राजस्थान का भौतिक विभाजन

इस भाग में क्या पढ़ेंगे

❖ राजस्थान – भौतिक विभाजन

  • प्रागैतिहासिक (पाषाण काल) में सम्पूर्ण विश्व एक ही विशाल भू-भाग के रूप में विद्यमान था, जिसे पेंजिया (Pangaea) कहा जाता था। इसके चारों ओर पैंथालासा सागर (Panthalassa Sea) फैला हुआ था।
  • समय के साथ पेंजिया दो प्रमुख भागों में विभाजित हो गया—
    • अंगारा लैण्ड — उत्तरी भाग
    • गोंडवाना लैण्ड — दक्षिणी भाग
  • इन दोनों भू-भागों के बीच टेथिस सागर स्थित था।
  • राजस्थान में गोंडवाना लैण्ड तथा टेथिस सागर के अवशेष प्राप्त होते हैं।

राजस्थान का सर्वप्रथम भौतिक प्रदेशों के आधार पर वर्गीकरण डॉ. वी. सी. मिश्रा ने अपनी पुस्तक ‘राजस्थान का भूगोल’ में किया। उन्होंने राज्य को निम्न 7 भौतिक प्रदेशों में विभाजित किया—

  • पश्चिमी शुष्क प्रदेश
  • अर्द्धशुष्क प्रदेश
  • नहरी प्रदेश
  • अरावली प्रदेश
  • पूर्वी कृषि-औद्योगिक प्रदेश
  • दक्षिण-पूर्वी कृषि प्रदेश
  • चम्बल बीहड़ प्रदेश

हरिमोहन सक्सेना ने अपनी पुस्तक ‘राजस्थान का भूगोल’ में राजस्थान को निम्न 4 भौतिक प्रदेशों में विभाजित किया—

  • पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश
  • अरावली पर्वतीय प्रदेश
  • पूर्वी मैदानी प्रदेश
  • दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश
विशेषता पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश अरावली पर्वतीय प्रदेश पूर्वी मैदानी प्रदेश दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश
बनने का क्रम चौथा प्राचीन सबसे प्राचीन तीसरा प्राचीन दूसरा प्राचीन
भूवैज्ञानिक युग प्लीस्टोसीन (उत्तर) प्री-कैम्ब्रियन प्लीस्टोसीन (प्रारम्भिक) क्रिटेशियस
क्षेत्रफल 61.11% 9% 23% 6.89%
जनसंख्या 40% 10% 39% 11%
भारत के भौतिक प्रदेश का भाग उत्तर भारत का विशाल मैदान प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश उत्तर भारत का विशाल मैदान प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश
प्रमुख अवशेष टेथिस सागर गोंडवाना लैण्ड टेथिस सागर गोंडवाना लैण्ड
औसत वर्षा 0–40 सेमी 40–60 सेमी 60–80 सेमी 80–120 सेमी

❖ (1) पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश

  • लगभग 7000 वर्ष पूर्व, अर्थात प्लीस्टोसीन हिमयुग के दौरान, वर्तमान राजस्थान के इस भाग में घने वन पाए जाते थे, किन्तु वर्तमान में यह क्षेत्र थार मरुस्थल के रूप में विकसित हो चुका है।
  • थार मरुस्थल का सर्वाधिक विस्तार भारत में पाया जाता है। इसका विस्तार पंजाब, हरियाणा, राजस्थान तथा गुजरात तक है।
  • सम्पूर्ण थार मरुस्थल का लगभग 62% भाग केवल राजस्थान में स्थित है।

राजस्थान के 16 मरुस्थलीय जिले निम्नलिखित हैं—

    • गंगानगर
    • हनुमानगढ़
    • बीकानेर
    • चूरू
    • झुंझुनूं
    • सीकर
    • जैसलमेर
    • जोधपुर
    • फलौदी
    • बाड़मेर
    • बालोतरा
    • ब्यावर
    • पाली
    • नागौर
    • डीडवाना-कुचामन
    • जालौर
  • अरावली पर्वतमाला के पश्चिम में कुल 17 जिले स्थित हैं।
  • सिरोही जिला अरावली के पश्चिम में स्थित होने के बावजूद मरुस्थलीय क्षेत्र में शामिल नहीं किया जाता।
  • थार मरुस्थल का विस्तार निरंतर पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर बढ़ रहा है।
  • राजस्थान का लगभग 61.11% (लगभग दो-तिहाई) भू-भाग मरुस्थलीय है, जिसका विस्तार लगभग 1,75,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।
  • पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश का सामान्य ढाल उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर है।
  • इस प्रदेश के उत्तर-पूर्वी भाग की समुद्र तल से औसत ऊँचाई लगभग 300 मीटर है, जबकि दक्षिणी भाग की औसत ऊँचाई लगभग 150 मीटर है। इसलिए थार मरुस्थल का दक्षिणी भाग समुद्र तल से सबसे कम ऊँचाई वाला क्षेत्र माना जाता है।
  • पिछले एक दशक में सर्वाधिक उल्का पिंड थार मरुस्थल में गिरे हैं।
  • थार मरुस्थल को विश्व का सबसे घनी आबादी, सर्वाधिक जनसंख्या तथा समृद्ध जैव विविधता वाला मरुस्थल माना जाता है।
  • यह ग्रेट पेलियो आर्कटिक अफ्रीकी मरुस्थल का पूर्वी भाग है।
  • इस क्षेत्र में मुख्यतः अवसादी चट्टानें पाई जाती हैं, जिनमें कोयला तथा पेट्रोलियम के भंडार मिलते हैं।
  • पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश में राजस्थान का सर्वाधिक दैनिक तापांतर दर्ज किया जाता है।
  • डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने इस मरुस्थलीय क्षेत्र को रूक्ष क्षेत्र कहा है, जबकि चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसे गुर्जरत्रा के नाम से उल्लेखित किया।
  • मरुस्थल का निरंतर आगे बढ़ना मरुस्थलीकरण अथवा रेगिस्तान का मार्च कहलाता है। इस प्रक्रिया के अध्ययन के लिए जैसलमेर का नाचना गाँव प्रसिद्ध है।
  • 50 सेमी वर्षा रेखा राजस्थान को लगभग दो समान भागों में विभाजित करती है। यही रेखा मरुस्थलीय प्रदेश की पूर्वी सीमा तथा अरावली पर्वतमाला की पश्चिमी सीमा का निर्धारण भी करती है।

❖ पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश के उपभाग

पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश को दो भागों में विभाजित किया गया है—

  1. शुष्क मरुस्थलीय प्रदेश
  2. अर्द्धशुष्क मरुस्थलीय प्रदेश
❖ (1) शुष्क मरुस्थलीय प्रदेश

इस प्रदेश में निम्न जिले शामिल हैं—

    • बीकानेर
    • जैसलमेर
    • फलौदी
    • बाड़मेर
    • बालोतरा
  • यहाँ की औसत वार्षिक वर्षा 0–25 सेमी के बीच रहती है।
  • सम (जैसलमेर) इस क्षेत्र का वनस्पति रहित तथा न्यूनतम वर्षा वाला स्थान माना जाता है।

❖ लाठी सीरीज

  • जैसलमेर में पोकरण से मोहनगढ़ तक लगभग 80 किलोमीटर लंबी भूमिगत मीठे पानी की जलधारा पाई जाती है, जिसे लाठी सीरीज कहा जाता है।
  • इसकी खोज वर्ष 2007 में काजरी के वैज्ञानिकों द्वारा की गई थी।
  • लाठी सीरीज को भूगर्भिक जलपट्टी के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस क्षेत्र में सेवन, धामण तथा करड़ जैसी स्वादिष्ट घासें पाई जाती हैं।

❖ चंदन नलकूप

  • जैसलमेर में लाठी सीरीज के समीप स्थित चंदन नलकूप से मीठा पानी प्राप्त होता है।
  • इसे थार का घड़ा कहा जाता है।

❖ जुरासिक युग की चट्टानें

  • जैसलमेर तथा बाड़मेर में जुरासिक युग की चट्टानें प्राप्त हुई हैं। आकल वुड फॉसिल्स पार्क इसका प्रमुख उदाहरण है।

❖ आकल (नेशनल वुड फॉसिल्स पार्क)

  • जैसलमेर स्थित आकल (नेशनल वुड फॉसिल्स पार्क) में लगभग 18 करोड़ वर्ष पुराने काष्ठ जीवाश्म संरक्षित हैं।

❖ बाप बोल्डर

  • फलौदी के बाप क्षेत्र में परमियन कार्बोनिफेरस काल के हिमानीकृत गोलाश्म के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

❖ बालूका स्तूप मुक्त (Sandy Dunes Free Area) क्षेत्र

  • यह क्षेत्र फलौदी, पोकरण (जैसलमेर) तथा बालोतरा के मध्य विस्तृत है।
  • यह चट्टानी मरुस्थल अथवा टीला रहित क्षेत्र है, जिसे हम्मादा कहा जाता है।
  • पश्चिमी मरुस्थल का लगभग 41.50% भाग इसी श्रेणी में आता है।

❖ बालूका स्तूप युक्त क्षेत्र

  • पश्चिमी मरुस्थल का लगभग 58.50% भाग बालूका स्तूपों से आच्छादित है।
  • राजस्थान में सर्वाधिक बालूका स्तूप जैसलमेर जिले में पाए जाते हैं।
❖ (2) अर्द्धशुष्क मरुस्थलीय प्रदेश (राजस्थान बांगर)
  • अर्द्धशुष्क मरुस्थलीय प्रदेश को राजस्थान बांगर के नाम से भी जाना जाता है।

➤ इस प्रदेश में निम्न जिले सम्मिलित हैं—

  • गंगानगर
  • हनुमानगढ़
  • चूरू
  • झुंझुनूं
  • सीकर
  • डीडवाना-कुचामन
  • नागौर
  • जोधपुर
  • पाली
  • जालौर

इस क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा 25–50 सेमी के बीच होती है।

❖ घग्घर का मैदान

  • घग्घर का मैदान मुख्यतः गंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिलों में विस्तृत है।
  • इसका निर्माण घग्घर नदी द्वारा लाई गई उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी से हुआ है।
  • हनुमानगढ़ में घग्घर नदी के पाट को नाली कहा जाता है।

❖ शेखावाटी क्षेत्र

  • शेखावाटी क्षेत्र में चूरू, सीकर तथा झुंझुनूं जिले शामिल हैं।
  • इस क्षेत्र की भूमि के नीचे चूने (कैल्सियम) की परतें पाई जाती हैं। वर्षा का जल इन परतों में समा जाता है, इसलिए इसे आन्तरिक जल प्रवाही क्षेत्र कहा जाता है।
  • भूमिगत चूने की परतों के कारण यहाँ ग्रीष्म ऋतु में अत्यधिक गर्मी तथा शीत ऋतु में अधिक ठंड पड़ती है।
  • इस क्षेत्र की मिट्टी प्राचीन काल में नदियों द्वारा लाई गई थी, जो समय के साथ अनुपजाऊ हो गई।
  • नदियों द्वारा लाई गई ऐसी अनुपजाऊ मिट्टी को बांगर कहा जाता है। इसी कारण शेखावाटी क्षेत्र को बांगर प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

नोट – 

  • नदियों द्वारा लाई गई उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी को खादर कहा जाता है।
  • शेखावाटी में घास के मैदान अथवा पशु चारागाह को बीड़ कहा जाता है।
  • इस क्षेत्र की प्रमुख नदी कांतली नदी है।
  • कांतली नदी के प्रवाह क्षेत्र को तोरावाटी तथा इसके आसपास की पहाड़ियों को तोरावाटी की पहाड़ियाँ कहा जाता है।
  • वर्षा जल के संरक्षण के लिए बनाए जाने वाले कच्चे कुओं को जोहड़ कहा जाता है।

❖ नागौरी उच्च भूमि

  • शेखावाटी प्रदेश एवं लूणी बेसिन के मध्य स्थित नागौर तथा डीडवाना-कुचामन का ऊँचा भू-भाग नागौरी उच्च भूमि कहलाता है।
  • इसकी औसत ऊँचाई लगभग 300–500 मीटर है।
  • इस क्षेत्र में सांभर, डीडवाना तथा कुचामन जैसी सर्वाधिक खारे पानी की झीलें स्थित हैं।
  • नागौर एवं अजमेर के भूजल में फ्लोराइड की अधिकता के कारण फ्लोरोसिस रोग हो जाता है। इससे दाँत पीले पड़ना, पीठ झुक जाना तथा शरीर में कूबड़ जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
  • इसी कारण इस क्षेत्र को कुबड़ पट्टी, बांका पट्टी अथवा हॉच बेल्ट कहा जाता है।
  • जायल से पुष्कर तक का क्षेत्र फ्लोरोसिस से सर्वाधिक प्रभावित माना जाता है।

❖ गोड़वाड़ प्रदेश / लूणी बेसिन

  • पाली, बिलाड़ा (जोधपुर) तथा जालौर जिलों में विस्तृत क्षेत्र को गोड़वाड़ प्रदेश अथवा लूणी बेसिन कहा जाता है।
  • इसका निर्माण लूणी नदी एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा किए गए निक्षेपण से हुआ है।
  • इसे लूणी बेसिन या लूणी-जवाई बेसिन के नाम से भी जाना जाता है।

❖ छप्पन की पहाड़ियाँ

  • बालोतरा के मोकलसर गाँव से सिवाणा तक लगभग 11 किलोमीटर लंबी 56 पहाड़ियों का समूह छप्पन की पहाड़ियाँ कहलाता है।
  • इन पहाड़ियों में मुख्यतः ग्रेनाइट शैल पाई जाती है।
  • बालोतरा के नाकोड़ा पर्वत पर जैन धर्म का प्रसिद्ध पार्श्वनाथ मंदिर स्थित है, जिसे नाकोड़ा भैरव के नाम से जाना जाता है।
  • पीपलूद (बालोतरा) में स्थित हल्देश्वर महादेव मंदिर भी इन्हीं पहाड़ियों में अवस्थित है।
  • पीपलूद (बालोतरा) को रेगिस्तान का माउंट आबू अथवा राजस्थान का लघु माउंट आबू कहा जाता है।
  • सेदड़ा (ब्यावर) क्षेत्र अपनी सर्पाकार चट्टानों के लिए प्रसिद्ध है।

❖ मालाणी आग्नेय शैल-समूह

  • मालाणी आग्नेय शैल-समूह मुख्यतः सिवाणा (बालोतरा) तथा जालौर क्षेत्र में पाया जाता है।
  • यहाँ ग्रेनाइट तथा ज्वालामुखीय रायोलाइट्स चट्टानों का विकास हुआ है।
  • ये शैलें प्रायः गुम्बदाकार अथवा इन्सेलवर्ग के रूप में मिलती हैं। इन्सेलवर्ग से आशय मरुस्थलीय क्षेत्रों में मिलने वाली ढालदार एवं एकाकी खड़ी चट्टानों से है।
  • इन्हीं शैलों के कारण जालौर तथा सांचौर में ग्रेनाइट उद्योग का व्यापक विकास हुआ है।
  • आबू पर्वत का निर्माण भी मुख्यतः ग्रेनाइट शैलों से हुआ है।

❖ बालूका स्तूप

  • बालूका स्तूप रेत से निर्मित टीले होते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में धोरे भी कहा जाता है।
  • इनका निर्माण मुख्यतः मरुस्थलीय क्षेत्रों में मिट्टी के अपरदन एवं निक्षेपण की प्रक्रिया से होता है।
  • जैसलमेर में गतिशील धोरों को धरियन कहा जाता है।
❖ बालूका स्तूप के प्रकार
(1) पवन की गति के आधार पर

★ अनुदैर्ध्य / पवनानुवर्ती बालूका स्तूप

  • इनका निर्माण पवन की दिशा के समानांतर होता है।
  • इन्हें रेखीय बालूका स्तूप भी कहा जाता है।
  • ये मुख्यतः हृषभति नदी घाटी में पाए जाते हैं।
  • इनका सर्वाधिक विस्तार जैसलमेर एवं बाड़मेर जिलों में है।

★ अनुप्रस्थ बालूका स्तूप

  • इनका निर्माण पवन की दिशा के समकोण (लम्बवत) होता है।
  • ये पूगल (बीकानेर), सूरतगढ़ (गंगानगर), चूरू तथा झुंझुनूं जिलों में पाए जाते हैं।

★ अवरोधी बालूका स्तूप

  • इनका निर्माण किसी झाड़ी, वृक्ष अथवा पहाड़ी जैसे प्राकृतिक अवरोध के कारण होता है।
  • ये मुख्यतः पुष्कर तथा नाग पहाड़ क्षेत्र में मिलते हैं।

★ बरखान (अर्द्धचन्द्राकार) बालूका स्तूप

  • बरखान सबसे अधिक गतिशील बालूका स्तूप होते हैं, इसलिए मरुस्थलीकरण के लिए इन्हें सर्वाधिक उत्तरदायी माना जाता है।
  • इनका पवनामुखी ढाल मंद तथा पवनविमुखी ढाल तीव्र होता है।
  • ये भालेरी (चूरू), सीकर, लूणकरणसर (बीकानेर), ओसियां (जोधपुर) तथा डीडवाना-कुचामन क्षेत्र में पाए जाते हैं।
(2) आकृति के आधार पर

★ सीफ (Seif)

  • सीफ एक अनुदैर्ध्य बालूका स्तूप है।
  • इसका विकास पवन की दिशा के समानांतर होता है।

★ पैराबोलिक (परवलयाकार) बालूका स्तूप

  • इन बालूका स्तूपों का निर्माण हवा की दिशा के विपरीत होता है तथा इनका आकार अंग्रेज़ी के U अक्षर जैसा होता है।
  • राजस्थान में सर्वाधिक पैराबोलिक बालूका स्तूप पाए जाते हैं।

★ तारा बालूका स्तूप

  • इनका निर्माण उन क्षेत्रों में होता है जहाँ हवा बार-बार अपनी दिशा बदलती रहती है।
  • ये मुख्यतः मोहनगढ़, पोकरण (जैसलमेर) तथा सूरतगढ़ (गंगानगर) में पाए जाते हैं।

★ शब्रकाफिज

  • इस प्रकार के बालूका स्तूप मरुस्थलीय क्षेत्रों में छोटी झाड़ियों के आसपास विकसित होते हैं।
❖ महत्वपूर्ण शब्दावली –

★ इर्ग (Erg)

  • ऐसा रेतीला मरुस्थल, जहाँ चारों ओर केवल रेत ही रेत फैली हो, इर्ग कहलाता है।
  • इसे महान मरुस्थल भी कहा जाता है।
  • राजस्थान में इसका सर्वाधिक विस्तार जैसलमेर में है।

★ हम्मादा (Hammada)

  • पथरीले मरुस्थल, जहाँ छोटी-छोटी पहाड़ियाँ एवं चट्टानें पाई जाती हैं, हम्मादा कहलाते हैं।
  • पोकरण, फलौदी एवं बालोतरा के मध्य स्थित बालूका स्तूप मुक्त क्षेत्र इसका प्रमुख उदाहरण है।

★ रैग (Reg)

  • जिस मरुस्थल में रेत, कंकड़ तथा पत्थर मिश्रित रूप में पाए जाते हैं, उसे रैग कहा जाता है।

★ प्लाया (Playa)

  • मरुस्थलीय क्षेत्रों की बड़ी खारे पानी की झीलों को प्लाया कहा जाता है।
  • थार मरुस्थल में वर्षा का जल भरने के बाद भूमि में उपस्थित लवणों के कारण इन झीलों का जल खारा हो जाता है।

★ रन / टाट

  • बालूका स्तूपों के बीच वर्षा जल के एकत्र होने से बनने वाले लवणीय दलदली क्षेत्र को रन अथवा टाट कहा जाता है।
  • राजस्थान में ऐसे क्षेत्रों का सर्वाधिक विस्तार जैसलमेर में है।

★ तल्ली / पोखर

  • मरुस्थल के प्राकृतिक गड्ढों में एकत्र होने वाले वर्षा के मीठे जल को तल्ली अथवा पोखर कहा जाता है।

★ मरहो

  • तल्ली या पोखर का जल सूख जाने के बाद जो उपजाऊ मिट्टी बचती है, उसे मरहो कहा जाता है।
  • इस मिट्टी में की जाने वाली कृषि को खडीन कृषि कहा जाता है।
  • खडीन कृषि की शुरुआत पालीवालों ने जैसलमेर में की थी।

★ बालसन

  • पर्वतों अथवा चट्टानों के मध्य जल के एकत्र होने से बनने वाली झीलों को बालसन कहा जाता है।

★ रोही मैदान

  • मरुस्थलीय क्षेत्र की उपजाऊ भूमि को रोही मैदान कहा जाता है।

★ भभुल्या

  • मरुस्थल में बनने वाले वायु भंवर अथवा चक्रवात को भभुल्या कहा जाता है।

★ थली

  • बीकानेर, गंगानगर तथा चूरू का वह ऊँचा भू-भाग, जो लूणी नदी के उत्तर में स्थित है, थली कहलाता है।

★ तली

  • मरुस्थल के दक्षिण-पश्चिमी निम्न भू-भाग को तली कहा जाता है।

★ पीवणा

  • राष्ट्रीय मरु उद्यान (जैसलमेर) में पाया जाने वाला पीवणा एक विषैला साँप है।
  • यह डंक मारने के बजाय सोए हुए व्यक्ति की श्वास के साथ विष पहुँचाने के लिए प्रसिद्ध माना जाता है।

★ ढांड

  • बालूका स्तूपों पर वायु के घर्षण से बनने वाले गर्तों को ढांड कहा जाता है।

❖ (2) अरावली पर्वतीय प्रदेश

  • अरावली पर्वतमाला का विस्तार पालनपुर (गुजरात) से रायसीना की पहाड़ी (दिल्ली) तक लगभग 692 किलोमीटर है।
  • राजस्थान में इसका विस्तार खेडब्रह्मा (गुजरात) से खेतड़ी (झुंझुनूं) तक लगभग 550 किलोमीटर लंबा है।
  • अरावली पर्वतमाला का लगभग 80% भाग राजस्थान में स्थित है।
  • इसकी औसत ऊँचाई लगभग 930 मीटर है।
  • अरावली पर्वतमाला राजस्थान को पूर्वी राजस्थान तथा पश्चिमी राजस्थान—इन दो प्राकृतिक भागों में विभाजित करती है।

अरावली का मुख्य विस्तार निम्न 16 जिलों में है—

    • उदयपुर
    • सिरोही
    • राजसमंद
    • अजमेर
    • ब्यावर
    • पाली
    • चित्तौड़गढ़
    • भीलवाड़ा
    • डूंगरपुर
    • डीडवाना-कुचामन
    • सीकर
    • झुंझुनूं
    • जयपुर
    • कोटपूतली-बहरोड़
    • अलवर
    • खैरथल-तिजारा
  • राजस्थान में अरावली की दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है, जबकि इसकी चौड़ाई उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ती जाती है।
  • अरावली का सर्वाधिक विस्तार उदयपुर जिले में तथा न्यूनतम विस्तार अजमेर जिले में है।
  • अरावली पर्वतमाला का सर्वोच्च शिखर गुरुशिखर (सिरोही) तथा सबसे निम्न बिंदु पुष्कर घाटी (अजमेर) है।
  • अरावली का मध्य भाग अजमेर में स्थित है।
  • सिरोही में अरावली की ऊँचाई सर्वाधिक तथा जयपुर में न्यूनतम है।
  • अरावली पर्वतमाला के दक्षिणी भाग में सर्वाधिक वर्षा होती है।
❖ अरावली के उपनाम
स्रोत उपनाम
विष्णु पुराण परिपत्र
भौगोलिक भाषा मेरू
उदयपुर आड़ा-वटा
बूंदी आडावली
तुलना भारत का अप्लेशियन (अमेरिका के अप्लेशियन पर्वत से तुलना)
❖ उत्पत्ति
  • अरावली पर्वतमाला का निर्माण प्री-कैम्ब्रियन युग में हुआ था।
  • इसका निर्माण उस समय हुआ, जब भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट समुद्र से अलग हुई थीं।
  • राजस्थान की प्री-कैम्ब्रियन चट्टानों का विस्तृत वर्णन ए. एम. हेरॉन (अलेक्जेंडर मैकमिलन हेरॉन) ने किया।
  • अरावली विश्व की सबसे प्राचीन वलित एवं अवशिष्ट पर्वतमाला मानी जाती है।
  • यह एक मोड़दार पर्वतमाला है।
  • अरावली पर्वतमाला का उद्गम अरब सागर के मिनिकॉय द्वीप (लक्षद्वीप) से माना जाता है।
  • अरावली की मूल जड़ अरब सागर से जुड़ी होने के कारण अरब सागर को अरावली का पिता कहा जाता है।
❖ अरावली की विशेषताएँ
  • अरावली पर्वतमाला का दक्षिणी भाग मुख्यतः ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है।
  • यह थार मरुस्थल के पूर्व दिशा में विस्तार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • राजस्थान की सर्वाधिक नदियों का उद्गम, सर्वाधिक सघन वनस्पति तथा खनिज संपदा का बड़ा भाग अरावली क्षेत्र में पाया जाता है।
  • अरावली के पूर्वी ढालों पर वनस्पति अपेक्षाकृत अधिक सघन है।
  • अरावली पर्वतमाला को भारत की महान जल विभाजक रेखा कहा जाता है, क्योंकि यह अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों को अलग करती है।
  • अरावली थार मरुस्थल और चम्बल घाटी के मध्य प्राकृतिक विभाजक का कार्य करती है।
  • अरावली पर्वतमाला को तीन भागों में विभाजित किया गया है—
(1)  उत्तरी अरावली
  • अलवर, खैरथल-तिजारा, सीकर, झुंझुनूं, जयपुर, दौसा तथा कोटपूतली-बहरोड़

उत्तरी अरावली की प्रमुख चोटियाँ- 

चोटी जिला ऊँचाई
रघुनाथगढ़ सीकर 1055 मीटर
मालखेत सीकर 1052 मीटर
लोहागल झुंझुनूं 1051 मीटर
भोजगढ़ झुंझुनूं 997 मीटर
खोज जयपुर 920 मीटर
भैरांच अलवर 792 मीटर
बाबाई जयपुर 792 मीटर
बरवाड़ा जयपुर 786 मीटर
बबाई झुंझुनूं 780 मीटर
बिलाली कोटपूतली-बहरोड़ 775 मीटर
मनोहरपुरा जयपुर 747 मीटर
बैराठ कोटपूतली-बहरोड़ 704 मीटर
सिरावास अलवर 651 मीटर
भानगढ़ अलवर 649 मीटर
जयगढ़ जयपुर 648 मीटर
(2) मध्य अरावली – 

मध्य अरावली की प्रमुख चोटियाँ

चोटी जिला ऊँचाई
टॉडगढ़ (गोरमजी) ब्यावर 934 मीटर
तारागढ़ अजमेर 873 मीटर
नाग पहाड़ अजमेर 795 मीटर

❖ मध्य अरावली के प्रमुख दर्रे

  • पर्वतों के मध्य स्थित संकरे मार्ग को दर्रा, नाल अथवा घाट कहा जाता है।
    • बर दर्रा (ब्यावर)ब्यावर को बर से जोड़ता है।
    • पखेरिया दर्रा (ब्यावर)ब्यावर से मसूदा जाने वाले मार्ग पर स्थित है।
    • शिवपुरा घाटब्यावर
    • सूरा घाट दर्राब्यावर
    • गोरमघाट दर्राराजसमंद
    • कामलीघाट दर्राराजसमंद
  • उत्तरी-मध्यवर्ती अरावली में सर्वाधिक अन्तराल (Gap) पाया जाता है।
(3) दक्षिणी अरावली
  • दक्षिणी अरावली का विस्तार देवगढ़ (राजसमंद) से उदयपुर होते हुए सिरोही तक है।

दक्षिणी अरावली की प्रमुख चोटियाँ

चोटी जिला ऊँचाई
गुरु शिखर सिरोही 1722 मीटर
सेर सिरोही 1597 मीटर
दिलवाड़ा सिरोही 1442 मीटर
जरगा उदयपुर 1431 मीटर
अचलगढ़ सिरोही 1380 मीटर
कुम्भलगढ़ राजसमंद 1224 मीटर
धोनिया उदयपुर 1183 मीटर
ऋषिकेश सिरोही 1017 मीटर
कमलनाथ उदयपुर 1001 मीटर
सज्जनगढ़ उदयपुर 938 मीटर
सायरा उदयपुर 900 मीटर
लीलागढ़ उदयपुर 874 मीटर
डोरा पर्वत जालौर 869 मीटर
नागपानी उदयपुर 867 मीटर
गोगुन्दा उदयपुर 840 मीटर
इसराना भाखर जालौर 839 मीटर
रोजा भाखर जालौर 730 मीटर
झारोला भाखर जालौर 588 मीटर

❖ गुरु शिखर

  • गुरु शिखर माउंट आबू (सिरोही) में स्थित अरावली पर्वतमाला की सर्वोच्च चोटी है।
  • कर्नल टॉड ने गुरु शिखर को संतों का शिखर तथा हिन्दू ओलम्पस की संज्ञा दी है।
  • इस शिखर का नाम दत्तात्रेय ऋषि के नाम पर रखा गया है।
  • इसकी ऊँचाई 1722 मीटर है।
  • गुरु शिखर पर दत्तात्रेय ऋषि का लगभग 5 मीटर ऊँचा मंदिर स्थित है।

❖ दक्षिणी अरावली के प्रमुख नाल / दर्रे

  • फुलवारी की नालउदयपुर में स्थित है तथा यह राजस्थान की सबसे बड़ी नाल मानी जाती है।
  • केवड़ा की नालउदयपुर
  • देबारी दर्राउदयपुर
  • हाथी दर्राउदयपुर में पिंडवाड़ा (सिरोही) से उदयपुर जाने वाले मार्ग पर स्थित है।
  • हाथीगुड़ा की नालकुम्भलगढ़ किले (राजसमंद) के निकट स्थित है तथा पाली को राजसमंद से जोड़ती है।
  • सोमेश्वर की नालपाली
  • देसूरी की नालपाली

❖ प्रमुख पहाड़ियाँ

पहाड़ी / पर्वतीय क्षेत्र मुख्य तथ्य
गिरवा उदयपुर के चारों ओर तश्तरीनुमा (कटोरा आकार) पहाड़ियों का समूह।
भाकर सिरोही की तीव्र ढाल वाली पहाड़ियाँ।
देशहरो उदयपुर में स्थित जरगा एवं रागा की पहाड़ियाँ, जो वर्षभर हरी-भरी रहती हैं।
मेवत डूंगरपुर और बांसवाड़ा के मध्य का पर्वतीय क्षेत्र।
मेरवाड़ा पहाड़ियाँ ब्यावर एवं अजमेर की पहाड़ियाँ, जो मेवाड़ और मारवाड़ को अलग करती हैं।
घोसी पहाड़ी झुंझुनूं में स्थित, ऊँचाई 740 मीटर
हर्ष की पहाड़ी सीकर में स्थित, ऊँचाई 820 मीटर। इसी पर हर्षनाथ मंदिर स्थित है।
उदयनाथ पर्वत अलवर में स्थित।
मालाणी पहाड़ी बाड़मेर एवं जालौर क्षेत्र में विस्तृत।
आडावल पर्वत बूंदी में स्थित।
मोडा पहाड़ झुंझुनूं में स्थित।
मगरा अरावली से अलग स्थित अपशिष्ट पहाड़ियों को मगरा कहा जाता है।

(3) पूर्वी मैदानी प्रदेश

पूर्वी मैदानी प्रदेश में निम्न जिले शामिल हैं—

    • अलवर
    • कोटपूतली-बहरोड़
    • खैरथल-तिजारा
    • डीग
    • भरतपुर
    • जयपुर
    • धौलपुर
    • करौली
    • सवाई माधोपुर
    • भीलवाड़ा
    • चित्तौड़गढ़
    • डूंगरपुर
    • बांसवाड़ा
    • प्रतापगढ़
  • इस प्रदेश का निर्माण मुख्यतः चम्बल, बनास, बाणगंगा तथा माही नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ (दोमट) मिट्टी से हुआ है।
  • यह राजस्थान का सर्वाधिक उपजाऊ भौतिक प्रदेश है, इसलिए इसे खाद्यान्न का कटोरा भी कहा जाता है।
  • इस प्रदेश का सामान्य ढाल पूर्व दिशा की ओर है।
  • राजस्थान में सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व इसी भौतिक प्रदेश में पाया जाता है।

❖ पूर्वी मैदानी प्रदेश के उपभाग

उपभाग मुख्य क्षेत्र / नदी विशेषता
चम्बल बेसिन चम्बल नदी सवाई माधोपुर, करौली एवं धौलपुर में विस्तृत मैदान।
छप्पन (माही) बेसिन माही नदी बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ एवं डूंगरपुर का नदी बेसिन।
बनास बेसिन बनास नदी बनास एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित मैदान।
बाणगंगा बेसिन बाणगंगा नदी जयपुर, दौसा, डीग एवं भरतपुर का मैदान।

(1) चम्बल बेसिन

  • चम्बल बेसिन का निर्माण चम्बल नदी द्वारा हुआ है।
  • इसका विस्तार मुख्यतः सवाई माधोपुर, करौली तथा धौलपुर जिलों में है।
  • चम्बल नदी के आसपास पाई जाने वाली ऊँची-नीची उत्खात स्थलाकृति को डांग कहा जाता है।
  • करौली में डांग भूमि का विस्तार सर्वाधिक होने के कारण इसे डांग की रानी कहा जाता है।
  • चम्बल नदी द्वारा होने वाले अवनलिका अपरदन के कारण गहरी एवं सँकरी घाटियाँ बन जाती हैं, जिन्हें बीहड़ कहा जाता है।
  • बीहड़ क्षेत्र का विस्तार कोटा, सवाई माधोपुर तथा धौलपुर तक है।

(2) छप्पन बेसिन / माही बेसिन

  • माही नदी के प्रवाह क्षेत्र को छप्पन बेसिन अथवा माही बेसिन कहा जाता है।
  • इसका विस्तार बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ तथा डूंगरपुर जिलों में है।
  • प्रतापगढ़ का प्राचीन नाम कांठल था।
  • प्रतापगढ़ में माही नदी के प्रवाह क्षेत्र को कांठल का मैदान कहा जाता है।
  • बांसवाड़ा से प्रतापगढ़ के मध्य स्थित 56 गाँवों एवं अनेक नदी-नालों वाले क्षेत्र को छप्पन का मैदान कहा जाता है।
  • डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा का क्षेत्र वागड़, मेवल अथवा व्याघवाट के नाम से भी जाना जाता है।

(3) बनास बेसिन

  • बनास बेसिन का निर्माण बनास नदी एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा किया गया है।
  • इस क्षेत्र का सामान्य ढाल पूर्व दिशा की ओर है।
  • यहाँ मुख्यतः जलोढ़ (दोमट) मिट्टी पाई जाती है, जो कृषि के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है।
  • इसकी औसत ऊँचाई लगभग 280–500 मीटर है।
  • देवगढ़ (राजसमंद) के समीप स्थित मैदान को पिडमाड का मैदान कहा जाता है।
  • बनास बेसिन का उत्तर-पूर्वी भाग मालपुरा–करौली क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।
  • इसका विस्तार मुख्यतः टोंक, सवाई माधोपुर तथा करौली जिलों में है।
  • ए. एम. हेरॉन ने इस क्षेत्र को तृतीय पेनिप्लेन की संज्ञा दी है।
  • जहाजपुर (भीलवाड़ा) का क्षेत्र खेराड़, जबकि मालपुरा (टोंक) का क्षेत्र मालखेराड़ कहलाता है।

(4) बाणगंगा बेसिन

  • बाणगंगा बेसिन का निर्माण बाणगंगा नदी के प्रवाह क्षेत्र से हुआ है।
  • इसका विस्तार मुख्यतः जयपुर, दौसा, डीग तथा भरतपुर जिलों में है।

❖ (4) दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश

  • दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश को हाड़ौती का पठार भी कहा जाता है।
  • यह मध्यप्रदेश के मालवा के पठार का उत्तरी विस्तार है।
  • इसकी औसत ऊँचाई लगभग 500 मीटर है।

इस प्रदेश में निम्न जिले शामिल हैं—

  • कोटा
  • बूंदी
  • बारां
  • झालावाड़

❖ हाड़ौती पठार के प्रमुख भाग

भाग मुख्य विशेषता
विंध्यन कगार भूमि चम्बल एवं बनास नदियों के मध्य स्थित बलुआ पत्थर से निर्मित क्षेत्र।
दक्कन लावा पठार कोटा, बूंदी, बारां एवं झालावाड़ में विस्तृत ज्वालामुखीय लावा से निर्मित पठारी क्षेत्र।

(1) विंध्यन कगार भूमि

  • इसका विस्तार मुख्यतः करौली, धौलपुर तथा सवाई माधोपुर जिलों में है।
  • यह चम्बल नदी एवं बनास नदी के मध्य स्थित भू-भाग है।
  • इसका निर्माण मुख्यतः बलुआ पत्थर से हुआ है।
❖ महान सीमा भ्रंश (Great Boundary Fault)
  • अरावली पर्वतमाला एवं विंध्याचल पर्वतमाला के मिलन क्षेत्र को महान सीमा भ्रंश (Great Boundary Fault) कहा जाता है।
  • यह अरावली पर्वतमाला के पूर्व में स्थित है।

➤ इसका विस्तार निम्न जिलों में है—

  • बूंदी
  • सवाई माधोपुर
  • करौली
  • धौलपुर
  • कोटा
  • चित्तौड़गढ़

(2) दक्कन लावा पठार

  • इसका विस्तार कोटा, बूंदी, बारां तथा झालावाड़ जिलों में है।
  • बूंदी की पहाड़ियों का सर्वोच्च शिखर सतूर है।

बूंदी के प्रमुख दर्रे निम्नलिखित हैं—

  • लाखेरी दर्रा
  • रामगढ़-खटकड़ दर्रा
  • जेतावास दर्रा

❖ मुकन्दरा की पहाड़ियाँ

  • मुकन्दरा की पहाड़ियाँ मुख्यतः कोटा (सर्वाधिक) तथा झालावाड़ जिलों में स्थित हैं।
  • ये विंध्याचल पर्वतमाला का ही विस्तार मानी जाती हैं।
  • इनकी सर्वोच्च चोटी चाँदबड़ी है।
  • इन पहाड़ियों का आकार अर्द्धचन्द्राकार है।

❖ शाहबाद उच्च क्षेत्र

  • शाहबाद उच्च क्षेत्र बारां जिले में स्थित है।
  • रामगढ़ (बारां) के निकट घोड़े की नाल (Horse Shoe) के आकार की पर्वत श्रेणी पाई जाती है।
  • इसी पर्वत श्रेणी के मध्य राजस्थान की एकमात्र उल्का पिंड के गिरने से बनी झील स्थित है।
  • इस क्रेटर को विश्व भू-विरासत के रूप में मान्यता प्राप्त है।

❖ डंग-गंगधर उच्च भूमि

  • डंग-गंगधर उच्च भूमि झालावाड़ का प्रमुख पठारी क्षेत्र है।

❖ राजस्थान के प्रमुख पठार

पठार स्थान मुख्य विशेषता
उड़िया का पठार सिरोही राजस्थान का सबसे ऊँचा पठार, ऊँचाई 1360 मीटरगुरु शिखर के नीचे स्थित।
भोराट का पठार गोगुन्दा (उदयपुर) से कुम्भलगढ़ (राजसमंद) 1225 मीटर ऊँचा, राजस्थान का दूसरा सबसे ऊँचा पठार। इसकी सर्वोच्च चोटी जरगा है।
आबू का पठार सिरोही लगभग 1200 मीटर ऊँचा, राजस्थान का तीसरा सबसे ऊँचा पठार। इसी पर माउंट आबू स्थित है, जो राजस्थान का सबसे ऊँचा नगर है।
मेसा का पठार चित्तौड़गढ़ लगभग 620 मीटर ऊँचा। इसी पर चित्तौड़गढ़ दुर्ग स्थित है।
लसाड़िया का पठार सलूम्बर जयसमंद झील के पूर्वी भाग में स्थित।
उपरमाल का पठार भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़) से बिजौलिया (भीलवाड़ा) हाड़ौती के पठार का ही भाग माना जाता है।
मानदेसरा का पठार चित्तौड़गढ़ चित्तौड़गढ़ जिले का प्रमुख पठारी क्षेत्र।
भोमट का पठार उदयपुर, सलूम्बर, डूंगरपुर एवं सिरोही यह क्षेत्र भील जनजाति के प्रमुख निवास क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top