले कड़े को कडूल्या कहा जाता है।
