राजस्थान के प्रमुख अधिनियम

❖ राजस्थान के प्रमुख अधिनियम ❖


नागरिक अधिकार पत्र (सिटिजन चार्टर)

  • विश्व में नागरिक अधिकार पत्र (Citizen Charter) की शुरुआत सबसे पहले ब्रिटेन में 1991 में हुई।
  • भारत में ‘सिटिजन’ शब्द का आशय उन ग्राहकों/नागरिकों से है, जिनके हितों एवं मूल्यों की सुरक्षा और सेवा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से नागरिक अधिकार पत्र तैयार किया जाता है।
  • भारत में सिटिजन चार्टर लागू करने की दिशा में 24 मई 1997 को ‘प्रभावी तथा उत्तरदायी प्रशासन’ विषय पर मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें नौ-सूत्रीय कार्ययोजना तैयार की गई।
  • भारत में पहला सिटिजन चार्टर 1997 में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालय द्वारा जारी किया गया।
  • राजस्थान में 1998 में नागरिक आपूर्ति विभाग ने तथा 1999 में राजस्व मण्डल ने सिटिजन चार्टर जारी किया।

सिटिजन चार्टर के प्रमुख सिद्धान्त / बिन्दु

  • नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण एवं समयबद्ध सेवाएँ उपलब्ध कराना।
  • प्रशासन को नागरिक-केन्द्रित बनाना।
  • ग्राहक सेवा को अधिक सरल एवं सुविधाजनक बनाना।
  • उपभोक्ताओं से संबंधित आवश्यक विवरण को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना।
  • सेवाओं की गुणवत्ता में निरंतर सुधार सुनिश्चित करना।
  • प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही एवं उत्तरदायित्व स्थापित कर सुशासन को बढ़ावा देना।
  • 18 दिसम्बर 2019 को राजस्थान सरकार ने राजस्थान जन आधार प्राधिकार अध्यादेश, 2019 लागू किया।

राजस्थान लोक सेवा गारंटी अधिनियम – 2011

  • यह अधिनियम संख्या 23, वर्ष 2011 का अधिनियम है।
  • लोक सेवकों को अधिक उत्तरदायी एवं जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा 14 नवम्बर 2011 को राजस्थान लोक सेवा गारंटी अधिनियम, 2011 लागू किया गया।
  • इस अधिनियम को 21 सितम्बर 2011 को राज्यपाल की स्वीकृति प्राप्त हुई।
  • इसे भारत के 62वें गणतंत्र वर्ष में राज्य विधानसभा द्वारा पारित किया गया।
  • मध्यप्रदेश भारत का पहला राज्य है, जिसने 2010 में लोक सेवा गारंटी अधिनियम लागू किया।
  • प्रारम्भ में इस अधिनियम के अंतर्गत 15 विभागों की 108 सेवाएँ आम जनता के लिए उपलब्ध कराई गई थीं।
  • वर्तमान में इसके अंतर्गत 27 विभागों की 287 सेवाएँ उपलब्ध हैं।

अधिनियम का उद्देश्य

  • जनता की समस्याओं का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करना।
  • प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता स्थापित करना।
  • सरकारी अधिकारियों में भ्रष्टाचार को कम करना।
  • नागरिकों को निर्धारित सेवाएँ प्राप्त करने का अधिकार सुनिश्चित करना।

अपील के प्रावधान

  1. प्रथम अपील – यदि किसी व्यक्ति का सेवा संबंधी आवेदन अस्वीकृत कर दिया जाए अथवा निर्धारित समय सीमा में सेवा उपलब्ध न कराई जाए, तो वह समय सीमा समाप्त होने की तिथि से 30 दिवस के भीतर प्रथम अपील अधिकारी के समक्ष अपील कर सकता है।
    • प्रथम अपील अधिकारी को शिकायत का निस्तारण 21 दिन के भीतर करना होगा।
  2. द्वितीय अपील – यदि आवेदक प्रथम अपील अधिकारी के निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तो वह 60 दिन के भीतर द्वितीय अपील अधिकारी के समक्ष अपील कर सकता है।
    • द्वितीय अपील अधिकारी आवश्यक होने पर 60 दिन की अवधि के बाद भी अपील स्वीकार कर सकता है।
    • जाँच में दोष सिद्ध होने पर संबंधित कर्मचारी पर न्यूनतम ₹500 तथा अधिकतम ₹5000 तक का आर्थिक दण्ड लगाया जा सकता है।
    • सेवा प्रदान करने में विलम्ब होने की स्थिति में ₹250 प्रतिदिन की दर से, अधिकतम ₹5000 तक का आर्थिक दण्ड लगाया जा सकता है।
    • सेवा उपलब्ध कराने की समय-सीमा की गणना आवेदन की तिथि से की जाएगी, जबकि अवकाश के दिनों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा।
    • इस अधिनियम के अंतर्गत किसी भी अपील आवेदन के साथ कोई शुल्क देय नहीं है।
    • विवाह पंजीकरण एवं प्रमाण-पत्र जारी करने की अधिकतम समय-सीमा 7 दिन, पुलिस विभाग द्वारा पासपोर्ट सत्यापन की समय-सीमा 30 दिन तथा मूल निवास एवं जाति प्रमाण-पत्र जारी करने की समय-सीमा 5 दिन निर्धारित है।

राजस्थान जनसुनवाई अधिकार अधिनियम – 2012

  • लोक शिकायतों का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित करने तथा नागरिकों को उनके निकटतम स्थान पर सुनवाई की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से यह अधिनियम बनाया गया।
  • राजस्थान देश का पहला राज्य है जिसने सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012 लागू किया।
  • यह अधिनियम 1 अगस्त 2012 से प्रभावी हुआ।

अपील

  • यदि किसी व्यक्ति को निर्धारित समय-सीमा के भीतर सुनवाई का अवसर नहीं दिया जाता है, तो वह 30 दिन के भीतर प्रथम अपील प्राधिकारी के समक्ष अपील कर सकता है।
  • यदि आवेदक प्रथम अपील प्राधिकारी के निर्णय से असंतुष्ट हो, तो वह 30 दिवस के भीतर द्वितीय अपील प्रस्तुत कर सकता है।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत परिवाद, आवेदन तथा अपील के साथ कोई शुल्क देय नहीं है।
  • यदि लोक सुनवाई अधिकारी निर्धारित समय-सीमा के भीतर सुनवाई उपलब्ध कराने में असफल रहता है, तो उस पर न्यूनतम ₹500 तथा अधिकतम ₹5000 तक का आर्थिक दण्ड लगाया जा सकता है।

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