❖ संत व संप्रदाय
➤ भारतीय परंपरा में संप्रदाय मुख्यतः दो प्रकार के माने जाते हैं—
- सगुण संप्रदाय – इनमें ईश्वर के साकार स्वरूप की आराधना की जाती है तथा मूर्ति पूजा को स्वीकार किया जाता है।
- प्रमुख सगुण संप्रदाय – रामानुज संप्रदाय, निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ संप्रदाय, नाथ संप्रदाय, गौड़ीय संप्रदाय तथा मीरा बाई।
- निर्गुण संप्रदाय – इस परंपरा में ईश्वर को निराकार माना जाता है तथा मूर्ति पूजा का अनुसरण नहीं किया जाता।
- प्रमुख निर्गुण संप्रदाय – विश्नोई संप्रदाय, जसनाथी संप्रदाय, दादूपंथ, रामस्नेही संप्रदाय, निरंजनी संप्रदाय, नवल संप्रदाय, लालदासी संप्रदाय, कबीरपंथी, संत रैदास, संत पीपा तथा संत धन्ना जी।
- सगुण एवं निर्गुण भक्ति का समन्वित स्वरूप चरणदास जी तथा संत माव जी की परंपरा में देखने को मिलता है।
❖ रामानुज संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक रामानुजाचार्य थे।
- इनका जन्म श्रीपेराम्बदूर (तमिलनाडु) में हुआ।
- इन्होंने श्रीभाष्य ग्रंथ की रचना की।
- विशिष्टाद्वैत सिद्धांत का प्रतिपादन रामानुजाचार्य द्वारा किया गया।
- भगवान राम की उपासना से जुड़े होने के कारण इसे रामावत संप्रदाय भी कहा जाता है।
❖ रामानंदी संप्रदाय
- संत रामानुज के शिष्य रामानंद ने भक्ति आंदोलन को दक्षिण भारत से उत्तर भारत तक पहुँचाया।
- उनका मत था कि ईश्वर मनुष्य के केवल सद्गुणों को देखता है, उसकी जाति अथवा दुर्गुणों का विचार नहीं करता।
- हिंदी के माध्यम से उपदेश देने वाले प्रथम संत रामानंद जी माने जाते हैं।
- राजस्थान में इस संप्रदाय की प्रमुख पीठ गलता जी (जयपुर) में स्थित है, जिसकी स्थापना कृष्णदास पयहारी ने की। उन्होंने यहाँ नाथ संप्रदाय के प्रभाव को समाप्त कर रामानंदी भक्ति का प्रचार किया।
➤ गलताजी
- गलताजी को गालव ऋषि की तपोभूमि माना जाता है।
- यहाँ एक प्राचीन सूर्य मंदिर स्थित है।
- गलताजी को उत्तर तोताद्री (उत्तरी पीठ) तथा राजस्थान का बनारस भी कहा जाता है।
- यहाँ बड़ी संख्या में बंदरों के कारण इसे मंकी वैली के नाम से भी जाना जाता है।
❖ रसिक संप्रदाय
- इस संप्रदाय की प्रमुख पीठ रैवासा (सीकर) में स्थित है।
- इसके संस्थापक अग्रदास जी थे।
- इस परंपरा में राम-सीता की श्रृंगारिक युगल जोड़ी की उपासना की जाती है।
❖ रामस्नेही संप्रदाय
- इस संप्रदाय में भगवान राम की निर्गुण भक्ति की जाती है।
- इसकी कुल चार शाखाएँ हैं।
➤ शाहपुरा शाखा (भीलवाड़ा)
- यह इस संप्रदाय की प्रमुख शाखा एवं प्रधान पीठ है।
- यहाँ के प्रार्थना स्थल को रामद्वारा कहा जाता है।
- इसके प्रवर्तक रामचरण जी थे, जिनका बचपन का नाम रामकिशन था।
- उनका जन्म सोडा गाँव (डिग्गी, टोंक) में हुआ।
- उनके गुरु कृपा राम जी, जो गुदड़ संप्रदाय के संत थे।
- रामचरण जी की वाणियों को अणभे वाणी (अनुभव वाणी) कहा जाता है।
- शाहपुरा में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी तक फूलडोल महोत्सव मनाया जाता है।
➤ रैण शाखा (नागौर)
- इस शाखा के संस्थापक दरियाव जी थे।
- दरियाव जी का जन्म जैतारण (ब्यावर) में हुआ।
- उन्होंने ‘रा’ को राम तथा ‘म’ को मोहम्मद का प्रतीक बताते हुए सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया।
➤ सिंथल शाखा (बीकानेर)
- इस शाखा के प्रवर्तक हरिरामदास थे।
➤ खेड़ापा शाखा (जोधपुर)
- इसके संस्थापक संत रामदास जी थे।
❖ वल्लभ संप्रदाय
- इसे पुष्टिमार्ग संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है।
- यह कृष्ण भक्ति पर आधारित संप्रदाय है।
- इस परंपरा में भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा की जाती है।
- इसके प्रवर्तक वल्लभाचार्य (उत्तर प्रदेश) थे।
- अणुभाष्य की रचना कर इन्होंने शुद्धाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया।
- वृंदावन में श्रीनाथजी मंदिर की स्थापना कराई।
➤ अष्टछाप कवि मंडली
- वल्लभाचार्य के पुत्र एवं उत्तराधिकारी विट्ठलनाथ जी ने अष्टछाप कवि मंडली का गठन किया।
- इस मंडली में वल्लभाचार्य के चार शिष्य — सूरदास, परमानन्ददास, कृष्णदास एवं कुंभनदास तथा विट्ठलनाथ जी के चार शिष्य — नंददास, चतुर्भुजदास, गोविन्ददास और छीतस्वामी सम्मिलित थे।
- फरवरी 1672 में मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने सिहाड़ गाँव (वर्तमान नाथद्वारा) में श्रीनाथजी की मूर्ति स्थापित करवाई।
- दामोदर दास एवं गोपीनाथ जी वृंदावन से श्रीनाथजी की मूर्ति सिहाड़ गाँव लेकर आए।
- विट्ठलनाथ जी के सात पुत्र थे, जिनकी पूजा के लिए श्रीनाथजी के सात स्वरूपों के अनुसार सात मंदिर स्थापित किए गए।
| मंदिर | स्थान |
|---|---|
| श्रीनाथजी मंदिर | नाथद्वारा (राजसमंद) – प्रधान पीठ |
| द्वारकाधीश मंदिर | कांकरोली (राजसमंद) |
| मथुरेश मंदिर | कोटा |
| मदनमोहन मंदिर | कामवन (डीग) |
| गोकुलचंद्र मंदिर | कामवन (डीग) |
| गोकुलनाथ मंदिर | गोकुल (उत्तर प्रदेश) |
| बालकृष्ण मंदिर | सूरत (गुजरात) |
- इस संप्रदाय में मंदिर को हवेली, भजनों को हवेली संगीत, दर्शन को झांकी तथा ईश्वर की कृपा को पुष्टि कहा जाता है।
- श्रीनाथजी मंदिर का अन्नकूट महोत्सव अत्यंत प्रसिद्ध है।
- किशनगढ़ के शासक सावंतसिंह (नागरीदास) इस संप्रदाय से प्रभावित होकर अपना राजपाट त्यागकर वृंदावन चले गए।
❖ निम्बार्क संप्रदाय / हंस संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य निम्बार्काचार्य थे।
- इन्होंने वेदांत पारिजात भाष्य की रचना कर द्वैताद्वैत (भेदाभेद) दर्शन का प्रतिपादन किया।
- इस संप्रदाय में राधा-कृष्ण की युगल स्वरूप में पूजा की जाती है।
- राजस्थान की प्रधान पीठ सलेमाबाद (किशनगढ़, अजमेर) में रूपनगढ़ नदी के किनारे स्थित है।
- इस पीठ की स्थापना परशुराम देव ने की।
- उदयपुर में भी इस संप्रदाय की एक प्रमुख पीठ स्थित है।
❖ गौड़ीय संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक चैतन्य महाप्रभु थे, जिनका जन्म नदिया (बंगाल) में हुआ।
- इनके द्वारा प्रतिपादित दर्शन अचिन्त्य भेदाभेद कहलाता है।
- आमेर के राजा मानसिंह प्रथम ने इस संप्रदाय से प्रभावित होकर वृंदावन में गोविंद देव जी मंदिर का निर्माण कराया।
- राजस्थान में इस संप्रदाय की प्रमुख पीठ गोविंद देव जी मंदिर (सिटी पैलेस, जयपुर) है, जिसका निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया।
- मदनमोहन जी मंदिर (करौली) भी इसी संप्रदाय से संबंधित है।
- इन मंदिरों में राधा-कृष्ण की युगल प्रतिमा की पूजा की जाती है।
- जयपुर के शासकों ने गोविंद देव जी को अपना राजा तथा स्वयं को उनका दीवान माना।
❖ दादू पंथ
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक दादू दयाल जी थे।
- इनका जन्म 1544 ई. में अहमदाबाद (गुजरात) में हुआ।
- इनके गुरु वृद्धानन्द जी अथवा बुड्ढन जी थे।
- इनके उपदेश ढूंढाड़ी भाषा में प्राप्त होते हैं।
- मिर्जा राजा मानसिंह के समय हिंदी मिश्रित सधुक्कड़ी भाषा में दादू जी री वाणी तथा दादू जी रा दूहा का संकलन किया गया।
- इस परंपरा के प्रमुख ग्रंथ संत गुण सागर, नाममाला तथा कायाबेलि हैं।
- दादू दयाल जी ने सर्वप्रथम आमेर से सांभर पहुँचकर अपने उपदेश दिए।
- 1585 में भगवंतदास जी ने फतेहपुर सीकरी (उत्तर प्रदेश) में दादू दयाल जी की भेंट अकबर से कराई।
- दादू दयाल जी साबरमती नदी (अहमदाबाद) में लोदीराम जी को बहते हुए मिले थे।
- दादू दयाल जी को राजस्थान का कबीर कहा जाता है।
- उन्होंने यह संदेश दिया कि ईश्वर एक है तथा उसके दरबार में हिंदू और मुसलमान के बीच कोई भेदभाव नहीं है।
- उन्होंने अपना अंतिम समय नारायणा (दूदू) में व्यतीत किया।
- दादू पंथ की प्रमुख पीठ नरैणा / नारायणा (दूदू) में स्थित है।
❖ दादू पंथ
➤ दादूखोल
- नारायणा के निकट स्थित भैराणा पहाड़ी को दादूखोल कहा जाता है। इसी स्थान पर दादू दयाल जी का देहावसान हुआ था तथा उनकी इच्छा के अनुसार उनका पार्थिव शरीर खुले स्थान पर छोड़ दिया गया।
- दादूपंथी परंपरा में मृत्यु के बाद शव को जंगल में पशु-पक्षियों के लिए छोड़ने की परंपरा है।
- इस संप्रदाय के अनुयायी विवाह नहीं करते, बल्कि बालकों को गोद लेकर अपना शिष्य बनाते हैं।
- दादू पंथ में सत्संग के स्थान को अलख दरीबा कहा जाता है।
- दादू दयाल जी ने निपख आंदोलन का संचालन किया।
- दादूपंथी एक-दूसरे का अभिवादन “सत्यराम” कहकर करते हैं।
- दादू दयाल जी की वाणियों का संकलन उनके दो शिष्यों संतदास एवं जगनदास ने हरेदवाणी नाम से किया।
- दादू दयाल जी के कुल 152 शिष्य थे, जिनमें से 52 प्रमुख शिष्यों को दादू पंथ के 52 स्तंभ कहा जाता है।
- दादू दयाल जी के निधन के बाद दादू पंथ की पाँच शाखाएँ विकसित हुईं।
| शाखा | प्रमुख जानकारी |
|---|---|
| खालसा | प्रारंभ गरीबदास जी ने किया। वे दादू पंथ के उत्तराधिकारी तथा दादू जी के पुत्र थे। इसकी प्रमुख पीठ नारायणा (दूदू) में है। |
| नागा | इसकी शुरुआत सुंदरदास जी ने की। नागा साधु शस्त्र धारण करते थे। इनके बढ़ते प्रभाव से जनता परेशान होने लगी, इसलिए 1726 ई. में सवाई जयसिंह ने इन्हें सैनिकों के रूप में नियुक्त किया। |
| विरक्त | इस शाखा के संत गृहस्थ लोगों को उपदेश देते थे। |
| उत्तरादे / स्थानधारी | इस शाखा के अनुयायी उत्तर भारत की ओर चले गए। इसके संस्थापक बनवारीदास, जो दादू जी के शिष्य थे। |
| खाकी | इस शाखा के साधु शरीर पर भस्म लगाते तथा खाकी वस्त्र धारण करते हैं। |
❖ दादू जी के प्रमुख शिष्य
➤ रज्जबदास जी
- रज्जबदास जी जाति से पठान मुसलमान थे।
- उनकी प्रमुख पीठ एवं मृत्यु स्थल सांगानेर (जयपुर) है।
- इनके प्रमुख ग्रंथ रज्जब वाणी तथा सर्वंगी हैं।
- कहा जाता है कि दादू दयाल जी का एक दोहा सुनने के बाद इन्होंने विवाह करने का विचार त्याग दिया तथा जीवनभर दूल्हे के वेश में रहकर उपदेश देते रहे।
“रज्जब तै किया गज्जव, सिर पर बांधा मौड़। आया था हरि भजन को, करे नरक की ठौर।”
➤ सुंदरदास जी
- सुंदरदास जी का जन्म दौसा के खंडेल परिवार में हुआ।
- उनकी प्रमुख पीठ तथा मृत्यु स्थल सांगानेर है।
- 1997 में उनके सम्मान में 2 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया।
- इनके प्रमुख ग्रंथ सुंदर वाणी, सुंदर विलास, सुंदर ग्रंथावली, ज्ञान समुद्र, बावनी तथा रामची अटक हैं।
➤ अन्य प्रमुख शिष्य
- मिसकिनदास (पुत्र), बखानजी, संतदास जी, जगन्नाथ जी, माधोदास तथा बालिंद जी।
❖ विश्नोई संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक जांभोजी (जम्भेश्वर) थे।
- उनका मूल नाम धनराज था।
- उनके पिता लोहट जी पंवार तथा माता हंसा देवी थीं।
- उनका जन्म 1451 ई. में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी) के दिन पीपासर (नागौर) में हुआ।
- उनके गुरु गोरखनाथ जी थे।
- जांभोजी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।
➤ मुकाम तलवा
- मुकाम तलवा (नोखा, बीकानेर) विश्नोई संप्रदाय की प्रमुख पीठ है।
- यही जांभोजी का समाधि स्थल भी है।
- यहाँ फाल्गुन अमावस्या तथा आश्विन अमावस्या को मेले आयोजित होते हैं।
➤ समराथल धौरा
- समराथल धौरा (बीकानेर) में 1485 ई. में जांभोजी ने विश्नोई संप्रदाय की स्थापना की।
- इसी स्थान पर उन्होंने अपने अनुयायियों को 29 (20+9) उपदेश दिए, जिनके आधार पर अनुयायी विश्नोई कहलाए।
➤ जाम्भा गाँव
- फलोदी स्थित जाम्भा गाँव में जांभोजी के आग्रह पर जैसलमेर के शासक जैतसिंह ने एक तालाब बनवाया।
- यह स्थान विश्नोई समाज के लिए पुष्कर के समान पवित्र माना जाता है।
➤ अन्य तीर्थ
- रामड़ावास (पीपाड़, जोधपुर)
- जांगुल (बीकानेर)
- जांभोजी के प्रवचन स्थल को सांथरी कहा जाता है।
- जांभोजी को विश्व का प्रथम पर्यावरण आंदोलन का प्रणेता माना जाता है। उन्होंने हरे-भरे वृक्षों की रक्षा तथा पशु हत्या का विरोध करने का संदेश दिया।
“सिर साटे रुख रहे, तो भी सस्ता जाण।”
- उनका प्रमुख मंत्र था — “विष्णु विष्णु तू भण रे प्राणी।”
- उन्होंने नीले वस्त्रों का त्याग करने का उपदेश दिया।
- बीकानेर में अकाल पड़ने पर दिल्ली सल्तनत के शासक सिकंदर लोदी ने उनके आग्रह पर हरा चारा भिजवाया।
➤ प्रमुख ग्रंथ
- जम्भ संहिता
- जम्भ सागर — इसमें 29 नियम तथा 120 शब्द वाणियाँ संकलित हैं।
- विश्नोई धर्म प्रकाश
- उनकी वाणी जम्भ वाणी, गुरु वाणी तथा सबदवाणी के नाम से प्रसिद्ध है।
❖ जसनाथी संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक जसनाथ जी थे।
- उनका बचपन का नाम जसवंत था।
- उनके पिता हमीरजी ज्याणी (जाट) तथा माता रूपादे थीं।
- उनके गुरु गोरखनाथ जी थे।
- उनकी मंगेतर का नाम काललदे बेनीवाल था।
- उनका जन्म 1482 ई. में कतरियासर (बीकानेर) में हुआ।
- कतरियासर (बीकानेर) ही उनकी समाधि तथा मुख्य केंद्र है।
- इस संप्रदाय में 36 नियमों का पालन किया जाता है।
- जसनाथ जी ने गोरख मालिया नामक स्थान पर 12 वर्ष तक तपस्या की।
- 1506 ई. में उन्होंने कतरियासर में समाधि ली।
- बीकानेर के राव लूणकरण उनके आशीर्वाद से राजा बने तथा उन्होंने राज्य के राजचिह्न में जाल वृक्ष को स्थान दिया।
- सिकंदर लोदी ने जसनाथ जी को कतरियासर की भूमि प्रदान की।
➤ पाँच प्रमुख उपपीठ
| उपपीठ | संस्थापक |
|---|---|
| लिखमादेसर (बीकानेर) | हांसोजी |
| पूनरासर (बीकानेर) | पालोजी |
| बमूल (बीकानेर) | हारोजी |
| मालासर (बीकानेर) | टोडर जी |
| पांचला (नागौर) | बोयाजी |
➤ अन्य प्रमुख संत
- लालनाथ जी, चौखनाथ जी, सवाईदास जी तथा जियोजी।
- जसनाथी संप्रदाय में अग्नि नृत्य की परंपरा प्रसिद्ध है।
- इस संप्रदाय के अनुयायी काले ऊन का धागा धारण करते हैं तथा मोर पंख और जाल वृक्ष को शुभ मानते हैं।
- जसनाथ जी ने लोहा पांगल तांत्रिक का घमंड समाप्त किया।
- 1500 ई. में जांभोजी और जसनाथ जी का ऐतिहासिक मिलन हुआ।
➤ प्रमुख ग्रंथ
- सिंभूड़ा , कोंडा
- रामनाथ जी द्वारा रचित यशोनाथ पुराण को जसनाथी संप्रदाय की बाइबिल कहा जाता है।
- इस संप्रदाय के मेले चैत्र, आश्विन तथा माघ माह की शुक्ल सप्तमी को आयोजित किए जाते हैं।
❖ लालदासी संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक लालदास जी थे।
- उनके पिता चांदमल तथा माता समदा थीं।
- उनका जन्म 1540 ई. में धौलीदूब गाँव (अलवर) में हुआ।
- वे मेव जाति के मुस्लिम लकड़हारे थे, फिर भी भगवान राम के भक्त थे। इसी कारण उन्हें सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक माना जाता है।
- उनके गुरु गदन चिश्ती थे।
- लालदास जी गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे।
- उनका निधन 1648 ई. में नगला जहाज (भरतपुर) में हुआ, जो इस संप्रदाय की प्रमुख पीठ भी है।
- उनकी समाधि (मकबरा) शेरपुर (कोटपूतली-बहरोड़) में स्थित है।
- इस संप्रदाय में मेव जाति के मुस्लिम अनुयायियों की संख्या सर्वाधिक है।
- इस संप्रदाय में दीक्षा के समय व्यक्ति का मुँह काला किया जाता है, उसे गधे पर बैठाकर नगर भ्रमण कराया जाता है तथा अंत में शरबत पिलाया जाता है।
- इस परंपरा में भिक्षा मांगने के स्थान पर स्वयं के परिश्रम से आजीविका कमाने पर बल दिया जाता है।
- लालदास जी की चेतावणियाँ इस संप्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है।
❖ चरणदासी संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक चरणदास जी थे।
- उनका बचपन का नाम रणजीत था।
- उनका जन्म 1703 ई. में डेहरा गाँव (अलवर) में हुआ।
- उनके गुरु शुकदेव मुनि ने उनका नाम चरणदास रखा।
- इस संप्रदाय की प्रमुख पीठ तथा चरणदास जी की समाधि दिल्ली में स्थित है।
- इस संप्रदाय के अनुयायी 42 नियमों का पालन करते हैं।
- बसंत पंचमी के अवसर पर यहाँ मेला आयोजित होता है तथा अनुयायी पीले वस्त्र धारण करते हैं।
➤ चरणदास जी की दो प्रमुख शिष्याएँ थीं—
| शिष्या | प्रमुख ग्रंथ |
|---|---|
| दयाबाई | दया बोध, विनय मलिका |
| सहजोबाई | सहज प्रकाश, 16 तिथि |
- 1739 ई. में चरणदास जी ने नादिरशाह के आक्रमण की भविष्यवाणी की थी।
➤ इनके प्रमुख ग्रंथ हैं— ब्रहा ज्ञान सागर, ब्रहा चरित्र, भक्ति सागर, धर्म जहाज, भक्ति पदार्थ, नासकेत लीला, ज्ञान स्वरोदय तथा अष्टांग योग।
❖ अलखिया संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक लाल गिरी थे, जिनका जन्म चूरू में हुआ।
- इसकी प्रधान पीठ बीकानेर में स्थित है।
- अलख स्तुति प्रकाश इस संप्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है।
❖ परनामी संप्रदाय
- इस संप्रदाय की स्थापना प्राणनाथ जी ने की।
- उनका जन्म जामनगर (गुजरात) में हुआ।
- इसकी प्रमुख पीठ पन्ना (मध्य प्रदेश) में स्थित है।
- राजस्थान में इस संप्रदाय का प्रमुख केंद्र जयपुर है।
- इसका प्रमुख ग्रंथ कुजलम स्वरूप है।
❖ नाथ संप्रदाय
- नाथ संप्रदाय एक शैव मत आधारित संप्रदाय है, जिसमें भगवान शिव की उपासना की जाती है।
- इसके प्रवर्तक मत्स्येंद्रनाथ (नाथ मुनि) माने जाते हैं।
➤ राजस्थान में इसकी दो प्रमुख शाखाएँ हैं—
| शाखा | प्रमुख जानकारी |
|---|---|
| बैराग पंथ | इसका प्रमुख केंद्र राताडूंगा (पुष्कर) है। इसके प्रथम प्रचारक भर्तृहरि थे। |
| माननाथी पंथ | इसका प्रमुख केंद्र महामंदिर (जोधपुर) है, जो राजस्थान में नाथ संप्रदाय का मुख्य केंद्र माना जाता है। इस मंदिर का निर्माण जोधपुर के महाराजा मानसिंह ने कराया। |
इस संप्रदाय के अन्य प्रमुख मंदिर उदय मंदिर (जोधपुर) तथा सिरे मंदिर (जालोर) हैं।
❖ लकुलीश / पाशुपत संप्रदाय
- लकुलीश को भगवान शिव का 24वाँ अवतार माना जाता है।
➤ इस संप्रदाय के प्रमुख मंदिर निम्नलिखित हैं—
| मंदिर | स्थान |
|---|---|
| एकलिंग मंदिर | कैलाशपुरी (उदयपुर) |
| बाड़ोली मंदिर | चित्तौड़गढ़ |
| चन्द्रभागा मंदिर | झालावाड़ |
मेवाड़ के महाराणा एकलिंग जी को अपना आराध्य मानते थे तथा शैव मत का पालन करते थे।
❖ कानपा पंथ
- इस पंथ के प्रवर्तक कानपा नाथ थे, जो जालंधर नाथ के शिष्य थे।
- इस पंथ में भगवान शिव की उपासना की जाती है।
❖ कापालिक संप्रदाय
- इस संप्रदाय के अनुयायी भैरव को भगवान शिव का अवतार मानकर उनकी पूजा करते हैं।
- इनके साधु शरीर पर चिता की भस्म धारण करते हैं।
- राजस्थान के प्राचीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उस समय शैव धर्म सर्वाधिक प्रभावशाली था तथा भगवान शिव को सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा जाता था।
❖ निरंजनी संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक हरिदास जी थे।
- उनका जन्म कापड़ोद गाँव (डीडवाना) में हुआ।
- उनकी प्रमुख पीठ तथा मृत्यु स्थल गढ़ा (डीडवाना) है।
- उनका मूल नाम हरिसिंह सांखला था।
- प्रारंभ में वे डाकू थे, बाद में साधु बन गए।
- उन्हें कलियुग का वाल्मीकि भी कहा जाता है।
- इस संप्रदाय में परमात्मा को अलख निरंजन तथा हरि निरंजन नामों से संबोधित किया जाता है।
- इनके प्रमुख उपदेश हरिपुरुष जी की वाणी तथा मंत्र राजप्रकाश में संकलित हैं।
➤ इस संप्रदाय के अनुयायी दो वर्गों में विभाजित हैं—
| अनुयायी | विशेषता |
|---|---|
| निहंग | वैराग्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। |
| घरबारी | गृहस्थ जीवन का पालन करते हैं। |
❖ नवल संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक नवलदास जी थे।
- उनका जन्म हस्सोलाव गाँव (नागौर) में हुआ।
- उनके गुरु करताराम थे।
- इसकी प्रमुख पीठ जोधपुर में स्थित है।
- इसका प्रमुख ग्रंथ नलेश्वर अनुभव वाणी है।
❖ गूदड़ संप्रदाय
- इस संप्रदाय के प्रवर्तक संतदास जी थे।
- संतदास जी गूदड़ (फटे पुराने कपड़ों) से बने वस्त्र धारण करते थे, इसलिए यह संप्रदाय गूदड़ संप्रदाय कहलाया।
- इसकी प्रमुख पीठ दाँतड़ा (शाहपुरा, भीलवाड़ा) में स्थित है।
❖ तेरापंथी
- तेरापंथी संप्रदाय का उद्भव जैन धर्म की श्वेतांबर शाखा से हुआ।
- इसके प्रवर्तक भीखण जी (भिक्षु) थे।
- उनका जन्म कंटालिया (सोजत, पाली) में हुआ।
❖ आचार्य तुलसी
- आचार्य तुलसी का जन्म लाडनू (डीडवाना-कुचामन) में हुआ।
- मार्च 1949 में चूरू से उन्होंने अणुव्रत सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
- उनकी प्रेरणा से जैन विश्व भारती शिक्षण संस्थान, लाडनू की स्थापना हुई।
➤ उन्होंने कहा था— “इंसान पहले इंसान है, फिर हिंदू या मुसलमान।”
❖ संत पीपा
- संत पीपा का मूल नाम प्रताप सिंह खींची था।
- वे गागरोन के शासक थे।
- उनके गुरु रामानंद जी थे।
- दर्जी समुदाय उन्हें अपना आराध्य देव मानता है।
- उनका प्रमुख मंदिर समदड़ी (बालोतरा) में स्थित है।
- उनकी गुफा टोडा (टोंक) में तथा उनकी छतरी गागरोन (झालावाड़) में स्थित है।
- रामानंद जी से दीक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपना राज्य त्याग दिया।
- संत पीपा ने भक्ति को मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन बताया।
❖ संत धन्ना जी
- संत धन्ना जी का जन्म 1415 ई. में धुवन (टोंक) के एक जाट परिवार में हुआ।
- वे रामानंद के शिष्य थे।
- बाद में उन्होंने राजस्थान छोड़कर बनारस को अपना कार्यक्षेत्र बनाया।
- उनके बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने अपनी अटूट श्रद्धा से भगवान कृष्ण की मूर्ति को भोजन कराया।
- धुवन गाँव (टोंक) में इनके सम्मान में मेला आयोजित होता है।
- राजस्थान में भक्ति आंदोलन के प्रवर्तकों में उनका महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।
❖ संत मावजी
- संत मावजी का जन्म साबला गाँव (डूंगरपुर) में हुआ।
- उन्हें वागड़ का धणी कहा जाता है।
- वे निष्कलंक संप्रदाय के प्रवर्तक थे।
- निष्कलंक संप्रदाय की प्रमुख पीठ साबला गाँव में स्थित है।
- उन्होंने सोम, माही और जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम पर बेणेश्वर धाम की स्थापना की, जहाँ खंडित शिवलिंग की पूजा होती है।
- इसी स्थान पर संत मावजी को आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
- वे भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप धारण कर गायें चराया करते थे।
- उनके अनुयायी उन्हें भगवान विष्णु का दसवाँ अवतार (कल्कि अवतार) मानते हैं।
- भील समाज में सुधार लाने के उद्देश्य से उन्होंने लसाड़िया आंदोलन चलाया।
- उन्होंने वागड़ी भाषा में पाँच प्रमुख ग्रंथों की रचना की, जिन्हें चोपड़ा कहा जाता है। ये ग्रंथ दीपावली के दिन बाहर निकाले जाते हैं तथा वाद-विवाद शैली में लिखे गए हैं।
- बांगड़ का धणी के नाम से हजरत शक्कर बाबा पीर प्रसिद्ध हैं।
❖ भगत कवि दुर्लभ
- भगत कवि दुर्लभ का जन्म तथा कार्यक्षेत्र वागड़ क्षेत्र रहा।
- उन्होंने भगवान कृष्ण की भक्ति का प्रचार-प्रसार किया।
- उन्हें राजस्थान का नृसिंह कहा जाता है।
❖ संत मीराबाई
- मीराबाई को राजस्थान की राधा कहा जाता है।
- उनका जन्म 1498 ई. में कुड़की (ब्यावर) में हुआ।
- बचपन में उनका नाम पेमल था।
- उनके पिता रतन सिंह राठौड़ थे, जो बाजोली के जागीरदार थे।
- उनकी माता का नाम कसूब कंवर था।
- उनका लालन-पालन उनके दादाजी राव दूदा, जो मेड़ता के शासक थे, ने किया।
- वे दासीपंथ (मीरादासी संप्रदाय) से संबंधित थीं।
- 1516 ई. में उनका विवाह राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ।
- भोजराज के निधन के बाद उन्होंने अपना जीवन पूर्णतः श्रीकृष्ण भक्ति को समर्पित कर दिया।
- विक्रमादित्य ने उन्हें विष देकर, सर्प से डसवाकर तथा अन्य प्रकार से प्रताड़ित करने का प्रयास किया।
- उनके गुरु संत रैदास थे।
- उनके धार्मिक गुरु गजाधर गुर्जर गौड़ थे।
- उनका अंतिम समय रणछोड़राय मंदिर, द्वारिका (गुजरात) में व्यतीत हुआ, जहाँ वे इसी मंदिर में विलीन हो गईं।
- उनकी भक्ति का प्रमुख भाव दांपत्य भाव (माधुर्य भाव) था।
➤ मीराबाई की प्रमुख रचनाएँ
- पदावलियाँ (मीराबाई की कविता)
- नरसी मेहता री हुंडी
- रुकमणी मंगल
- सत्यभामाजी नू रूसणो
- टीका राग गोविंद
- रत्ना खाती ने ब्रज भाषा में नरसी जी रो मायरो ग्रंथ मीराबाई के निर्देशन में लिखा, जिसे उनकी आत्मकथा माना जाता है।
❖ संत रैदास
- संत रैदास का जन्म काशी (बनारस) में हुआ।
- उन्होंने निर्गुण भक्ति का संदेश दिया।
- मीराबाई के समय वे चित्तौड़ आए थे।
- चित्तौड़गढ़ स्थित मीरा मंदिर के सामने उनकी स्मृति में चार खंभों वाली छतरी बनी हुई है।
- उनकी प्रमुख वाणी/रचना रैदास की परची है।
❖ संत रानाबाई
- संत रानाबाई को राजस्थान की दूसरी मीरा कहा जाता है।
- उनका जन्म 1504 ई. में वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन हरनावा गाँव (डीडवाना-कुचामन) में हुआ।
- उनके पिता राम गोपाल जाट तथा माता गंगाबाई थीं।
- वे पालड़ी के संत चतुरदास की शिष्या थीं।
- 1570 ई. में उन्होंने जीवित समाधि ग्रहण की।
❖ गवरी बाई
- गवरी बाई का जन्म डूंगरपुर के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ।
- उन्हें वागड़ की मीरा के नाम से जाना जाता है।
- उनकी प्रमुख रचना कीर्तनमाला है।
- डूंगरपुर के महारावल शिवसिंह ने उनके लिए बालमुकुंद मंदिर का निर्माण करवाया।
❖ संत भूरीबाई अलख
- संत भूरीबाई अलख मेवाड़ की प्रसिद्ध श्रीकृष्ण उपासिका थीं।
- उनका जन्म सरदारगढ़ (राजसमंद) में हुआ।
❖ करमा बाई
- करमा बाई का जन्म कालवा गाँव (डीडवाना-कुचामन) में हुआ।
- मान्यता है कि उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को खिचड़ा खिलाया था। इसी स्मृति में आज भी जगन्नाथ पुरी मंदिर (उड़ीसा) में भगवान जगन्नाथ को खिचड़े का भोग अर्पित किया जाता है।
➤ महत्वपूर्ण उपाधियाँ
| उपाधि | संबंधित व्यक्तित्व |
|---|---|
| राजस्थान की राधा | संत मीराबाई |
| राजस्थान की दूसरी मीरा | संत रानाबाई |
| वागड़ की मीरा | गवरी बाई |
| मत्स्य की मीरा | समान बाई (अलवर) |
