❖ मुख्यमंत्री एवं मंत्रीपरिषद्
- राज्य में संवैधानिक रूप से प्रमुख राज्यपाल माना जाता है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर वास्तविक शक्ति का संचालन मुख्यमंत्री करता है, जो सरकार का प्रमुख होता है।
❖ अनुच्छेद 164 – मुख्यमंत्री पद का प्रावधान
➤ अनुच्छेद 164 (1) के अनुसार राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, जबकि अन्य मंत्रियों का चयन मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल करता है।
- सभी मंत्री अपना कार्यकाल राज्यपाल की इच्छा (प्रसादपर्यंत) तक जारी रखते हैं।
- सामान्य स्थिति में राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त करता है।
- यदि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिले तो राज्यपाल अपने विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकता है।
- ऐसी स्थिति में नए मुख्यमंत्री को लगभग 1 महीने के भीतर विधानसभा में विश्वास मत साबित करना होता है।
- मुख्यमंत्री का सामान्य कार्यकाल लगभग 5 वर्ष माना जाता है।
- उसका पद तब तक सुरक्षित रहता है जब तक उसे विधानसभा में बहुमत का समर्थन (प्रसादपर्यंत स्थिति) प्राप्त रहता है।
- “प्रसादपर्यंत” का तात्पर्य यहाँ विधानसभा में पूर्ण बहुमत की स्थिति से है।
- यदि बहुमत समाप्त हो जाए तो मुख्यमंत्री को स्वेच्छा से त्यागपत्र देना पड़ता है, जो राज्यपाल को दिया जाता है।
- एक मुख्यमंत्री का त्यागपत्र पूरे मंत्रिपरिषद के सामूहिक इस्तीफे के समान माना जाता है।
- विधानसभा यदि अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे तो मुख्यमंत्री को पद छोड़ना पड़ता है।
➤ अनुच्छेद 164 (2) में स्पष्ट है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
➤ अनुच्छेद 164 (3) के तहत मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों को शपथ राज्यपाल द्वारा दिलाई जाती है, जिसका प्रारूप अनुसूची 3 में निर्धारित है।
➤ अनुच्छेद 164 (4) के अनुसार मुख्यमंत्री बनने के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष निर्धारित की गई है।
- मुख्यमंत्री के लिए अलग से कोई विशेष योग्यता नहीं होती, उसकी योग्यता वही होती है जो विधानसभा सदस्य बनने के लिए आवश्यक है।
- यदि कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बन जाता है लेकिन विधायक नहीं है, तो उसे 6 महीने के भीतर किसी भी सदन की सदस्यता प्राप्त करनी अनिवार्य होती है।
नोट – अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति चुनाव में केवल लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा के निर्वाचित सदस्य ही मतदान कर सकते हैं।
- यदि कोई मुख्यमंत्री विधानपरिषद का सदस्य या मनोनीत सदस्य है तो वह इस प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकता।
➤ अनुच्छेद 164 (5) के अनुसार मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों के वेतन और भत्तों का निर्धारण राज्य विधानमंडल द्वारा किया जाता है।
- वर्तमान में मुख्यमंत्री का मासिक वेतन लगभग 75,000 रुपये है।
➤ अनुच्छेद 166 राज्य सरकार की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक कार्यों के संचालन से संबंधित है।
❖ मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियाँ
➤ अनुच्छेद 167 के अनुसार मुख्यमंत्री का प्रमुख कर्तव्य राज्यपाल को आवश्यक सूचनाएँ उपलब्ध कराना है।
- मुख्यमंत्री कैबिनेट के निर्णयों एवं प्रशासनिक नीतियों की जानकारी समय-समय पर राज्यपाल तक पहुँचाता है।
- वह राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच मुख्य संचार कड़ी के रूप में कार्य करता है।
- मंत्रिपरिषद की बैठकों की तारीख, समय और स्थान का निर्धारण मुख्यमंत्री करता है।
- किसी भी मंत्री की नियुक्ति मुख्यमंत्री की स्वीकृति के बिना संभव नहीं होती।
- सभी विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने की जिम्मेदारी भी मुख्यमंत्री की होती है।
★ मुख्यमंत्री निम्न संस्थाओं का अध्यक्ष/सदस्य होता है—
- राज्य आयोजना बोर्ड का प्रमुख अध्यक्ष
- राज्य पर्यटन सलाहकार समिति का अध्यक्ष
- राजस्थान आर्थिक परिवर्तन सलाहकार परिषद का अध्यक्ष
- मुख्यमंत्री सलाहकार समिति का अध्यक्ष
- अंतर्राज्यीय परिषद, नीति आयोग की कार्यकारी परिषद और राष्ट्रीय विकास परिषद का सदस्य
❖ राजस्थान में उप मुख्यमंत्री
- संविधान में उप मुख्यमंत्री पद का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।
राजस्थान में अब तक निम्न उप मुख्यमंत्री रहे हैं—
| क्रम | नाम | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| 1 | श्री टीकाराम पालीवाल | राजस्थान के प्रथम उप मुख्यमंत्री |
| 2 | श्री हरिशंकर भाभड़ा | उप मुख्यमंत्री के रूप में सर्वाधिक कार्यकाल; पूर्व में विधानसभा अध्यक्ष भी रहे |
| 3 | श्री बनवारीलाल बैरवा | उप मुख्यमंत्री रहे |
| 4 | श्रीमती कमला बेनीवाल | राजस्थान की प्रथम महिला उप मुख्यमंत्री |
| 5 | श्री सचिन पायलट | उप मुख्यमंत्री (2018–2020) |
| 6 | सुश्री दिया कुमारी | वर्तमान उप मुख्यमंत्री; राजस्थान की दूसरी महिला उप मुख्यमंत्री |
| 7 | श्री प्रेमचंद बैरवा | वर्तमान उप मुख्यमंत्री |
❖ राज्य मंत्रिपरिषद
➤ अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को सहायता और परामर्श देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रमुख मुख्यमंत्री होता है।
➤ अनुच्छेद 164 (1) के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है।
- मंत्री अपने पद पर राज्यपाल के प्रसादपर्यंत बने रहते हैं।
- यदि कोई मंत्री विधानमंडल का सदस्य नहीं है, तो उसे 6 माह के भीतर सदस्यता प्राप्त करना आवश्यक होता है।
➤ अनुच्छेद 164 (1क) के अनुसार किसी राज्य की मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या विधानसभा सदस्यों की कुल संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती तथा न्यूनतम संख्या 12 (11+1) से कम नहीं होगी।
- यह प्रावधान 91वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 (लागू 1 जनवरी 2004) के माध्यम से जोड़ा गया था।
- राजस्थान विधानसभा में कुल 200 सदस्य हैं, इसलिए यहाँ मंत्रियों की अधिकतम संख्या 30 (29+1) तथा न्यूनतम संख्या 12 होती है।
- यदि किसी राज्य में मंत्रियों की संख्या निर्धारित सीमा से अधिक हो जाती है तो 6 माह के भीतर उसे अनुरूप किया जाना आवश्यक है।
❖ मंत्रियों की श्रेणियाँ
➤ मंत्रिपरिषद में सामान्यतः तीन प्रकार के मंत्री होते हैं—
(1) कैबिनेट मंत्री
- ये राज्य सरकार के महत्वपूर्ण विभागों के प्रमुख होते हैं।
जैसे— गृह विभाग, वित्त विभाग, कृषि विभाग।
- राज्य सरकार के किसी विभाग के राजनीतिक प्रमुख के रूप में कार्य करते हैं।
(2) राज्य मंत्री
- इन्हें स्वतंत्र प्रभार दिया जा सकता है या कैबिनेट मंत्री के अधीन विभाग सौंपा जाता है।
- स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री अपने विभाग के कार्यों का संचालन मुख्यमंत्री की स्वीकृति से कर सकते हैं।
(3) उपमंत्री
- इन्हें किसी भी विभाग का स्वतंत्र प्रभार नहीं दिया जाता।
- ये कैबिनेट मंत्री एवं राज्य मंत्रियों की सहायता करते हैं।
❖ संसदीय सचिव
- राजस्थान में संसदीय सचिव एवं राज्य मंत्रियों की परंपरा की शुरुआत वर्ष 1967 में चौथी विधानसभा के दौरान मुख्यमंत्री श्री मोहनलाल सुखाड़िया के कार्यकाल में हुई थी।
- इनकी नियुक्ति मुख्यमंत्री द्वारा की जाती है।
- शपथ भी इन्हें मुख्यमंत्री द्वारा दिलाई जाती है।
- इनकी नियुक्ति राज्य के विधायकों में से ही की जाती है और उद्देश्य मंत्रियों को प्रशासनिक कार्यों में सहायता प्रदान करना होता है।
