राजस्थान की हस्तकला

इस भाग में क्या पढ़ेंगे

❖ हस्तकला

  • राजस्थान को हस्तकलाओं का आगार कहा जाता है।
  • हस्तकला (हस्तशिल्प) उद्योग का संबंध कुटीर उद्योग से है।

❖ थेवा कला – प्रतापगढ़

  • हरे काँच की सतह पर सोने से आकर्षक चित्रांकन करने की कला को थेवा कला कहा जाता है।
  • इस कला के सम्मान में वर्ष 2002 में 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया।
  • प्रतापगढ़ रियासत के राजा सावंतसिंह के शासनकाल में राज सोनी परिवार ने इस कला की पहली कलाकृति बनाकर उन्हें भेंट की थी।
  • सोनी परिवार इस पारंपरिक कला की तकनीक को आज भी गुप्त रखता है।

➤ कलाकार

  • नाथू जी सोनीथेवा कला के जनक माने जाते हैं।
  • महेश राज सोनीवर्ष 2015 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित।
  • गिरीश कुमार

❖ मीनाकारी – जयपुर

  • सोने के आभूषणों पर रंग भरने की कला को मीनाकारी कहा जाता है।
  • इसका उद्भव पर्शिया (ईरान) में माना जाता है।
  • जयपुर के राजा मानसिंह प्रथम लाहौर से 5 कारीगरों को जयपुर लेकर आए, जिनसे इस कला का विकास हुआ।

➤ कलाकार

  • कुदरत सिंहवर्ष 1988 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित।
  • मुन्नालाल
  • दुर्गा सिंह
आधार प्रमुख केंद्र
पीतल पर मीनाकारी जयपुर, अलवर
चाँदी पर मीनाकारी नाथद्वारा
ताँबा पर मीनाकारी भीलवाड़ा
सोना पर मीनाकारी प्रतापगढ़
मार्बल पर मीनाकारी जयपुर

❖ टेराकोटा – मोलेला गाँव (राजसमंद)

  • इस कला में मिट्टी की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं।
  • निर्माण के समय चावल की भूसी तथा गधे की लीद का मिश्रण उपयोग में लिया जाता है।
  • इसके लिए बनास नदी की विशेष प्रकार की मिट्टी प्रयुक्त होती है, जिसकी गुणवत्ता सिरेमिक जैसी मानी जाती है।

➤ कलाकार

  • मोहनलाल कुम्हारवर्ष 2012 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित।
  • खेमराज
  • राजेंद्र कुम्हार

❖ ब्लू पॉटरी (कामचीनी)

  • चीनी मिट्टी के बर्तनों पर चित्रांकन करने की कला को ब्लू पॉटरी कहा जाता है।
  • इसका मूल उद्भव पर्शिया (ईरान) में माना जाता है।
  • भारत में इसका प्रसार अकबर के शासनकाल के दौरान हुआ।
  • दिल्ली के भोला नामक व्यक्ति ने यह कला चूड़ामन और कालूराम को सिखाई, जिन्होंने इसे जयपुर में स्थापित किया।
  • महाराजा रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में जयपुर में ब्लू पॉटरी की शुरुआत हुई।
  • इसमें नीला रंग (कोबाल्ट ऑक्साइड) प्रमुख रूप से उपयोग किया जाता है।
  • वर्ष 1974 में मऊ (सीकर) के कृपाल सिंह शेखावत को ब्लू पॉटरी के लिए पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया।

➤ महिला कलाकार

  • स्व. नाथी बाई

➤ अन्य कलाकार

    • गोपाल सैनी
    • जमनाप्रसाद
    • भगवान सहाय
    • हनुमान सहाय
  • रामगढ़ (अलवर) के ओमप्रकाश गालव क्ले पॉटरी (डिजाइनर मिट्टी के पात्र) के प्रसिद्ध कलाकार हैं।

❖ सुनहरी (स्वर्णिम) पेंटिंग पॉटरी – बीकानेर

  • बीकानेर अपनी सुनहरी (स्वर्णिम) पेंटिंग पॉटरी के लिए प्रसिद्ध है।

❖ कागजी पॉटरी – अलवर

  • इस कला में अत्यंत पतली परत वाले बर्तनों का निर्माण किया जाता है।
❖ ब्लैक पॉटरी
  • कोटा तथा सवाई माधोपुर ब्लैक पॉटरी के प्रमुख केंद्र हैं।

❖ बंधेज

  • जयपुर बंधेज कला के लिए प्रसिद्ध है।
  • इस कला में कपड़े को बाँधकर विभिन्न प्रकार के डिज़ाइन बनाए जाते हैं।
  • इसे टाई-डाई (बांधो और रंगो) कला भी कहा जाता है।

➤ प्रमुख केंद्र

  • बंधेज की साड़ियाँजोधपुर
  • चुनरियाँजयपुर एवं जोधपुर

❖ लहरिया

  • जयपुर लहरिया के लिए प्रसिद्ध है।
  • इस तकनीक में कपड़े पर विभिन्न रंगों की लहरदार आकृतियाँ बनाई जाती हैं।
  • जब लहरदार धारियाँ एक-दूसरे को काटती हैं, तो उसे मोठड़ा कहा जाता है।
  • मोठड़ा विशेष रूप से जोधपुर की पहचान है।
  • जयपुर का राजशाही लहरिया तथा समुद्र लहरिया विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

➤ प्रमुख उत्पाद

  • जरी की साड़ीजयपुर

❖ दाबू प्रिंट – आकोला (चित्तौड़गढ़)

  • छीपा जाति द्वारा कपड़े के जिन भागों पर रंग नहीं चढ़ाना होता, उन्हें पहले दबा दिया जाता है। इसी तकनीक को दाबू प्रिंट कहा जाता है।
दाबू प्रिंट का प्रकार प्रमुख केंद्र
मोम का दाबू प्रिंट सवाई माधोपुर
मिट्टी का दाबू प्रिंट बालोतरा
गेहूँ के बींधन का दाबू प्रिंट बगरू, सांगानेर
पावरलूम कपड़े पर छपाई बालोतरा
❖ अजरख प्रिंट – बाड़मेर
  • इस प्रिंट में कपड़ों पर मुख्यतः लाल एवं नीले रंगों की छपाई की जाती है।
❖ मलीर प्रिंट – बाड़मेर
  • इस शैली में कत्थई तथा काले रंगों का प्रमुख रूप से उपयोग किया जाता है।
❖ सांगानेर प्रिंट – सांगानेर (जयपुर)
  • मुन्नालाल गोयल ने सांगानेर प्रिंट को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • इसमें हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग तकनीक द्वारा कपड़ों पर फूलों की अत्यंत बारीक छपाई की जाती है।
❖ बगरू प्रिंट – बगरू (जयपुर)
  • इस प्रिंट में बेल, फूल-पत्तियाँ तथा पशु-पक्षियों की आकृतियाँ बनाई जाती हैं।
  • रामकिशोर छीपा इसके प्रसिद्ध कलाकार हैं।
  • बगरू स्याह-बैगर (काला-लाल) छपाई के लिए प्रसिद्ध है।
  • यहाँ सूती कपड़े पर हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग तकनीक से प्राकृतिक रंगों का उपयोग करके छपाई की जाती है।
❖ आजम प्रिंट / जाजम प्रिंट
  • आकोला (चित्तौड़गढ़) आजम (जाजम) प्रिंट के लिए प्रसिद्ध है।

❖ भाँडल की छपाई – भीलवाड़ा

  • इस छपाई में अभ्रक का उपयोग किया जाता है।
  • स्थानीय भाषा में अभ्रक को भाँडल कहा जाता है।

❖ कोटा डोरिया / मसूरिया साड़ी – कैथून (कोटा)

  • कोटा के झाला जालिम सिंह ने मैसूर से कुछ बुनकरों को बुलवाया।
  • इन्हीं में महमूद मसूरिया ने यहाँ साड़ी निर्माण का कार्य प्रारंभ किया।

❖ मलागिरी / मलयगिरी

  • इस वस्त्र को अनेक रंगों के मिश्रण से तैयार किया जाता है।
  • इसमें भूरे रंग की प्रधानता रहती है।
  • इसकी विशेषता यह है कि कपड़ा लंबे समय तक सुगंधित बना रहता है।
  • महाराजा रामसिंह द्वितीय की अंगरखी आज भी सुगंधित होने का उल्लेख मिलता है।

❖ पोमचा

  • पोमचा का अर्थ कमल के फूल से युक्त ओढ़नी होता है।
  • बच्चे के जन्म के अवसर पर माँ द्वारा इसे धारण किया जाता है।
  • पुत्र के जन्म पर पीले रंग तथा पुत्री के जन्म पर गुलाबी रंग का पोमचा पहना जाता है।
  • जयपुर एवं शेखावाटी इसके प्रमुख केंद्र हैं।
  • हाड़ौती क्षेत्र में विधवा महिलाएँ काले रंग की ओढ़नी पहनती हैं, जिसे चीड़ का पोमचा कहा जाता है।
  • बोलचाल की भाषा में पोमचा को पीला भी कहा जाता है।
  • पोमचा का एक प्रमुख प्रकार पाटोदा लूंगड़ा है, जो लक्ष्मणगढ़ (सीकर) के लिए प्रसिद्ध है।

❖ गलीचे – जयपुर

  • आमेर के शासक मानसिंह प्रथम ने राजस्थान में गलीचा निर्माण की परंपरा का प्रारंभ कराया।

❖ नमदे – टोंक

  • नमदा कला का मूल उद्भव ईरान से माना जाता है।
  • टोंक इस हस्तकला का प्रमुख केंद्र है।

❖ दरियाँ

  • लवाण (दौसा), टांकला (नागौर) तथा सालावास (जोधपुर) अपनी उत्कृष्ट दरियों के लिए प्रसिद्ध हैं।

❖ गोटा

  • महिलाओं के परिधानों के बाहरी भाग पर सजावट के लिए गोटा लगाया जाता है।
  • अधिक चौड़ाई वाले गोटे को लप्पा तथा कम चौड़ाई वाले गोटे को लप्पी कहा जाता है।

➤ गोटे के प्रमुख प्रकार

    • लप्पा-लप्पी
    • किरण
    • बांकड़ी
    • गोखरू
    • बिजिया
  • खंडेला (सीकर) गोटा कला के लिए प्रसिद्ध है।
  • जयपुर का गुलाल गोटा विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

❖ बातिक

  • इस तकनीक में पहले कपड़े पर प्रारंभिक चित्र बनाया जाता है, उसके बाद उस पर मोम की परत चढ़ाई जाती है।
  • खंडेला (सीकर) बातिक कला का प्रमुख केंद्र है।

❖ फड़ चित्रण – शाहपुरा (भीलवाड़ा)

  • छीपा जाति के जोशी चितेरों द्वारा कपड़े (पट) पर बनाए जाने वाले चित्रों को फड़ कहा जाता है।
  • इसमें कपड़े पर चित्रों के माध्यम से लोक देवताओं की कथाओं का चित्रात्मक प्रस्तुतीकरण किया जाता है।

➤ कलाकार

    • श्री लाल जोशी (शाहपुरा, भीलवाड़ा) – वर्ष 2006 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित।
    • पार्वती जोशीप्रथम महिला फड़ चित्रकार
    • कल्याण जोशी
  • पाबूजी की फड़ सबसे लोकप्रिय तथा सबसे छोटी फड़ मानी जाती है।
  • देवनारायण जी की फड़ सबसे प्राचीन एवं सबसे बड़ी फड़ मानी जाती है।

❖ बादला – जोधपुर

  • जिंक (जस्ता) से निर्मित पानी रखने की बोतल को बादला कहा जाता है।

❖ तारकशी के जेवर – नाथद्वारा (राजसमंद)

  • चाँदी के पतले तारों से तैयार किए जाने वाले आभूषण तारकशी के जेवर कहलाते हैं।

❖ कोफ्तगिरी

  • फौलाद अथवा लोहे की वस्तुओं पर सोने के पतले तारों की जड़ाई करने की कला को कोफ्तगिरी कहा जाता है।
  • यह कला दमिश्क से पंजाब लाई गई और बाद में मुगलों के समय राजस्थान पहुँची।
  • जयपुर और अलवर इसके प्रमुख केंद्र हैं।

❖ तहनिशा

  • इस कला में पहले डिज़ाइन को गहराई तक उकेरा जाता है, फिर उसमें पतले धातु के तार भरे जाते हैं।
  • उदयपुर एवं अलवर इस कला के प्रमुख केंद्र हैं।

❖ तलवार – सिरोही

➤ तलवारों के प्रमुख प्रकार

    • भगलियाँ – दो गाँठ वाली तलवार।
    • ठेरणा
    • कुलाबो – खमदार पत्ती वाली तलवार।
    • साँकेला – जिसके पाते पर जलेबी जैसी अंडाकार आकृति होती है।
    • नालदार

मेवाड़ में तलवार निर्माण के लिए बिगोद का लोहा उपयोग में लिया जाता था।

❖ लाख का काम – जयपुर, जोधपुर

  • लाख से बनी चूड़ियों को मौकड़ी कहा जाता है।
  • चूड़ियाँ बनाने वाले कारीगर को लखारा तथा उन्हें बेचने वाले को मणिया कहा जाता है।
  • काँच की चूड़ी को कातरया कहा जाता है।
  • हाथी दाँत की चूड़ियाँ जोधपुर में प्रसिद्ध हैं।

❖ हाथी दाँत के खिलौने एवं मूर्तियाँ – जयपुर, उदयपुर

  • जयपुर और उदयपुर हाथी दाँत से बने खिलौनों एवं मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • मारवाड़ में हाथी दाँत के खिलौनों को बागुडिया कहा जाता था।

❖ गोफण

  • गोफण का उपयोग दूर से पत्थर (डगल्या) फेंककर पक्षियों को उड़ाने तथा पशुओं को खेतों से बाहर भगाने के लिए किया जाता है।

❖ उस्ता कला / मुनब्बती कला – बीकानेर

  • इस कला में ऊँट की खाल पर सुनहरे रंग से चित्रांकन किया जाता है।
  • इस कला के कारीगर उस्ताद कहलाते हैं।
  • अनूपसिंह के शासनकाल में लाहौर से उस्तादों को बीकानेर लाया गया।

➤ कलाकार

  • हिसामुद्दीन उस्तावर्ष 1985 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित।
  • रुकनुद्दीन उस्ता
  • मोहम्मद हनीफ

उस्ता कला के संरक्षण एवं विकास के लिए वर्ष 1975 में बीकानेर में उस्ता कैमल हाइड केंद्र की स्थापना की गई।

❖ मथेरण कला – बीकानेर

  • मथेरण (जैन समुदाय) स्वयं को महात्मा कहता है।
  • इस कला में पौराणिक कथाओं तथा देवी-देवताओं से संबंधित भित्ति चित्र बनाए जाते हैं।
  • बीकानेर चित्रशैली के विकास में इस कला का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

➤ कलाकार

  • मुन्नालाल
  • मुकुंद

❖ कशीदाकारी कला

  • विभिन्न प्रकार के धागों से कपड़ों पर सजावटी डिज़ाइन बनाने की कला को कशीदाकारी कहा जाता है।
  • बाड़मेर और जैसलमेर इसके प्रमुख केंद्र हैं।
  • बाड़मेर की रूमा देवी इस कला की प्रसिद्ध कलाकार हैं।

❖ मूर्तिकला – जयपुर

  • जयपुर संगमरमर की मूर्तियों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है।
  • लाल पत्थर की मूर्तियाँ थानागाजी (अलवर) तथा सिकंदरा (दौसा) में बनाई जाती हैं।

कलाकार

  • अर्जुनलाल प्रजापतिवर्ष 2010 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित।
  • बाँसवाड़ा के तलवाड़ा गाँव में सोमपुरा जाति के मूर्तिकार काले संगमरमर की मूर्तियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं।

❖ पिछवाई – नाथद्वारा (राजसमंद)

  • भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से संबंधित घटनाओं का चित्रांकन पिछवाई कला की प्रमुख विशेषता है।
  • इसमें मूर्ति के पीछे लगाए जाने वाले कपड़े पर चित्र बनाए जाते हैं।

कलाकार

    • लच्छीराम
    • घनश्याम
    • कैलाश शर्मा
    • नरोत्तम शर्मा

❖ पाने – नाथद्वारा (राजसमंद)

  • कागज पर देवी-देवताओं के चित्र बनाने की परंपरा को पाने कहा जाता है।
  • श्रीनाथजी का पाना सर्वाधिक कलात्मक माना जाता है।

❖ बाखला

  • ऊँट के बच्चे को तोड़िया कहा जाता है।
  • उसके मुलायम बालों को सूत के साथ मिलाकर जो उत्कृष्ट कपड़ा तैयार किया जाता है, उसे बाखला कहते हैं।
  • ऊँट की सजावट में तंग, मोरखा, गोरबंद तथा पिलान का उपयोग किया जाता है।

❖ जटपट्टी – जसोल (बालोतरा)

  • पशुओं के बालों को जट कहा जाता है।
  • जटपट्टी का निर्माण बकरी के बालों से किया जाता है।
  • इस उद्योग को जिरोही, भाकला तथा गंदहा के नाम से भी जाना जाता है।

❖ कढ़ाई

  • रंग-बिरंगे धागों से कपड़ों पर कलात्मक आकृतियाँ बनाने की प्रक्रिया कढ़ाई कहलाती है।
  • भरत, सूफ, हुरम जी तथा आरी कढ़ाई की प्रमुख शैलियाँ हैं।
  • छोटी-छोटी बिंदियों वाली कढ़ाई को मुकेश कहा जाता है।
  • जब कढ़ाई में जरदोजी तथा सुनहरे तारों का उपयोग किया जाता है, तो उसे कलाबत्तू कहा जाता है।
❖ रूपाहली सुनहरी (स्वर्णिम) छपाई
  • किशनगढ़, चित्तौड़गढ़ तथा कोटा रूपाहली सुनहरी (स्वर्णिम) छपाई के प्रमुख केंद्र हैं।
❖ हाथ से कागज निर्माण – सांगानेर
  • सांगानेर हाथ से कागज निर्माण की पारंपरिक कला के लिए प्रसिद्ध है।

❖ मोती भारत – जालौर

  • इस कला में मोतियों का उपयोग करके विभिन्न प्रकार के आकर्षक डिज़ाइन तैयार किए जाते हैं।

❖ कुन्दन कला – जयपुर

  • सोने के आभूषणों में रत्नों की जड़ाई करने की पारंपरिक कला को कुन्दन कला कहा जाता है।

❖ कावड़

  • कावड़ लकड़ी से बना चलता-फिरता मंदिर होता है, जिसमें अनेक द्वार होते हैं।
  • बस्सी (चित्तौड़गढ़) में खेरादी जाति के लोग कावड़ निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं।

➤ कलाकार

    • माँगीलाल मिस्त्री
    • द्वारिका प्रसाद जाँगिड़
    • सत्यनारायण सुथार

❖ बेवाण – बस्सी (चित्तौड़गढ़)

  • लकड़ी से निर्मित छोटी मंदिरनुमा संरचना को बेवाण कहा जाता है।
  • इसे मिनीएचर वुडन टेम्पल के नाम से भी जाना जाता है।
  • देवझूलनी (जलझूलनी) एकादशी के अवसर पर बेवाण की झाँकी निकाली जाती है।
  • बस्सी की काष्ठकला के जन्मदाता प्रभात जी सुथार माने जाते हैं।

➤ कलाकार

  • जमनालाल सुथार
  • द्वारका प्रसाद

❖ कोठियाँ

  • ग्रामीण क्षेत्रों में अनाज के भंडारण के लिए बनाई जाने वाली संरचनाओं को कोठियाँ कहा जाता है।

❖ वील

  • वील ग्रामीण क्षेत्रों में दैनिक उपयोग की वस्तु है, जिसका उपयोग बर्तन रखने के लिए किया जाता है।
  • इसका प्रचलन विशेष रूप से जैसलमेर में अधिक है।
  • इसका निर्माण घोड़े की लीद एवं चिकनी मिट्टी के मिश्रण से किया जाता है।

❖ खेसले – लेटा (जालौर)

  • लेटा (जालौर) खेसले के लिए प्रसिद्ध है।

❖ बू-नरावता गाँव – नागौर

  • बू-नरावता गाँव (नागौर) मिट्टी के खिलौने तथा गुलदस्ते बनाने के लिए प्रसिद्ध है।

❖ कठपुतलियाँ एवं लकड़ी के खिलौने – उदयपुर

  • उदयपुर कठपुतलियों तथा लकड़ी के खिलौनों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है।
  • लोक कला मंडल (लोककला मंदिर), उदयपुर ने देवीलाल सामर के नेतृत्व में राजस्थानी कठपुतली कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
  • वर्ष 1952 में देवीलाल सामर द्वारा लोककला मंदिर की स्थापना की गई।

❖ तीर-कमान

  • बोडीगामा (डूंगरपुर) तथा चन्दुजी का गढ़ा (बाँसवाड़ा) तीर-कमान निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं।

❖ रमकड़ा उद्योग – गलियाकोट (डूंगरपुर)

  • इस उद्योग में पत्थर के खिलौने बनाए जाते हैं।

❖ मिरर वर्क – चौहटन (बाड़मेर)

  • इस कला में कपड़ों पर काँच लगाया जाता है।
  • मिरर वर्क का सर्वाधिक कार्य जैसलमेर में किया जाता है।

❖ पेचवर्क – शेखावाटी

  • इस तकनीक में एक कपड़े पर दूसरे कपड़े के टुकड़े जोड़कर डिज़ाइन तैयार किए जाते हैं।

❖ ऐप्लिक

  • ऐप्लिक कला में कपड़े पर रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़ों को सिलाई द्वारा सजाया जाता है।
  • ओडिशा का पिपली शिल्प ऐप्लिक कला के नाम से प्रसिद्ध है।

❖ मोजड़ी जूतियाँ – भीनमाल (जालौर)

  • भीनमाल (जालौर) मोजड़ी जूतियों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है।
  • दूल्हा एवं दुल्हन की विशेष जूतियों को बिनोटा कहा जाता है।
  • बड़गाँव (जालौर) भी इसके लिए प्रसिद्ध है।

❖ सूँघनी नसवार – ब्यावर

  • ब्यावर सूँघनी नसवार के लिए प्रसिद्ध है।

❖ छाते – फालना (पाली)

  • फालना (पाली) छाता निर्माण का प्रमुख केंद्र है।

❖ सांझी

  • श्राद्ध पक्ष में सांझी बनाई जाती है।
  • कुँवारी कन्याएँ दीवार पर गोबर से आकृतियाँ बनाकर उन्हें काँच के टुकड़ों, चूड़ियों, मोतियों एवं लाख से सजाती हैं।
  • सांझी को माता पार्वती का स्वरूप मानकर उत्तम वर की कामना की जाती है।

❖ मांडणा

  • घर की दीवार, चौखट, आँगन तथा चबूतरे पर मांडणा बनाया जाता है।
  • किसी व्यक्ति के तीर्थयात्रा से सकुशल लौटने पर पुष्कर पेड़ी अथवा पथवारी मांडने की परंपरा है।
  • विवाह के अवसर पर वर के घर लौटने के बाद पथवारी की पूजा की जाती है।

❖ गौड़लिया

  • पशुओं की पहचान के लिए उन्हें दागने की प्रक्रिया अटेरना कहलाती है।
  • दागने के बाद बनने वाले पहचान-चिह्न को गौड़लिया कहा जाता है।

❖ आम के पापड़ – बाँसवाड़ा

  • बाँसवाड़ा आम के पापड़ के लिए प्रसिद्ध है।

❖ खुशबूदार मेथी / पान मेथी – नागौर

  • नागौर खुशबूदार (पान) मेथी के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

❖ ऊनी कंबल

  • जयपुर, जोधपुर, बाड़मेर तथा बीकानेर ऊनी कंबलों के प्रमुख केंद्र हैं।

❖ मोण – मेड़ता (नागौर)

  • मोण मिट्टी से बने बड़े मटकों को कहा जाता है।
  • मेड़ता (नागौर) इसके लिए प्रसिद्ध है।

❖ कलई

  • पीतल, ताँबा तथा अन्य धातुओं के बर्तनों पर चमक लाने की प्रक्रिया को कलई कहा जाता है।

❖ पीतल के बर्तनों पर मुरादाबादी का काम – जयपुर

  • जयपुर पीतल के बर्तनों पर मुरादाबादी कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है।

❖ पीतल के ठप्पेदार अनूठे बर्तन – बालाहेड़ी गाँव (महुआ, दौसा)

  • बालाहेड़ी गाँव (महुआ, दौसा) पीतल के ठप्पेदार बर्तनों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है।

❖ खेती के औजार – नागौर

  • नागौर खेती के औजारों के निर्माण का प्रमुख केंद्र है तथा इसे राजस्थान की धातुनगरी कहा जाता है।

❖ मेहंदी – सोजत (पाली)

  • सोजत (पाली) मेहंदी के लिए प्रसिद्ध है।

❖ खेल का सामान – हनुमानगढ़

  • हनुमानगढ़ खेल सामग्री के निर्माण का प्रमुख केंद्र है।

❖ पाव रजाई – जयपुर

  • जयपुर अपनी प्रसिद्ध पाव रजाई के लिए जाना जाता है।

❖ लकड़ी का नक्काशीदार फर्नीचर – बाड़मेर

  • बाड़मेर नक्काशीदार लकड़ी के फर्नीचर के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है।

❖ लकड़ी के दरवाजे – शेखावाटी

  • शेखावाटी कलात्मक लकड़ी के दरवाजों के लिए प्रसिद्ध है।

❖ लकड़ी के झूले – जोधपुर

  • जोधपुर लकड़ी के झूलों के निर्माण का प्रमुख केंद्र है।

❖ काष्ठ पर कलात्मक शिल्प / मूर्तियाँ – जेठाना (डूंगरपुर)

  • जेठाना (डूंगरपुर) काष्ठ पर कलात्मक शिल्प एवं मूर्तियों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है।

❖ राजस्थान की राज्य मिठाई – घेवर

  • घेवर राजस्थान की राज्य मिठाई है।

बीकानेर की प्रसिद्ध खाद्य सामग्री –

  • पनहारी मोदक
  • पापड़
  • भुजिया
  • रसगुल्ला
  • चमचम
  • नमकीन

जोधपुर की प्रसिद्ध व्यंजन

  • मावा कचौरी
  • प्याज कचौरी
  • मिर्ची बड़ा

राज्य की प्रथम हस्तशिल्प नीति17 सितंबर 2022

  • राजस्थान की प्रथम हस्तशिल्प नीति 17 सितंबर 2022 को लागू की गई।
  • इसका उद्देश्य विलुप्त होती हस्तकलाओं का संरक्षण एवं पुनर्जीवन करना तथा रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराना है।

राजस्थान राज्य हथकरघा विकास निगमजयपुर

  • स्थापनावर्ष 1984
  • इसका प्रमुख उद्देश्य बुनकरों को कच्चा माल उपलब्ध कराना है।

हस्तशिल्प डिजाइन एवं विकास केंद्रजयपुर

  • जयपुर में हस्तशिल्प डिजाइन एवं विकास केंद्र स्थापित है।

राजस्थान लघु उद्योग निगम (राजसिको)जयपुर

  • स्थापना3 जून 1961
  • राजस्थान में हस्तकला उद्योग को सर्वाधिक संरक्षण प्रदान करने वाली संस्था राजसिको है।
  • यह राजस्थली शोरूम के माध्यम से हस्तशिल्प वस्तुओं का विपणन करती है।
  • इस संस्था द्वारा ₹2,50,000 का पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
  • हैंडलूम मार्क हैंडलूम कपड़ों की प्रामाणिकता का प्रमाण माना जाता है।

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