❖ राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था ❖
स्थानीय स्तर पर जनता द्वारा अपने क्षेत्र का प्रशासन संचालित करने की व्यवस्था को स्थानीय स्वशासन कहा जाता है। भारत में स्थानीय स्वशासन दो स्तरों पर संचालित होता है—
(1) ग्रामीण स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज)
ग्रामीण पंचायती राज व्यवस्था तीन स्तरों पर आधारित है—
| स्तर | संस्था |
|---|---|
| उच्च स्तर | जिला परिषद |
| मध्य स्तर | पंचायत समिति |
| निम्न स्तर | ग्राम पंचायत |
(2) नगरीय (शहरी) स्थानीय स्वशासन
इसकी विस्तृत जानकारी नगरीय स्वशासन अध्याय में दी गई है।
- लॉर्ड रिपन को भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक (Father of Local Self-Government) माना जाता है। उन्होंने 1882 में जिला बोर्ड, ग्राम पंचायत तथा न्याय पंचायत के गठन की पहल करते हुए स्थानीय निकायों के विकास का प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
- लॉर्ड रिपन द्वारा प्रस्तुत यह प्रस्ताव स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा कहलाता है, इसी कारण उन्हें भारत में स्थानीय स्वशासन का पिता कहा जाता है।
- भारत शासन अधिनियम, 1935 के माध्यम से स्थानीय स्वशासन को राज्य सूची का विषय बनाया गया। वर्तमान में भी यह राज्य सूची के अंतर्गत ही आता है।
- भारतीय संविधान के भाग-4 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) के अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायतों के गठन का प्रावधान किया गया है।
- स्वतंत्रता से पूर्व वर्तमान राजस्थान में सबसे पहले बीकानेर रियासत ने 1928 में ग्राम पंचायत अधिनियम बनाया। इसके बाद जोधपुर (1928), जयपुर (1938), सिरोही (1943), भरतपुर, उदयपुर तथा करौली में भी पंचायतों से संबंधित कानून बनाए गए।
- पूरे राजस्थान में विधानसभा द्वारा पंचायती राज अधिनियम, 1953 पारित किया गया, जिसके अंतर्गत 1953 में राज्यभर में ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई।
❖ पंचायती राज से संबंधित महत्वपूर्ण समितियाँ
➤ बलवंत राय मेहता समिति – 1957
- इस समिति के अध्यक्ष बलवंत राय मेहता थे।
- यह पंचायती राज से संबंधित गठित पहली समिति थी।
- समिति ने लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की अवधारणा पर विशेष बल दिया।
- समिति ने 24 नवम्बर 1957 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें पुराने जिला बोर्डों को समाप्त कर त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की।
➤ सादिक अली समिति – 1964
- समिति ने प्रधान एवं जिला प्रमुख का चुनाव निर्वाचक मंडल के माध्यम से कराने का सुझाव दिया।
➤ गिरधारी लाल व्यास समिति – 1973
- प्रत्येक ग्राम पंचायत में ग्राम सेवक एवं सचिव की नियुक्ति की अनुशंसा की।
- पंचायती राज संस्थाओं के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने पर बल दिया।
➤ अशोक मेहता समिति – 1977
- समिति ने अगस्त 1978 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- इस समिति ने द्विस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का समर्थन किया।
| स्तर | व्यवस्था |
|---|---|
| प्रथम स्तर | जिला स्तर |
| द्वितीय स्तर | मंडल स्तर |
- ग्राम पंचायतों के स्थान पर मंडल पंचायतों के गठन की अनुशंसा की।
- जिला कलेक्टर सहित सभी अधिकारियों को जिला परिषद के अधीन रखने का सुझाव दिया।
- पंचायती राज से जुड़े कार्यों की निगरानी के लिए राज्य मंत्रिपरिषद में अलग से एक मंत्री नियुक्त करने की सिफारिश की।
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण प्रदान करने का सुझाव दिया।
- दलगत प्रणाली के आधार पर पंचायती राज चुनाव कराने की अनुशंसा की।
- पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा देने तथा संस्थाओं का कार्यकाल 4 वर्ष निर्धारित करने की सिफारिश की।
➤ जी. वी. के. राव समिति – 1985
- योजना आयोग ने 1985 में जी. वी. के. राव की अध्यक्षता में ग्रामीण विकास एवं गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की प्रशासनिक व्यवस्था का अध्ययन करने हेतु इस समिति का गठन किया।
➤ डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी समिति – 1986
- राजीव गांधी सरकार ने लोकतंत्र एवं विकास को सुदृढ़ बनाने तथा पंचायती राज संस्थाओं के पुनरुद्धार के उद्देश्य से डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया।
➤ पी. के. थुंगन समिति – 1988
- जिला परिषद को अधिक शक्तिशाली बनाने की सिफारिश की।
- पंचायती राज को संघ सूची का विषय बनाने तथा इसे संवैधानिक दर्जा प्रदान करने का सुझाव दिया।
➤ वी. एन. गाडगिल समिति – 1988
- पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा देने की अनुशंसा की।
- त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का समर्थन किया।
➤ हरलाल सिंह खरा समिति – 1990
- बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशों के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 2 अक्टूबर 1959 को नागौर के बगदरी गाँव से पंचायती राज व्यवस्था का औपचारिक उद्घाटन किया।
- उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया तथा राज्यपाल गुरुमुख निहाल सिंह थे।
- राजस्थान देश का पहला राज्य बना जिसने द्वितीय पंचवर्षीय योजना के दौरान पंचायती राज व्यवस्था लागू की।
- राजस्थान के बाद आंध्र प्रदेश ने 11 अक्टूबर 1959 को पंचायती राज व्यवस्था प्रारम्भ की और यह ऐसा करने वाला दूसरा राज्य बना।
❖ 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
➤ 73वाँ संविधान संशोधन विधेयक
| प्रक्रिया | तिथि |
|---|---|
| लोकसभा से पारित | 22 दिसम्बर 1992 |
| राज्यसभा से पारित | 23 दिसम्बर 1992 |
| राष्ट्रपति की स्वीकृति | 20 अप्रैल 1993 |
| लागू होने की तिथि | 24 अप्रैल 1993 |
- 24 अप्रैल 1993 से यह संशोधन प्रभावी हुआ। इसी कारण प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है।
- 73वें संविधान संशोधन के अंतर्गत भारतीय संविधान में भाग-9 जोड़ा गया, जिसमें अनुच्छेद 243 से अनुच्छेद 243(O) तक के प्रावधान सम्मिलित किए गए।
- इसी संशोधन के माध्यम से 11वीं अनुसूची को संविधान में जोड़ा गया, जिसमें 29 विषय शामिल किए गए।
- 73वें संविधान संशोधन के लागू होने के बाद पंचायती राज अधिनियम सर्वप्रथम कर्नाटक में लागू किया गया, जबकि पंचायती राज संस्थाओं के प्रथम चुनाव मध्य प्रदेश में कराए गए।
❖ अनुच्छेदवार पंचायती राज के संवैधानिक प्रावधान
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 243 | परिभाषाएँ |
| 243 क (A) | ग्राम सभा |
| 243 ख (B) | पंचायतों का गठन |
| 243 ग (C) | पंचायतों की संरचना |
| 243 घ (D) | स्थानों का आरक्षण |
| 243 ङ (E) | पंचायतों की अवधि |
| 243 च (F) | सदस्यता के लिए निरर्हताएँ (अयोग्यताएँ) |
| 243 छ (G) | पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार एवं उत्तरदायित्व |
| 243 ज (H) | पंचायतों की कर लगाने की शक्तियाँ एवं उनकी निधियाँ |
| 243 झ (I) | वित्त आयोग का गठन एवं वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन |
| 243 ञ (J) | पंचायतों के लेखों की संपरीक्षा |
| 243 ट (K) | पंचायतों के लिए निर्वाचन |
| 243 ठ (L) | संघ राज्य क्षेत्रों में लागू होना |
| 243 ड (M) | कुछ क्षेत्रों में इस भाग का लागू न होना |
| 243 ढ (N) | विद्यमान विधियों एवं पंचायतों का बना रहना |
| 243 ण (O) | निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन |
➤ अनुच्छेद 243 – परिभाषाएँ
- इस अनुच्छेद में ग्राम सभा, पंचायत, मध्यवर्ती स्तर तथा जिला की परिभाषाएँ दी गई हैं।
➤ अनुच्छेद 243 क (A) – ग्राम सभा
- ग्राम सभा ग्राम स्तर पर उन सभी शक्तियों का प्रयोग करेगी तथा उन दायित्वों का निर्वहन करेगी, जिनका निर्धारण संबंधित राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार किया जाएगा।
➤ अनुच्छेद 243 ख (B) – पंचायतों का गठन
पंचायती राज व्यवस्था के लिए त्रिस्तरीय ढाँचा निर्धारित किया गया है—
- ग्राम पंचायत
- पंचायत समिति
- जिला परिषद
➤ अनुच्छेद 243 ग (C) – पंचायतों की संरचना
- राज्य विधानमंडल को कानून बनाकर पंचायतों की संरचना निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त है।
- ग्राम पंचायत तथा मध्यवर्ती स्तर (खण्ड स्तर) की पंचायत समिति के सभी सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष मतदान द्वारा किया जाता है।
- जिला परिषद के सदस्यों का निर्वाचन राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार किया जाता है।
- ग्राम पंचायत के अध्यक्ष सरपंच का चुनाव प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा होता है।
- पंचायत समिति के अध्यक्ष प्रधान तथा जिला परिषद के अध्यक्ष जिला प्रमुख का चुनाव निर्वाचित सदस्य अपने मध्य से करते हैं।
➤ अनुच्छेद 243 घ (D) – स्थानों का आरक्षण
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्रदान किया जाता है।
- सभी वर्गों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
नोट – 2009 में केन्द्र सरकार ने महिलाओं के लिए 50% आरक्षण का प्रावधान किया, किन्तु इसके लिए संविधान संशोधन अभी प्रस्तावित है।
➤ अनुच्छेद 243 ङ (E) – पंचायतों की अवधि
➤ अनुच्छेद 243 ङ(1) के अनुसार पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल उनकी प्रथम बैठक की तिथि से 5 वर्ष निर्धारित किया गया है।
➤ अनुच्छेद 243 ङ(3)(क) के अनुसार कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही चुनाव कराना आवश्यक है।
➤ अनुच्छेद 243 ङ(3)(ख) के अनुसार यदि किसी पंचायती राज संस्था को कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग कर दिया जाता है, तो उसके विघटन की तिथि से 6 माह के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य होगा।
➤ अनुच्छेद 243 च (F) – सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
- पंचायती राज संस्थाओं के किसी भी स्तर का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई है।
➤ अनुच्छेद 243 छ (G) – पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार एवं उत्तरदायित्व
- 11वीं अनुसूची के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं को 29 विषयों पर कानून बनाने एवं कार्य करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
| क्रमांक | विषय |
|---|---|
| 1 | कृषि |
| 2 | भूमि सुधार एवं मृदा संरक्षण |
| 3 | लघु सिंचाई, जल प्रबंधन एवं जलग्रहण विकास |
| 4 | पशुपालन, डेयरी एवं मुर्गीपालन |
| 5 | मत्स्य पालन |
| 6 | सामाजिक वानिकी एवं कृषि वानिकी |
| 7 | लघु वन उत्पादन |
| 8 | लघु उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सहित |
| 9 | खादी एवं ग्रामीण कुटीर उद्योग |
| 10 | ग्रामीण आवास |
| 11 | पेयजल |
| 12 | ईंधन एवं चारा |
| 13 | सड़कें, नालियाँ, पुल एवं जलमार्ग |
| 14 | सार्वजनिक वितरण प्रणाली |
| 15 | सामुदायिक संपत्ति का रखरखाव |
| 16 | शिक्षा, प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय सहित |
| 17 | तकनीकी प्रशिक्षण एवं व्यावसायिक शिक्षा |
| 18 | प्रौढ़ एवं अनौपचारिक शिक्षा |
| 19 | पुस्तकालय |
| 20 | सांस्कृतिक गतिविधियाँ |
| 21 | बाजार एवं मेले |
| 22 | स्वास्थ्य, स्वच्छता, अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं डिस्पेंसरी |
| 23 | परिवार कल्याण |
| 24 | महिला एवं बाल विकास |
| 25 | समाज कल्याण तथा विकलांगों का कल्याण |
| 26 | कमजोर वर्गों का कल्याण, विशेषकर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति |
| 27 | ग्रामीण विद्युतीकरण एवं विद्युत वितरण |
| 28 | गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत |
| 29 | गरीबी उन्मूलन |
➤ अनुच्छेद 243 ट (K) – पंचायतों के लिए निर्वाचन
- राज्य निर्वाचन आयोग को पंचायती राज संस्थाओं की निर्वाचक नामावली तैयार करने तथा उनके चुनाव सम्पन्न कराने की जिम्मेदारी दी गई है।
❖ राजस्थान पंचायती राज अधिनियम
- राजस्थान के राज्यपाल ने 23 अप्रैल 1994 को राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 को स्वीकृति प्रदान की।
➤ वार्ड सभा
- राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 के अध्याय-2 में वार्ड सभा का उल्लेख किया गया है।
- मूल अधिनियम में वार्ड सभा का प्रावधान नहीं था। इसे वर्ष 2000 में संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया।
- संबंधित वार्ड में निवास करने वाले सभी वयस्क व्यक्ति वार्ड सभा के सदस्य होते हैं।
- वार्ड सभा की प्रत्येक वर्ष कम से कम 2 बैठकें आयोजित की जाती हैं।
- बैठक की गणपूर्ति (कोरम) के लिए कुल सदस्यों के 1/10 (10%) की उपस्थिति आवश्यक होती है।
- वार्ड सभा की बैठक की अध्यक्षता वार्ड पंच द्वारा की जाती है।
➤ ग्राम सभा
- राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 के अध्याय-2 (क) की धारा 8 के अंतर्गत ग्राम सभा के गठन का प्रावधान किया गया है।
- प्रत्येक ग्राम पंचायत के लिए एक ग्राम सभा होगी, जिसके सदस्य उस पंचायत क्षेत्र के गाँवों के सभी पंजीकृत मतदाता होंगे।
- ग्राम सभा की प्रत्येक वर्ष कम से कम 2 बैठकें आयोजित करना अनिवार्य है।
नोट – राजस्थान पंचायती राज (उपबन्धों का अनुसूचित क्षेत्रों में लागू होने के सम्बन्ध में उपान्तरण) नियम, 2011 के अनुसार राजस्थान में ग्राम सभाओं की संयुक्त बैठक आयोजित करने का प्रावधान है।
- संयुक्त बैठक की अध्यक्षता सरपंच द्वारा की जाती है।
- संयुक्त बैठक में प्रत्येक ग्राम सभा से 5% सदस्य अथवा 10 सदस्य, इनमें से जो संख्या कम हो, उसकी उपस्थिति अनिवार्य होती है।
- धारा 8(ख) के अनुसार बैठक की गणपूर्ति (कोरम) के लिए कुल सदस्य संख्या के 1/10 (10%) की उपस्थिति आवश्यक है।
- धारा 8(ग) के अनुसार ग्राम सभा की बैठक की अध्यक्षता सरपंच करता है। यदि सरपंच अनुपस्थित हो, तो उपस्थित सदस्य बहुमत से किसी एक सदस्य का चयन अध्यक्षता के लिए करते हैं।
❖ पंचायती राज का त्रिस्तरीय ढाँचा
(1) ग्राम पंचायत
- ग्राम पंचायत गाँव स्तर की स्थानीय स्वशासन संस्था है।
- इसका राजनीतिक प्रमुख सरपंच होता है।
- चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित है।
- प्रशासनिक प्रमुख ग्राम विकास अधिकारी (V.D.O.) होता है।
- वार्ड पंचों का निर्वाचन प्रत्यक्ष मतदान द्वारा किया जाता है।
- सरपंच का चुनाव प्रत्यक्ष निर्वाचन से जनता द्वारा किया जाता है, जबकि उपसरपंच का चुनाव निर्वाचित वार्ड पंच अपने मध्य से करते हैं।
- वार्ड पंच, उपसरपंच एवं सरपंच को पीठासीन अधिकारी द्वारा शपथ दिलाई जाती है।
- वार्ड पंच, उपसरपंच तथा सरपंच अपना त्यागपत्र खण्ड विकास अधिकारी (BDO) को प्रस्तुत करते हैं।
- 3 हजार तक की जनसंख्या वाले क्षेत्र में न्यूनतम 5 पंच निर्धारित किए गए हैं।
- ग्राम पंचायत की बैठक प्रत्येक 15 दिन में कम से कम एक बार आयोजित की जाती है।
- ग्राम विकास अधिकारी, संबंधित पंचायत समिति के सदस्य तथा जिला परिषद के सदस्य ग्राम पंचायत के पदेन सदस्य होते हैं।
(2) पंचायत समिति
- पंचायत समिति का गठन खण्ड (मध्य) स्तर पर किया जाता है।
- इसका राजनीतिक प्रमुख प्रधान होता है।
- चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित है।
- प्रशासनिक प्रमुख खण्ड विकास अधिकारी (B.D.O.) होता है।
- पंचायत समिति के सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष मतदान द्वारा किया जाता है।
- प्रधान एवं उपप्रधान का चुनाव निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने मध्य से अप्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से किया जाता है।
- पंचायत समिति के सदस्यों को पीठासीन अधिकारी शपथ दिलाता है, जबकि प्रधान एवं उपप्रधान को उपखण्ड अधिकारी द्वारा शपथ ग्रहण कराई जाती है।
- पंचायत समिति सदस्य तथा उपप्रधान अपना त्यागपत्र प्रधान को देते हैं, जबकि प्रधान अपना त्यागपत्र जिला प्रमुख को प्रस्तुत करता है।
- 1 लाख तक की जनसंख्या वाले क्षेत्र में न्यूनतम 15 सदस्य निर्धारित किए गए हैं।
- पंचायत समिति की बैठक प्रत्येक 1 माह में कम से कम एक बार आयोजित की जाती है।
- खण्ड विकास अधिकारी, संबंधित क्षेत्र के विधायक, सांसद, जिला परिषद सदस्य तथा उस पंचायत समिति के अंतर्गत आने वाली सभी ग्राम पंचायतों के सरपंच इसके पदेन सदस्य होते हैं।
(3) जिला परिषद
- जिला परिषद का गठन जिला (शीर्ष) स्तर पर किया जाता है।
- इसका राजनीतिक प्रमुख जिला प्रमुख होता है।
- चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई है।
- प्रशासनिक प्रमुख मुख्य कार्यकारी अधिकारी (C.E.O.) होता है।
- जिला परिषद के सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष मतदान द्वारा किया जाता है।
- जिला प्रमुख एवं उपजिला प्रमुख का चुनाव निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने मध्य से अप्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से किया जाता है।
- जिला परिषद के सदस्यों को पीठासीन अधिकारी (जिला कलेक्टर) शपथ दिलाते हैं, जबकि जिला प्रमुख एवं उपजिला प्रमुख को भी जिला कलेक्टर द्वारा शपथ ग्रहण कराई जाती है।
- जिला परिषद सदस्य एवं उपजिला प्रमुख अपना त्यागपत्र जिला प्रमुख को देते हैं, जबकि जिला प्रमुख अपना त्यागपत्र संभागीय आयुक्त को प्रस्तुत करता है।
- 4 लाख तक की जनसंख्या वाले जिले में न्यूनतम 17 सदस्य निर्धारित किए गए हैं।
- जिला परिषद की बैठक प्रत्येक 3 माह में कम से कम एक बार आयोजित की जाती है।
- मुख्य कार्यकारी अधिकारी, संबंधित जिले के सभी सांसद, सभी विधायक तथा जिले की सभी पंचायत समितियों के प्रधान इसके पदेन सदस्य होते हैं।
❖ सदस्यों को हटाया जाना / निलंबन
➤ राजस्थान पंचायती राज अधिनियम की धारा 38 के अनुसार राज्य सरकार आवश्यक जाँच के उपरांत पंचायती राज संस्थाओं के किसी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष अथवा सदस्य को पद से हटा सकती है।
ऐसी कार्रवाई निम्न परिस्थितियों में की जा सकती है—
- यदि संबंधित व्यक्ति अपने दायित्वों का निर्वहन करने में असमर्थ हो।
- यदि वह अपने कर्तव्यों का पालन करने से इंकार कर दे।
- यदि वह किसी अनुचित आचरण अथवा कदाचार का दोषी पाया जाए।
❖ पेसा (पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996
- पंचायती राज संस्थाओं को अधिक सशक्त बनाने के उद्देश्य से 24 दिसम्बर 1996 को यह अधिनियम 10 राज्यों के जनजातीय (अनुसूचित) क्षेत्रों में लागू किया गया।
➤ यह अधिनियम निम्न राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों में लागू है—
-
- राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, झारखंड तथा ओडिशा।
- इस अधिनियम को दिलीप सिंह भूरिया समिति द्वारा 1995 में प्रस्तुत रिपोर्ट की अनुशंसाओं के आधार पर लागू किया गया।
- पेसा अधिनियम का मुख्य उद्देश्य जनजातीय समुदायों की परम्पराओं, रीति-रिवाजों तथा उनकी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था का संरक्षण करना है।
- इस अधिनियम के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभाओं को व्यापक अधिकार प्रदान किए गए हैं।
- ग्राम सभा से परामर्श किए बिना भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया नहीं की जा सकती।
- नशा नियंत्रण से संबंधित अधिकार भी ग्राम सभा को प्रदान किए गए हैं।
❖ राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की अध्याय एवं धाराएँ
अध्याय–1 : प्रारम्भिक
- धारा (1) – अधिनियम का संक्षिप्त नाम, प्रसार एवं प्रारम्भ।
- धारा (2) – विभिन्न परिभाषाओं का उल्लेख, जिसमें ग्राम सभा की परिभाषा भी शामिल है।
अध्याय–2 : वार्ड सभा
- धारा (3) – वार्ड सभा तथा उसकी बैठकों का प्रावधान।
- धारा (4) – वार्ड सभा की बैठक के लिए गणपूर्ति (कोरम) कुल सदस्य संख्या का 1/10 (10%) निर्धारित किया गया है।
- धारा (5) – वार्ड सभा की बैठक की अध्यक्षता संबंधित वार्ड पंच करता है।
- धारा (6) – संकल्प से संबंधित प्रावधान।
- धारा (7) – वार्ड सभा के कार्य एवं कर्तव्य।
- धारा (8) – सतर्कता समिति का प्रावधान।
- धारा 8(क) – ग्राम सभा एवं उसकी बैठकों का प्रावधान।
- धारा 8(ख) – बैठक की गणपूर्ति (कोरम)।
- धारा 8(ग) – पीठासीन अधिकारी का प्रावधान।
- धारा 8(घ) – ग्राम सभा से संबंधित कोई भी संकल्प बैठक में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत से पारित किया जाएगा।
- धारा 8(ङ) – ग्राम सभा के कार्य एवं कर्तव्य।
अध्याय–3 : पंचायती राज संस्थाएँ
- धारा (9) – ग्राम पंचायत का गठन।
- धारा (10) – पंचायत समिति का गठन।
- धारा (11) – जिला परिषद का गठन।
- धारा (12) – ग्राम पंचायत की संरचना।
- धारा (13) – पंचायत समिति की संरचना।
- धारा (14) – जिला परिषद की संरचना।
- 4 लाख तक की जनसंख्या वाले जिले में 17 निर्वाचन क्षेत्र निर्धारित किए गए हैं।
- यदि जनसंख्या 4 लाख से अधिक हो, तो प्रत्येक अतिरिक्त 1 लाख अथवा उसके किसी भाग पर 17 की संख्या में 2 निर्वाचन क्षेत्रों की वृद्धि की जाएगी।
- धारा (15) – अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान।
- धारा (16) – सरपंच, प्रधान एवं जिला प्रमुख के पदों पर आरक्षण संबंधी व्यवस्था।
- धारा (17) – पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल एवं निर्वाचन।
- धारा (18) – निर्वाचक एवं निर्वाचक नामावली।
- धारा (19) – पंच अथवा सदस्य के निर्वाचन हेतु योग्यता एवं आयु का प्रावधान।
- धारा (19A) – किसी व्यक्ति द्वारा पंचायती राज संस्थाओं की एक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध।
- धारा (20) – एक ही समय में किसी व्यक्ति द्वारा दो या अधिक पंचायती राज संस्थाओं की सदस्यता ग्रहण करने पर प्रतिबंध।
- धारा (29) – जिला प्रमुख एवं उपजिला प्रमुख के निर्वाचन का प्रावधान।
- धारा (30) – अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सदस्यों के कार्यकाल का प्रावधान।
- धारा (32) – सरपंच एवं उपसरपंच की शक्तियाँ, कार्य एवं कर्तव्य।
- धारा (32) – प्रधान की शक्तियाँ, कार्य एवं कर्तव्य।
- धारा (45) – ग्राम पंचायत की बैठकें प्रत्येक 15 दिन में कम से कम एक बार आयोजित की जाएँगी।
- धारा (46) – पंचायत समिति की बैठक प्रत्येक माह में कम से कम एक बार होगी।
- धारा (47) – जिला परिषद की बैठक प्रत्येक 3 माह में कम से कम एक बार आयोजित की जाएगी।
- धारा (50) – ग्राम पंचायत के कार्य, कर्तव्य एवं शक्तियाँ।
- धारा (51) – पंचायत समिति के कार्य एवं शक्तियाँ।
- धारा (52) – जिला परिषद के कार्य एवं शक्तियाँ।
- धारा (53) – किसी पंचायत को कर्तव्यों का समनुदेशन (Delegation)।
- धारा (81) – विकास अधिकारी की शक्तियाँ एवं कर्तव्य।
- धारा (82) – मुख्य कार्यपालक अधिकारी तथा अन्य अधिकारियों की शक्तियाँ एवं कर्तव्य।
- धारा (83) – जिला परिषद के कर्मचारीवृन्द से संबंधित प्रावधान।
- धारा (84) – मुख्य कार्यपालक अधिकारी एवं अन्य अधिकारियों की शक्तियाँ तथा कर्तव्य।
- धारा (85) – विकास अधिकारी एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी की आपातकालीन शक्तियाँ।
अध्याय–4 : राज्य सरकार आदि की शक्तियाँ
- धारा (92) – किसी पंचायती राज संस्था के संकल्प को रद्द अथवा निलंबित करने की शक्ति।
- धारा (94) – राज्य सरकार को किसी पंचायती राज संस्था को विघटित (भंग) करने का अधिकार।
- धारा (106) – नियमों एवं उपविधियों के उल्लंघन से संबंधित प्रावधान।
- धारा (107) – विवादों से संबंधित प्रावधान।
अध्याय–5 : प्रकीर्ण
- धारा (108) – सदस्य एवं अधिकारी लोक सेवक माने जाएंगे।
- धारा (118) – वित्त आयोग के गठन का प्रावधान।
- धारा (119) – राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों से संबंधित व्यवस्था।
- धारा (121) – जिला आयोजना समिति का प्रावधान।
- धारा (122) – वार्षिक प्रशासनिक रिपोर्ट।
- धारा (123) – कठिनाइयों का निराकरण।
- धारा (124) – निरसन एवं व्यावृत्तियाँ।
❖ महत्वपूर्ण बिन्दु
- 6 जनवरी 2000 से ग्राम पंचायत स्तर पर सतर्कता समिति को समाप्त कर दिया गया।
- अटल सेवा केन्द्र प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर स्थापित है।
- राजस्थान की प्रत्येक ग्राम पंचायत में सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) वर्ष में दो बार कराया जाता है।
- राजस्थान की पहली महिला सरपंच छगन बहन थीं, जो 1961 में खींचन गाँव (फलोदी) से निर्वाचित हुईं।
- राजस्थान की प्रथम महिला जिला प्रमुख नगेंद्र बाला थीं, जो कोटा से संबंधित थीं।
- राजस्थान में पंचायत प्रशिक्षण केन्द्र (P.T.C.) की कुल संख्या 6 है।
- यदि किसी पंचायती राज संस्था को विघटित (भंग) कर दिया जाता है, तो उसका निर्वाचन 6 माह के भीतर कराया जाना आवश्यक है। नवगठित संस्था केवल पूर्व संस्था के शेष कार्यकाल तक ही कार्य करेगी।
- यदि विघटन के बाद संस्था का शेष कार्यकाल 6 माह से कम हो, तो पुनः चुनाव कराना आवश्यक नहीं होता।
- राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 में संशोधन कर 2021 में पंचायत समिति एवं जिला परिषद के गठन से संबंधित प्रावधानों में परिवर्तन किया गया।
- धारा 89(2) में पहले ग्राम सेवक का उल्लेख था, जिसे राजस्थान पंचायती राज (संशोधन) अधिनियम, 2021 के माध्यम से बदलकर ग्राम विकास अधिकारी कर दिया गया।
➤ नवम्बर 2020 तक राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव 11 बार सम्पन्न हो चुके हैं—
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- 1960, 1965, 1978, 1981, 1988, 1995, 2000, 2005, 2010, 2015 तथा 2020।
- वित्त आयोग द्वारा ग्राम पंचायतों को अनुदान प्रदान किया जाता है।
- जिला स्थापन समिति का अध्यक्ष जिला प्रमुख होता है।
- राजस्थान में स्थानीय स्वशासन विभाग एवं स्थानीय निकाय निदेशालय का मुख्यालय जयपुर में स्थित है।
➤ पंचायती राज संस्थाओं के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को निम्न संस्थानों द्वारा प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है—
| संस्थान | स्थान |
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| ग्राम विकास अधिकारी प्रशिक्षण केन्द्र | मंडोर (जोधपुर) |
| पंचायत प्रशिक्षण केन्द्र | डूंगरपुर |
| पंचायत प्रशिक्षण केन्द्र | अजमेर |
| हरिश्चन्द्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान (HCM RIPA) | जयपुर एवं उदयपुर |
| इंदिरा गांधी पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास संस्थान | जयपुर |
