जयपुर का इतिहास

इस भाग में क्या पढ़ेंगे

जयपुर का इतिहास

  • जयपुर पर कछवाहा वंश का शासन रहा, जिसे भगवान राम के पुत्र कुश का वंशज माना जाता है।
  • इस वंश की कुलदेवी जमवाय माता हैं।
  • आमेर दुर्ग स्थित शीला देवी को कछवाहा शासकों की आराध्य देवी के रूप में पूजा जाता था।
  • आमेर में स्थित अम्बिकेश्वर महादेव कछवाहा वंश के कुलदेवता हैं।
  • जयपुर के गोविंद देव जी इस वंश के आराध्य देवता माने जाते हैं।
  • प्राचीन समय में वर्तमान जयपुर क्षेत्र को ढूंढाड़ के नाम से जाना जाता था।

❖ राजधानी

राजधानी विवरण
दौसा 1137 ई. में दूलहेराय ने बड़गुर्जरों को पराजित कर इसे अपनी राजधानी बनाया।
मांची / जमवारामगढ़ 1137 ई. में दूलहेराय ने मीणाओं को हराकर इसे राजधानी के रूप में स्थापित किया।
आमेर 1207 ई. में कोकिलदेव ने मीणाओं को परास्त कर राजधानी आमेर स्थानांतरित की।
जयपुर 1727 ई. में सवाई जयसिंह ने नई राजधानी जयपुर की स्थापना की।

❖ दूलहेराय / तेजकरण / ढोला

  • दूलहेराय का मूल नाम सालहकुमार था।
  • इन्हें कछवाहा वंश का संस्थापक, आदि पुरुष तथा मूल पुरुष माना जाता है।
  • इन्होंने रामगढ़ में जमवाय माता का मंदिर बनवाया।

❖ ढोला-मारू की प्रेम कहानी

  • ढोला मध्यप्रदेश के नरवर के शासक सोडा के पुत्र थे।
  • मारू, बीकानेर के पूंगलगढ़ के शासक पूंगल की पुत्री थीं।
  • ढोला और मारू का विवाह पुष्कर में संपन्न हुआ।
  • विवाह के समय ढोला की आयु 3 वर्ष तथा मारू की आयु 1.5 वर्ष थी।

❖ कोकिलदेव

  • 1207 ई. में मीणाओं को पराजित कर आमेर को अपनी राजधानी बनाया।
  • इन्होंने अम्बिकेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवाया।

❖ पंचवनदेव

  • पृथ्वीराज चौहान ने इन्हें महोबा का प्रशासक नियुक्त किया।
  • तराईन के युद्ध में युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

❖ राजदेव

  • आमेर में कदमी महल का निर्माण करवाया।
  • इस महल में आमेर के शासकों का राजतिलक मीणाओं द्वारा किया जाता था।

❖ पृथ्वीराज कछवाहा

  • इन्होंने आमेर राज्य को अपने 12 पुत्रों के बीच विभाजित कर दिया।
  • इसी कारण आमेर को 12 कोटड़ी कहा जाने लगा।

➤ प्रमुख जागीरें निम्नलिखित थीं—

    • राजावत
    • नाथावत
    • खंगारोत
    • बांकावत
  • 1527 ई. के खानवा के युद्ध में राणा सांगा की ओर से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
  • इनके शासनकाल में जयपुर के गलता जी में कृष्णदास पयहारी ने रामानंदी संप्रदाय की स्थापना की।

❖ रतनसिंह

  • इन्होंने शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार कर ली।

❖ भारमल (1547–1574 ई.)

  • 1562 ई. में जब बादशाह अकबर अजमेर की तीर्थयात्रा पर आया, तब चगताई खाँ की सहायता से भारमल की अकबर से भेंट हुई।
  • 6 फरवरी 1562 को सांभर में भारमल ने अपनी पुत्री हरका बाई / मानमति / शाही बाई का विवाह अकबर से कराया।
  • इस विवाह से सलीम (जहाँगीर) का जन्म हुआ। बाद में जहाँगीर ने अपनी माता हरका बाई को मरियम-उज़-ज़मानी की उपाधि प्रदान की।
  • भारमल राजपूताना के प्रथम शासक थे जिन्होंने मुगलों की अधीनता स्वीकार की तथा उनसे वैवाहिक संबंध स्थापित किए।
  • अकबर ने भारमल को 5000 का मनसबदार नियुक्त किया तथा राजा एवं अमीर-उल-उमरा की उपाधियाँ प्रदान कीं।

नोट – 1556 ई. में मजनू खाँ ने नारनौल (दिल्ली) में अकबर और भारमल की पहली मुलाकात कराई थी।

❖ भगवंत दास कछवाहा (1574–1589 ई.)

  • अकबर ने इन्हें भी अमीर-उल-उमरा की उपाधि प्रदान की तथा 5000 का मनसबदार बनाया।
  • 1568 ई. के चित्तौड़ आक्रमण में इन्होंने अकबर का साथ दिया।
  • 13 फरवरी 1585 को भगवंत दास ने अपनी पुत्री मानबाई का विवाह जहाँगीर से कराया।
  • इस दंपति से खुसरो का जन्म हुआ।

❖ मिर्जा राजा मानसिंह (1589–1614 ई.)

  • 1550 ई. में मौजमाबाद (जयपुर) में जन्म हुआ।
  • मात्र 12 वर्ष की आयु में मुगल दरबार में चले गए।
  • इन्होंने अकबर तथा जहाँगीर—दोनों की सेवा की।
  • अकबर ने इन्हें फर्जन्द (पुत्र) तथा मिर्जा राजा की उपाधियाँ प्रदान कीं।
  • 1569 ई. में अपने पिता भगवंत दास के साथ रणथंभौर के सर्जन हाड़ा के विरुद्ध अपना पहला सैन्य अभियान संचालित किया।
  • 1572 ई. के सरनाल युद्ध (गुजरात) में इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • 1573 ई. में मिर्जा राजा मानसिंह ने डूंगरपुर के शासक आस्करण को युद्ध में पराजित कर अपनी सैन्य क्षमता का परिचय दिया।

❖ काबुल की सूबेदारी (1585–1587 ई.)

  • अकबर ने अपने सौतेले भाई मिर्जा हाकिम के विद्रोह को शांत करने के लिए मिर्जा राजा मानसिंह को काबुल भेजा।
  • काबुल में मिर्जा हाकिम को पराजित करने के बाद अकबर ने मिर्जा राजा मानसिंह को 5000 जात-सवार का मनसबदार नियुक्त किया तथा मिर्जा राजा की उपाधि से सम्मानित किया।
  • काबुल के पाँच कबीलों पर विजय प्राप्त करने के उपरांत उन कबीलों ने अपने ध्वज का एक-एक भाग फाड़कर मानसिंह को भेंट किया।
  • इन्हीं पाँच रंगों से बने पचरंगे ध्वज को आगे चलकर जयपुर का राजकीय ध्वज बनाया गया।

❖ बिहार की सूबेदारी (1587–1594 ई.)

  • काबुल से स्थानांतरण के बाद मिर्जा राजा मानसिंह को बिहार का सूबेदार बनाया गया, क्योंकि वहाँ के स्थानीय जागीरदार विद्रोह कर रहे थे।
  • वे दो बार बिहार के सूबेदार रहे तथा अपने कार्यकाल में मानपुर नगर की स्थापना करवाई।
  • 1592 ई. में इन्होंने उड़ीसा के अफगान शासकों नासिर खाँ और कलू खाँ को पराजित किया तथा पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर को अकबर के अधिकार में कराया।

❖ बंगाल की सूबेदारी (1594–1605 ई.)

  • 1594 ई. में अकबर ने मिर्जा राजा मानसिंह को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया।
  • वे तीन बार बंगाल के सूबेदार रहे।
  • 1604 ई. में पूर्वी बंगाल के शासक केदार कायत को पराजित कर जस्सोर से शीला देवी की प्रतिमा आमेर लेकर आए।
  • 1605 ई. में बंगाल पर विजय प्राप्त करने के बाद अकबर ने उन्हें 7000 का मनसबदार बनाया, किंतु बाद में जहाँगीर ने उनकी मनसबदारी में कमी कर दी।
  • बंगाल में इन्होंने अकबरपुर नगर की स्थापना की, जिसे वर्तमान में राजमहल के नाम से जाना जाता है।

नोट – 

अकबर ने 7000 की मनसबदारी केवल दो व्यक्तियों को प्रदान की थी—

क्रम नाम
1. मिर्जा राजा मानसिंह
2. मिर्जा अज़ीज़ कोका

हिन्दू मनसबदारों का सर्वाधिक प्रतिशत औरंगजेब के शासनकाल में 33% था, जबकि अकबर के समय यह 22% था।

❖ कला, स्थापत्य एवं साहित्य

  • मिर्जा राजा मानसिंह ने वृन्दावन (उत्तर प्रदेश) में गोविंद देव जी मंदिर का निर्माण कराया, जिसके वास्तुकार गोविन्द दास थे।
  • बाद में सवाई जयसिंह ने गोविंद देव जी की प्रतिमा को जयपुर लाकर चन्द्रमहल के समीप पुनः स्थापित कराया।
  • मिर्जा राजा मानसिंह अकबर के नवरत्नों में सम्मिलित थे।
  • इनके दरबारी कवि पुण्डरीक विट्ठल ने रागमाला, रागचंद्रोदय, रागमंजरी, नर्तन निर्णय तथा दूनी प्रकाश जैसे ग्रंथों की रचना की।
  • कवि नरोत्तम ने मानचरित्र रासो, राय मुरारीदान ने मानप्रकाश, तथा जगन्नाथ ने मानसिंह कीर्ति मुक्तावली ग्रंथ की रचना की।
  • हरिनाथ, सुंदरदास, हापा बारहट तथा जगन्नाथ मिर्जा राजा मानसिंह के प्रमुख दरबारी विद्वानों में शामिल थे।
  • 1614 ई. में इलिचपुर (महाराष्ट्र) में मिर्जा राजा मानसिंह का निधन हुआ।

❖ भावसिंह (1614–1621 ई.)

❖ मिर्जा राजा जयसिंह (1621–1667 ई.)

  • जयपुर के शासकों में 46 वर्ष का सबसे लंबा शासनकाल मिर्जा राजा जयसिंह का रहा।
  • इन्होंने तीन मुगल बादशाहों के शासनकाल में महत्वपूर्ण सेवाएँ दीं।
मुगल बादशाह प्रमुख कार्य
जहाँगीर अहमदनगर अभियान में अम्बर की ओर से भाग लिया।
शाहजहाँ कंधार अभियान में भाग लिया। शाहजहाँ ने इन्हें मिर्जा राजा की उपाधि तथा 5000 का मनसब प्रदान किया।
औरंगजेब शिवाजी के विरुद्ध चलाए गए अभियान का नेतृत्व किया।
  • शाहजहाँ के साथ बीजापुर और गोलकुण्डा अभियानों में भाग लेकर दक्षिण भारत गए।
  • शाहशुजा के विरुद्ध भेजी गई मुगल सेना का नेतृत्व भी इन्होंने किया।

❖ शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार संघर्ष

➤ बहादुरपुर का युद्ध — फरवरी 1658 ई.
  • शाहशुजा को परास्त करने के लिए शाहजहाँ ने दाराशिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह तथा मिर्जा राजा जयसिंह को भेजा।
  • बनारस के निकट हुए इस युद्ध में शाहशुजा पर विजय प्राप्त हुई।
  • इस सफलता से प्रसन्न होकर शाहजहाँ ने मिर्जा राजा जयसिंह को 6000 का मनसबदार बनाया।
➤ धरमत (उज्जैन) का युद्ध — 15 अप्रैल 1658 ई.
  • यह युद्ध औरंगजेब एवं मुरादबख्श तथा दाराशिकोह, मारवाड़ के शासक जसवंत सिंह और मिर्जा राजा जयसिंह के मध्य हुआ।
  • इस युद्ध में औरंगजेब विजयी रहा।
➤ सामूगढ़ का युद्ध — 29 मई 1658 ई.
  • यह युद्ध औरंगजेब और मुराद के विरुद्ध दाराशिकोह के मध्य लड़ा गया।
  • इस युद्ध में भी औरंगजेब को विजय प्राप्त हुई।
➤ दोराई (अजमेर) का युद्ध — 14 मार्च 1659 ई.
  • यह युद्ध औरंगजेब एवं मिर्जा राजा जयसिंह (नेतृत्वकर्ता) तथा दाराशिकोह के मध्य हुआ।
  • इस युद्ध में औरंगजेब विजयी रहा।

❖ पुरन्दर की संधि — 11 जून 1665 ई.

  • पुरन्दर की संधि शिवाजी और मिर्जा राजा जयसिंह के बीच सम्पन्न हुई।
  • इस समझौते के अंतर्गत शिवाजी ने अपने 35 किलों में से 23 किले मुगलों को सौंप दिए।
  • संधि के अनुसार शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को 5000 का मनसबदार बनाया जाना था।
  • इस संधि की मध्यस्थता रघुनाथ पंडित अत्रे ने की।

❖ कला एवं साहित्य

  • मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार में कवि बिहारीलाल को विशेष सम्मान प्राप्त था।
  • बिहारीलाल ने बिहारी सतसई ग्रंथ की रचना की, जिसमें कुल 713 दोहे संकलित हैं।
  • मिर्जा राजा जयसिंह प्रत्येक दोहे पर बिहारीलाल को सोने की एक अशर्फी पुरस्कारस्वरूप प्रदान करते थे।
  • बिहारीलाल के भांजे कुलपति मिश्र भी मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार से जुड़े थे। उन्होंने कुल 52 ग्रंथों की रचना की।
  • रामकवि ने जयसिंह चरित्र नामक ग्रंथ की रचना की।
  • मिर्जा राजा जयसिंह का निधन बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) में हुआ।

❖ सवाई जयसिंह द्वितीय (1700–1743 ई.)

  • सवाई जयसिंह द्वितीय के पिता बिशनसिंह थे।
  • इन्होंने अपने जीवनकाल में 7 मुगल बादशाहों की सेवा की।
  • इनका मूल नाम विजयसिंह था। बाद में औरंगजेब ने इनका नाम बदलकर जयसिंह रखा तथा उनकी वाक्पटुता से प्रभावित होकर सवाई की उपाधि प्रदान की।
  • इसी के बाद से जयपुर के सभी शासकों के नाम के साथ सवाई उपाधि का प्रयोग किया जाने लगा।

❖ जाजू का युद्ध — 1707 ई.

  • यह युद्ध औरंगजेब के पुत्र आजम तथा मुअज्जम के मध्य लड़ा गया।
  • इस संघर्ष में सवाई जयसिंह ने आजम का समर्थन किया, किंतु युद्ध में आजम पराजित हुआ और मुअज्जम विजयी रहा।
  • विजय प्राप्त करने के बाद मुअज्जम ने बहादुर शाह प्रथम की उपाधि धारण की तथा विजयसिंह (सवाई जयसिंह) को पुनः आमेर का शासक नियुक्त किया।
  • बहादुर शाह प्रथम ने आमेर का नाम बदलकर मोमिनाबाद रखा तथा सैयद हुसैन खाँ को वहाँ का फौजदार नियुक्त किया।

❖ देबारी (उदयपुर) समझौता — 1708 ई.

  • यह समझौता सवाई जयसिंह (जयपुर), अजीतसिंह (मारवाड़) तथा महाराणा अमरसिंह द्वितीय (मेवाड़) के मध्य हुआ।
  • समझौते में यह निर्णय लिया गया कि अजीतसिंह को मारवाड़ तथा सवाई जयसिंह को आमेर का शासक बनाया जाएगा।
  • साथ ही महाराणा अमरसिंह द्वितीय ने अपनी पुत्री चंद्रकुंवरी का विवाह सवाई जयसिंह से इस शर्त पर करने का निर्णय लिया कि उनसे उत्पन्न पुत्र ही भविष्य में आमेर का शासक बनेगा।

❖ बूंदी के उत्तराधिकार में हस्तक्षेप

  • बूंदी के शासक राव बुद्धसिंह की पत्नी अमर कुंवरी, जो सवाई जयसिंह की बहन थीं, ने अपने पुत्र उम्मेदसिंह के समर्थन में मराठा सरदार राव होल्कर को आमंत्रित किया।
  • इसका कारण यह था कि सवाई जयसिंह दलेलसिंह को बूंदी का शासक बनाना चाहते थे।

❖ भरतपुर विवाद

  • सवाई जयसिंह ने बदनसिंह को ब्रजराज की उपाधि प्रदान की तथा डीग की जागीर भी दी।
  • मुहम्मद शाह रंगीला ने सवाई जयसिंह को राज राजेश्वर, राजाधिराज सवाई तथा सरमद-ए-राजा-ए-हिंद जैसी उपाधियों से सम्मानित किया।
  • अनेक इतिहासकारों ने सवाई जयसिंह को उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता के कारण चाणक्य की संज्ञा दी है।

❖ हुरड़ा (भीलवाड़ा) सम्मेलन — 17 जुलाई 1734 ई.

  • इस सम्मेलन के योजनाकर्ता सवाई जयसिंह थे।
  • इसका मुख्य उद्देश्य मराठों के बढ़ते आक्रमणों का सामना करने के लिए राजपूताना के सभी शासकों को एक मंच पर लाना था।
  • सम्मेलन की अध्यक्षता मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने की।

➤ सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रमुख शासक—

राज्य प्रतिनिधि
बूंदी दलेलसिंह
मारवाड़ अभयसिंह
बीकानेर जोरावर सिंह
करौली गोपालसिंह

❖ धौलपुर समझौता — 1741 ई.

  • 1741 ई. में सवाई जयसिंह और पेशवा बालाजी बाजीराव के मध्य धौलपुर समझौता सम्पन्न हुआ।

❖ मालवा की सूबेदारी

  • सवाई जयसिंह कुल तीन बार मालवा के सूबेदार नियुक्त किए गए।
  • 1713 ई. में फर्रूखशियर ने उन्हें 7000 का मनसबदार बनाकर मालवा का सूबेदार नियुक्त किया।
  • इसके बाद मुहम्मद शाह रंगीला ने उन्हें दो बार मालवा का सूबेदार बनाया।

❖ जयपुर की स्थापना — 18 नवंबर 1727 ई.

  • 18 नवंबर 1727 ई. को जयपुर नगर की स्थापना की गई।
  • इसकी नींव पंडित जगन्नाथ सम्राट ने रखी।
  • जयपुर के वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य, जो मूलतः बंगाल के थे, थे।
  • नगर का निर्माण 9 वर्ग सिद्धांत के आधार पर किया गया।
  • जयपुर को भारत का प्रथम नियोजित (Planned) नगर माना जाता है।
  • सी. वी. रमन ने जयपुर को रंग श्री द्वीप (Island of Glory) की संज्ञा दी।
  • नगर में 7 प्रमुख प्रवेश द्वार बनाए गए तथा इसकी सड़कों का निर्माण समकोण (Right Angle) पर किया गया।
  • बिशप हैबर के अनुसार जयपुर का परकोटा मास्को के क्रेमलिन नगर के समान दिखाई देता है।

❖ जंतर-मंतर

  • सवाई जयसिंह ने खगोलीय गणनाओं के लिए देश के विभिन्न स्थानों पर पाँच वेधशालाओं का निर्माण कराया।
क्रम वेधशाला
1. दिल्ली (सबसे प्राचीन)
2. जयपुर
3. बनारस
4. मथुरा
5. उज्जैन
  • जयपुर की वेधशाला इन सभी में सबसे बड़ी है।
  • जुलाई 2010 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
  • वर्तमान में यह भारतीय मौसम विभाग की वेधशाला के रूप में भी कार्यरत है।

❖ खगोल एवं ज्योतिष

  • 1725–1733 ई. के बीच सवाई जयसिंह ने शुद्ध नक्षत्रों पर आधारित एक खगोलीय सारणी तैयार की।
  • यह सारणी उन्होंने मुहम्मद शाह रंगीला को भेंट की, जो आगे चलकर जीज-ए-मुहम्मदशाही के नाम से प्रसिद्ध हुई।
  • इन्होंने जयसिंह कारिका नामक प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रंथ की रचना की।
  • खगोलशास्त्र का ज्ञान इन्होंने अपने गुरु जगन्नाथ से प्राप्त किया।
  • इनके दरबार में ज्योतिषी केवलराम भी थे, जिन्होंने फ्रेंच भाषा से लोगोरिथम का संस्कृत में अनुवाद किया। यह अनुवाद विभाग सारणी के नाम से जाना जाता है।

❖ साहित्य

  • पुण्डरीक रत्नाकर ने जयसिंह कल्पद्रुम ग्रंथ की रचना की।
  • श्री कृष्ण भट्ट ने ईश्वर विलास नामक महाकाव्य की रचना की। इनके अन्य प्रमुख ग्रंथ पद्म मुक्तावली, वृत्त मुक्तावली तथा राम गौतम हैं।
  • सवाई जयसिंह ने श्री कृष्ण भट्ट को कवि कलानिधि तथा राम रसाचार्य की उपाधियाँ प्रदान कीं।
  • श्री कृष्ण भट्ट ने राम-रसा (राघव गौतम) ग्रंथ की भी रचना की।

❖ सवाई जयसिंह द्वितीय : अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • सवाई जयसिंह वृंदावन से गोविंद देव जी की प्रतिमा जयपुर लेकर आए तथा चन्द्रमहल के समीप स्थित जयनिवास बाग में गोविंद देव जी मंदिर का निर्माण कराया।
  • जयपुर के शासक स्वयं को गोविंद देव जी का दीवान मानते थे।
  • सवाई जयसिंह अंतिम हिन्दू शासक थे जिन्होंने पुण्डरीक रत्नाकर के मार्गदर्शन में अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न कराया।
  • सवाई जयसिंह पहले राजपूत शासक थे जिन्होंने सती प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया तथा विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए नियम बनवाए।

❖ सवाई ईश्वरी सिंह (1743–1750 ई.)

  • देबारी समझौते के अनुसार माधोसिंह को जयपुर का शासक बनाया जाना था, लेकिन जयपुर के सरदारों ने सवाई ईश्वरी सिंह को गद्दी पर बैठाया।

❖ राजमहल (टोंक) का युद्ध — 1 मार्च 1747 ई.

  • यह युद्ध सवाई ईश्वरी सिंह एवं महाराजा सूरजमल की संयुक्त सेना तथा माधोसिंह, मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय और मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर के मध्य लड़ा गया।
  • इस युद्ध में सवाई ईश्वरी सिंह को विजय प्राप्त हुई।
  • इस विजय की स्मृति में उन्होंने सात मंजिला ईसरलाट का निर्माण करवाया, जिसे वर्तमान में सरगासूली के नाम से जाना जाता है।

❖ बगरू का युद्ध — 1748 ई.

  • यह युद्ध सवाई ईश्वरी सिंह तथा माधोसिंह और मल्हार राव होल्कर की संयुक्त सेना के बीच हुआ।
  • इस संघर्ष में सवाई ईश्वरी सिंह पराजित हुए।
  • पराजय के बाद उन्होंने माधोसिंह को पाँच परगने तथा मराठों को बड़ी धनराशि देने की शर्त स्वीकार की।
  • निर्धारित हर्जाना अदा न कर पाने के कारण 1750 ई. में मराठों के दबाव में सवाई ईश्वरी सिंह ने ईसरलाट से कूदकर आत्महत्या कर ली।

❖ सवाई माधोसिंह प्रथम (1750–1768 ई.)

  • सवाई माधोसिंह प्रथम के शासक बनने के बाद मराठों ने पुनः धनराशि की मांग की।
  • मांग पूरी न होने पर मराठा सैनिकों ने जयपुर में उपद्रव मचाया।
  • इसके उत्तर में जयपुर के नागरिकों ने मराठा सैनिकों का व्यापक कत्लेआम कर दिया।

❖ कांकोद (टोंक) का युद्ध — 1759 ई.

  • यह युद्ध सवाई माधोसिंह प्रथम और मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर के बीच हुआ।
  • इस युद्ध में सवाई माधोसिंह प्रथम विजयी रहे।

❖ भटवाड़ा (बारां) का युद्ध — 1761 ई.

  • रणथंभौर दुर्ग पर अधिकार स्थापित करने के उद्देश्य से सवाई माधोसिंह प्रथम तथा कोटा के शासक शत्रुशाल एवं जालिम सिंह झाला के मध्य युद्ध हुआ।
  • इस युद्ध में कोटा के शासक शत्रुशाल को विजय प्राप्त हुई।
  • 1763 ई. में सवाई माधोसिंह प्रथम ने सवाईमाधोपुर नगर की स्थापना की।
  • इन्होंने चाकसू (जयपुर) की शील डूंगरी पहाड़ी पर शीतला माता मंदिर का निर्माण भी करवाया।

❖ सवाई प्रतापसिंह (1778–1803 ई.)

  • सवाई प्रतापसिंह के शासनकाल में जयपुर पर मराठों के सर्वाधिक आक्रमण हुए।

❖ तुंगा (लालसोट, दौसा) का युद्ध — 28 जुलाई 1787 ई.

  • यह युद्ध मोरेल नदी के तट पर लड़ा गया।
  • इसमें सवाई प्रतापसिंह और मारवाड़ के महाराजा विजयसिंह की संयुक्त सेना का सामना महादजी सिंधिया से हुआ।
  • इस युद्ध में महादजी सिंधिया पराजित हुए।
  • पराजय के बाद महादजी सिंधिया ने कहा— “यदि मैं जीवित रहा, तो जयपुर को धूल में मिला दूँगा।”

❖ पाटन का युद्ध — 1790 ई.

  • यह युद्ध सवाई प्रतापसिंह एवं महाराजा विजयसिंह (मारवाड़) की संयुक्त सेना तथा महादजी सिंधिया और उनके फ्रांसीसी सेनापति डी-बोईन के मध्य लड़ा गया।
  • इस युद्ध में महादजी सिंधिया विजयी रहे।
  • डी-बोईन की समाधि मेड़ता (नागौर) में स्थित है।

❖ मालपुरा (टोंक) का युद्ध — 1800 ई.

  • यह युद्ध सवाई प्रतापसिंह और मराठा सरदार दौलतराव सिंधिया के मध्य हुआ।
  • इस संघर्ष में सवाई प्रतापसिंह को पराजय का सामना करना पड़ा।

❖ साहित्य एवं कला

  • सवाई प्रतापसिंह का शासनकाल जयपुर चित्रकला का स्वर्णकाल माना जाता है।
  • वे विद्वानों और संगीतज्ञों के संरक्षक होने के साथ-साथ स्वयं भी ब्रजनिधि उपनाम से ढूंढाड़ी एवं ब्रजभाषा में काव्य रचना करते थे।
  • इनके संगीत गुरु चाँद खाँ थे, जिन्होंने स्वर सागर ग्रंथ की रचना की।
  • इनके काव्य गुरु गणपति भारती थे, जिन्होंने संगीत सागर ग्रंथ लिखा।
  • देवश्री ब्रजपाल भट्ट के नेतृत्व में जयपुर में एक संगीत सम्मेलन आयोजित कराया, जिसके परिणामस्वरूप राधा गोविंद संगीत सार ग्रंथ की रचना हुई।
  • इनके दरबार में 22 संगीतज्ञ, 22 कवि, 22 ज्योतिषी तथा 22 विषय विशेषज्ञ निवास करते थे। इन विद्वानों के समूह को गंधर्व बाईसी अथवा गुणीजन खान कहा जाता था।
  • महाराष्ट्र से तमाशा लोकनाट्य परंपरा को जयपुर लाने का श्रेय इन्हें दिया जाता है। इसके प्रमुख कलाकार बंशीधर भट्ट थे।

❖ सवाई जगतसिंह द्वितीय

  • मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी का विवाह पहले मारवाड़ के शासक भीमसिंह से तय हुआ था।
  • मारवाड़ के शासक भीमसिंह की मृत्यु के बाद कृष्णा कुमारी का विवाह सवाई जगतसिंह द्वितीय से निर्धारित किया गया।

❖ गिंगोली (डीडवाना-कुचामन) का युद्ध — 1807 ई.

  • कृष्णा कुमारी के विवाह विवाद को लेकर सवाई जगतसिंह, अमीर खाँ पिंडारी तथा मारवाड़ के शासक मानसिंह के मध्य युद्ध हुआ।
  • इस युद्ध में सवाई जगतसिंह को विजय प्राप्त हुई।
  • बाद में मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह ने अमीर खाँ पिंडारी की सलाह पर अजीतसिंह चूंडावत के माध्यम से कृष्णा कुमारी को विष दिलवा दिया।
  • सवाई जगतसिंह पर नर्तकी रसकपूर का अत्यधिक प्रभाव था।
  • रसकपूर के नाम से सिक्के भी जारी किए गए।
  • 1818 ई. में इन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि की।

❖ सवाई रामसिंह द्वितीय (1835–1880 ई.)

  • अल्पायु में गद्दी पर बैठने के कारण अंग्रेज अधिकारी जॉन लुडलो ने जयपुर का प्रशासन संभाला।
  • जॉन लुडलो ने जयपुर में सती प्रथा, दास प्रथा, कन्या वध तथा दहेज प्रथा पर रोक लगाने के आदेश जारी किए।
  • 1844 ई. में उनके प्रयासों से जयपुर में सर्वप्रथम समाधि प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम में महाराजा रामसिंह द्वितीय ने अंग्रेजों की भरपूर सहायता की।
  • इस सहयोग से प्रसन्न होकर अंग्रेजों ने उन्हें सितार-ए-हिंद की उपाधि तथा कोटपूतली की जागीर प्रदान की।
  • 1844 ई. में महाराजा कॉलेज, महारानी कॉलेज, संस्कृत कॉलेज तथा महाराजा लाइब्रेरी की स्थापना करवाई।
  • 1868 ई. के अकाल राहत कार्यों के दौरान रामनिवास बाग का निर्माण कराया गया।
  • 1876 ई. में प्रिंस अल्बर्ट एडवर्ड के जयपुर आगमन पर पूरे नगर को गुलाबी रंग से सजवाया गया।
  • स्टेनले रीड ने अपनी पुस्तक रॉयल टूर टू इंडिया में पहली बार जयपुर के लिए पिंक सिटी शब्द का प्रयोग किया।
  • 1857 ई. में कला के विकास हेतु मदरसा हुनरी (वर्तमान राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट) की स्थापना की गई।
  • 1878 ई. में राम प्रकाश थिएटर की स्थापना की गई, जिसे उत्तरी भारत का पहला रंगमंच तथा पहला फारसी थिएटर माना जाता है।

❖ सवाई माधोसिंह द्वितीय

  • नाहरगढ़ दुर्ग में अपनी नौ पासवानों के लिए एक समान स्वरूप वाले नौ सुंदर महलों का निर्माण कराया।
  • इन्हें बब्बर शेर के नाम से भी जाना जाता है।
  • महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के जयपुर आगमन पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के लिए 5 लाख रुपये का आर्थिक सहयोग प्रदान किया।
  • जयपुर के सिटी पैलेस परिसर में मुबारक महल का निर्माण कराया।
  • 1902 ई. में एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह में भाग लेने के लिए इंग्लैंड गए।
  • इस यात्रा के दौरान गंगाजल से भरे चाँदी के दो विशाल जार साथ ले गए, जिन्हें गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में विश्व के सबसे बड़े जल पात्र के रूप में दर्ज किया गया। वर्तमान में ये सिटी पैलेस, जयपुर में सुरक्षित हैं।

❖ सवाई मानसिंह द्वितीय

  • जयपुर रियासत के अंतिम शासक थे।
  • इनके प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माइल थे, जिन्हें आधुनिक जयपुर का निर्माता कहा जाता है।
  • इनका विवाह बिहार की राजकुमारी गायत्री देवी से हुआ।
  • वे पोलो के उत्कृष्ट खिलाड़ी थे तथा पोलो खेलते समय उनका निधन हुआ।
  • 29 अगस्त 1949 को राजस्थान उच्च न्यायालय के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता की।
  • राजस्थान के राजप्रमुख के पद पर भी कार्य किया।
  • 1962 ई. में राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए।
  • 1965 ई. में स्पेन में भारत के राजदूत नियुक्त किए गए।

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