❖ चौहान वंश
- 7वीं से 12वीं शताब्दी के काल को सामान्यतः राजपूत युग कहा जाता है।
- चौहान शासकों ने अपनी पहली राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) को बनाया। इसके बाद क्रमशः सांभर तथा अजमेर को राजधानी के रूप में विकसित किया।
❖ चौहान वंश की उत्पत्ति के प्रमुख मत
| क्रमांक | मत (सिद्धांत) | विवरण / प्रमुख समर्थक |
|---|---|---|
| 1. | अग्निकुंड मत | चंदबरदाई द्वारा रचित ‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार वशिष्ठ ऋषि ने अग्निकुंड से चार वीर योद्धाओं—गुर्जर प्रतिहार, परमार, चालुक्य (सोलंकी) तथा चौहान (चाहमान)—की उत्पत्ति की। इस मत का समर्थन मुहणौत नैणसी एवं सूर्यमल्ल मिश्रण ने किया। |
| 2. | सूर्यवंशी मत | ‘पृथ्वीराज विजय’, ‘हम्मीर महाकाव्य’, ‘हम्मीर रासो’ तथा पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार चौहान सूर्यवंशी थे। |
| 3. | चंद्रवंशी मत | हाँसी शिलालेख तथा अचलेश्वर मंदिर के अभिलेख में चौहानों को चंद्रवंशी माना गया है। |
| 4. | इंद्र के वंशज मत | रायपाल के सेवाड़ी (पाली) अभिलेख के अनुसार चौहान इंद्र के वंशज थे। |
| 5. | विदेशी मत | कर्नल जेम्स टॉड तथा विलियम कुक ने चौहानों को शक-सिथियन मूल का माना। डी. ए. स्मिथ ने इन्हें हूणों का वंशज बताया। अलेक्जेन्डर कनिंघम ने ब्रोचगुर्जर ताम्रपत्र (678 ई.) के आधार पर चौहानों को कुषाण (यू-ची) मूल का माना। |
| 6. | वैदिक आर्यों की संतान (विशुद्ध भारतीय) मत | सी. वी. वैद्य तथा गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार चौहान वैदिक आर्यों की संतान एवं विशुद्ध भारतीय थे। |
| 7. | ब्राह्मण मत | गोपीनाथ शर्मा ने बिजौलिया शिलालेख के आधार पर चौहानों को वत्स गोत्र का ब्राह्मण माना। डॉ. दशरथ शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘अर्ली चौहान डायनेस्टी’, डी. आर. भंडारकर तथा जान कवि द्वारा रचित ‘कायम खाँ रासो’ के आधार पर भी इस मत का समर्थन किया। |
❖ सांभर / अजमेर के चौहान
- चौहानों का मूल निवास क्षेत्र सपादलक्ष माना जाता है, जो सांभर के आसपास स्थित था।
- इसी कारण इन्हें शाकम्भरी (सांभर) के चौहान (चाहमान) कहा गया।
❖ वासुदेव चौहान (551 ईस्वी)
- वासुदेव चौहान को चौहान वंश का संस्थापक, आदि पुरुष तथा मूलपुरुष माना जाता है।
- बिजौलिया शिलालेख में इन्हें वत्स गोत्र का ब्राह्मण बताया गया है तथा उल्लेख मिलता है कि इन्होंने सांभर झील का निर्माण कराया।
- इन्होंने अहिच्छत्रपुर को अपनी राजधानी बनाया।
नोट — प्रारंभिक काल में चौहान गुर्जर प्रतिहारों के सामंत थे, लेकिन गुवक प्रथम ने उनकी अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर स्वतंत्रता स्थापित की।
❖ गुवक प्रथम
- गुवक प्रथम, दुर्लभराज का पुत्र था।
- यह प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय का सामंत था।
- इसके शासनकाल में हर्षनाथ मंदिर (सीकर) का निर्माण कराया गया।
नोट — हर्षनाथ जी चौहानों के इष्टदेव एवं आराध्य देव माने जाते हैं।
❖ चंदनराज
- चंदनराज की पत्नी रुद्राणी प्रतिदिन पुष्कर झील में 1,000 दीपक प्रज्वलित कर महादेवजी की आराधना करती थीं।
❖ सिंहराज
- सिंहराज ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
❖ विग्रहराज द्वितीय
- प्रारंभिक चौहान शासकों में विग्रहराज द्वितीय को सबसे प्रतापी शासक माना जाता है।
- इन्होंने अहिलवाड़ा के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को पराजित किया।
- भड़ोच (गुजरात) में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता का मंदिर बनवाया।
❖ गोविन्दराज तृतीय
- पृथ्वीराज विजय में गोविन्दराज तृतीय को वैरीघट्ट (शत्रु संहारक) की उपाधि से संबोधित किया गया है।
- इन्होंने गजनी के शासकों को मारवाड़ की ओर आगे बढ़ने से रोक दिया।
- ❖ चामुंडराज
- ❖ दुर्लभराज तृतीय
- ❖ विग्रहराज तृतीय
❖ पृथ्वीराज प्रथम
- पृथ्वीराज प्रथम, अजयराज चौहान के पिता थे।
- पृथ्वीराज विजय ग्रंथ (रचयिता — जयानक) में उल्लेख मिलता है कि इन्होंने 700 चालुक्य सैनिकों का वध किया, जो पुष्कर में ब्राह्मणों को लूटने आए थे।
❖ अजयराज चौहान (1105–1133 ई)
- 1113 ईस्वी में इन्होंने अजयमेरू (अजमेर) नगर की स्थापना की तथा इसे अपनी राजधानी बनाया।
- इन्होंने अजयदेव एवं अजयप्रिय नाम से चाँदी के सिक्के जारी किए, जिनके कारण क्षेत्र में चाँदी की प्रचुरता का उल्लेख मिलता है।
- इनके सिक्कों पर इनकी रानी सोमलदेवी का नाम भी अंकित मिलता है।
❖ अर्णोराज / अनाजी (1133–1155 ई)
- इन्होंने तुर्क आक्रमणकारियों को पराजित कर क्षेत्र से बाहर खदेड़ा तथा मालवा के शासक नरवर्मन को भी हराया।
- इस क्षेत्र की शुद्धि हेतु हवन कराया गया तथा चंद्रा नदी का जल रोककर 1137 ईस्वी में आनासागर झील का निर्माण कराया।
- पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण भी इन्होंने करवाया।
- इनके दरबार में विद्वान देवबोध एवं धर्मघोष उपस्थित थे।
- इन्होंने परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की।
- आबू युद्ध में चालुक्य शासक कुमारपाल ने इन्हें पराजित किया, जिसका उल्लेख प्रबंध चिंतामणि (लेखक — मेरुतुंग) तथा प्रबंध कोष (लेखक — राजशेखर) में मिलता है।
- इन्होंने चालुक्य नरेश जयसिंह सिद्धराज की पुत्री कंचन देवी से विवाह किया।
- इनकी हत्या इनके पुत्र जगदेव चौहान द्वारा की गई, जिसके कारण इन्हें चौहानों का पितृहंता काल से भी जोड़ा जाता है।
- इनके चार पुत्र — जगदेव, विग्रहराज चतुर्थ, अपरगांगेय और सोमेश्वर — आगे चलकर शासक बने।
- बिजौलिया अभिलेख में सोमेश्वर की उपाधि प्रताप लंकेश्वर मिलती है।
❖ विग्रहराज चतुर्थ / बिसलदेव चौहान (1158–1163 ई)
- इन्होंने गजनी के शासक अमीर खुसरुशाह तथा दिल्ली के तोमर (तंवर) शासक को पराजित कर दिल्ली पर अधिकार स्थापित किया।
- वे दिल्ली पर अधिकार करने वाले प्रथम चौहान शासक थे।
- इनका शासनकाल चौहान वंश का स्वर्ण युग माना जाता है।
❖ प्रमुख ग्रंथ
- ललित विग्रहराज — यह ग्रंथ दरबारी कवि सोमदेव द्वारा रचित है, जिसमें विग्रहराज एवं देसलदेवी की प्रेम कथा का काल्पनिक वर्णन मिलता है।
- बिसलदेव रासो — यह ग्रंथ दरबारी कवि नरपति नाल्ह द्वारा लिखा गया, जिसमें बिसलदेव एवं राजमति की प्रेम कथा वर्णित है।
-
- इन्होंने संस्कृत में हरकेली नाटक की रचना की।
- इनके शासनकाल में दिल्ली शिवालिक स्तंभ अभिलेख (1163 ई) उत्कीर्ण हुआ, जिसमें उल्लेख है कि विग्रहराज चतुर्थ ने बार-बार म्लेच्छों को पराजित किया।
- इन्होंने अजमेर में संस्कृत शिक्षा हेतु सरस्वती कंठाभरण पाठशाला का निर्माण कराया, जिसे बाद में 1198 ई में कुतुबुद्दीन ऐबक ने ध्वस्त कर अढ़ाई दिन का झोपड़ा (मस्जिद) में परिवर्तित कर दिया।
- इसी स्थान पर आज भी पंजाब शाह पीर का अढ़ाई दिन का उर्स आयोजित होता है। यह राजस्थान की प्राचीनतम मस्जिदों में गिनी जाती है।
- विद्वानों एवं कवियों के संरक्षक होने के कारण इन्हें कविबांधव कहा जाता है, यह उपाधि जयानक भट्ट द्वारा दी गई थी।
- इन्होंने जाबालिपुर का नाम बदलकर ज्वालिपुर कर दिया।
- टोंक में बीसलपुर कस्बा एवं बीसलसागर बाँध का निर्माण कराया।
❖ पृथ्वीराज चौहान द्वितीय
- इनकी रानी सुहवदेवी ने मेनाल में सहुवेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया।
❖ पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1177–1192 ई)
- इनका जन्म 1166 ईस्वी में अहिलपाटन (गुजरात) में हुआ था।
- इनके पिता सोमेश्वर तथा माता कर्पूरी देवी थीं।
- इनके सेनाध्यक्ष भुवनमल्ल थे।
- इनके मुख्यमंत्री एवं परामर्श मंत्री कदमवास / कैमास थे।
- पृथ्वीराज चौहान तृतीय मात्र 11 वर्ष की आयु में शासक बने।
- इनके नाना अनंगपाल तोमर ने दिल्ली में लालकोट किला बनवाया था, जिसे बाद में पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने मोहम्मद गौरी से जीतकर इसका नाम पिथौरागढ़ रखा।
❖ पृथ्वीराज चौहान तृतीय – प्रमुख युद्ध एवं घटनाएँ
| घटना | वर्ष | विवरण |
|---|---|---|
| भंडारको का दमन | 1182 ई | मथुरा–भरतपुर क्षेत्र में पृथ्वीराज चौहान द्वारा भंडारकों का दमन किया गया। |
| महोबा विजय | 1182 ई | महोबा (उत्तर प्रदेश) के चंदेल शासक परमार्दिदेव के सेनापति आल्हा–उदल (भाई) को युद्ध में पराजित कर मार दिया गया। इसके बाद पंजुनराय कछवाह को महोबा का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया। |
| चालुक्यों पर विजय / संघर्ष | 1184 ई | गुजरात के चालुक्य और अजमेर के चौहानों के बीच लंबे समय से संघर्ष चला आ रहा था। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज ने आबू राजकुमारी इच्छिनी से विवाह किया, जिससे भीमदेव द्वितीय नाराज हुआ। इसके बाद नागौर युद्ध में भीमदेव द्वितीय के प्रधानमंत्री जगदेव प्रतिहार और पृथ्वीराज की सेना आमने-सामने हुए, बाद में संधि हो गई। |
| कन्नौज प्रकरण (संयोगिता विवाह) | — | कन्नौज (उत्तर प्रदेश) के शासक जयचंद गढ़वाल की पुत्री संयोगिता से पृथ्वीराज चौहान ने गंधर्व विवाह किया। |
| तराईन का प्रथम युद्ध | 1191 ई | यह युद्ध तराईन (वर्तमान करनाल, हरियाणा) में पृथ्वीराज चौहान तृतीय और मुहम्मद गोरी के बीच हुआ, जिसमें पृथ्वीराज चौहान विजयी रहे। दिल्ली के सामंत गोविंदराज ने युद्ध में मुहम्मद गोरी का दांत तोड़ दिया, जिसके बाद गोरी गजनी भाग गया, परंतु पृथ्वीराज ने उसकी सेना का पीछा नहीं किया। |
| तराईन का द्वितीय युद्ध | 1192 ई | इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान तृतीय और मुहम्मद गोरी के बीच संघर्ष हुआ जिसमें पृथ्वीराज की पराजय हुई। इसके बाद भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। पृथ्वीराज को सिरसा के पास बंदी बना लिया गया। पृथ्वीराज रासो के अनुसार मुहम्मद गोरी पृथ्वीराज को गजनी ले गया, जहाँ चंदबरदाई द्वारा दिए गए दोहे के आधार पर पृथ्वीराज ने शब्दभेदी बाण से गोरी का वध कर दिया। |
दोहा (पृथ्वीराज रासो अनुसार):
चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूकी चौहान
❖ महत्वपूर्ण बिन्दु – चौहान वंश एवं पृथ्वीराज चौहान
- मुहम्मद गौरी भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का आधार बनने वाला शासक माना जाता है।
- पृथ्वीराज चौहान को भारतीय इतिहास में अंतिम हिन्दू सम्राट के रूप में जाना जाता है।
- इन्होंने चारों दिशाओं में शत्रुओं का दमन कर दलपंगुल (विश्वविजेता) की उपाधि धारण की। इन्हें रायपिथौरा के नाम से भी जाना जाता है।
- पृथ्वीराज चौहान के दरबार में प्रमुख कवि एवं विद्वान चन्दबरदाई, जयानक, विद्यापति गौड़, वागीश्वर जनार्दन, आशाधर तथा विश्वरूप थे।
- पृथ्वीराज रासो ग्रंथ (भाषा — पिंगल) की रचना चन्दबरदाई ने की, जिसे बाद में उनके पुत्र जल्हण ने पूर्ण किया।
नोट — चन्दबरदाई का मूल नाम पृथ्वी भट्ट वल्लादी था।
- पृथ्वीराज विजय ग्रंथ (भाषा — संस्कृत) की रचना जयानक ने की।
- पृथ्वीराज चौहान के घोड़े का नाम नाट्यरम्भा था।
- इनके स्मृति स्थल के रूप में तारागढ़ (अजमेर) को जाना जाता है, तथा इनकी छतरी काबुल (अफगानिस्तान) में स्थित बताई जाती है।
❖ रणथम्भौर के चौहान
★ गोविंदराज चौहान (1194 ई)
- गोविंदराज चौहान पृथ्वीराज चौहान के पुत्र थे।
- कुतुबुद्दीन ऐबक ने इन्हें रणथम्भौर की जागीर प्रदान की।
- इन्हें रणथम्भौर चौहान वंश का संस्थापक माना जाता है।
❖ वीरनारायण
- इनके समय इल्तुतमिश से संघर्ष हुआ, जिसमें इनकी मृत्यु हो गई।
❖ वाग्भट्ट
- इन्होंने दिल्ली सल्तनत की रजिया सुल्तान के रणथम्भौर आक्रमण को असफल कर दिया।
❖ जैत्रसिंह
- इन्होंने नासीरुद्दीन के रणथम्भौर आक्रमण को विफल कर दिया।
❖ हम्मीर देव चौहान (1282–1301 ई)
- हम्मीर देव चौहान को रणथम्भौर के चौहान शासकों में सर्वाधिक प्रतापी एवं शक्तिशाली शासक माना जाता है।
- इन्होंने अपने विजय अभियानों के लिए कोटियजन यज्ञ का आयोजन करवाया, जो पंडित विश्वरूप की देखरेख में सम्पन्न हुआ।
- इन्होंने मेवाड़ के शासक समरसिंह को पराजित किया।
- 1290 ईस्वी में दिल्ली शासक जलालुद्दीन खिलजी ने झांई दुर्ग पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।
- झांई दुर्ग की रक्षा करते हुए गुरुदास सैनी वीरगति को प्राप्त हुए।
- 1291–1292 ईस्वी के बीच जलालुद्दीन खिलजी ने दो बार रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण किया, परंतु वह दुर्ग पर अधिकार नहीं कर सका।
- इस विफलता के बाद जलालुद्दीन ने कहा कि “ऐसे 10 दुर्गों को मैं मुसलमान के एक बाल के बराबर भी नहीं समझता”।
- इस पूरे अभियान का विवरण अमीर खुसरो की रचना मिफ्ता उल फुतूह तथा जियाउद्दीन बरनी की पुस्तक तारीख-ए-फिरोजशाही में मिलता है।
- हम्मीर देव चौहान ने कुल 17 युद्ध लड़े, जिनमें से 16 युद्धों में विजय प्राप्त की।
❖ अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारण
- हम्मीर देव चौहान ने अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मद शाह तथा उसके भाई केहब्रू को शरण दी।
- गुजरात अभियान के दौरान मुहम्मद शाह सारा धन लेकर हम्मीर देव के पास चला गया था।
- हम्मीर हठ के अनुसार, मुहम्मद शाह का अलाउद्दीन खिलजी की बेगम चिमना से प्रेम संबंध था और दोनों मिलकर अलाउद्दीन की हत्या की योजना बना रहे थे।
❖ अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण एवं युद्ध
- जब हम्मीर देव ने मुहम्मद शाह को वापस लौटाने से मना किया, तब अलाउद्दीन खिलजी ने उलग्गू खा एवं नुसरत खा के नेतृत्व में सेना भेजी।
- इस सेना ने सबसे पहले झांई दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
- इसके बाद हम्मीर देव चौहान ने अपने सेनापति भीमसिंह और धर्मसिंह को युद्ध हेतु भेजा।
- संघर्ष में धर्मसिंह रणथम्भौर लौट आया जबकि भीमसिंह युद्ध में मारा गया।
- हम्मीर देव ने भीमसिंह की मृत्यु के लिए धर्मसिंह को दोषी माना।
- इसके बाद धर्मसिंह को पद से हटाकर उसके भाई भोज को सेनापति बनाया गया, लेकिन बाद में भोज भी निष्कासित होकर अलाउद्दीन के पास चला गया और उसने रणथम्भौर पर आक्रमण के लिए प्रेरित किया।
- पुनः अलाउद्दीन ने उलग्गू खा और नुसरत खा के नेतृत्व में सेना भेजी।
- इस युद्ध में नुसरत खा मारा गया।
❖ अमीर खुसरो का विवरण एवं घेरा
- अमीर खुसरो (रचनाएँ — खजाइन उल फुतूह, तारीख-ए-अलाई) स्वयं इस अभियान में अलाउद्दीन की सेना के साथ उपस्थित था और उसने युद्ध का प्रत्यक्ष वर्णन किया है।
- अलाउद्दीन ने लगभग एक वर्ष तक रणथम्भौर दुर्ग का घेरा डाले रखा, जिससे किले में भोजन सामग्री की भारी कमी हो गई।
- अमीर खुसरो के अनुसार उस समय स्थिति ऐसी थी कि “सोने के दो दानों के बदले चावल का एक दाना भी नहीं मिल रहा था”।
- इस दौरान अलाउद्दीन ने हम्मीर देव के सेनापति रणमल और रतिपाल को लालच देकर अपने पक्ष में मिला लिया।
❖ साका – 11 जुलाई 1301
- हम्मीर देव चौहान की पत्नी रंगदेवी तथा पुत्री देवलदे ने रणथम्भौर दुर्ग के पदमला तालाब में कूदकर जौहर किया।
- इसके बाद हम्मीर देव चौहान ने केसरिया (शाका) किया।
- यह घटना राजस्थान का प्रथम साका तथा एकमात्र जल जौहर मानी जाती है।
- युद्ध में मुहम्मद शाह भी हम्मीर देव के पक्ष में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
- विजय के बाद अमीर खुसरो ने लिखा — “आज कुफ्र का घर इस्लाम का घर हो गया”।
- विजय के पश्चात अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर दुर्ग को उलग्गू खा को सौंप दिया।
❖ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
- हम्मीर देव के दरबार में कवि विजादित्य उपस्थित था।
- जैत्रसिंह के 32 वर्षों के शासन की स्मृति में हम्मीर देव ने रणथम्भौर दुर्ग में 32 खम्भों की छतरी बनवाई, जिसे न्याय की छतरी कहा जाता है।
➤ हम्मीर देव के बारे में प्रसिद्ध दोहा प्रचलित है—
“सिंह सवन सत्पुरुष वचन, कदली फलै एक बार
तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े ना दूजी बार”
❖ हम्मीर देव चौहान से संबंधित ग्रंथ एवं लेखक
| ग्रंथ | लेखक |
|---|---|
| हम्मीर महाकाव्य | नयन चन्द्र सूरी |
| हम्मीर रासो | शारंगधर (14वीं सदी, संस्कृत) |
| हम्मीर रासो | जोधराज (18वीं सदी, अहीरवाटी) |
| हम्मीर हठ | चंद्रशेखर |
| सुर्जन चरित्र | चंद्रशेखर |
| हम्मीर बंधन | अमृत कैलाश |
| हम्मीररायण | भांडऊ व्यास |
❖ नाडोल के चौहान
- शाकम्भरी के चौहानों के पश्चात यह प्रथम चौहान राज्य माना जाता है।
- इस शाखा की स्थापना लक्ष्मण चौहान ने 960 ईस्वी में की थी, जो शाकम्भरी नरेश वाक्पति राज के पुत्र थे।
- नाडोल शाखा के शासक कीर्तिपाल चौहान ने मेवाड़ के शासक सामंतसिंह को पराजित कर मेवाड़ को अपने अधीन कर लिया।
- बाद में नाडोल के चौहान का विलय जालौर के चौहानों में हो गया।
❖ जालौर के चौहान
- इस शाखा के संस्थापक कीर्तिपाल चौहान थे, जिन्होंने 1181 ईस्वी में इसकी स्थापना की।
- इन्होंने परमारों से जालौर छीनकर उस पर अधिकार स्थापित किया।
- प्राचीन शिलालेखों में जालौर का नाम जाबालिपुर तथा जालौर किला का नाम सुवर्णगिरी मिलता है।
- इस शाखा का नाम सोनगढ़ पर्वत के कारण सोनगरा चौहान पड़ा।
❖ चाचिगदेव
- चाचिगदेव, दिल्ली के सुल्तान नासीरुद्दीन महमूद तथा बलबन के समकालीन थे।
- इनके शासनकाल में किसी बड़े आक्रमण का उल्लेख नहीं मिलता।
❖ कान्हददेव चौहान (1305–1311 ई)
- कान्हददेव चौहान के बारे में जानकारी कान्हदड़े प्रबंध ग्रंथ (लेखक — पद्मनाभ, जो जालौर शासक अखयराज के दरबारी थे) में मिलती है।
- अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात अभियान के दौरान मार्ग देने की मांग की थी, जिसे अस्वीकार कर दिया गया।
- कान्हददेव के मुख्यमंत्री जैता देवड़ा ने अलाउद्दीन की सेना पर आक्रमण कर दिया।
- मुहणौत नैणसी के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी की पुत्री फिरोजा का विवाह कान्हददेव के पुत्र वीरमदेव से प्रस्तावित था, लेकिन वीरमदेव ने इसे स्वीकार नहीं किया।
❖ अलाउद्दीन खिलजी का सिवाणा अभियान (2 जुलाई 1308)
- इस अभियान का नेतृत्व सेनापति कमालुद्दीन गुर्ग ने किया।
- सिवाणा दुर्ग का सेनापति सातलदेव था, जो कान्हददेव का भतीजा था।
- देशद्रोही भावला पंवार ने किले के जल स्रोत में गोमांस मिलाकर उसे अपवित्र कर दिया।
- युद्ध में अलाउद्दीन की सेना के सेनानायक नाहरखा तथा भोज मारे गए।
- अंततः सातलदेव के नेतृत्व में केसरिया (शाका) किया गया तथा महिलाओं ने जौहर किया।
- विजय के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने सिवाणा दुर्ग का नाम बदलकर खैराबाद रखा और इसे कमालुद्दीन गुर्ग को सौंप दिया।
❖ जालौर अभियान (1311 ई)
- कान्हददेव के सेनापति दहिया बीका ने शत्रु सेना को जालौर दुर्ग तक पहुँचने का सुरक्षित मार्ग बता दिया।
- युद्ध में कान्हददेव और उनका पुत्र वीरमदेव सोनगरा वीरगति को प्राप्त हुए।
- रानी जैतलदेव के नेतृत्व में महिलाओं ने जौहर किया।
- विजय के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर दुर्ग का नाम बदलकर जलालाबाद रखा।
- इस युद्ध का वर्णन पद्मनाभ के ग्रंथ वीरमदेव सोनगरा री बात तथा हम्मीररायण में भी मिलता है।
नोट — कान्हददेव के भाई मालदेव सोनगरा ने अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार कर ली, जिसे बाद में चित्तौड़ किले का भार सौंपा गया।
❖ सिरोही के चौहान
- प्राचीन साहित्य में सिरोही को अर्बुद प्रदेश कहा गया है।
- कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार इसका प्राचीन नाम शिवपुरी था।
- सिरोही का एक पुराना नाम सरणवाही भी मिलता है।
- प्रारंभ में आबू क्षेत्र पर परमार वंश का शासन था, जिनके संस्थापक धूमराज थे तथा उनकी राजधानी चंद्रावती थी।
- बाद में सहसमल ने सिरोही नगर की स्थापना की।
❖ लुम्बा चौहान
- लुम्बा चौहान को सिरोही की देवड़ा शाखा का संस्थापक एवं आदि पुरुष माना जाता है।
- लगभग 1311 ईस्वी में इन्होंने आबू और चंद्रावती को परमारों से छीनकर देवड़ा शाखा की स्थापना की।
- देवड़ा चौहानों के कुलदेवता सारणेश्वर महादेव हैं।
❖ अखैराज देवड़ा
- इनका उपनाम उड़ना अखैराज था।
- इन्होंने 1527 ईस्वी के खानवा युद्ध में महाराणा सांगा का समर्थन किया।
❖ सुरतान देवड़ा
- इन्होंने अक्टूबर 1583 के दताणी युद्ध में महाराणा प्रताप के भाई जगमाल (जो अकबर का सेनापति था) को पराजित कर मार दिया।
❖ बूंदी के चौहान (हाड़ा शाखा)
- कुंभाकालीन लेख में बूंदी का नाम वृन्दावती मिलता है।
❖ देवीसिंह हाड़ा
- इन्होंने बूंदी के शासक जैता मीणा को पराजित कर बूंदी राज्य में हाड़ा चौहान वंश की स्थापना की।
❖ राव सुर्जन हाड़ा
- वर्ष 1569 ईस्वी में जब अकबर ने चित्तौड़गढ़ जीतकर रणथम्भौर को घेर लिया, तब राव सुर्जन हाड़ा ने अकबर से संधि कर ली।
- इस संधि के बाद अकबर ने उन्हें राव राजा की उपाधि प्रदान की तथा 5000 का मनसबदार बनाया।
- इनके अनुरोध पर कवि चन्द्रशेखर ने सुर्जन चरित्र ग्रंथ की रचना की।
❖ राव रतनसिंह हाड़ा
- जहांगीर ने इन्हें 5000 का मनसबदार नियुक्त किया।
- इनके न्यायप्रिय स्वभाव के कारण इन्हें रामराज तथा चित्रकला प्रेम के कारण सर बुलन्द राय की उपाधि दी गई।
❖ राव शत्रुसाल (छत्रसाल) हाड़ा
- इन्होंने केशोरायपाटन (बूंदी) में प्रसिद्ध केशवराय मंदिर का निर्माण कराया।
- बूंदी किले में रंगमहल का निर्माण भी इन्हीं के शासनकाल में हुआ।
❖ अनिरुद्ध हाड़ा
- इनके शासनकाल (लगभग 1683–1695 ई) में देवपुरा गाँव (बूंदी) में स्थित 84 खंभों की छतरी का निर्माण राव देवा द्वारा कराया गया।
- इनकी पत्नी नाथावती ने 1699 ईस्वी में रानी जी की बावड़ी (बूंदी) का निर्माण कराया, जो इनके पुत्र बुद्धसिंह के काल में पूर्ण हुई।
- इनके पुत्र जोधसिंह हाड़ा जैतसागर तालाब (बूंदी) में गणगौर उत्सव के दौरान रानियों एवं गणगौर प्रतिमा के साथ डूब गए, जिससे प्रसिद्ध कहावत प्रचलित हुई —
“हाड़ो ले डूब्यो गणगौर”
❖ राव बुद्धसिंह
- इन्होंने नेहतरंग ग्रंथ की रचना की।
- इनके शासनकाल में मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने बूंदी का नाम बदलकर फर्रुखाबाद रख दिया था।
- इनकी कच्छावा रानी अमर कुंवरी ने अपने पुत्र उमेद सिंह को राजा बनाने हेतु अपने राखीबंध भाई मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर को आमंत्रित किया।
- सवाई जयसिंह ने दलेल सिंह को बूंदी का शासक नियुक्त किया।
- 18 अप्रैल 1734 ईस्वी को राजस्थान में सर्वप्रथम मराठों का प्रवेश बूंदी से हुआ।
❖ उम्मेद सिंह
- इनके पास प्रसिद्ध घोड़ा हुंजा था।
- इन्होंने तारागढ़ किला (बूंदी) में प्रसिद्ध चित्रशाला का निर्माण कराया।
❖ विष्णु सिंह
- वर्ष 1818 ईस्वी में इन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि की।
❖ बहादुर सिंह
- ये बूंदी रियासत के अंतिम शासक थे।
❖ कोटा के चौहान (हाड़ा शाखा)
- कोटा का नाम कोटिया भील के नाम पर पड़ा माना जाता है।
- प्राचीन काल में कोटा का नाम नंदग्राम था।
- प्रारंभ में कोटा, बूंदी रियासत का ही भाग था, जहाँ हाड़ा चौहान शाखा का शासन था।
- वर्ष 1631 ईस्वी में मुगल बादशाह शाहजहां ने बूंदी नरेश रतनसिंह के पुत्र माधोसिंह (कोटा के संस्थापक) को कोटा प्रदान किया।
❖ मांगरोल का युद्ध (1821 ई)
- यह युद्ध कोटा महाराव किशोरसिंह द्वितीय तथा झाला जालिम सिंह (कोटा के फौजदार/प्रशासक) के बीच प्रशासनिक अधिकारों को लेकर बारां के पास मांगरोल में हुआ।
- इस युद्ध में अंग्रेजों ने झाला जालिम सिंह का समर्थन किया।
- युद्ध के बाद झाला जालिम सिंह कोटा प्रशासन के वास्तविक नियंत्रक बन गए।
- वर्ष 1838 ईस्वी में झाला मदन सिंह (जालिम सिंह के पोते) को अंग्रेजों ने कोटा रियासत के 17 परगने देकर झालावाड़ रियासत की स्थापना की, जिसकी राजधानी झालरापाटन रखी गई।
❖ महत्वपूर्ण नोट – अंग्रेजों द्वारा स्थापित राजस्थान की अंतिम रियासत झालावाड़ थी।
