❖ राजस्थान के प्रमुख आयोग ❖
राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग
- मानव अधिकारों की पहली अंतरराष्ट्रीय घोषणा 10 दिसम्बर 1948 को की गई। इसी दिन अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन भी हुआ माना जाता है।
- प्रत्येक वर्ष 10 दिसम्बर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है।
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन 12 अक्टूबर 1993 को किया गया।
- मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अध्याय 5 की धारा 21 से 29 में राज्य मानवाधिकार आयोग से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
- राज्य मानवाधिकार आयोग एक वैधानिक (सांविधिक) निकाय है, इसे संवैधानिक निकाय का दर्जा प्राप्त नहीं है।
- यह एक स्वायत्त एवं उच्चाधिकार प्राप्त संस्था है, जिसका प्रमुख उद्देश्य मानव अधिकारों की सुरक्षा, संरक्षण तथा उनके उल्लंघन पर निगरानी रखना है।
- राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थापना मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 21 के अंतर्गत 18 जनवरी 1999 को की गई तथा आयोग ने 23 मार्च 2000 से अपना कार्य प्रारम्भ किया।
- आयोग का मुख्यालय जयपुर में स्थित है।
❖ संरचना (विन्यास)
- राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग एक बहुसदस्यीय निकाय है।
- स्थापना के समय (1999) आयोग में 1 अध्यक्ष एवं 4 सदस्य निर्धारित थे।
- मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2006 के बाद वर्तमान में आयोग में 1 अध्यक्ष तथा 2 सदस्य होते हैं।
➤ अध्यक्ष – अध्यक्ष के रूप में राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश अथवा अन्य सेवानिवृत्त न्यायाधीश की नियुक्ति की जाती है।
➤ सदस्य
- एक सदस्य उच्च न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश अथवा जिला न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं, जिन्हें न्यायिक सेवा का 7 वर्ष का अनुभव हो।
- दूसरा सदस्य मानवाधिकार विषय का विशेषज्ञ होता है।
❖ धारा 22 – आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति
- आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा चयन समिति की अनुशंसा पर की जाती है।
➤ चयन समिति
- चयन समिति में अध्यक्ष सहित 4 सदस्य होते हैं।
- समिति की अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं।
| पद | सदस्य |
|---|---|
| अध्यक्ष | मुख्यमंत्री |
| सदस्य | गृहमंत्री |
| सदस्य | विधानसभा अध्यक्ष |
| सदस्य | विधानसभा में विपक्ष का नेता |
❖ धारा 23 – आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों को हटाने का प्रावधान
- आयोग के अध्यक्ष अथवा सदस्य को केवल राष्ट्रपति के आदेश से ही पद से हटाया जा सकता है।
- इसके लिए आवश्यक है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा जाँच के उपरांत यह सिद्ध हो जाए कि संबंधित व्यक्ति अपने दायित्वों के निर्वहन में असमर्थ है अथवा उसके विरुद्ध कदाचार सिद्ध हो चुका है।
❖ धारा 24 – कार्यकाल
- आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले पूर्ण हो, तक होता है।
- 2019 के संशोधन से पूर्व यह अवधि 5 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, निर्धारित थी।
- अध्यक्ष एवं सदस्यों की पुनर्नियुक्ति की जा सकती है।
- यदि अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाए, तो राज्यपाल आयोग के किसी सदस्य को कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में अधिकृत कर सकता है।
➤ आयोग के अधिकारी एवं कर्मचारी
- आयोग में एक सचिव नियुक्त किया जाता है, जो इसका मुख्य कार्यपालक अधिकारी होता है।
- सचिव का पद राज्य सरकार के सचिव स्तर का होता है।
- आयोग की अपनी अन्वेषण (जाँच) एजेंसी होती है, जिसका नेतृत्व महानिरीक्षक पुलिस (IG) से कम स्तर का अधिकारी नहीं करता।
- आयोग प्रत्येक वर्ष अपना वार्षिक प्रतिवेदन राज्य सरकार को प्रस्तुत करता है।
❖ धारा 33 – वित्तीय स्वायत्तता
- इस धारा के अनुसार राज्य सरकार द्वारा तथा राज्य विधानमंडल के बनाए गए नियमों के अधीन आयोग को वित्तीय स्वायत्तता प्रदान की जाती है।
❖ राज्य मानवाधिकार आयोग के कार्य
- आयोग के कार्यक्षेत्र में सामाजिक, नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक अधिकार सम्मिलित हैं।
- आयोग राज्य सूची तथा समवर्ती सूची से संबंधित विषयों पर मानवाधिकार उल्लंघन की जाँच करता है।
- मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में आयोग स्वतः संज्ञान ले सकता है अथवा पीड़ित या उसकी ओर से प्रस्तुत याचिका के आधार पर जाँच प्रारम्भ कर सकता है।
- मानवाधिकार से संबंधित शोध (अनुसंधान) को बढ़ावा देना तथा मानवाधिकार साक्षरता का प्रसार करना।
- इस क्षेत्र में कार्यरत गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) एवं अन्य संस्थाओं के प्रयासों को प्रोत्साहित करना।
- मानवाधिकारों के प्रभावी उपयोग में आने वाली बाधाओं का पुनरावलोकन कर उनके समाधान के लिए आवश्यक सिफारिशें करना।
- जिला मुख्यालयों पर मानव अधिकार प्रकोष्ठ की स्थापना को प्रोत्साहित करना।
- किसी न्यायालय में लंबित मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित मामले में, न्यायालय की अनुमति प्राप्त होने पर हस्तक्षेप करना।
- कारागारों एवं बंदीगृहों (जेलों) का निरीक्षण कर वहाँ की व्यवस्थाओं का परीक्षण करना।
- किसी लोक सेवक द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन किए जाने पर उसके विरुद्ध जाँच करने की शक्ति आयोग को प्राप्त है।
- आयोग मानवाधिकार उल्लंघन की जाँच कर सकता है, किन्तु दंड अथवा सजा देने का अधिकार इसे प्राप्त नहीं है।
- आयोग एक वर्ष से अधिक पुराने मामलों की जाँच नहीं करता।
- जो मामले किसी अन्य आयोग में विचाराधीन (लंबित) हों, उनकी जाँच आयोग नहीं करता।
❖ महत्वपूर्ण तथ्य
- राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग की प्रथम अध्यक्ष – कांता भटनागर
- आयोग की एकमात्र महिला अध्यक्ष – कांता भटनागर
- अध्यक्ष के रूप में सर्वाधिक कार्यकाल – नगेन्द्र कुमार जैन (5 वर्ष)
- अध्यक्ष के रूप में न्यूनतम कार्यकाल – कांता भटनागर
- आयोग के प्रथम कार्यवाहक अध्यक्ष – अमरसिंह गोदारा
- आयोग के एकमात्र ऐसे अध्यक्ष, जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश भी रहे – जस्टिस सैयद समीर अहमद
- आयोग के सदस्य के रूप में सर्वाधिक कार्यकाल – पुखराज सीरवी
- सदस्य के रूप में न्यूनतम कार्यकाल – नमीनारायण मीणा
- राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के कामकाज की प्रक्रिया (विनियम), 2001 वर्ष 2001 से लागू है।
❖ राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्षों की सूची
| क्रम | अध्यक्ष | कार्यकाल |
|---|---|---|
| 1 | कांता भटनागर | 23 मार्च 2000 से अगस्त 2000 तक |
| 2 | सैयद समीर अहमद | — |
| 3 | नगेन्द्र कुमार जैन | — |
| 4 | प्रकाश टाटिया | — |
| 5 | गोपालकृष्ण व्यास | — |
| 6 | गंगाराम मूलचंदानी | 27 जून 2024 से लगातार |
❖ राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC)
- भारत सरकार अधिनियम, 1919 के प्रावधानों के अंतर्गत वर्ष 1926 में पहली बार लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई।
- लोक सेवा आयोग के गठन की अनुशंसा वर्ष 1924 में ली कमीशन द्वारा की गई थी।
- राजस्थान के गठन के समय कुल 22 रियासतों में से केवल जोधपुर (1939), जयपुर (1940) तथा बीकानेर (1946) में ही लोक सेवा आयोग स्थापित थे।
- 16 अगस्त 1949 को जयपुर, जोधपुर एवं बीकानेर के लोक सेवा आयोगों को समाप्त कर दिया गया।
- इसी दिन राजस्थान के राजप्रमुख सवाई मानसिंह द्वितीय ने राजस्थान लोक सेवा आयोग की स्थापना के लिए अध्यादेश जारी किया, जो 20 अगस्त 1949 से प्रभावी हुआ।
- अध्यादेश की धारा 1(3) के अनुसार 22 दिसम्बर 1949 को इसका राजपत्र (गजट) में प्रकाशन किया गया। इसी तिथि को राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की स्थापना मानी जाती है।
- प्रारम्भ में आयोग का मुख्यालय जयपुर में था, किन्तु सत्यनारायण राव समिति की अनुशंसा पर 21 अगस्त 1958 को इसे अजमेर स्थानांतरित कर दिया गया।
- भारतीय संविधान के भाग-14 में अनुच्छेद 315 से 323 तक राज्य लोक सेवा आयोग से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।
- राजस्थान लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक संस्था है।
❖ अनुच्छेद 315 – राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग
- अनुच्छेद 315(1) के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग की व्यवस्था होगी।
- अनुच्छेद 315(2) के अनुसार संसद कानून बनाकर दो या दो से अधिक राज्यों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग की स्थापना कर सकती है।
- संयुक्त लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
❖ अनुच्छेद 316 – सदस्यों की नियुक्ति एवं कार्यकाल
- राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है।
- आयोग के कुल सदस्यों में से आधे सदस्य ऐसे होने चाहिए, जिन्होंने भारत सरकार अथवा किसी राज्य सरकार के अधीन कम से कम 10 वर्ष तक प्रशासनिक पद पर कार्य किया हो।
➤ अनुच्छेद 316(2) – कार्यकाल
- अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष अथवा 62 वर्ष की आयु, जो भी पहले पूर्ण हो, तक रहता है।
- अध्यक्ष एवं सदस्य अपना त्यागपत्र राज्यपाल को सौंपते हैं।
- कार्यकाल समाप्त होने के बाद किसी सदस्य की उसी पद पर पुनर्नियुक्ति नहीं की जा सकती, लेकिन सदस्य को बाद में अध्यक्ष नियुक्त किया जा सकता है।
❖ अनुच्छेद 317 – अध्यक्ष एवं सदस्यों का निलंबन या पद से हटाना
- राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अथवा सदस्य को केवल कदाचार सिद्ध होने की स्थिति में ही राष्ट्रपति के आदेश द्वारा पद से हटाया जा सकता है।
- हटाने से पूर्व उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 145 में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जाँच की जाती है।
- जाँच की अवधि के दौरान राज्यपाल संबंधित अध्यक्ष या सदस्य को निलंबित कर सकता है।
❖ अनुच्छेद 318 – अध्यक्ष, सदस्यों एवं कर्मचारियों की संख्या तथा सेवा शर्तें
- राज्यपाल आयोग के सदस्यों की संख्या तथा उनकी सेवा शर्तों का निर्धारण करता है।
- आयोग की स्थापना के समय इसमें 1 अध्यक्ष एवं 2 सदस्य अर्थात कुल 3 सदस्य थे।
- वर्ष 2011 से वर्तमान व्यवस्था के अनुसार आयोग में 1 अध्यक्ष एवं 7 सदस्य, अर्थात कुल 8 सदस्य हैं।
❖ अनुच्छेद 320 – RPSC के कार्य
➤ अनुच्छेद 320(1)
- राज्य सेवाओं में नियुक्ति हेतु प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन करना।
➤ अनुच्छेद 320(3)
- सिविल सेवाओं एवं सिविल पदों पर भर्ती की प्रक्रिया से जुड़े विषयों पर राज्य सरकार को परामर्श देना।
- एक सेवा से दूसरी सेवा में पदोन्नति तथा अंतरण (स्थानांतरण) से संबंधित मामलों पर परामर्श देना।
- भारत सरकार अथवा राज्य सरकार की सिविल सेवा में कार्यरत कर्मचारियों से जुड़े अनुशासनात्मक मामलों में अनिवार्य रूप से परामर्श देना।
❖ अनुच्छेद 322
- आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन एवं भत्तों का व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित होता है।
❖ अनुच्छेद 323 – RPSC का वार्षिक प्रतिवेदन
- राज्य लोक सेवा आयोग का दायित्व है कि वह प्रत्येक वर्ष अपने कार्यों का वार्षिक प्रतिवेदन राज्यपाल को प्रस्तुत करे।
❖ महत्वपूर्ण बिन्दु
आयोग के कार्यों के सुचारु संचालन के लिए राजस्थान के राजप्रमुख (राज्यपाल) द्वारा निम्नलिखित विनियम लागू किए गए—
| विनियम | वर्ष |
|---|---|
| राजस्थान लोक सेवा आयोग (कार्यों की सीमा) विनियम | 1951 |
| राजस्थान लोक सेवा आयोग (सेवा की शर्तें) विनियम | 1974 |
- लोक सेवा आयोग से संबंधित संविधान के अनुच्छेद – 16, 234 तथा 315 से 323।
- RPSC का मुख्यालय अजमेर में स्थित है।
- लोक सेवा दिवस प्रत्येक वर्ष 21 अप्रैल को मनाया जाता है।
- RPSC के प्रथम अध्यक्ष – एस. के. घोष (22 दिसम्बर 1949 से 25 जनवरी 1950)
- RPSC के द्वितीय अध्यक्ष – एस. सी. त्रिपाठी (28 जुलाई 1950 से 7 अगस्त 1951)
- RPSC के तृतीय अध्यक्ष – डी. एस. तिवारी
- RPSC के वर्तमान अध्यक्ष – उत्कल रंजन साहू (12 जून 2025 से लगातार)
- अध्यक्ष के रूप में सर्वाधिक कार्यकाल – डी. एस. तिवारी
- अध्यक्ष के रूप में न्यूनतम कार्यकाल – पी. एस. यादव
- RPSC के ऐसे सदस्य जो राजस्थान के मुख्य सचिव भी रहे – सांबलदान उज्जवल
- ऐसे व्यक्ति जिन्होंने RPSC में अध्यक्ष तथा सचिव, दोनों पदों पर कार्य किया – एन. के. बैरवा
- RPSC के प्रथम कार्यवाहक अध्यक्ष – एल. एल. जोशी
❖ RPSC के कार्यवाहक अध्यक्ष
| क्रम | नाम |
|---|---|
| 1 | एल. एल. जोशी |
| 2 | बी. एल. रावत |
| 3 | एस. सी. सिंगारिया |
| 4 | एस. एस. टाक |
| 5 | एच. एन. मीणा |
| 6 | आर. डी. सैनी |
| 7 | शिवसिंह राठौड़ |
| 8 | जसवंत सिंह राठी |
❖ महत्वपूर्ण तथ्य
- RPSC के ऐसे सदस्य जो बाद में राजस्थान के राज्यपाल बने – रघुकुल तिलक
- RPSC के वे सदस्य जो लोकसभा सदस्य भी रहे – धुलेश्वर मीणा तथा दिव्या सिंह
- RPSC की वह सदस्य जो पूर्व में मंत्री भी रही – श्रीमती कमला भील
- RPSC की वे महिला सदस्य जिन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सदस्य के रूप में भी कार्य किया – कांता खतुरिया एवं प्रकाशवती शर्मा
❖ RPSC की पूर्व महिला सदस्य
| क्रम | नाम |
|---|---|
| 1 | श्रीमती कांता खतुरिया |
| 2 | श्रीमती कमला भील |
| 3 | श्रीमती प्रकाशवती शर्मा |
| 4 | श्रीमती दिव्या सिंह |
| 5 | श्रीमती राजकुमारी गुर्जर |
❖ RPSC की वर्तमान महिला सदस्य
| क्रम | नाम |
|---|---|
| 1 | श्रीमती संगीता आर्य |
| 2 | श्रीमती मंजू शर्मा |
❖ हरिश्चन्द्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान
- हरिश्चन्द्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान का मुख्यालय जयपुर में स्थित है।
- राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु इस संस्थान की स्थापना वर्ष 1957 में जोधपुर में की गई थी।
- बाद में वर्ष 1963 में इस संस्थान को जयपुर स्थानांतरित कर दिया गया।
❖ राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग
- पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों के लिए अनुच्छेद 243K तथा नगरपालिकाओं के चुनावों के लिए अनुच्छेद 243ZA के अंतर्गत 1 जुलाई 1994 को राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना की गई।
- यह एक संवैधानिक संस्था है।
- राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग एक एक-सदस्यीय निकाय है।
- आयोग का प्रमुख राज्य निर्वाचन आयुक्त होता है।
- आयोग में एक सचिव नियुक्त होता है, जो राज्य का मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Chief Electoral Officer) भी होता है।
- मुख्य निर्वाचन अधिकारी राज्य स्तर पर चुनावों के संचालन में भारतीय निर्वाचन आयोग की सहायता करता है।
- आयोग का मुख्यालय जयपुर में स्थित है।
➤ 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत जोड़े गए अनुच्छेद 243K एवं अनुच्छेद 243ZA के अनुसार राज्य निर्वाचन आयुक्त राज्य की पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के चुनावों के लिए निर्वाचन नामावली तैयार करने, चुनावों का निर्देशन, नियंत्रण, संचालन तथा संपादन करने के लिए उत्तरदायी होता है।
- राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग केवल पंचायती राज संस्थाओं एवं नगरपालिकाओं के चुनाव कराता है।
➤ नोट – सांसद एवं विधायक के चुनाव भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा कराए जाते हैं।
➤ नियुक्ति – राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। सामान्यतः इस पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का अधिकारी नियुक्त किया जाता है।
➤ कार्यकाल – कार्यकाल 5 वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले पूर्ण हो।
➤ त्यागपत्र – राज्यपाल को दिया जाता है।
➤ पद से हटाने का प्रावधान – कदाचार अथवा असमर्थता के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा पद से हटाया जा सकता है।
❖ महत्वपूर्ण बिन्दु
- राजस्थान में जिला कलेक्टर को जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में नियुक्त किया जाता है।
- मतदाता सूचियों को शुद्ध एवं त्रुटिरहित बनाए रखने के लिए प्रत्येक मतदान केन्द्र पर बूथ लेवल अधिकारी (BLO) नियुक्त किया जाता है।
- इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का पहली बार प्रयोग नगरपालिका चुनावों में किया गया।
- NOTA (None of the Above) का प्रथम उपयोग 14वीं राजस्थान विधानसभा चुनाव, 2013 में हुआ।
- राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग के प्रथम राज्य निर्वाचन आयुक्त – अमरसिंह राठौड़ (1 जुलाई 1994 से 30 मार्च 2000)
- सर्वाधिक कार्यकाल वाले राज्य निर्वाचन आयुक्त – अमरसिंह राठौड़
- न्यूनतम कार्यकाल वाले राज्य निर्वाचन आयुक्त – नेकराम भसीन
- वर्तमान राज्य निर्वाचन आयुक्त – मधुकर गुप्ता (14 अगस्त 2022 से लगातार)
- वर्तमान मुख्य निर्वाचन अधिकारी – नवीन महाजन (IAS)
❖ राजस्थान के राज्य निर्वाचन आयुक्त
| क्रम | नाम |
|---|---|
| 1 | अमरसिंह राठौड़ |
| 2 | नेकराम भसीन |
| 3 | इन्द्रजीत खन्ना |
| 4 | अशोक कुमार पाण्डे |
| 5 | रामलुभाया |
| 6 | प्रेमसिंह मेहरा |
| 7 | मधुकर गुप्ता |
राजस्थान राज्य वित्त आयोग
- 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं के लिए अनुच्छेद 243I तथा नगरपालिकाओं के लिए अनुच्छेद 243Y के अनुसार उनकी वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ बनाने एवं पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने हेतु राज्यपाल प्रत्येक 5 वर्ष में राज्य वित्त आयोग का गठन करता है।
- यह एक संवैधानिक निकाय है।
- राज्य वित्त आयोग पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है तथा राज्य की संचित निधि से पंचायतों को अनुदान दिए जाने संबंधी सिफारिशें करता है। साथ ही, राज्यपाल द्वारा सौंपे गए अन्य दायित्वों का भी निर्वहन करता है।
- अनुच्छेद 243I के अनुसार आयोग राज्य एवं पंचायतों के बीच करों, शुल्कों तथा पथकरों के वितरण एवं निर्धारण के संबंध में राज्यपाल को सिफारिशें देता है।
- अनुच्छेद 243Y के अंतर्गत आयोग नगरपालिकाओं द्वारा लगाए जाने वाले करों, शुल्कों एवं पथकरों के निर्धारण के संबंध में भी राज्यपाल को अनुशंसा करता है।
❖ संरचना
- राज्य वित्त आयोग एक 5-सदस्यीय निकाय है।
- इसमें 1 अध्यक्ष एवं 4 सदस्य होते हैं।
➤ नियुक्ति
- आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
➤ कार्यकाल
- आयोग का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित है।
➤ त्यागपत्र
- अध्यक्ष एवं सदस्य अपना त्यागपत्र राज्यपाल को देते हैं।
- आयोग अपनी वार्षिक रिपोर्ट राज्यपाल को प्रस्तुत करता है, जिसे बाद में राज्यपाल राज्य विधानमण्डल के समक्ष रखवाते हैं।
- वर्तमान में छठा राज्य वित्त आयोग कार्यरत है।
- वर्तमान अध्यक्ष – प्रधुम्न सिंह
- वर्तमान सदस्य – लक्ष्मण सिंह रावत एवं अशोक लोहाटी
❖ राजस्थान राज्य वित्त आयोग
| क्रम | अध्यक्ष | गठन | कार्यकाल |
|---|---|---|---|
| 1 | कृष्ण कुमार गोयल | 24 अप्रैल 1994 | 1 अप्रैल 1995 – 31 मार्च 2000 |
| 2 | हीरालाल देवपुरा | मई 1999 | 1 अप्रैल 2000 – 31 मार्च 2005 |
| 3 | माणिकचंद सुराणा | मई 2004 | 1 अप्रैल 2005 – 31 मार्च 2010 |
| 4 | डॉ. बी. डी. कल्ला | अप्रैल 2011 | 1 अप्रैल 2010 – 31 मार्च 2015 |
| 5 | डॉ. ज्योति किरण | जुलाई 2014 | 1 अप्रैल 2015 – 31 मार्च 2020 |
| 6 | प्रधुम्न सिंह | 12 अप्रैल 2021 | 1 अप्रैल 2020 – 31 मार्च 2025 |
राजस्थान राज्य महिला आयोग
- राजस्थान राज्य महिला आयोग का गठन 15 मई 1999 को किया गया।
- यह एक सांविधिक (वैधानिक) एवं गैर-संवैधानिक निकाय है।
- आयोग एक परामर्शकारी संस्था है। यह मामलों की जाँच कर सकता है, लेकिन दण्ड देने का अधिकार इसे प्राप्त नहीं है।
- आयोग का मुख्यालय जयपुर में स्थित है।
- केरल के बाद राजस्थान ऐसा देश का दूसरा राज्य है, जहाँ राज्य महिला आयोग की स्थापना की गई।
❖ धारा 3 – आयोग का गठन
- आयोग में 1 अध्यक्ष, 3 सदस्य तथा 1 सदस्य सचिव का प्रावधान है।
➤ नियुक्ति
- अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है।
➤ अध्यक्ष
- अध्यक्ष के रूप में ऐसी महिला नियुक्त की जाती है, जिसे महिलाओं की समस्याओं एवं उनके समाधान का पर्याप्त ज्ञान एवं अनुभव हो।
➤ सदस्य
- एक सदस्य अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिला होगी।
- एक सदस्य अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिला होगी।
- आयोग के सचिव की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है।
❖ धारा 4 – पदावधि एवं सेवा शर्तें
- अध्यक्ष तथा प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 3 वर्ष होता है।
➤ त्यागपत्र
- अध्यक्ष एवं सदस्य अपना त्यागपत्र राज्य सरकार को देते हैं।
- अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन, भत्ते तथा सेवा शर्तों का निर्धारण राज्य सरकार द्वारा किया जाता है।
- आयोग की बैठक कम-से-कम प्रत्येक दो माह में एक बार अध्यक्ष द्वारा बुलाई जाती है।
❖ धारा 8 – अध्यक्ष एवं सदस्यों को पद से हटाने का प्रावधान
- राज्य सरकार निम्न परिस्थितियों में अध्यक्ष अथवा सदस्यों को पद से हटा सकती है—
- यदि उन्हें दिवालिया घोषित कर दिया जाए।
- यदि वे किसी आपराधिक मामले में दोषी सिद्ध हो जाएँ।
- यदि वे लगातार 3 बैठकों में बिना उचित कारण अनुपस्थित रहें।
- यदि वे अपने दायित्वों का निर्वहन करने में असमर्थ हो जाएँ।
❖ धारा 10 – आयोग की शक्तियाँ
- राजस्थान राज्य महिला आयोग को दीवानी (सिविल) न्यायालय के समान शक्तियाँ प्राप्त हैं।
❖ धारा 11 – आयोग के कार्य
- महिलाओं के साथ होने वाले अनुचित व्यवहार एवं उत्पीड़न से संबंधित मामलों की जाँच करना तथा आवश्यक कार्यवाही के लिए राज्य सरकार को सिफारिश करना।
- पीड़ित महिलाओं द्वारा प्रस्तुत शिकायतों का निस्तारण करना।
- महिलाओं के अधिकारों एवं हितों की रक्षा करते हुए उन्हें न्याय दिलाने का प्रयास करना।
- महिलाओं से संबंधित संवैधानिक एवं वैधानिक प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी करना तथा महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना।
❖ महिला आयोग की अध्यक्ष
| क्रम | अध्यक्ष | कार्यकाल |
|---|---|---|
| 1 | श्रीमती कांता खतुरिया | मई 1999 से मई 2002 |
| 2 | प्रो. पवन सुराणा | जनवरी 2003 से जनवरी 2006 |
| 3 | श्रीमती तारा भंडारी | अप्रैल 2006 से अप्रैल 2009 |
| 4 | प्रो. लाड कुमारी जैन | नवम्बर 2011 से नवम्बर 2014 |
| 5 | श्रीमती सुमन शर्मा | अक्टूबर 2015 से अक्टूबर 2018 |
| 6 | श्रीमती रेहाना रियाज चिश्ती | 11 फरवरी 2022 से 10 फरवरी 2025 |
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005)
- भारत में सूचना के अधिकार आंदोलन की प्रमुख प्रेरणा अरुणा राय को माना जाता है।
- अरुणा राय ने वर्ष 1995 में मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) की स्थापना कर छांग गेट, ब्यावर से सूचना के अधिकार आंदोलन की शुरुआत की।
- अरुणा राय को रमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को 15 जून 2005 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। अधिनियम के कुछ प्रावधान उसी दिन से प्रभावी हो गए थे।
- यह अधिनियम पूरे भारत में 12 अक्टूबर 2005 से लागू हुआ।
- राजस्थान में सूचना का अधिकार अधिनियम 13 अक्टूबर 2005 से प्रभावी हुआ।
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अध्याय 5 में सूचना आयोग की शक्तियों, कार्यों, अपील तथा दण्ड से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।
➤ नोट – सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लागू होने के बाद सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 को निरस्त कर दिया गया।
❖ मुख्य उद्देश्य
- उपयोगी एवं आवश्यक सरकारी सूचनाओं को आम नागरिकों तक सरलता से उपलब्ध कराना।
- नागरिकों को सशक्त बनाते हुए शासन व्यवस्था में पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व स्थापित करना।
- भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना।
❖ सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया
- सूचना प्राप्त करने के लिए सबसे पहले संबंधित लोक सूचना अधिकारी (PIO) को आवेदन प्रस्तुत किया जाता है।
- लोक सूचना अधिकारी को आवेदन प्राप्त होने के 30 दिन के भीतर सूचना उपलब्ध करानी होती है।
- यदि सूचना 30 दिन की निर्धारित अवधि के बाद उपलब्ध कराई जाती है, तो आवेदक से कोई शुल्क नहीं लिया जाता।
- यदि निर्धारित अवधि में सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाए अथवा प्राप्त सूचना से आवेदक संतुष्ट न हो, तो वह प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपील कर सकता है।
- प्रथम अपीलीय अधिकारी को सामान्यतः 30 दिन के भीतर निर्णय देना होता है। आवश्यक होने पर उचित कारणों के आधार पर इस अवधि में 15 दिन की अतिरिक्त वृद्धि की जा सकती है।
- यदि इसके बाद भी संतोषजनक सूचना प्राप्त नहीं होती, तो आवेदक 60 दिन के भीतर वरिष्ठ लोक सूचना अधिकारी के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर सकता है।
- यदि वहाँ से भी समाधान नहीं मिलता, तो अंतिम अपील राज्य सूचना आयोग के समक्ष की जा सकती है।
- सूचना उपलब्ध न कराने अथवा गलत सूचना देने पर लोक सूचना अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से, अधिकतम ₹25,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
❖ धारा 6(3)
- यदि किसी लोक प्राधिकरण (Public Authority) के पास माँगी गई सूचना उपलब्ध नहीं है, तो वह आवेदन उस संबंधित लोक प्राधिकरण को स्थानांतरित करेगा जिसके पास वह सूचना उपलब्ध है।
❖ ऐसी सूचनाएँ जिन्हें उपलब्ध कराने से इंकार किया जा सकता है
- ऐसी सूचना जिससे राष्ट्र की एकता, अखण्डता एवं सुरक्षा प्रभावित होती हो।
- ऐसी सूचना जिसके सार्वजनिक होने से किसी व्यक्ति के जीवन या सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो सकता हो।
- ऐसी सूचना जिससे संसद अथवा विधानसभा की कार्यवाही प्रभावित होती हो।
- ऐसी सूचना जिसका प्रकटीकरण न्यायालय के आदेश की अवहेलना करता हो।
- ऐसी सूचना जो किसी विदेशी सरकार से विश्वासपूर्वक प्राप्त हुई हो।
- पुलिस अथवा सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने से संबंधित गोपनीय सूचना।
- कैबिनेट के अभिलेख एवं दस्तावेज।
❖ महत्वपूर्ण बिन्दु
- प्रत्येक सरकारी विभाग में एक लोक सूचना अधिकारी (PIO) की नियुक्ति की जाती है।
- सामान्यतः विभागाध्यक्ष के अधीन कार्यरत वरिष्ठतम अधिकारी को लोक सूचना अधिकारी नियुक्त किया जाता है।
- लोक सूचना अधिकारी प्रकाशित सूचनाओं का प्रत्येक वर्ष अद्यतन (अपडेट) करता है।
- सूचना प्राप्त करने के लिए आवेदन शुल्क ₹10 निर्धारित है, जबकि गरीबी रेखा (BPL) से नीचे जीवनयापन करने वाले व्यक्तियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता।
- A3 अथवा A4 आकार के प्रत्येक पृष्ठ की प्रतिलिपि का शुल्क ₹2 प्रति पृष्ठ है।
- राजस्थान सूचना आयोग (प्रबंधन) विनियम, 2007 का निर्माण सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 15(4) के अंतर्गत किया गया तथा इसे 24 जुलाई 2007 से लागू किया गया।
राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC)
- ध्येय वाक्य – “आवदानि जनेभ्यः”
- राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) एक वैधानिक (सांविधिक) एवं स्वायत्तशासी निकाय है।
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत आने वाले मामलों में राजस्थान राज्य सूचना आयोग अंतिम अपीलीय प्राधिकरण है। इसके निर्णय अंतिम एवं बाध्यकारी होते हैं।
- आयोग को ऐसे किसी भी व्यक्ति की शिकायत प्राप्त करने एवं उसकी जाँच करने का अधिकार है, जिसे लोक सूचना अधिकारी (PIO) से सूचना प्राप्त नहीं हुई हो या सूचना प्राप्त करने में कठिनाई हुई हो।
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अध्याय 4 की धारा 15 के अंतर्गत राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) की स्थापना का प्रावधान किया गया है।
❖ धारा 15(1) – आयोग का गठन
- राजस्थान राज्य सूचना आयोग का गठन 18 अप्रैल 2006 को किया गया।
- आयोग के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त – एम. डी. कौरानी थे।
❖ धारा 15(2) – संरचना
- राजस्थान राज्य सूचना आयोग एक बहुसदस्यीय निकाय है।
- आयोग में 1 मुख्य सूचना आयुक्त तथा अधिकतम 10 सूचना आयुक्त नियुक्त किए जा सकते हैं।
- वर्तमान में आयोग में 1 मुख्य सूचना आयुक्त तथा 4 सूचना आयुक्तों के पद सृजित हैं।
❖ धारा 15(3) – नियुक्ति
- मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा चयन समिति की अनुशंसा पर की जाती है।
➤ चयन समिति
| पद | सदस्य |
|---|---|
| अध्यक्ष | मुख्यमंत्री |
| सदस्य | विधानसभा में प्रतिपक्ष का नेता |
| सदस्य | मुख्यमंत्री द्वारा मनोनीत मंत्रिमण्डल का एक सदस्य |
❖ धारा 15(7) – मुख्यालय
- राजस्थान राज्य सूचना आयोग का मुख्यालय जयपुर में स्थित है।
❖ धारा 16 – पदावधि एवं सेवा शर्तें
- मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले पूर्ण हो, तक होता है।
- पद एवं गोपनीयता की शपथ राज्यपाल अथवा उनके द्वारा अधिकृत व्यक्ति दिलाता है।
- त्यागपत्र राज्यपाल को दिया जाता है।
- इनके वेतन एवं भत्ते राज्य सरकार के मुख्य सचिव के समान होते हैं।
- सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 के अनुसार राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त एवं अन्य सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते तथा सेवा शर्तों का निर्धारण केन्द्र सरकार द्वारा किया जाता है।
❖ धारा 17 – पद से हटाने का प्रावधान
- मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त को कदाचार अथवा असमर्थता के आधार पर राज्यपाल के आदेश से तभी हटाया जा सकता है, जब उच्चतम न्यायालय राज्यपाल के निर्देश पर जाँच कर यह प्रतिवेदन दे कि संबंधित अधिकारी को पद से हटाया जाना चाहिए।
- निम्न परिस्थितियों में राज्यपाल मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त को पद से हटा सकता है—
- दिवालिया घोषित होने पर।
- किसी आपराधिक मामले में दोषी सिद्ध होने पर।
- पद पर रहते हुए किसी अन्य लाभ के पद को स्वीकार करने पर।
- मानसिक अथवा शारीरिक अक्षमता के कारण अपने दायित्वों का निर्वहन करने में अयोग्य होने पर।
- आयोग अपनी वार्षिक रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करता है, जिसे बाद में राज्य विधानमण्डल के समक्ष रखा जाता है।
❖ अपीलीय शक्तियाँ
➤ धारा 19(1) – प्रथम अपील
- यदि किसी व्यक्ति को निर्धारित अवधि में सूचना प्राप्त नहीं होती अथवा वह राज्य लोक सूचना अधिकारी के निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तो वह निर्धारित अवधि समाप्त होने अथवा सूचना प्राप्त होने की तिथि से 30 दिन के भीतर राज्य लोक सूचना अधिकारी से वरिष्ठ अधिकारी के समक्ष प्रथम अपील कर सकता है।
➤ धारा 19(3) – द्वितीय अपील
- प्रथम अपील के निर्णय के विरुद्ध 90 दिन के भीतर राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील की जा सकती है।
- धारा 19(7) के अनुसार राज्य सूचना आयोग का निर्णय अंतिम एवं बाध्यकारी होता है।
- अपील का निस्तारण करते समय यदि आयोग के संबंधित सूचना आयुक्त को यह प्रतीत हो कि—
- सूचना आवेदन स्वीकार करने से इंकार किया गया है।
- निर्धारित समय-सीमा में सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई है।
- जानबूझकर अधूरी, भ्रामक अथवा झूठी सूचना दी गई है।
- सूचना से संबंधित अभिलेख अथवा विषय-वस्तु को नष्ट कर दिया गया है।
- ऐसी स्थिति में संबंधित लोक सूचना अधिकारी पर आवेदन प्राप्त होने की तिथि से सूचना उपलब्ध कराने तक ₹250 प्रतिदिन की दर से, अधिकतम ₹25,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
❖ राजस्थान राज्य सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त
| क्रम | मुख्य सूचना आयुक्त | कार्यकाल |
|---|---|---|
| 1 | एम. डी. कौरानी | 18 अप्रैल 2006 से 18 अप्रैल 2011 |
| 2 | टी. श्रीनिवासन | सितम्बर 2011 से अगस्त 2015 |
| 3 | सुरेश कुमार चौधरी | नवम्बर 2015 से दिसम्बर 2018 |
| 4 | देवेन्द्र भूषण गुप्ता | दिसम्बर 2020 से दिसम्बर 2023 |
| 5 | मोहन लाल लाठर | 9 जुलाई 2024 से लगातार |
❖ महत्वपूर्ण तथ्य
- राजस्थान सम्पर्क पोर्टल का शुभारम्भ वर्ष 2014 में आमजन की शिकायतों के पंजीकरण एवं उनके त्वरित निस्तारण के उद्देश्य से किया गया।
- सभी सरकारी योजनाओं की जानकारी एक ही मंच पर उपलब्ध कराने के लिए 18 दिसम्बर 2020 को जनकल्याण पोर्टल (Public Welfare Portal) का शुभारम्भ किया गया।
- RTI पोर्टल 2.0 का शुभारम्भ राजस्थान राज्य सूचना आयोग द्वारा किया गया।
